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क्वांटम भौतिकी के अनुसार : जहाँ अवयवों की बस्ती ही नही, वहां हमारी सोच का प्रवेश करना मानो वर्जित है।
  • मनुष्य भौतिकी को पैटर्न की दृष्टी से और घटनाओं व गुणों को उदाहरण द्वारा समझता है। यदि उसे गति, स्थिति, संरचना अथवा अस्तित्व के रूपों में कोई पैटर्न अथवा उसके समकक्ष उदाहरण दिखलाई नही देता। तब तक वह उस संरचना की गति, स्थिति अथवा रूपों को समझ नही पाता। या यूँ कहें कि मनुष्य तब तक उस भौतिकी से अनजान रहता है।
  • प्रकाश को यह जानकारी तो रहती है कि वह सरल रेखीय गति कर रहा है। तथा निर्धारित स्थान को भी यही जानकारी रहती है कि प्रकाश उसके पास तक सरल रेखा में गति करते हुए आया है। परन्तु जब हम, प्रकाश की गत्यावस्था का अध्ययन निर्देशित तंत्र के रूप में करते हैं। तब निष्कर्ष कुछ और ही प्राप्त होते हैं।
  • जिन्हें हम देखते आए हैं वे सभी प्राकृतिक हैं। प्रकृति द्वारा प्रदत्त न कि प्रकृति... और जब हम इन्ही प्राकृतिक वस्तुओं का अध्ययन अवस्था परिवर्तन के आधार पर करते हैं। तब यह प्रणाली अप्राकृतिक कहलाती है। क्योंकि इसमें सतत परिवर्तन हो रहा है। जिससे यह मालूम होता है कि व्यवस्था, अव्यवस्था की ओर अग्रसर है। अव्यवस्था का सम्बन्ध विकास से कतई नहीं है।
  • ब्रह्माण्ड के वास्तविक स्वरुप अथवा वास्तविकता को समझने में बाधक बिंदु प्रमुख रूप से अध्ययन की कार्यविधि और तथ्य अथवा सामान्य जानकारी है।
  • सैद्धांतिक प्रकरण और प्रायोगिक प्रकरण में आपसी गहरा सम्बन्ध है। सैद्धांतिक प्रकरण, प्रायोगिक प्रकरण को सत्यापित करता है। और वहीं प्रायोगिक प्रकरण, सैद्धांतिक प्रकरण को प्रमाणित करता है।
  • विज्ञान में प्रतीत होने का दो तरह से अध्ययन किया जाता है। एक तो भ्रम की स्थिति को निर्धारित करने में.. और दूसरा तब जब सैद्धांतिक रूप से हमें यह ज्ञात हो जाता है कि प्रयोगों द्वारा इसे प्रमाणित नहीं की जा सकता। यही वह स्थिति होती है जब हम प्रकृति के समकक्ष होते हैं।
  • विज्ञान न केवल ब्रह्माण्ड की प्रकृति, भौतिकता के रूपों और भविष्य की घटनाओं से हमारा परिचय करवाता है। बल्कि साथ ही साथ अविष्कार और खुशहाल ज़िंदगी जीने के सुअवसर भी प्रदान करता है।
  • बिलकुल, ब्रह्माण्ड विस्तार कर रहा है। परन्तु कैसे ?? ब्रह्माण्ड यदि संकुचित भी होता है तो मजबूरन हमें उसे विस्तार ही कहना होगा। इसे समझने के लिए सापेक्षता और विशेष सापेक्षता के सिद्धांतों को समझना होगा।
  • किसी भी घटना का विश्लेषण करने से ज्ञात होता है प्रकृति में किसी भी तरह की कमी नहीं है। परन्तु जो हुआ है, ऐसा होना ही तय था या इसके अलावा कुछ और नहीं हो सकता था। यह कहना अनुचित होगा। क्योंकि प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है संभावना पर नहीं..।
  • भौतिकी की समझ विकसित करने हेतु व्यक्ति को मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा की व्याकरण सीखनी चाहिए। क्योंकि व्याकरण हमें गणनीय, अगणनीय, मात्रा, गुणक, समूह, व्यव्हार, क्रम, समय, स्थान, कर्ता, क्रिया, कर्म, विशेषण, सापेक्ष, निरपेक्ष, गति, सूक्ष्म और स्थूल जैसे गुणों का महत्व बतलाती है। और इस महत्व को मातृभाषा की व्याकरण द्वारा इसलिए नहीं समझा जा सकता क्योंकि बचपन से ही मातृभाषा की व्याकरण का उपयोग इस मह्त्व को समझे बिना शब्दों के रूप में किया जाता है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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