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हिंदी में विज्ञान की पढ़ाई
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2009 में प्रकाशित विज्ञान और गल्प से साभार                                                           - प्रो जयंत विष्णु नार्लीकर

इस लेख को लिखे 10 से 12 साल बीते होंगे। फिर भी वहाँ जो कुछ कहा गया है वह आज भी लागू होता है। कालानुरूप सामाजिक परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए कुछ और बातों का आज जिक्र करना आवश्यक है।

विज्ञान ही नही सभी क्षेत्रों में जानकरी का आजकल बोलबाला है। कंप्यूटर का माध्यम अब किंडरगार्टन से पी. एच. डी. तक, पांच साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के दादा जी तक लोकप्रिय बन चुका है। कम्प्युटर की भाषा, उसी के शब्दों में बाय डिफाल्ट यानि स्थाई रूप से अंग्रेजी रही है। अतः अंग्रेजी जानना आजकल के कंप्यूटर ज़माने में आवशयक हो चूका है।

फिर भी यह प्रसन्नता की बात है कि कंप्यूटर विशेषज्ञों ने बहुतांश भारतीय भाषाओं में कंप्यूटर से संवाद बनाने में सफलता हासिल की है। हालाँकि हिंदी सहित अन्य लिपियों, भाषाओं का सॉफ्टवेयर अंग्रेजी से मुकाबला नहीं कर पाता, तो भी केवल हिंदी जानने वाला उसके सहारे कंप्यूटर द्वारा जानकारी पा सकता है। हिंदी में जानकारी देने वाले वेबसाइट के पन्नों की संख्या भी दिनों दिन बढ़ रही है।

जैसा मैंने उपयुक्त लेख में कहा है विज्ञान समझने में मातृभाषा सर्वोत्तम माध्यम है। जब-जब मैं हिंदी भाषिक प्रदेश में भाषण देने जाता हूँ। तब जहाँ तक हो सके, हिंदी में बोलता हूँ। श्रोता इस पर्याय को पसंद करते हैं क्योंकि मेरी शुरुआत 'देवियों और सज्जनों' का स्वागत तालियों से होता है। इसी न्याय से यह भी सिद्ध होता है कि हिंदी भाषिक कंप्यूटर साहित्य के लिए काफी मांग रहेगी, क्योंकि हिंदी भाषिक बड़ी संख्या में हैं और कंप्यूटर जन सामान्य में लोकप्रिय होते जा रहे हैं।

यदि यह विचार को आगे बढ़ाएँ तो इसके दो अच्छे परिणाम होंगे। एक तो यह कि मातृभाषा के माध्यम से और कंप्यूटर की लोकप्रियता की वजह से हिंदी जैसी भाषा में विज्ञान की जानकारी फैलाने में सहायता मिलेगी और दूसरा विधायक परिणाम यह हो सकता है कि 'अपनी' भाषा में पढ़ने के कारण जनसामान्य विज्ञान के प्रति आत्मीयता महसूस करेगा। आज जो एक भावना प्रचलित है कि "विज्ञान एक परदेशी विद्द्या है जो हमारी समझ से परे है" उसे हटाने में 'अपनी भाषा' में विज्ञान समझाना सफल होगा।

यहाँ यह भी लिखना आवश्यक है कि जिस 'ब्रह्माण्ड' मालिका का लेख में जिक्र है वह काफी लोकप्रिय साबित हुई।


विज्ञान-प्रसार के बारे में मैं कुछ कहना चाहता हूँ। पहला प्रश्न यह है कि विज्ञान की पढाई किस भाषा में होनी चाहिए ? मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मैंने विज्ञान हिंदी में पढ़ा था। मैं पहली कक्षा से दसवी कक्षा तक बनारस में जिस स्कूल में विद्यार्थी था वहाँ हिंदी माध्यम में विज्ञान पढ़ाया गया और मैं हिंदी में पढता था। मुझे उसमें कोई कठिनाई नज़र नहीं आई। व्यक्ति जिस भाषा में विचार करते हैं उस भाषा में विज्ञान पढ़ाना चाहिए क्योंकि विज्ञान सोचने समझने की चीज है रटने की नहीं। आपको इतिहास-भूगोल पढ़ाना है तो चाहे जिस भाषा में पढ़ाइए, मुझे कोई एतराज़ नहीं, क्योंकि आजकल यहाँ जो शिक्षा प्रणाली है उसके बारे में मैं बहुत निराशावादी हूँ। आप कैसा भी पाठ्यक्रम बनाइये इतिहास और भूगोल रटकर ही पढ़ाया जाता है और रटकर ही उसकी परीक्षा दी जाती है। ऐसा आप किसी भी भाषा में करिये या कोई विदेशी भाषा लीजिये, फ्रेंच लीजिये, उसमें कोई एतराज़ नहीं, उसमें बच्चे को कुछ समझ में नहीं अाता। आज उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश की उपज आदि को आज वे पढ़ लेंगे और अगले साल भूल जाएँगे लेकिन विज्ञान के बारे में ऐसा नहीं है।

विज्ञान के अनुसार सृष्टि के जो नियम हैं, उन नियमों को आप जानना चाहते हैं। जिनके कारण सृष्टि का व्यव्हार-व्यापर चलता रहता है, उन नियमों को आप अच्छी तरह से कैसे समझ सकते हैं ? आप जिस भाषा में मन में विचार करते हैं, उस भाषा में आप विज्ञान अधिक अच्छी तरह से समझ सकते हैं। मेरा तो यही अनुभव रहा। अगर आप किसी भी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल का पाठ्यक्रम देखें तो उसमें बड़े लम्बे-लम्बे शब्द रहते हैं, उन शब्दों का क्या मतलब होता है बच्चों को समझ में नहीं आता। वे वैसा का वैसा रट लेते हैं वैसा ही गृहकार्य में उतार लेते हैं और अध्यापक भी हिज्ज ठीक देखकर संतुष्ट हो जाते हैं। उसमें जो विज्ञान भरा है वह बच्चों की समझ में आया है कि नहीं, इसकी चिंता किसी को नहीं होती। इसलिए विज्ञान मातृभाषा में पढ़ाना चाहिए। कम-से-कम जहाँ विज्ञान की शुरुआत होती है (स्कूल के पाठ्यक्रम में), वहाँ तो विज्ञान मातृभाषा में ही पढ़ाया जाना चाहिए। इस देश में हिंदी अधिक लोगों की मातृभाषा है जहाँ मातृभाषा के रूप में हिंदी का उपयोग करते हैं, वहाँ विज्ञान की पढाई हिंदी में होनी चाहिए। आगे चलकर जब आप विज्ञान में शोध प्रबंध प्रस्तुत करना चाहते हैं ,पी. एच. डी. करना चाहते हैं ,या उच्च अध्ययन करना चाहते हैं तो अन्य देशों में विज्ञान की प्रगति जानने के लिए अंग्रेजी की आवश्यकता पड़ेगी। अंग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन दूसरे कारण से। विज्ञान में जो नई-नई बातें आ रही हैं, अधिकांश हम अंग्रेजी में पढ़ते हैं टेलीविज़न और फिल्मों में जो जानकारी आती है, वह अंग्रेजी में होती है, इसलिए अंग्रेजी का ज्ञान होना आवश्यक है लेकिन जहाँ पर समझने का सवाल है, वहाँ मातृभाषा का महत्व अधिक है।

दूसरी समस्या जो सामने आती है वह है पारिभाषिक शब्दों की। जब आप विज्ञान के बारे में समझाना चाहते हैं या उसके बारे में कुछ लिखना चाहते हैं, तब कुछ पारिभाषिक शब्दों को आपको लाना होता है। वैज्ञानिक निबंध में आपको ऐसे शब्द मिलते हैं। कहाँ तक हम अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल करें, कहाँ तक हम नए शब्द बनाएँ और किस प्रकार बनाएँ इन शब्दों को ? किसी भी भाषा का विकास अनेक तरीकों से होता है एक तरीका यह है कि शब्द भंडार बढ़ना चाहिए। अन्य भाषा के शब्द उसमें मिल जाएँ। आप अंग्रेजी भाषा देखें, अंग्रेजी शब्दकोष खोल कर देखें, उसमें ऐसे अनेक शब्द मिलेंगे, जिनका मूल अन्य भाषाओं में था। लेकिन अंग्रेजी भाषा में वे समा गए। उसी प्रकार हिंदी में भी हमें ऐसा आग्रह नहीं रखना चाहिए कि हम बिलकुल शुद्ध हिंदी वाले भारत में बने शब्द ही रखें। विदेशी शब्दों को हिंदी में लाना चाहिए, ये इसमें हिंदी का निरादर नहीं होगा, बल्कि हिंदी में एक नई ताकत आएगी। जैसे रेडियो शब्द है, जो बाहर से आया है पारिभाषिक शब्द है। हो सकता है आप रेडियो का अनुवाद करके कोई हिंदी शब्द बनाएं लेकिन उसका कोई इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। रेलगाड़ी शब्द है, जो हिंदी में समा गया है, लेकिन उसका गाड़ी शब्द हिंदी है और रेल शब्द अंग्रेजी है। कोई ऐसा नहीं कहता कि रेलगाड़ी बाहरी शब्द है। विज्ञान के बारे में मुझे ऐसा कहना पड़ता है कि वहां जो शब्द हैं उनमें अंग्रेजी के शब्द भी हों तो कोई हर्ज नहीं है। हम उनका इस्तेमाल करके हिंदी की पारिभाषिक शब्द-संख्या बढ़ा रहे हैं।

जब आपको नए पारिभाषिक शब्द बनाने ही हैं तो संस्कृत भाषा से बनाना उचित है जैसे अंग्रेजी भाषा में लेटिन या ग्रीक शास्त्रीय भाषा से बनाएं गए है, लेकिन संस्कृत भाषा की जो अनेक संताने हैं हिंदी, मराठी, बंगाली आदि इनमें एक ही पारिभाषिक शब्द के लिए वही संस्कृत शब्द नहीं चुना गया है। इसके मैं अनेक उदाहरण दे सकता हूँ। मराठी और हिंदी का उच्चारण देता हूँ। एटम को मराठी में अणु कहते हैं हिंदी वाले परमाणु कहते हैं। मॉलिक्यूल को हिंदी में अणु कहते हैं और मराठी में रेणु कहा जाता हैं मेरी दृष्टी में ऐसी भिन्नता अनावश्यक है क्योंकि एक ही संस्कृत भाषा से शब्द बना रहे हैं यदि राष्ट्रीय सतर पर एक समिति यह निश्चित करे कि हम एटम को क्या कहें ? तो अच्छा होगा। हो सकता है मराठी भाषी ने जो शब्द चुने हैं वे अच्छे हों, या हिंदी भाषी ने जो शब्द चुने हैं वे अच्छे हों या बंगाली भाषी ने जो शब्द चुने हैं वे अच्छे हों, लेकिन हमें एक पारिभाषिक शब्दावली बनाना चाहिए। जिससे कि मेरे जैसे लोगों को दुविधा न हो। मुझे कभी मराठी में भाषण देना होता है तो कभी हिंदी में। एटम के लिए कभी गलती से हिंदी में अणु तो कभी मराठी में परमाणु बोल देंगे। ऐसी गलती दूर की जा सकती हैं। और इसे दूर भी किया जाना चाहिए।

जहाँ तक विज्ञान के प्रसार में हिंदी के उपयोग का सवाल है एक तो ऐसे लेख लिख सकते हैं जो सामान्य नागरिक पढ़ सके। विज्ञान के बारे में उनके मन में एक तरह का डर रहता है कि यह हमारे वश की बात नहीं है। दूर प्रयोगशालाओं में जो लोग बैठे हैं, जो विज्ञान के लिए प्रयोग करते हैं, उन्ही के समझ की बात है। यह धारणा गलत है लोगों की भाषा में अगर हम लेख लिखें, विज्ञान के बारे में कुछ बतलाएँ तो उनकी धारणा दूर हो सकती है। उसका एक उदाहरण मुझे ध्यान में आता है कि नीति कथाओं को पंचतंत्र में कैसे लिखा गया है ? एक धनिक था। उसके बच्चे सामान्य पाठशाला में कुछ पढ़-लिख नहीं सकते थे। उसने पंडित विष्णु शर्मा को बुलाया और कहा कि इनको जरा सिखाओ, बिलकुल पढ़ते नहीं, उजड्ड लगते हैं। तो उन्होंने कहानियां सुनाईं। कहानियों के रूप में जो नीति है। जो नीति मूल्य है बच्चों के सामने रखा और उन्हें सिखाया। विज्ञान के बारे में कुछ ऐसा ही किया जा सकता है। जो चीजें सामान्य पाठक किसी सादे लेख में नहीं पढ़ना चाहेगा, वह विज्ञान की कथा के रूप में अच्छी तरह से पढ़ सकेगा। एक अच्छी विज्ञान कथा का उदाहरण में आपको देता हूँ जो पहले जूल्सव्हर्न ने फ्रेंच में लिखी थी (अराउंड द वर्ल्ड इन 80 डेज), उसका अंग्रेजी में अनुवाद हुआ फिर अनेक भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। हिंदी में भी उसका अनुवाद हुआ। कहानी में एक आदमी बाजी लगाता है कि 80 दिन में पृथ्वी का चक्कर लगाकर आएगा और पूरब की ओर जाते-जाते वह जब वह लौटता है तो उसे 81 दिन करीब- करीब लग जाते हैं। वह सोचता है कि वह बाजी हार गया लेकिन बात ऐसी होती है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रहती है इस कारण जैसे-जैसे हम पूरब की ओर जाते हैं - आजकल के हवाई जहाज के यात्रियों को इसका अनुभव होता है कि घड़ियाँ आगे करनी पड़ती हैं तो उसने ऐसा ही किया था, लेकिन उसे कुछ ध्यान नहीं आया कि केवल 80 दिन ही बीते थे, 81 दिन नहीं बीते थे, क्योंकि जब वह पूरा चक्कर लगा कर वापस अाया, तब घड़ी को आगे बढ़ाते-बढ़ाते हुए अाया था। वह असल में बाजी जीत गया। यह तो एक तथ्य है, जो विज्ञान-कथा के रूप में लोगों ने पढ़ा और तब तथ्य उन्हें अच्छी तरह से समझ में अाया। ऐसी काफी विज्ञान-कथाएँ लिखी जा सकती हैं और कुछ ऐसी विज्ञान-कथाएँ भी लिखी जा सकती हैं जिसमें समाज-प्रबोधन किया जा सकता है समाज में जो एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण आना चाहिए, जिसके बारे में आाजकल काफी कहा जाता है, बोला जाता है, लिखा जाता हैं। इस वैज्ञानिक दृष्टीकोण का क्या महत्व है ? किस प्रकार उसे आचरण में लाया जा सकता है, यह कथा-माध्यम से हम दिखा सकते हैं।

इसके बाद एक माध्यम पत्रकारिता का है। मुझे यह कहना है कि द टाइम्स ऑफ़ इंडिया कितना भी मोटा क्यों न हो। लेकिन उसमें विज्ञान नहीं है। नवभारत टाइम्स में भी कुछ विज्ञान न हो तो आश्चर्य की बात नहीं है। इसके बारे में मुझे हर समय बहुत खेद होता है कि हमारे समाचार पत्रों में, हमारे अख़बारों में विज्ञान के बारे में जानकारी बहुत कम दी जाती है और जो कुछ भी जानकारी दी जाती है - आप द टाइम्स ऑफ़ इंडिया देखें किसी वैज्ञानिक शोध के बारे में विवरण होगा तो नीचे देखिये किसी विदेशी संस्था का नाम होगा कि यहाँ से यह समाचार लिया गया है। हो सकता है न्यूयॉर्क टाइम्स से लिया गया हो, या लंदन टाइम्स से। ऐसा करने की वास्तव में कोई जरुरत नहीं है। हमारे देश में इतने वैज्ञानिक हैं उनसे पूंछकर या कुछ अख़बारों के स्टाफ पर किसी विज्ञान स्नातक को रखा जाए, उसे यह काम दिया जाए कि विज्ञान के बारे में लिखो। हमारे अख़बारों में विज्ञान के बारे में काफी लिखा जा सकता है। मैंने देखा है कि इस बारे में महाराष्ट्र टाइम एक मराठी पत्र है। विज्ञान के बारे में उसमें एक दिन बुधवार को काफी लिखा जाता है। जो महाराष्ट्र टाइम ने कर दिखाया, वह द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने नहीं किया, नवभारत टाइम्स या जन सत्ता जैसे समाचार पत्रों में ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए कि विज्ञान के बारे में एक पन्ना उसमें रहे, हफ्ते में किसी एक दिन। इस तरह हम विज्ञान को बहुत लोगों तक पहुंचा सकते हैं। आप जानते हैं कि हिंदी अखबार बहुत पढ़ा जाता है, अंग्रेजी अखबार की अपेक्षा। तो क्यों न इसका फायदा उठाया जाए और हम विज्ञान को अधिक लोगों तक क्यों न पहुँचाएँ।

और एक माध्यम-शक्तिशाली माध्यम है रेडियो और टेलीविज़न का। इसके बारे में मैं अपना अनुभव बताता हूँ। दो-तीन साल पहले टी. वी. पर कार्ल सेगन की "कॉसमॉस" नाम की एक मालिका हर रविवार को दिखाई जाती थी। इस मालिका को पहले तीन-चार मिनटों में मैं हिंदी में प्रस्तुत करता था। इसी उद्देश से मुझ से कहा गया कि 2-3 मिनिटों में प्रत्येक प्रोग्राम की थोड़ी सी जानकारी झलक दूँ। जब प्रोग्राम मालिका पूरी हुई तो मुझे दर्शकों के पत्र मिले। उन्होंने लिखा था कि जो माध्यम अंग्रेजी के कॉसमॉस का था। वह अच्छी तरह से समझ में नहीं आया, लेकिन हिंदी में शुरू में हमें जो बतलाया गया, उसके कारण प्रोग्राम हम अच्छी तरह से समझ सके। इसका मतलब है कि देश के अधिकांश दर्शक (बम्बई, कलकत्ता जैसे कुछ शहरों को छोड़कर) जिनके पास आजकल टी. वी. प्रोग्राम पहुँच रहे हैं - हिंदी भाषा-भाषी होते या हिंदी समझते हैं। इसलिए हिंदी में टी. वी. के लिए विज्ञान पर अच्छे प्रोग्राम बनने चाहिए। इस दिशा में कॉसमॉस के अनुभव के बाद मेरा एक प्रयत्न रहा है कि हिंदी में वैसी ही एक चित्र मालिका बननी चाहिए - और वैसी अब बन रही है। फिल्म डिवीज़न द्वारा 15 किस्तों की एक मालिका "ब्रह्माण्ड " शीर्षक से बन रही है अभी कुछ महीने और लगेंगे। मुझे आशा है कि हिंदी माध्यम से इस प्रकार के जो प्रोग्राम टी. वी. में दिखाएँ जाएंगे, उनसे लोगों को विज्ञान के बारे में अधिक जानकारी मिल पाएगी।

अब सवाल आता है, विज्ञान के प्रसार में कौन-कौन हाथ बँटा सकते हैं। सामान्य रूप से लोग कहते हैं कि यह काम वैज्ञानिकों का है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा काम अपनी प्रयोगशाला में जाकर शोध करना है या अपने छात्रों को पढ़ाना है अगर हम लोग ऐसा काम करने लगे तो हमारा अनुसंधान का काम है वह आगे नहीं बढ़ पाएगा। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। वैज्ञानिक को खुद अपने अनुसंधान द्वारा, अन्वेषण द्वारा अपने ज्ञान की वृद्धि करने का मौका मिलता है। उसके अलावा लोगों को विज्ञान पढ़ाने से भी ज्ञान वृद्धि का मौका मिलता है। जब हम किसी व्यक्ति को कोई बात समझाना चाहते हैं। तो वह प्रश्न पूछता है। उन प्रश्नों के उत्तर देते समय हम उस विषय को अधिक अच्छी तरह से समझ सकते हैं कोई कितना भी बड़ा पंडित क्यों न हो वह अगर और लोगों को अपना ज्ञान समझाना चाहता है तो उसके ज्ञान में अपनी वृद्धि होती है, इसलिए वैज्ञानिकों को ऐसा करना चाहिए कि अपने समय का कुछ अंश विज्ञान-प्रसार के लिए देवें।

विज्ञान के प्रसार में साहित्यकारों को भी आगे आना चाहिए। उनकी लेखनी में वैज्ञानिकों की अपेक्षा अधिक ताकत होती है। मैं विज्ञान का लेख लिख सकूंगा लेकिन मेरी हिंदी इतनी अच्छी नहीं होगी जितनी किसी जाने माने लेखक की होगी। जिसकी लेखनी में इतना दम है उसे चाहिए कि विज्ञान के बारे में कुछ समझाए। आप कहेंगे कि साहित्यिक लोग कहते हैं कि विज्ञान तो हम समझ नहीं सकते, बहुत कठिन बात है, हम लोगों को क्या बतलाएंगे? लेकिन ऐसी कुछ बात नहीं है। अगर प्रयास करें तो कुछ विज्ञान के विषय कम से कम विज्ञान कथा के माध्यम से लोगों के सामने ला सकेंगे। इस बारे में वे किसी वैज्ञानिक से सहायता ले सकते हैं। वे किसी वैज्ञानिक से चर्चा करें कि मेरे मन में ऐसी कल्पना आई है तो वैज्ञानिक बता सकते हैं कि बात सही है या नहीं, उसमें क्या सुधार करना चाहिए। इस प्रकार से हम एक नए प्रकार के साहित्य को निर्मित कर सकते हैं। ऐसे नए साहित्य द्वारा हिंदी का भी विकास होगा हैं। विज्ञान साहित्य को 20 वी. शताब्दी का नया साहित्य मानना चाहिए, जो अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं में काफी विकसित हो चुका है। हमें ऐसा साहित्य अपनी भाषाओं में लाना चाहिए, इसके लिए मैं मान्य साहित्यकारों से यह कहूँगा कि आप लोग विज्ञान कथाएँ लिखिए, लिखने का प्रयास कीजिये। आप लोग अच्छी विज्ञान कथाएँ लिख पाएंगे। उनसे मैं यह भी कहूँगा कि अन्य साहित्यिक रूपों से विज्ञान कथाओं को कुछ भी कम मत समझिए। यह मत समझिए कि जो विज्ञान के बारे में लिखा है वह असली साहित्य नहीं है। वह भी साहित्य का महत्वपूर्ण अंश हो सकता है।

आज हम लोग 21 वी. सदी की बातें कर रहे हैं तो 21 वी. सदी विज्ञान युग से ही पहचानी जाएगी। 20 वी. सदी को भी हम विज्ञान युग कहने लगे हैं..... किसी भी भाषा की जो समृद्धि है, वह तत्कालीन सामाजिक परिवर्तनों एवं तकनीकी का किस प्रकार चित्रण कर सकती है - इस पर उस भाषा की समृद्धि निर्भर रहती है और अगर हम विज्ञान-युग में प्रवेश कर रहे हैं तो इसकी कुछ झलक तो हमें अपनी भाषा में दिखलानी ही चाहिए - इसलिए हिंदी को इस क्षेत्र में अधिक आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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3 Comments

  1. एक अत्यंत आकर्षक और चिन्तनयुक्त लेख मैं श्री जयंत विष्णु नार्लीकर और आधारभूत ब्रह्माण्ड से सहमत हूँ ! लेकिन यहाँ पर अंग्रेजी को कुछ ज्यादा ही कठिन मान लिया गया हैं ,अंग्रेजी इतनी कठिन नही हैं ! मैं ज्यादा अंग्रेजी नही जानता और मैं 10 वी क्लास का एक अंग्रेजी-मीडियम का एक विद्यार्थी हूँ ,मुझे तो अंग्रेज़ी में विज्ञान को समझने में कोई दिक्कत नही होती हैं ! फिर भी मैं हिंदी को प्रोत्साहित करता हूँ !

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    1. प्रदीप, इस लेख का आधार 'हिंदी बनाम अंग्रेजी' भाषा वाला मुद्दा नहीं है। बल्कि इस लेख का आधार मातृभाषा बनाम अन्य भाषा है। लेखक ने यहाँ स्पष्ट किया है कि विज्ञान की प्रारम्भिक शिक्षा मातृभाषा में ही क्यों दी जानी चाहिए। विज्ञान सिर्फ जानकारी का नाम नहीं है कि उसे किसी भी भाषा द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान स्थानांतरित किया जा सके। विज्ञान को पढ़ने के बाद हमारे मस्तिष्क में जो चित्रण बनता है। उसकी अभिव्यक्ति और उसके चित्रण को निर्मित करने में मातृभाषा अहम भूमिका निभाती है। जिसकी पूर्ति अन्य भाषा नहीं कर सकती। अन्य भाषा के उपयोग से चित्रण का अर्थ का अनर्थ निकलने की सम्भावना बनी रहती है। यदि किसी व्यक्ति विशेष की मातृभाषा अंग्रेजी, फ्रेंच या उर्दू आदि.. जो भी हो। इसलिए उसे उसी भाषा में विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा दी जानी चाहिए।

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  2. भौतिकी की समझ विकसित करने हेतु व्यक्ति को मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा की व्याकरण सीखनी चाहिए। क्योंकि व्याकरण हमें गणनीय, अगणनीय, मात्रा, गुणक, समूह, व्यव्हार, क्रम, समय, स्थान, कर्ता, क्रिया, कर्म, विशेषण, सापेक्ष, निरपेक्ष, गति, सूक्ष्म और स्थूल जैसे गुणों का महत्व बतलाती है। और इस महत्व को मातृभाषा की व्याकरण द्वारा इसलिए नहीं समझा जा सकता क्योंकि बचपन से ही मातृभाषा की व्याकरण का उपयोग इस मह्त्व को समझे बिना शब्दों के रूप में किया जाता है।
    - अज़ीज़ राय

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