ads

Style1

Style2

Style3[OneLeft]

Style3[OneRight]

Style4

Style5

आधारभूत ब्रह्माण्ड ?? आखिर है क्या ??

1. निर्धारित प्रकृति की क्या वजह है ??
2. आखिर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से भी पहले क्या था ??
3. किन शब्दों के द्वारा संपूर्णता की व्याख्या की जा सकती है ??
4. ब्रह्माण्ड का स्वरुप या ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संरचना कैसी है ??
5. यदि पूँछा जाए कि राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में है। तो ब्रह्माण्ड कहाँ है ??
6. किस आधार पर भौतिकता अथवा संबंधित विषयों को परिभाषित किया जाता है ??

इन सभी प्रश्नों का उत्तर “आधारभूत ब्रह्माण्ड” है। आधारभूत ब्रह्माण्ड के अस्तित्व से संबंधित आधे से अधिक प्रश्नों के उत्तर तो मात्र “आधारभूत ब्रह्माण्ड” शब्द के भौतिक अर्थ को जानने से ही प्राप्त हो जाते हैं।

भौतिकता का सीमांत दर्शन

आधारभूत ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संरचना (गणितीय मॉडल) अनंत के लिए सर्वाधिक मान को दर्शाती है। इस संरचना में शामिल होने के लिए ऐसा कुछ भी शेष नहीं रह जाता। जिसकी कल्पना भी की जा सके। याद रहे बिना आधार के कोई भी कल्पना कर पाना असंभव है। आधारभूत ब्रह्माण्ड का स्वरुप भौतिकता की सीमा को दर्शाता है। जब आप इस विशिष्ट संरचना की बनावट को समझते हैं। तब आपके मन में भी अनंत की शर्तों से जुड़े हुए प्रश्न नहीं रह जाते।


क्योंकि विशिष्ट संरचना के विश्लेषण में क्रमशः सिद्धांत, अवयव, राशियाँ, बल, कण, नियम, विषय और अवधारणाओं के एकीकरण का वर्गीकृत रूप प्राप्त होता है। इन्ही वर्गीकृत रूपों में प्रकृति, प्राकृतिक और अप्राकृतिक बिन्दुओं का और स्वाभाविक और स्वतः क्रियाओं का भी स्पष्ट वर्गीकरण दिखाई देता है।

परमाणु का नाम अमर रखा..

कुछ दिनों पहले मैंने अपनी ज्यादाद के लिए एक वारिस को चुना। वह एक परमाणु था। जिसका नाम मैंने अमर रखा। अब वह कुछ दिनों से गायब है। उस परमाणु अर्थात अमर को ढूढ़ने के लिए विज्ञान के पास कोई भी युक्ति नहीं है। हाँ, संरचना को आधार मानकर उसकी खोज की जा सकती है।

  1. संरचना से अभिप्राय : उस परमाणु का स्वतंत्र अस्तित्व होना है।
  2. दूसरी शर्त : उस संरचना के समान दूसरा अन्य परमाणु ना होना है।
स्वतंत्र अस्तित्व होने के कारण ही, मैं उसका नाम अमर रख सका। यह कारण अन्य दुसरे शर्त से भिन्न है। संरचना ही किसी भी वस्तु, जीव, जंतु, पौधा, निर्जीव या विषय की प्रकृति निश्चित करती है।

विज्ञान के पास विशिष्ट संरचना ही एक मात्र विकल्प है। जिसे वह ईश्वर की उपस्थिति के रूप में प्रयुक्त कर सकता है। जिसे ब्रह्माण्ड के स्वरुप द्वारा जाना जाता है। जो अपरिवर्तित है। जिसके आधार पर प्रकृति निर्धारित होती है। अपरिवर्तित होने के कारण, इसे “आधारभूत ब्रह्माण्ड” कहना उचित होगा। परन्तु वर्तमान में यह संरचना मनुष्य को ज्ञात नहीं है।

समस्या का भौतिकी अर्थ

समस्या के बारे में हमारा यह सोचना पूर्णतः गलत होगा कि जब हम किसी व्यक्ति, वस्तु या विषय को समस्या की दृष्टी से देखेंगे। तब तक वह एक समस्या है, अन्यथा समस्या नही है। सैद्धांतिक रूप से इस दृष्टी से परिभाषित समस्या का समाधान शत प्रतिशत होना संभव है। परन्तु इसे व्यव्हार में लाना थोड़ा मुश्किल होता है। परन्तु समस्या का स्वरुप वास्तविक है। यह किसी व्यक्ति विशेष की दृष्टी पर निर्भर नही करता है। और न ही समस्या को व्यक्ति विशेष की दृष्टी पर आधारित मानना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से वह समस्या किसी न किसी रूप में आपके सामने आ ही जाएगी।


ब्रह्माण्ड में एक समान अवस्था (Uniform) का न होना समस्या के स्वरुप (भौतिकी अर्थ) को दर्शाना है। समस्या को व्यवहारिक विषयों के अंतर्गत पाया जाता है। यह कई रूपों में सामने आती है। समस्या की स्थिति लोगों की अवधारणाओं को एकीकृत करती है। समस्या का सम्बन्ध सिद्धांतों, नियमों या भौतिकता के किसी भी अन्य रूप के होने या न होने से कतई नहीं रहता। समस्या के भौतिकी अर्थ में प्रायोगिक रूप से भी समस्या उपस्थित रहती ही है। शायद महा-संकुचन या ब्रह्माण्ड की विशेष अवस्था के बाद से यह मनुष्य का पीछा छोड़ दे। परन्तु महा-संकुचन जैसी अवस्था तक प्रायोगिक स्थिति (क्योंकि हम उपस्थित नहीं रहेंगे) बचेगी ही नहीं। समस्या का कारण ही समस्या का निदान मालूम होता है।

“आधारभूत ब्रह्माण्ड में समस्या का उतना ही महत्व है। जितना कि ब्रह्माण्ड की अवस्था परिवर्तन के लिए अन्य घटकों की आवश्यकता (या स्वतः निर्मित होतें हैं) का मालूम होना है।”

प्रकृति

किसी भी घटना के विश्लेषण करने से ज्ञात होता है कि प्रकृति में किसी भी तरह की कमी नहीं है। परन्तु जो हुआ है, ऐसा होना ही तय था या इसके अलावा कुछ और नहीं हो सकता था। यह कहना अनुचित होगा।

क्योंकि प्रकृति संभावना पर कार्य नहीं करती। ऐसा नहीं है कि राम 100 डिग्री सेल्सियस तक पानी गर्म करेगा। तभी पानी उबलेगा। श्याम के हाथों पानी नहीं उबलेगा या कुछ और ही परिणाम प्राप्त होगा।

जबकि प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है। इसके प्रत्येक घटक मानो इंतजार में ही रहते हैं। और वे जानते हैं कि उनके साथ कौन-कौन से संयोग बन सकते हैं ! वे घटक प्रत्येक संयोग के लिए तैयार रहते हैं।

फिर चाहे मेरे ही हाथों मेरी ही पैर पर चाकू क्यों न गिरा हो। खून तो निकलेगा ही। तब चाकू यह नहीं सोचेगा कि आखिर अज़ीज़ स्वयं को क्यों नुक्सान पहुँचाना चाहेगा !! वह तो मेरे पैर को नुक्सान अवश्य पहुंचाएगा।

भौतिकी के नियम

ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संरचना का रचित, निर्मित, उत्पन्न या पैदा होना। ब्रह्माण्ड की गणितीय अवधारणा को जन्म देना है। ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संरचना को समझते हुए बहुत से गणितज्ञ और वैज्ञानिकों ने संभावना जताई है कि इसको बनाने, निर्मित करने या पैदा करने वाला अवश्य ही एक गणितज्ञ होगा। क्योंकि इसकी संरचना समझने योग्य है। जिसे सूत्रों, ज्यामिति संरचनाओं और गणितीय नियमों में बांधा जा सकता है। इसका निर्माण एक सुनियोजित तरीके को दर्शाता है।

"फिर भी प्रकृति, गणितीय नियम में न चलकर भौतिकी के नियमों का अनुसरण करती है।"


शिशु ब्रह्माण्ड

यह बहुत ही रोमांचक विषय है। क्योंकि इस विषय में उन बिन्दुओं का अध्ययन किया जाता है जिनके अनुसार ब्रह्माण्ड का जन्म हो सकता है। कहने का तात्पर्य वे कौन-कौन सी परिस्थितियां है। जो ब्रह्माण्ड को जन्म देती अथवा दे सकती हैं ?? क्या इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होती है ?? या निरंतर जारी है ?? इन घटनाओं का परिक्षण कर पाना हमारे लिए संभव है या नहीं है ?? हे ना मजेदार विषय...


वास्तव में शिशु ब्रह्माण्ड विकास के क्रम पर आधारित विषय है। हमें याद रखना होगा कि हम ब्रह्माण्ड के जन्म की बात कर रहे हैं। तात्पर्य उसके जैसे और भी ब्रह्माण्ड हैं... जो पहले से ही मौजूद रहते हैं। अध्ययन के लिए हमें विषय से सम्बंधित सभी शर्तों को जानना होता है। जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड में विकास का एक निश्चित क्रम है। यह क्रम प्राकृतिक नियम को निरुपित करता है। ब्रह्माण्ड में विकास दो तरह से होता है।

  1. संख्यात्मक विकास..
  2. गुणात्मक विकास..
यह (शिशु ब्रह्माण्ड) ब्रह्माण्ड के समूह से सम्बंधित विषय है। श्याम विवर के द्वारा ब्रह्माण्ड के जन्म होने की संभावना जताई जाती है। परन्तु उसके लिए जरुरी है कि हमारे ब्रह्माण्ड के अलावा भी और भी ब्रह्माण्ड का अस्तित्व हो!

समान्तर ब्रह्माण्ड

समान्तर ब्रह्माण्ड को समझना और उस पर अध्ययन करना बहुत ही जटिल कार्य है। क्योंकि समान्तर ब्रह्माण्ड की शुरुआत एक ही बिंदु या स्थिति से होती है और आगे चलकर उन ब्रह्माण्ड की दिशा या अवस्था भिन्न-भिन्न हो जाती है। यह ठीक उसी तरह से होता है जैसे कि किसी विषय की शुरुआत एक मुद्दे से होती है। परन्तु वह मुद्दा व्यक्ति विशेष की सोच के अनुरूप भिन्न-भिन्न दिशा में विचरण करने लगता है। हमें ज्ञात रहे विशेष समय या स्थिति के लिए प्रत्येक समान्तर ब्रह्माण्ड का मान सदैव एक समान रहता है।


वास्तव में समान्तर ब्रह्माण्ड की अवधारणा संभावनाओं पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए वर्तमान स्थिति वही बिंदु है। जहाँ से समान्तर ब्रह्माण्ड की शुरुआत होती है। और आने वाला समय अर्थात भविष्य उसकी संभावनाओं को दर्शाता है। याद रहे प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है। परिणाम स्वरुप भविष्य की सभी संभावनाएँ एक साथ, एक ही समय पर, किसी न किसी दिशा में अवश्य उपस्थित रहती हैं। यही समान्तर ब्रह्माण्ड का स्वरुप है।

इस विषय के निष्कर्ष और भी मजेदार हैं। इसे एक तरह का जादू ही समझिये।

प्रायोगिक उपकरण

जब हम किसी “प्रायोगिक उपकरण” का ध्यान से अध्ययन करते हैं। तो देखतें है कि चाहे वह किसी भी तरह का संसूचक हो या मापन या गणना करने का यंत्र हो। उन सभी यंत्रो के द्वारा किसी न किसी रूप में ज्ञात सिद्धांतों का पालन किया जाता है। तात्पर्य सभी प्रकार के प्रायोगिक प्रकरण, सैद्धांतिक प्रकरण पर आधारित होते हैं। परन्तु प्रायोगिक प्रकरण में सैद्धांतिक प्रकरण की भूमिका निर्धारित करना इतना आसन नहीं होता। जितना की हम कभी-कभी समझ लेते हैं। इसके लिए हमें अध्ययन से संबंधित सभी घटनाओं और प्रायोगिक सामग्रियों की प्रकृति को जानना होता है। तत्पश्चात हम किसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।


“प्रायोगिक प्रकरण यह निर्धारित करता है कि यदि हम निर्देशित नियमों का पालन करते हैं। तो एक निश्चित प्रकार के निर्देशित निष्कर्षों को पाएंगे। फिर चाहे स्थिति, समय, प्रेक्षक की मनोदशा या फिर प्रेक्षक ही क्यों न बदल जाए। निष्कर्षों में किसी भी तरह का परिवर्तन नहीं होगा। न ही संख्यात्मक रूप से और न ही गुणात्मक रूप से.. क्योंकि घटना में अनुपातिक परिवर्तन देखने को मिलते हैं।”

ब्रह्माण्ड : नए गणितीय ढांचे के रूप में

भिन्न- भिन्न सिद्धांतों के द्वारा सदैव ब्रह्माण्ड को एक नए गणितीय ढांचे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होता है कि हम पूर्व में प्रस्तुत किये गए गणितीय ढांचों का अवलोकन ही न करें। क्योंकि कभी-कभी प्रस्तुत किये जाने वाले गणितीय ढांचों का वास्तविक ब्रह्माण्ड (भौतिकी) से किसी भी तरह का लेना देना नहीं रहता। वह मात्र कोरी कल्पना के समान होता है।

भौतिकी की उन्नति के क्रम अनुसार नीचे कुछ सिद्धांतों के साथ उनका वर्णन भी किया जा रहा है। प्रदर्शित तालिका “Motion Mountain” पुस्तक से साभार है।



सिद्धांत / मत
प्रकृति और हम
अंतरिक्ष / आधार
गैलिलियो की भौतिकी
Galilean Physics
प्रकृति में निरंतरता है।
Nature is continuous.
जिस पर हम रहते हैं। उसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊंचाई निर्धारित रहती है।
We live in Galilean space.
सापेक्षता की भौतिकी
Relativity
प्रकृति, असीम रूप से इतनी बड़ी भी नहीं है।
Nature has no infinitely large.
हम उस वक्राकर अंतरिक्ष पर रहते हैं।
We live in Riemannian space.
क्वांटम क्षेत्र सिद्धांत
Quantum field theory
प्रकृति, बहुत छोटी भी नहीं है।
Nature has no infinitely small.
हम उस क्षण-भंगुर अंतरिक्ष पर रहते हैं।
We live in a Hilbert / Fock space.
एकीकरण की भौतिकी
Unification
प्रकृति, ही सीमित है और ही उसका कोई दूसरा भाग है।
Nature is not finite. Nature has no parts.
हम किसी भी अंतरिक्ष पर नहीं रहते, बल्कि हम ही अंतरिक्ष हैं।
We do not live in any space; we are space.
टीप : आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक गणितीय भौतिक ढांचा है। जिसमें निरंतर संख्यामक और गुणात्मक विकास होता है। विकास का यह क्रम स्वतः और स्वाभाविक क्रियाओं की देन है।

शीर्ष