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अनेकों बार साहित्य, समाज, दर्शन, गणित अथवा विज्ञान में निर्णायक मोड़ आ जाते हैं। तब हमें तय करना होता है कि हम किसे मान्यता दें अथवा न दें…  विशेषकर मान्यता प्राप्ति की दौड़ में परिभाषाओं को देखा गया है। इस निर्णायक मोड़ में सही-गलत अथवा अच्छाई- बुराई से जुड़े विकल्प नहीं होते हैं। बल्कि मान्यता प्राप्ति की दौड़ के अपने अलग विकल्प होते हैं।

सही-गलत का निर्णय उद्देश को जानकार लिया जा सकता है। जबकि अच्छाई-बुराई का निर्णय समर्थन के आधार पर किया जाता है। परन्तु हम बात कर रहे हैं मान्यता प्रदान करने के निर्णय की…  यह निर्णय किस आधार पर लिया जाना चाहिए ! क्या परिस्थितियों का इस निर्णय पर कोई प्रभाव पड़ता है ! आइये जानते हैं मान्यता प्राप्ति के निर्णायक मोड़ के बारे में...


जब बात मान्यता सम्बंधित निर्णय की हो। तब भविष्य की चिंता नहीं की जाती। जैसा की सही-गलत अथवा अच्छाई- बुराई के निर्णय लेते समय भविष्य की चिंता की जाती है। मान्यता संबंधी निर्णय ज्ञात तथ्यों अथवा ज्ञात वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर लिए जाते है। मान्यता प्रदान करने वाले व्यक्ति निम्न बिन्दुओं को ध्यान में रखते हैं।
  1. व्यक्ति निर्णय लेते समय विषय संबंधी सभी ज्ञात तथ्य ध्यान में रखता है।
  2. निर्णय करने वाला व्यक्ति ज्ञात सभी तथ्यों का अवलोकन करता है।
  3. सभी ज्ञात वैज्ञानिक पद्धतियों के पहलुओं की बारीकी से जांच करता है।
  4. विकल्प में परिवर्तन की सम्भावना कम से कम होनी चाहिए। इसके लिए वह व्यक्ति जहाँ तक हो सके परिवर्तन के घटकों और उसके आधार को ज्ञात करने की कोशिश करता है।
  5. परिवर्तन की सम्भावना होने पर ज्ञात घटकों को सीमाओं के रूप में परिभाषित करता है। और व्यापक सीमा वाले विकल्प को चुनता है। जिसमें कम से कम प्रकार की सीमाओं का वर्णन हो। 
  6. यदि कोई दो विकल्प स्वीकार करने योग्य हों तो अधिकतम सीमा (व्यापक गुण) वाले विकल्प को मान्यता देता है।
टीप : यदि निर्णय दो व्यक्तियों की मान्यताओं में से एक को चुनने का है तो उस व्यक्ति की मान्यता को स्वीकार करना चाहिए। जिसकी मान्यता में ज्ञात तथ्यों में से अधिकतम तथ्यों का अवलोकन निहित हो। और यदि दोनों की मान्यताओं में निहित तथ्यों की संख्या या अध्ययनित तथ्य एक समान हों। तो निर्णय मान्यता प्राप्ति की दौड़ से बाहर होकर सही-गलत अथवा अच्छाई-बुराई के निर्णय में तब्दील हो जाता है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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