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कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा और कार्य करने की दर को शक्ति कहते हैं। परिभाषा में ऊर्जा और शक्ति का कार्य से सीधा सम्बन्ध देखा जा सकता है। परन्तु हम ऊर्जा और शक्ति को सरलता से कैसे समझ सकते हैं ? तो फिर क्यों न ऊर्जा और शक्ति को समझने से पहले कार्य को ही समझ लिया जाए ! पलक झपकना, तसले में रखे ईंटों को सिर में रखकर ढोना कार्य नही है। ऐं.. पलक झपकना, तसले में रखे ईंटों को सिर में रखकर ढोना कार्य नही है तो फिर कार्य किसे कहते हैं ? याद रखिये कार्य के दो मूल घटक होते हैं। बल और बल की दिशा में विस्थापन... इन दोनों घटकों के अदिश (Dot Product) गुणनफल को ही कार्य कहते हैं। आरोपित बल से निर्मित प्रतिक्रिया को कार्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में बल ही कार्य करता है। पलक झपकना और ईंटों को सिर में रखकर ढोना बेशक दोनों क्रियाएँ हैं। परन्तु फिर भी इन दोनों क्रियाओं को कार्य नहीं कहा जाता। क्योंकि दोनों क्रियाओं में विस्थापन का मान शून्य होता है। जब हम किसी घटना का अवलोकन करते हैं तब हमें कार्य के दो मूल घटक बल और बल की दिशा में होने वाले विस्थापन को घटना के रूप में विश्लेषित करना होता है। यदि हम इन दोनों घटकों को विश्लेषित करने में असमर्थ होते हैं। तब हमें मजबूरन कहना होता है कि हम कार्य के परिमाण को ज्ञात नहीं कर सकते। अर्थात कार्य नही किया गया।

जब तसले में रखे ईंटों को धरती से उठाकर सिर पर रखा जाता है तब तो कार्य का होना माना जाता है। और जब सिर पर रखे ईंटों से भरे तसले को किसी दूसरे स्थान में रख दिया जाता है तब भी कार्य किया हुआ माना जाता है। परन्तु जब तसले में रखे ईंटों को सिर पर रखकर घूमा जाए या सिर पर रखे ईंटों से भरे तसले को उसी स्थान पर पुनः रख दिया जाए, जहां से तसले में रखे ईंटों को धरती से उठाकर सिर पर रखा गया था। तब हम इस सारे प्रक्रम (घटना) को शून्य कार्य कहेंगे। ऐसा सुनना और कहना दोनों अजीब लगता है। परन्तु यह वास्तविकता है कि जब किसी प्रेक्षक को कोई वस्तु एक समय के बाद जहाँ की तहाँ मिले। तब उस प्रेक्षक के लिये उस वस्तु पर कोई कार्य घटित नहीं हुआ होता। हम आपकी मनोस्थिति को अच्छी तरह से समझ रहे हैं। आपके दिमाग में न जाने कितने प्रश्न एक साथ सामने आने के लिए उठ रहे हैं ! जो हमारी चर्चा पर भारी पड़ने के लिये आतुर हैं। ज़रा ठहर जाइये, आपकी मनोस्थिति को यहाँ तक पहुँचाने के पीछे हमारा एक उद्देश्य है। याद रखिये हमने ऊर्जा और शक्ति को सरलता से समझने के लिये कार्य को समझने का प्रयास किया था। और अब हम इस मनोस्थिति के साथ ऊर्जा और शक्ति पर आगें चर्चा करेंगे। अपनी मनोस्थिति को आप कुछ समय तक यूँ ही बनाए रखियेगा।


किसी भी घटना में कार्य, ऊर्जा और शक्ति के अवलोकन के लिये हमें आधार को सुनिश्चित करना होता है कि आखिर हम किसके परिप्रेक्ष्य में कार्य, ऊर्जा और शक्ति को ज्ञात करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में घटना के दौरान किसकी ऊर्जा में परिवर्तन हुआ है ? ये रहा उन सभी प्रश्नों का उत्तर जो कुछ देर पहले तक आपके मन में उठ रहे थे। अब हम किसी एक घटना का उदाहरण लेकर दोनों घटक ऊर्जा और शक्ति को समझने का प्रयास करेंगे। यदि हम एक ट्राली मिट्टी को एक बार में ही ट्राली से उतार लेते हैं यानि कि हमारे पास न्यूनतम शक्ति एक ट्राली मिट्टी को उतारने की है। यह घटना हमारी शक्ति को दर्शाती है। और यदि हम उसी मिट्टी की ट्राली को एक बार में खाली नहीं कर पाते हैं तब हम एक से अधिक बार में एक ही घटना को दोहराकर ट्राली को खाली कर सकते हैं। और ऐसा करने के लिए हमें ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यानि कि हम उस मिट्टी को कई भागों में बाँटकर ट्राली से उतारते हैं। इस तरह से यह घटना ऊर्जा को दर्शाती है। आशा है कि अब आप ऊर्जा और शक्ति को लेकर स्पष्ट हो गए होंगे।

आपने देखा कि किस प्रकार ऊर्जा और शक्ति में पुनरावृत्ति, भौतिकता का बंटवारा और आवश्यकता आदि गुणों के आधार पर समय का प्रभाव पड़ता है। इन्ही छोटे-छोटे गुणों के आधार पर बिग-बैंग घटना के समय ब्रह्माण्ड की ऊर्जा एक समान वितरित थी। और वहीं ब्रह्माण्ड की शक्ति केंद्रित थी। .

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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