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"यदि कोई वस्तु स्थिर है तो वह स्थिर ही रहेगी और यदि वह गतिमान है तो स्थिर वेग से गतिशील ही रहेगी। जब तक उस पर कोई परिणामी बाह्य बल न लगाया जाय।" इसे ही गति का प्रथम नियम अर्थात जड़त्व का नियम कहते हैं। आइये हम इस नियम के विपरीत कल्पना करते हैं। जैसा हम सभी जानते हैं कि किसी भी तथ्य की अपनी कुछ शर्तें होती हैं। ठीक इसके विपरीत उस तथ्य के विरोधी तथ्य की भी अपनी कुछ शर्तें होती हैं। वास्तव में उन विरोधी तथ्यों का कारण उनकी अपनी शर्ते होती हैं। जबकि हम जड़त्व के नियम के विपरीत कल्पना करना चाहते हैं। तो हमें इस नियम की शर्तों को जानना होगा। जड़त्व के नियम की प्रमुख शर्त है आरोपित बाह्य बल की उपस्थिति। अब हमें हमारी कल्पना के लिए आधार मिल चुका है।

अब ऐसी भौतिकी की कल्पना कीजिये कि जिसमें "जड़त्व का नियम" बिना अपनी शर्त के लागू होता है। स्वाभाविक रूप से जो वस्तु स्थिर है वह स्थिर ही रहेगी और जो वस्तु गतिमान है वह स्थिर वेग से गतिशील ही रहेगी। अभी तक की हमारी कल्पना में किसी भी तरह की गलती नही हुई है। और हम जानते है कि बिना बाह्य बल की उपस्थिति में वस्तु की अवस्था में परिवर्तन नही होगा। फलस्वरूप आपका हम से, नाभिक का इलेक्ट्रान से, सूर्य का ग्रहों और उपग्रहों से... किसी भी तरह से संबंध स्थापित नही हो सकता। दूसरे शब्दों में इकाई रूपों की रचना ही नही हो पाएगी, किसी भी दो इकाइयों के संबंध की कल्पना ही नही की जा सकेगी। क्योंकि जो इकाई अथवा वस्तु (माना वस्तु की रचना पूर्व में ही हो गई हो तब) गतिशील है वह उसी दिशा में एक समान वेग से गतिशील रहेगी। शेष सभी वस्तुएँ स्थिर रहेंगी।


अभी तक आपने देखा कि किसी एक वस्तु का किसी अन्य दूसरी वस्तु से किसी भी तरह का संबंध स्थापित नही हो रहा है। अब सोचते हैं कि क्या कोई ऐसी विशिष्ट संरचना है जो प्रत्येक वस्तु का अन्य दूसरी वस्तु के साथ बिना किस बाह्य बल की उपस्थिति में संबंध स्थापित कर सके ?? क्योंकि इस कल्पना का एक मात्र साधन और आधार ब्रह्माण्ड की वह विशिष्ट संरचना ही बचती है। जो किसी भी वस्तु, इकाई या इकाई रूप का संबंध किसी अन्य भौतिकता के रूप से स्थापित कर सकती है। यदि ब्रह्माण्ड सीमित हुआ तो कुछ विशिष्ट संरचनाएँ हमारी आँखों के सामने उभर जाती हैं। जो किसी भी वस्तु, इकाई या इकाई रूप का संबंध किसी अन्य भौतिकता के रूप से स्थापित कर सकने में सहायक बन सकती हैं। परन्तु वह विशिष्ट संरचना एक बाह्य बल के रूप में उभर कर सामने आएगी। अभी तक की पूरी कल्पना और ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संरचना संभावित परिस्थितियों से सम्बंधित है। परन्तु हमें वह संरचना वर्तमान में ज्ञात नही है। 

संबंध स्थापित करने के लिए एक समान वेग से स्वतः गतिशील पिंड ही काफी है। वर्तमान में इस गति की कल्पना ही की जा सकती है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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