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आधारभूत, ब्रह्माण्ड का विशिष्ट गुण

आधारभूत, ब्रह्माण्ड का वह विशिष्ट गुण है। जो ब्रह्माण्ड संबंधी चर्चाओं का कारण बनता है। आधारभूत अर्थात अपरिवर्तित.. यह गुण ब्रह्माण्ड का मूल-आधार है। वे गुण जो ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के पर्याय हैं। जो अपरिवर्तित हैं। फलस्वरूप हम उनके बारे में चर्चा कर पाते हैं। इस गुणात्मक ब्रह्माण्ड को आधारभूत ब्रह्माण्ड कहा जाता है। जी हाँ, आपका सोचना बिल्कुल सही है कि ब्रह्माण्ड और आधारभूत ब्रह्माण्ड में फर्क है। इन दोनों को एक नहीं माना जा सकता। क्योंकि आधारभूत ब्रह्माण्ड की व्यापकता स्वाभाविक रूप से ब्रह्माण्ड की व्यापकता से अधिक है। आधारभूत ब्रह्माण्ड में शामिल होने के लिए ऐसा कुछ भी शेष नही रह जाता है, जिसकी कल्पना भी की जा सके। इसी कारण संगत परिस्थितियों के आधार पर अस्तित्व की व्याख्या विकास के रूप में की जाती है। आधारभूत ब्रह्माण्ड की संरचना के आधार पर असंगत परिस्थितियों के अस्तित्व को नकार दिया जाता है।


हमारे सामने आधारभूत ब्रह्माण्ड से जुड़ी हुई चुनौतियाँ हैं कि वे कौन से गुण हैं। जो अपरिवर्तित हैं। जिनके मान में परिवर्तन नही होता। ब्रह्माण्ड के वे कौन-कौन से गुण हैं जो अवस्था परिवर्तन (प्रकृति निर्माण) का कारण बनते हैं ? और इन सब में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर आधारभूत ब्रह्माण्ड का स्वरुप क्या है ?? क्योंकि इस प्रश्न के उत्तर के साथ ही सभी प्रश्नों के उत्तर अपने आप मिल जाते हैं। चाहे वह प्रश्न प्रकृति निर्धारण से सम्बंधित हो या ब्रह्माण्ड की बनावट से सम्बंधित हो। या फिर व्यवहारिक प्रकरण के निर्माण से सम्बंधित हो। एक बात तो स्पष्ट है कि ब्रह्माण्ड के आधारभूत गुण, आधारभूत ब्रह्माण्ड की व्यापकता और प्रकृति निर्धारण का कारण बनते हैं।

भ्रम अथवा प्रायोगिक आभाव

जब दो रेलगाड़ियाँ एक ही दिशा में भिन्न-भिन्न वेग से गतिशील हों। तब आप देखेंगे कि कम वेग से गतिशील रेलगाड़ी अधिक वेग से गतिशील रेलगाड़ी के सापेक्ष पीछे-पीछे गतिशील न होकर, पीछे की ओर गतिशील होती हुई प्रतीत होती है। यह साधारण सापेक्षता का उदाहरण है।


विज्ञान में प्रतीत होने का दो तरह से अध्ययन किया जाता है। एक तो भ्रम की स्थिति को निर्धारित करने में.. और दूसरा तब जब सैद्धांतिक रूप से हमें यह ज्ञात हो जाता है कि प्रयोगों द्वारा इसे प्रमाणित नहीं की जा सकता। यही वह स्थिति होती है जब हम प्रकृति के समकक्ष होते हैं। उदाहरण स्वरुप प्रकाश की गति के समकक्ष वेग से गतिशील वस्तु की लम्बाई में कमी को मापने के लिए जरुरी है कि प्रेक्षक भी उसी वेग से गतिशील हो। अर्थात प्रेक्षक की लम्बाई में भी कमी आएगी। फलस्वरूप हम प्रकाश की गति से गतिशील वस्तु की लम्बाई की कमी को नहीं माप सकेंगे। क्योंकि मापन की क्रिया अनुपातिक क्रिया होती है। वस्तु तथा प्रेक्षक में समान अनुपात में कमी आएगी। क्योंकि वस्तु तथा प्रेक्षक की गति समान है। भ्रम की स्थिति साधारण सापेक्षता और प्रायोगिक कमी के रूप में आंकी जाने वाली स्थिति विशेष सापेक्षता के अंतर्गत आती है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की मान्यताएँ

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को लेकर भिन्न-भिन्न मान्यताएँ हैं। इन सभी मान्यताओं में भिन्नता का कारण ब्रह्माण्ड की सीमा है। ब्रह्माण्ड की सीमा लोगों की अवधारणाओं को पृथक करती है। सीमा अर्थात किसी अन्य ब्रह्माण्ड की परिकल्पना करना। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर दिया गया सबसे अधिक मान्यता प्राप्त सिद्धांत बिग बैंग सिद्धांत है। यह सिद्धांत उस समय प्रतिपादित किया गया जब खगोल वैज्ञानिकों ने विकसित टेलिस्कोप तथा अन्य वैज्ञानिक साधनों द्वारा प्रेक्षणों के आधार पर यह बताया कि हमारा ब्रह्माण्ड विस्तार कर रहा है। यह सिद्धांत बेल्जियम के खगोल शास्त्री एवं पादरी जार्ज लेमेतेर ने दिया। इस सिद्धांत के अनुसार अरबों साल पहले हमारा ब्रह्माण्ड घनीभूत अवस्था में एक बिंदु के समान था। जिसे विलक्षणता का बिंदु कहा गया। इस बिंदु में अचानक महाविस्फोट हुआ। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का विस्तार होना प्रारंभ हो गया। महाविस्फोट ने अतिसघन पिंडों को छिन्न-भिन्न कर दिया। एक सेकेंड के कई गुने छोटे हिस्से के समयांतराल में ही फोटोन और लेप्तोक्वार्क ग्लुआन अन्तरिक्ष में दूर-दूर तक छिटक गए। इसी समयांतराल में परमाणु ने अपना आकार ले लिया था। महाविस्फोट के खरबों वर्ष बाद तक अत्यधिक ताप रहा। ताप में कमी के साथ ही आकाशगंगाएँ बनी। जो आज भी एक दूसरे से दूर जा रहीं हैं। यही बिग बेंग सिद्धांत है।


हर्मन बांडी, थॉमस गोल्ड, एवं फ्रेड हॉयल नामक ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने बिग बेंग सिद्धांत को चुनौती दे डाली। आप तीनों ने मिलकर स्थायी अवस्था सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत में कहा गया कि ब्रह्माण्ड का न तो महाविस्फोट के साथ आरंभ हुआ और न ही इसका अन्त होगा। अर्थात इस विशाल ब्रह्माण्ड का न आदि है और न ही अन्त है। इस सिद्धांत के अनुसार आकाशगंगाएँ आपस में दूर तो होती जाती हैं। परन्तु उनका आकाशीय घनत्व अपरिवर्तित रहता है। तात्पर्य दूर होती हुई आकाशगंगाओं के मध्य नई आकाशगंगाएं बनती रहती हैं। इसलिए ब्रह्माण्ड के पदार्थ का घनत्व एक दम स्थिर बना रहता है।

भौतिकता के रूपों का गुणधर्म

प्रत्येक अवयव, कण, पिंड, निकाय अथवा निर्देशित तंत्र किसी न किसी रूप में क्रियाएँ करते हैं। इन क्रियाओं को हम भौतिकता के रूपों (अवयव, कण, पिंड निकाय या निर्देशित तंत्र) के अस्तित्व की जरुरी शर्त मान सकते हैं। भौतिकता के रूपों के अस्तित्व के लिए जरुरी है कि वे सभी क्रियाओं में भागीदार हों। इस तरह ब्रहमांड के सभी मूलभूत अवयव जो किसी अन्य भौतिकता के रूपों से निर्मित नहीं हैं, ब्रहमांड के अन्य सभी अवयवों से संबंध बना पाते हैं। इसलिए ब्रह्माण्ड में भौतिकता के सभी रूप किसी न किसी रूप में गति करते हैं। क्योंकि ब्रहमांड में विरामावस्था की शर्तों का अस्तित्व ही नहीं है। भाषा विज्ञान में इस बात को तब प्रमाणिकता मिल जाती है। जब कुछ न करने अर्थात बैठे रहने को भी क्रिया के रूप में गिना लिया जाता है।

टीप :
१. एक समान वेग से गतिशील वस्तु या पिंड स्थिर तथा निरपेक्ष मानी जाती है।
२. ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के लिए स्वाभाविक तथा स्वतः दोनों क्रियाएँ जिम्मेदार हैं।

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