ads

Style1

Style2

Style3[OneLeft]

Style3[OneRight]

Style4

Style5

सैद्धांतिक शर्तों का महत्व

कुछ वर्षों पूर्व हमें ज्ञात हुआ है कि ब्रह्माण्ड किसी विशिष्ट आरंभिक शर्तों के साथ अस्तित्व में नहीं आया। और साथ ही सर "स्टीफन विलियम हाकिंग" के द्वारा इस बात की जानकारी दी गई कि आज का ब्रह्माण्ड पूर्व की कई संभावित अवस्थाओं के अध्यारोपण का परिणाम है। इसके बाबजूद कुछ लोगों के मन में यह प्रश्न बना रहता है कि किस तरह की शर्तों के कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति नही हुई है ?? विज्ञान का इन शर्तों से क्या अभिप्राय है ?? परन्तु ऐसे प्रश्न करने से पहले हमें यह भी सोचना होता है कि कहीं हमारे प्रश्न गलत तो नही !! क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार इन शर्तों का अस्तित्व ही नही है। तो उनके प्रकार कैसे हो सकते हैं !! अतः शर्तों के महत्व को समझने से पहले यह जानना होगा है कि कौन-कौन सी शर्तों का अस्तित्व है अथवा हो सकता है ??


विज्ञान द्वारा जब कहा जाता है कि किसी वस्तु का रंग लाल है। तो इसका तात्पर्य यह है कि उस लाल रंग की वस्तु के साथ ब्रह्माण्ड में प्रकाश की उपस्थिति भी है। प्रकाश की उपस्थिति उस लाल रंग की वस्तु की प्रमुख शर्त कहलाएगी। ब्रह्माण्ड में कभी भी ऐसा नही होगा कि कोई वस्तु लाल रंग की हो और प्रकाश की उपस्थिति न हो। इस तरह की शर्तों को सैद्धांतिक शर्तें कहते हैं। चूँकि ये शर्तें संरचना पर आधारित होती हैं। इसलिए इन्हें संरचनीय शर्तें कहा जा सकता है। ये सभी शर्ते विज्ञान का आधार होती हैं। इन शर्तों के आलवा किसी भी शर्तों को "ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति" का कारण नही माना जा सकता।

टीप : ब्रह्माण्ड के अस्तित्व को हम चाहे उत्पत्ति (कुछ नही से कुछ होने के संकेत के रूप में) मानें या फिर निर्माण (अवस्था परिवर्तन अर्थात एक रूप से दूसरे में रूपांतरण) सैद्धांतिक शर्तों के कारण ही ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया है। आखिर ब्रह्माण्ड ऐसा क्यों है ? इन्ही शर्तों के कारण..  यदि वैसा होता तो ?? मैं कहता कि उसकी शर्तों के कारण..। ये सैद्धांतिक शर्तें निर्धारित प्रकृति की वजह हैं। आधारभूत ब्रह्माण्ड स्वतः निर्मित ब्रह्माण्ड है। परन्तु इसकी भी सैद्धांतिक शर्तें हैं। जो इसकी बनावट पर आधारित हैं।

संभावना और प्रायिकता में भिन्नता

माध्यमिक शालाओं में और विशेषकर विज्ञान संकाय के विद्यार्थियों को जब कभी प्रायिकता संबंधी अध्याय पढ़ाने की आवश्यकता होती है। तब शिक्षकों द्वारा प्रायिकता को समझाने के लिए "संभावना" का प्रयोग किया जाता है। शुरूआती दौर तक "संभावना" (Possibility) को ही प्रायिकता (Probability) मानना उचित था। परन्तु जब हम प्रायिकता (गणितीय संभावना) का उपयोग भौतिकी में करते हैं। तब प्रकृति का स्पष्ट चित्रण हमारे मन में नहीं बन पाता। जिससे की हमें प्रकृति को समझने में कठनाइयों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि प्रकृति, प्रायिकता पर कार्य करती है संभावनाओं पर नहीं। आइये देखते हैं कि संभावना (Possibility) और प्रायिकता (Probability) में कैसी भिन्नता है।


  1. संभावना के लिए घटना का घटित होना आवश्यक नही है। जबकि प्रायिकता में घटना का घटित होना जरुरी है।
  2. संभावना किसी एक (विशेष) घटना के घटित होने को लेकर व्यक्त की जाती है। जबकि प्रायिकता में, उसी एक घटना में एक समान परिणाम की अन्य सभी घटनाओं की संभावनाओं को एक साथ व्यक्त किया जाता है।
  3. अर्थात संभावना में एक आधार कार्यरत होता है। जबकि प्रायिकता में एक से अधिक आधार कार्यरत होते हैं।
  4. स्वाभाविक रूप से घटना के घटित होने की संभावना को मापा जाता है। जबकि प्रायिकता में एक समान परिणाम वाली घटनाओं की संभावनाओं को गिना जाता है।
  5. संभावना का मान शून्य से लेकर शत प्रतिशत तक होता है। जबकि प्रायिकता का मान शत प्रतिशत से शून्य की ओर अग्रसर होता है। परन्तु शून्य कभी नही हो सकता।
  6. संभावना पूर्ववर्ती घटनाओं पर निर्भर करती है। जबकि प्रायिकता का पूर्ववर्ती घटनाओं के साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता है।
  7. फलस्वरूप कारकों के आधार पर संभावना एक भौतिकीय अवधारणा कहलाती है। जबकि घटकों के आधार पर प्रायिकता एक गणितीय अवधारणा कहलाती है।
  8. संभावना को एक हद तक निश्चित किया जा सकता है। परन्तु प्रायिकता पूर्ण रूप से एक अनिश्चित अवधारणा है।
संभावना और प्रायिकता का भौतिकीय अर्थ, उनके उदाहरण और विज्ञान में उनकी उपयोगिता को आने वाले लेखों में पढ़ा जा सकता है।

प्राकृतिक नियम : भौतिकता के रूपों का आपसी व्यवहार

प्राकृतिक नियमों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि ये नियम भौतिकता के रूपों का आपसी व्यवहार है। और वहीं व्यावहारिक नियम एक निश्चित सीमा तक व्यवस्था कायम करने की युक्ति है। प्राकृतिक नियम, ये वे नियम हैं जो टेस्ट टिउब बेबी, कृत्रिम खून, अविष्कार और कृत्रिम पौधे जैसी व्यवस्था को भी संचालित करते हैं। जबकि टेस्ट टिउब बेबी, कृत्रिम खून, अविष्कार और कृत्रिम पौधे जैसी चीजों को मनुष्य ने बनाया है !! इस स्थिति में “टेस्ट टिउब बेबी” या “कृत्रिम खून” को प्राकृतिक न मानना हमारी गलती होगी। प्राकृतिक नियम उन सभी चीजों पर भी लागू होते है जिन्हें हम बना सकते हैं। वास्तव में ये उस पदार्थ में लागू होते हैं जिसके उपयोग से हम अपनी कल्पना को साकार रूप देते हैं। 


नियमों के आधार पर ही ब्रह्माण्ड के समूह की अवधारणा सामने आई। ब्रह्माण्ड के समूह की अवधारणा के अनुसार एक से अधिक ब्रह्मांड का अस्तित्व संभव हैं। और इस असीम अंतरिक्ष में एक से अधिक ब्रह्माण्ड का अस्तित्व नियमों के आधार पर ही संभव है। तात्पर्य प्रत्येक ब्रह्माण्ड को नियमों के आधार पर ही भिन्न- भिन्न समझा जाता है। और उसे ब्रह्माण्ड की गिनती में शामिल कर लिया जाता है।

अदृश्य जगत महज एक व्यवहार

हम उन सभी चीजों को देख सकते हैं। जिन्हें देखा जा सकता है। चाहे उनका आकार अतिसूक्ष्म ही क्यों ना हो। चाहे बात गुरुत्वीय या परमाण्विक धरातल के स्तर की ही क्यों ना हो। परन्तु इन चीजों को अलग-अलग युक्तियों द्वारा ही देख सकते हैं। लेकिन उन रचनाओं को नहीं देखा जा सकता। जिसके कारण हम दृश्य जगत को देख पाते हैं। इसे ही अदृश्य जगत कहा जाता है।


अदृश्य जगत में शक्ति, ऊर्जा, उद्देश, गणितीय मॉडल और अवयवों की क्रियाएँ शामिल है। जिसके आधार पर घटनाओं का वर्गीकरण, समान प्रजाति में भी भिन्नता और ब्रह्माण्ड का अवस्था के आधार पर अध्ययन करना संभव हो पाता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है, कि अदृश्य जगत नहीं है। यह मात्र कोरी कल्पना है। बल्कि अदृश्य जगत को सैद्धांतिक प्रकरण माना जा सकता है। जिसका आशय वास्तविक अस्तित्व से है। क्योंकि प्रायोगिक प्रकरण में गणना और मापन के आधार पर परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। यह वास्तविकता का अस्तित्व है। इस तरह प्रत्येक जगत की अपनी अलग उपयोगिता होती है।

शीर्ष