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प्रकाश और उसकी प्रकृति

प्रकाश को सरल रेखीय गति करने की प्रकृति के रूप में जाना जाता है। परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है। प्रकाश को यह जानकारी तो रहती है कि वह सरल रेखीय गति कर रहा है। तथा निर्धारित स्थान को भी यही जानकारी रहती है कि प्रकाश उसके पास तक सरल रेखा में गति करते हुए आया है। परन्तु जब हम, प्रकाश की गत्यावस्था का अध्ययन निर्देशित तंत्र के रूप में करते हैं। तब निष्कर्ष कुछ और ही प्राप्त होते हैं। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं होता है कि हम पहले गलत थे। या प्रकाश सरल रेखा में गति नहीं करता है। इस घटना को सामान्य सापेक्षिकता (व्यापक आपेक्षिकता) के सिद्धांत के प्रभाव के रूप में देखा जाता है।


इसे कुछ इस तरह से समझिये कि प्रकाश तो सरल रेखा में ही गति करता है। परन्तु गति का मार्ग ही घुमावदार है। इस घुमावदार मार्ग को गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव के रूप में देखा जाता है। क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल प्रकाश के मार्ग को ही विचलित कर देता है। यह घटना भौतिकी के सरलता और सहजता का प्रमाण है। आज.. पूर्व में लिखित भौतिकी की परिभाषा याद आ गई। "भौतिकी, इतनी सरल और सहज है जैसे कि बंद कमरे की खिड़की से मैं बाहर के वातावरण को देख तो सकता हूँ। परन्तु वहां तक जाने के लिए मुझे दरवाजे का रास्ता ही चुनना पड़ेगा।"

सैद्धांतिक प्रकरण

विज्ञान चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न करे, यह आशा रखना व्यर्थ है कि हम कभी-न-कभी अतीत में भी यात्रा कर पाएँगे। यदि ऐसा संभव होगा, तो हमें मजबूरन स्वीकार करना होगा कि सैद्धांतिक रूप से पूर्णतः असंगत परिस्थितियाँ भी संभव हैं।               - लेव लांदाऊ (नोबल पुरुस्कार विजेता) और यूरी रुमेर द्वारा लिखित पुस्तक से



तब विज्ञान का नया दौर शुरू होगा। तब शब्दों को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता होगी। इसका अर्थ यह कदाचित नहीं होता कि हम पहले से ही गलत थे। विज्ञान पहले सक्षम नहीं था। परन्तु अब होते जा रहा है। ऐसा सोचना भी गलत होगा। बल्कि तब हमें उन असंगत परिस्थितियों के बारे में पुनः सोचना होगा। उनके अस्तित्व को खोजने के लिए पुनः प्रयास करने होंगे। तब भी ब्रह्माण्ड का स्वरुप परिवर्तित नहीं होगा। परन्तु प्रकृति, नए तरीके से कार्यरत होगी। जैसा कि हम सभी अचानक मौसम परिवर्तन के समय देखतें हैं।

भौतिकता के रूप

वर्तमान में ज्ञात भौतिकता के रूप = अवयव, कण, पिंड, निकाय (बंद या खुला) और निर्देशित तंत्र (जड़त्वीय या अजड़त्वीय), भौतिकता के किसी भी रूप की समानता, आधारभूत ब्रह्माण्ड की संरचना के साथ नहीं की जा सकती। फिर चाहे भौतिकता के किसी भी रूप के गुण, उस संरचना से ही क्यों ना मिलते हों। कहने का तात्पर्य आधारभूत ब्रह्माण्ड को ना ही कण कहा जा सकता है और ना ही एक बड़ा पिंड… वहीं आधारभूत ब्रह्माण्ड को ना ही एक निकाय कहा जा सकता है और ना ही एक निर्देशित तंत्र कहा जा सकता है। यदि आधारभूत ब्रह्माण्ड की संरचना को एक जड़त्वीय निर्देशित तंत्र मान लिया जाए। तो हमें पता चलता है कि विशिष्ट संरचना के द्वारा अजड़त्वीय निर्देशित तंत्र के गुण भी दर्शाए जाते हैं। वहीं बंद निकाय मानने पर हमें पता चलता है कि संरचना के द्वारा खुले निकाय के गुण भी दर्शाए जाते हैं। वास्तव में भौतिकता के सभी रूपों का विश्लेषण आधारभूत ब्रह्माण्ड के द्वारा ही होता है। यही भ्रम का कारण बन जाता है।

टीप :
(१) दिखलाई गई संरचना, आधारभूत ब्रह्माण्ड की संरचना नहीं है। अपितु यह ३- आयामिक संरचना के लिए ४- आयामिक संरचना का निरूपण है।
(२) भौतिकता के सभी रूप भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित होते हैं। उनको एक मान लेना, हमारी गलती होगी।

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