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जब हम अपने व्यक्तिगत कार्यों को अंजाम देने में लगे होते हैं तब हम दूसरों को नज़र अंदाज़ करते रहते हैं। नज़र अंदाज़ करने के लिए हमें अलग से किसी कार्य को करना नहीं होता। बल्कि नज़र अंदाज़ करने का यह सिलसिला तो व्यक्तिगत कार्यों में फसे होने के परिणाम स्वरुप खुदवा खुद होता रहता है। आराम के दिनों में जब इस सृष्टि को निहारने का मौका मिलता है तो हम खिल उठते हैं ! इसकी ख़ूबसूरती के रहस्य को जानने की इच्छा कर बैठते हैं ? ये सृष्टि बनी कैसे ? कहाँ तक है यह फैली ? कब हुई इसकी उत्पत्ति ? किन नियमों ने है रचा इसे ? और अंत में इसका भविष्य क्या है ? हम बार-बार इन्ही प्रश्नों को सुनते हैं और न जाने कितने हज़ारों वर्षों से इन प्रश्नों के जबाब तलाशते आए हैं ? फिर भी ये प्रश्न ज्यों के त्यों बने हुए हैं। तो क्या हम इस रहस्य को कभी नहीं सुलझा पाएंगे ? इसमें समस्या क्या है ? यह सोचने का विषय है कि आखिर हम इन्ही प्रश्नों को क्यों जानना चाहते हैं ? इन प्रश्नों का इस ब्रह्माण्ड के लिए क्या महत्व है ? दरअसल ये प्रश्न वाकई में इस ब्रह्माण्ड के रहस्य को सुलझाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि ये सभी प्रश्न स्वतंत्र रूप से पूछे गए प्रश्न नहीं है। ये मूल प्रश्न हैं। ये सभी प्रश्न एक दूसरे के साथ गुथे हुए हैं। फलस्वरूप इन प्रश्नों को आज तक हम पूर्ण रूप से सुलझा नहीं पाए। हर एक प्रश्न के जबाब में हमने ब्रह्माण्ड को एक नए स्वरुप में पाया है। और जब तक हम इन सभी प्रश्नों के जबाब में ब्रह्माण्ड के संभावित स्वरूपों में से किसी एक ब्रह्माण्ड के स्वरुप का चयन वास्तविक ब्रह्माण्ड के रूप में नहीं कर लेते। तब तक ये प्रश्न ज्यों के त्यों बने रहेंगे।

जब कभी इन संभावित स्वरूपों को लेकर परिक्षण करने की बात आती है। तब हमारे सामने इस सृष्टि की विशालता आड़े आने लगती है। इस विशालता को विख्यात खगोलशास्त्री एडिंगटन ने उपमा के रूप में कुछ इस तरह प्रस्तुत किया है। "कल्पना कीजिये आलू के अंदर कुछ कीड़े हैं। वह आलू एक आलू से भरे बोरे में हैं। ऐसे कई बोरे एक से अधिक मंजिलों से बने जहाज में भरें हैं। और जहाज समुद्र पर तैर रहा है। यदि वे कीड़े समुद्र के बारे में जानना चाहते हैं तो ? पृथ्वी के तल से ब्रह्माण्ड की जानकारी पाने का मानव का प्रयत्न कुछ इसी तरह का है।" इस विशालता के आलावा भी ब्रह्माण्ड के समस्त घटकों को परिभाषित करने दूसरे शब्दों में उनके भौतिक अर्थ को सुनिश्चित करने का कार्य जो बहुत अधिक जटिल है, परिक्षण के उपरांत विश्लेषण में बाधा उत्पन्न करता है। ब्रह्माण्ड की विशालता को हम नियमों के जरिये कम आंक कर अपने कार्य को पूरा करते हैं। परन्तु घटकों और गुणांकों को परिभाषित करने और उनके भौतिक अर्थ को सुनिश्चित करने का कार्य सरल नहीं होता है। इसके लिए हम ब्रह्माण्ड को अलग-अलग आधार पर कई भागों में विभक्त करके अपने कार्य को अंजाम देते हैं।


वास्तव में सृष्टि का रहस्य उसी सृष्टि में छुपा हुआ है जिसे हम और आप देखते आए हैं। न कि सृष्टि को देखने के उपरांत हमारे मन में उभरने वाले उन प्रश्नों में सृष्टि का रहस्य छुपा है। क्योंकि इस सृष्टि को देखने के उपरांत जो प्रश्न मन में उभरते हैं। उनके प्रश्नों के उत्तर इसी ब्रह्माण्ड में हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो ब्रह्माण्ड के इसी स्वरुप में है। और चूँकि यह स्वरुप अभी तक पूर्णतः ज्ञात नहीं है इसलिए लेख की भाषा में सृष्टि का रहस्य ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्यों में छुपा हुआ है।
ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्य :
  1. दैविक ब्रह्माण्ड : संस्कृति और सभ्यता के विकास के साथ ही मानव ने इस बात को भली-भांति समझ लिया था कि सृष्टि को देखने के उपरांत उठने वाले प्रश्नों के जबाब इसी सृष्टि की सुंदरता में है। इसलिए ब्रह्माण्ड के संभावित स्वरुप को लेकर उन्होंने विचार किया। परन्तु उस समय के मनुष्य ने उस प्रकृति या ब्रह्माण्ड को एक नई सुंदरता प्रदान कर दी। अर्थात उस प्रकृति को मनुष्य का स्वरुप प्रदान कर दिया गया। उसे एक जीव मान लिया गया। यह स्वरुप केवल एक ही संस्कृति या सभ्यता में देखने को नहीं मिलता है बल्कि सभी पुरानी और विकसित सभ्यताओं में इसे देखा जा सकता है। जहाँ प्राचीन ग्रीक में पृथ्वी को गईया (Gaia) अर्थात एक जीव का स्वरुप प्रदान किया गया है। देवी गईया (पृथ्वी) एक मानव के रूप में भोजन ग्रहण करती हैं और जीवाणु और विषाणु के रूप में हम मनुष्य उसी भोजन को प्रकृति के रूप में धरातल से ग्रहण करते हैं। वहीं भारतीय संस्कृति में ब्रह्माण्ड को अंडे की उपमा दी गई है। ऐसा अंडा जिसमें सब कुछ समाहित है। इसी तरह उत्तरी यूरोप की नार्डिक सभ्यता में ब्रह्माण्ड को एक विशाल वृक्ष माना गया है। जिसकी जड़ों से लेकर डालियों तक सभी भागों में चाँद, तारे, जीव-जंतु और वनस्पति पाए जाते हैं।
  2. स्थिर ब्रह्माण्ड : विज्ञान के शुरूआती विकास के दौर में ब्रह्माण्ड के संभावित स्वरुप के लिए जाने अनजाने बहुत से वैज्ञानिकों ने अपने मत रखे। परन्तु वास्तव में वे सभी मत सिर्फ और सिर्फ पृथ्वी और हमारे सौरमंडल तक के तंत्र को समझाने में सहायक साधनों को जुटा रहे थे। पूरे ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्य को समझने में इन सभी मतों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सौरमंडल और उसका आधार आकाश के प्रति हमारी सोच विकसित करने के पीछे पाईथागोरस, आर्यभट्ट, कोपरनिकस, गैलीलियो, केपलर और न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों का योगदान प्रमुख रहा है। परन्तु ब्रह्माण्ड के संभावित स्वरुप के परिदृश्य के लिए प्रथम ढांचे के रूप में सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने हमारा परिचय ब्रह्माण्ड से कराया। सन 1917 को साधारण सापेक्षता का सिद्धांत देते वक्त गुरुत्वाकर्षण के नूतन सिद्धांत द्वारा ब्रह्माण्ड के ढांचे को स्थिर बतलाया गया। जिसमें स्थित सभी तारे और आकाशगंगाओं को अचल बतलाया गया। यहाँ ताकि कि आकाश /अंतरिक्ष को भी सीमित बतलाया गया था। और ब्रह्माण्ड का यह स्वरुप अनादि काल से इसी तरह से स्थिर बना हुआ है। इस तरह के ब्रह्माण्ड के ढांचे से यह निष्कर्ष निकला गया कि यदि हम सीधी रेखा से किसी भी दिशा में गति करते हुए यात्रा करें। तो ब्रह्माण्ड का पूरा एक चक्कर यात्रा के शुरुआती बिंदु पर आकर ही समाप्त होगा।
  3. गतिशील ब्रह्माण्ड : सन 1922 में एक रुसी वैज्ञानिक अलेक्सेंडर फ्रीडमैन ने गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा दी। ब्रह्माण्ड के इस ढांचे के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। यानि कि ब्रह्माण्ड की अवस्था में निरंतर परिवर्तन हो रहा है। और यह ब्रह्माण्ड आदि काल में वर्तमान स्वरुप से भिन्न था। इस ढांचे के द्वारा यह सम्भावना जताई गई कि एक समय यह ब्रह्माण्ड बिंदु जैसी स्थिति में था। एक प्रचंड विस्फोट के रूप में अत्याधिक ताप के साथ ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई। जिसके कारण उस बिंदु जैसी स्थिति के अवयवी अंश बिखर गए। जिससे आगे चलकर तारे, आकाशगंगाएं, हम और आप बने। जिसका कारण अज्ञात माना गया। आइंस्टीन सहित तत्कालीन वैज्ञनिकों ने महाविस्फोट जनित ब्रह्माण्ड के मॉडल को अस्वीकार किया। परन्तु सन 1929 में अमेरिकी वैज्ञनिक एडविन हब्बल ने दूरबीन के उपयोग से आकाशगंगाओं की गति का अध्ययन करके बतलाया कि सभी आकाशगंगाएं एक दूसरे से दूर जा रही हैं। और जो आकाशगंगा हमसे जितनी दूरी पर है वह आकाशगंगा हमारी आकाशगंगा से उतनी ही तीव्र गति से दूर जा रही है। तब जाकर फ्रीडमैन की अवधारणा को स्वीकार किया गया कि ब्रह्माण्ड अचल न होकर फ़ैल रहा है।
  4. स्थिर अवस्था का ब्रह्माण्ड : अलेक्सेंडर फ्रीडमैन के महाविस्फोट सिद्धांत को प्रसिद्ध वैज्ञानिक और लेखक जार्ज गैमो ने अपने कार्यों द्वारा विश्लेषित किया। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के कुछ मिनटों बाद की परिस्थिति का अध्ययन करते हुए। जार्ज गैमो ने यह निष्कर्ष निकले कि महाविस्फोट के समय ब्रह्माण्ड का तापक्रम अरबों अंश सेंटीग्रेट रहा होगा। और इन परिस्थितियों में न्यूट्रॉन और प्रोटॉनों के संयोग से हाइड्रोजन सहित सभी मूलतत्व जैसे लोहा, सोना से लेकर यूरेनियम और थोरियम तक के तत्वों के निर्माण होने की सम्भावना जताई गई। उसी समय 1948 ईसवी के दौरान तीन ब्रिटिश वैज्ञानिक हर्मन बांडी, थॉमस गोल्ड एवं फ्रेड हॉयल ने ब्रह्माण्ड को एक ऐसे ढांचे के रूप में प्रस्तुत किया। जो अनादि, अनंत और जिसमें सतत विस्तार हो रहा था। परन्तु इस ब्रह्माण्ड का घनत्व नियत था। विस्तार होने के बाबजूद घनत्व एक सा बना रहे ये कैसे हो सकता है ? तब आप तीनों वैज्ञानिकों ने पदार्थ के सृजन की बात की। अर्थात जब एक गैस का गोल फूलता है तब उसके आयतन में वृद्धि और घनत्व में कमी आती है। परन्तु बांडी-गोल्ड-हॉयल के स्थिर ब्रह्माण्ड में घनत्व में आने वाली कमी को "रिक्तता में सृजित पदार्थ" द्वारा पूर्ति की जाती थी। और इस तरह से ब्रह्माण्ड का घनत्व बना रहता था। परन्तु आयतन में वृद्धि विस्तार को दर्शाती थी। हॉयल के कथानुसार प्रोटोन जैसे मूलकणों का अक्षय नहीं होता है। जबकि तत्कालीन वैज्ञानिकों का मत प्रोटोन के अक्षय होने पर टिका था। फलस्वरूप ढांचे में आकाशगंगाओं के मध्य नई आकाशगंगाएं बनती रहती हैं को बतलाया गया।
  5. सैद्धांतिक ब्रह्माण्ड : अभी तक आपने ब्रह्माण्ड के जितने संभावित परिदृश्य देखे हैं। वे तीनों परिदृश्य ब्रह्माण्ड की अवस्था को लेकर किसी विशेष वैज्ञानिक द्वारा सुझाए गए मॉडल थे। परन्तु हम ब्रह्माण्ड के घटकों से निर्मित होने वाले संभावित परिदृश्यों से आपको रूबरू कराएँगे। ये सभी परिदृश्य भौतिकी के विकास के दौरान परिष्कृत होकर हमारे सामने आते रहे हैं। ब्रह्माण्ड के ये मॉडल किसी एक वैज्ञानिक द्वारा प्रस्तुत नहीं किये गए। बल्कि वैज्ञानिकों के कार्यों ने उसे हरदम परिष्कृत किया है। यदि आज हम वर्तमान भौतिकी द्वारा दिए गए ब्रह्माण्ड के नवीनतम मॉडल की बात करें। तो ब्रह्माण्ड न ही सीमित है और न ही इसका कोई दूसरा भाग है। ये तो बात हो गई उस पदार्थ की जिससे ब्रह्माण्ड बना हुआ है। परन्तु इस ब्रह्माण्ड का दूसरा घटक अंतरिक्ष भी तो है। तब इस ढांचे के अनुसार अंतरिक्ष को नकार दिया गया है अर्थात हम / पदार्थ अंतरिक्ष में नहीं रहते हैं। बल्कि हम ही अंतरिक्ष हैं। ब्रह्माण्ड का यह स्वरुप एकीकरण (Unification) सिद्धांत द्वारा सामने आया है। ठीक इसी तरह भौतिकी के विकास ने ब्रह्माण्ड को कई संभावित स्वरुप दिए हैं। इसे आप इस लेख में पढ़ सकते हैं।
जैसा कि हमने लेख की शुरुआत में कुछ प्रश्नों पर चर्चा की थी। उन सभी प्रश्नों को लेकर भी ब्रह्माण्ड को नए ढांचे के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। परन्तु ब्रह्माण्ड के ये सभी संभावित परिदृश्य तथ्यों के आधार पर दिए गए हैं कहने का आशय हर एक प्रश्न के लिए ब्रह्माण्ड का एक नया मॉडल सुझाया गया है। तो क्या हम जिस ब्रह्माण्ड में रहते हैं उसके आलावा भी दूसरे ब्रह्माण्ड के तथ्यों को खोज पा रहे हैं। अरे मैंने ये क्या कह दिया ! तो क्या एक से अधिक ब्रह्माण्ड अस्तित्व रखते हैं ? बेशक यह मॉडल भी तथ्यात्मक रूप से ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्यों में गिना जाता है। ब्रह्माण्ड के अंत को लेकर भी ब्रह्माण्ड के कई परिदृश्य सामने आते हैं जहाँ आप इस कड़ी द्वारा पहुँच सकते हैं। एकलौते ब्रह्माण्ड और एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने के परिदृश्य को हम आने वाले लेखों में पढ़ेंगे। क्योंकि इन विषयों का आधार इस लेख के आधार से भिन्न है। ऊपर बतलाए गए सभी संभावित परिदृश्य ब्रह्माण्ड की मूल संरचना और उसकी प्रकृति से सम्बंधित हैं। बाँकी सभी संभावित परिदृश्य मूल परिदृश्यों के तथ्यों में थोड़ा बहुत परिवर्तन करके प्रस्तुत किये गए हैं।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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