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ब्रह्माण्ड का अंत कैसे हो !

हमारा पिछला लेख "दो अनसुलझे सवाल" का पहला प्रश्न ब्रह्माण्ड के अस्तित्व से सम्बंधित और दूसरा प्रश्न ब्रह्माण्ड के अंत से सम्बंधित था। आज हम दूसरे प्रश्न और सम्बंधित विषय का गहराई से अध्ययन करेंगे और जानने की कोशिश करेंगे कि क्या ब्रह्माण्ड की उम्र को हम प्रभावित करते हैं या नही ? "ब्रह्माण्ड का अंत कैसे हो !" क्या हम अपने क्रियाकलापों (प्रभाव) द्वारा ब्रह्माण्ड के अंत (उम्र) के तरीके को निर्धारित कर सकते हैं ? या फिर उस निर्धारित तरीके को केवल जान सकते हैं ? क्या होता होगा ? ब्रह्माण्ड के अंत को कौन निर्धारित करता है ? हम कैसें जानेंगे कि ब्रह्माण्ड का अंत कैसे होगा ? रुको-रुको थोड़ा सा धैर्य रखो, अभी तो इस विषय पर चर्चा शुरू हुई है।

ब्रह्माण्ड के अंत पर चर्चा करने से पहले हमें ब्रह्माण्ड का अंत करने वाले घटकों को समझना होता है। और साथ ही यह भी समझना होता है कि ये घटक किस तरह से ब्रह्माण्ड की उम्र को प्रभावित और ब्रह्माण्ड के अंत के तरीके को निर्धारित करते हैं। "ब्रह्माण्ड का अंत" सुनते से ही हमारे दिमाग में समय संबंधी प्रश्न उभर आते हैं। क्योंकि समय, ब्रह्माण्ड के अंत का एक महत्वपूर्ण घटक और कारक दोनों होता है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब हुई ? प्रश्न में समय एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में कार्य करता है। जबकि ब्रह्माण्ड का अंत कब होगा ? प्रश्न में समय ब्रह्माण्ड के अंत का एक प्रमुख घटक होता है जो यह निर्धारित करता है कि ब्रह्माण्ड का अंत कैसे हो !

जैसा की हम सभी जानते हैं कि ब्रह्माण्ड का सृजन महा-विस्फोट घटना के रूप में समय और अंतराल की उत्पत्ति के साथ हुआ है और इसलिए ब्रह्माण्ड के सृजन के पूर्व समय और अंतराल का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसके बाबजूद यदि कुछ वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के सृजन के पूर्व को जानने की कोशिश कर रहे हैं। तो इसका तात्पर्य यह है कि वे वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के स्वरुप को दोलित ब्रह्माण्ड (संभावित) के रूप में देखते हैं और उसकी सम्भावित सम्भावनाओं को खोज रहे हैं। इस प्रकार के ब्रह्माण्ड में महा-विस्फोट की घटना ब्रह्माण्ड का प्रारम्भ न होकर ब्रह्माण्ड का एक पहलू होती है। महा-विस्फोट घटना के समय ब्रह्माण्ड अतिसूक्ष्म अवस्था के रूप में अस्तित्व में था। आज भी वैज्ञानिकों के लिए यह संशय का विषय बना हुआ है कि महा-विस्फोट घटना के समय ब्रह्माण्ड अतिसूक्ष्म रूप में था या फिर एक बिंदु के रूप में केंद्रित था ! परन्तु दोनों परिस्थितियों से इतना तो तय है कि महा-विस्फोट के समय ब्रह्माण्ड का घनत्व अधिकतम (सघन) था और अब वह घनत्व कम (विरल) होते जा रहा है। इस तरह ब्रह्माण्ड का निरंतर विस्तार समय और अंतराल के रूप में हो रहा है। घनत्व = द्रव्यमान / आयतन

अभी तक हमने देखा कि समय और अंतराल की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड के सृजन के साथ ही हुई है। और अब हम समय और अंतराल के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड के अंत को समझने की कोशिश करेंगे। हमें वर्तमान के जो आंकड़े उपलब्ध होते हैं सिर्फ उनके आधार पर हम यह निर्धारित नहीं कर सकते कि ब्रह्माण्ड का अंत कैसे हो ! ब्रह्माण्ड के अंत को समझने के लिए हमको भूतकाल के आंकड़ों की भी आवश्यकता होती है। समय और अंतराल के संयोजित आंकङों के आधार पर ही हम यह निर्धारित कर सकते हैं कि ब्रह्माण्ड का अंत कैसे हो ! समय और अंतराल के संयोजित आंकड़े तीन भिन्न-भिन्न परिस्थितियों को जन्म देते हैं। परन्तु इनमें से केवल एक परिस्थिति का अनुसरण ब्रह्माण्ड के द्वारा किया जाता है। जो इस बात को भी दर्शाता है कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप कैसा है ? और आंगे चलकर उसका अंत कैसा होगा ! यानि कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप ब्रह्माण्ड के अंत को निर्धारित करता है। ठीक वैसे ही जैसे कि मनुष्य का अंत उसके मरने के साथ होता है और पेड़-पौधों का अंत उसके सूखने के साथ होता है। जैसा कि हमने पहले भी लिखा है कि समय, कारक और घटक दोनों के रूप में ब्रह्माण्ड का अंत करता है। यानि कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय कितनी थी ? या फिर ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब हुई ? दोनों प्रश्नों में समय कारक के रूप में कार्यरत होता है। और ब्रह्माण्ड का अंत नियत समय, सीमित समय या अनंत समय के साथ होगा ? इस प्रश्न में समय घटक के रूप में कार्यरत रहता है। अंतराल केवल घटक के रूप में ही कार्यरत होता है। और यह निर्धारित करने में सहायता प्रदान करता है कि ब्रह्माण्ड का अंत सूक्ष्म रूप में, मंदाकिनियों के मध्यस्त दूरी बढ़ने के रूप में या फिर ब्रह्माण्ड के मूल अवयवों तक ब्रह्माण्ड के टूटने के रूप में होगा ? 

ब्रह्माण्ड की नियति के चार परिदृश्य :
महा-विच्छेद : ब्रह्माण्ड के अंत का यह सबसे भयावह परिदृश्य है। क्योंकि इस अवस्था में परमाणु भी अपने अवयवी तत्वों में टूट जाता है। इस परिदृश्य के अनुसार हमको और आपको घबराने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि इस भयावह परिदृश्य के पहले ही हमारी आकाशगंगा (दुग्ध-मेखला), सौरमंडल और सभी ग्रह पहले ही नष्ट हो जाएंगे। नष्ट होने का यह क्रम व्यापक पैमाने से निचले पैमाने की ओर होता है।
महा-शीतलन : इस परिदृश्य के अंतर्गत ब्रह्माण्ड की सभी मंदाकिनियां एक दूसरे से दूर जाती जाएंगी। जिससे कि मंदाकिनियों के मध्यस्त किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं रह पाएगा। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड के ताप में अत्यधिक कमी आएगी। और ब्रह्माण्ड का अंत शीतलन के रूप में होगा।
महा-संकुचन : इस परिदृश्य के अंतर्गत ब्रह्माण्ड में संकुचन प्रारम्भ हो जाएगा और तत्पश्चात ब्रह्माण्ड एक नए ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के लिए तैयार होगा। सम्भव है कि यह ब्रह्माण्ड भी किसी अन्य ब्रह्माण्ड के पतन (अंत) के पश्चात् ही अस्तित्व में आया हो।
महाद्रव अवस्था : इस परिदृश्य के अंतर्गत ब्रह्माण्ड के द्रव्य का उपयोग एक नए ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रूप में होता हुआ दिखलाई देता है। ब्रह्माण्ड के इस द्रव्य का उपयोग प्रकाश की गति के समान होगा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हिग्स बोसॉन कण के अस्तित्व के प्रमाण की पुष्टि सर्न द्वारा जुलाई 2012 को कर दी गई है। उसी के बाद से महाद्रव अवस्था को ब्रह्माण्ड की नियति के रूप में देखा जाने लगा है। जिसके अनुसार जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ब्रह्माण्ड स्वाभाविक रूप से अस्थिर है और हिग्स बोसोन कण ने ब्रह्माण्ड को द्रव्यमान देने का कार्य किया हुआ है, के द्वारा ब्रह्माण्ड के इस द्रव्य का उपयोग एक नए उभरते हुए ब्रह्माण्ड के निर्माण में होने लगेगा। और इस उभरते हुए ब्रह्माण्ड के निर्माण का कार्य हिग्स बोसोन कण के द्वारा किया जाएगा। यह ठीक वैसे ही होगा जैसे कि हिग्स बोसोन कण ब्रह्माण्ड के द्रव्य को द्रव के रूप में सुड़क रहा है। ताकि उसका उपयोग किसी अन्य रूप में अन्य तरीके से कर सके।

महा-शीतलन
महा-विच्छेद

महा द्रव-अवस्था
महा-संकुचन












ब्रह्माण्ड के घटकों के आधार पर नियति के परिदृश्यों का विश्लेषण :
जैसा कि हमने अपने पिछले लेख (ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं ?) में लिखा था कि ब्रह्माण्ड के दो सैद्धांतिक घटक पदार्थ और ऊर्जा होते हैं तथा दो व्यावहारिक घटक स्थिति और भौतिक राशियाँ होती हैं। ये घटक ब्रह्माण्ड के अंत से सीधा संबंध रखते हैं को हम यहाँ समझने की कोशिश करेंगे। "ब्रह्माण्ड का अंत" के प्रमुख घटक ब्रह्माण्ड का स्वरुप, उसकी उत्पत्ति, समय, अंतराल, श्याम ऊर्जा, अंतरिक्ष की वक्रता और क्रांतिक घनत्व हैं।

ब्रह्माण्ड का स्वरुप : यह एक ऐसा महत्वपूर्ण कारक और घटक है। जो ब्रह्माण्ड के अन्य घटकों पर प्रभावी होता है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हम सभी किसी न किसी रूप में (पिंड, निकाय या निर्देशित तंत्र) ब्रह्माण्ड के अवयव हैं। तब इतना तो तय है कि हम ब्रह्माण्ड के स्वरुप को नहीं जान सकते। यह ठीक वैसे ही होता है जब हम यह सोचते हैं कि कोई कमरा अंदर से आयताकार है। तो वह बाहर से भी आयताकार होगा ! परन्तु बाहर से देखने पर वह गोलाकार भी हो सकता है। परन्तु ब्रह्माण्ड के स्वरुप को जानने के लिए हम कोशिश करते रहते हैं। जैसे कि हमने कुछ पंक्तियाँ पहले ही लिखा है कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप अन्य घटकों पर प्रभाव डालता है। और हम इन्ही प्रभावों को समझ कर यह दावा करते हैं कि हम ब्रह्माण्ड के स्वरुप से परिचित हो रहे हैं। और इस तरह ब्रह्माण्ड का स्वरुप बहुत सी संकल्पनाओं को जन्म देता है। जिसमे से "ब्रह्माण्ड के समूह" यानि कि एक से अधिक ब्रह्माण्ड की संकल्पना प्रमुख है। जो इस बात पर टिकी हुई है कि इन सभी ब्रह्माण्ड में अलग-अलग नियम कार्यरत होते हैं। परन्तु क्या इन ब्रह्माण्ड में से किसी एक ब्रह्माण्ड का सम्बन्ध किसी अन्य दूसरे ब्रह्माण्ड से हो सकता है या नहीं ? यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि क्या एक ब्रह्माण्ड किसी अन्य दूसरे ब्रह्माण्ड में बाह्य कारक के रूप में बल आरोपित कर सकता है या नहीं ? इस स्थिति में ब्रह्माण्ड के अंत के परिदृश्यों की संख्या और अधिक हो जाएगी। परन्तु जब हम इन्ही चार परिदृश्यों को लेकर ब्रह्माण्ड के स्वरुप पर चर्चा करते हैं। तो हम यह पाते हैं कि महा-संकुचन और महाद्रव की अवस्था ब्रह्माण्ड के स्वरुप को एकीकृत रूप में परिभाषित करती है। और इन दोनों परिदृश्यों में सीमितता की चर्चा होती है। परन्तु दोनों परिदृश्यों में सीमितता का अर्थ भिन्न-भिन्न निकलता है। जबकि महा-विच्छेद और महा-शीतलन दोनों परिदृश्यों में ब्रह्माण्ड असीम प्रतीत होता है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति : विज्ञान में वर्तमान, भूतकाल और भविष्यकाल जैसी कोई चीज नहीं होती है। वास्तव में यह ब्रह्माण्ड की अवस्था को निरूपित करता है। जो इस बात को दर्शाता है कि अभी विस्तार हो रहा है या फिर संकुचन हो रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो संरचना में बाह्य बल प्रभावी है या फिर आंतरिक बल प्रभावी है। समय की ये तीनों अवस्थाएँ एक दूसरे के सापेक्ष होती है। आइये जानते हैं कि वो कैसे ? ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही समय और अंतराल अस्तित्व में आए। समय के सापेक्ष
ब्रह्माण्ड में अंतराल में होने वाली वृद्धि भूतकाल को कम अंतराल के रूप में और भविष्यकाल को अधिक अंतराल के रूप में दर्शाती है। जबकि अंतराल में आने वाली कमी भूतकाल को अधिक अंतराल के रूप में और भविष्यकाल को कम अंतराल के रूप में दर्शाती है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति उसके स्वरुप को समझने में सहायता प्रदान करती है कि ब्रह्माण्ड अतिसूक्ष्म रूप से विस्तार करते हुए अस्तित्व में आया है ? या फिर ब्रह्माण्ड एक बिंदु के रूप में केंद्रित था। जो असममित स्थिति उत्पन्न होने के कारण अस्तित्व में आया है ? महा-संकुचन (महा-उछाल), महा-विच्छेद और महा-शीतलन तीनों परिदृश्य महा-विस्फोट के समय में ब्रह्माण्ड को एक बिंदु के रूप में दर्शाते हैं जबकि महाद्रव अवस्था के अनुसार महाविस्फोट के समय ब्रह्माण्ड का स्वरुप सममित अवस्था को दर्शाता है। जब कभी ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई रही होगी। उस स्थिति से वर्तमान तक पहुँचने में ब्रह्माण्ड जिन परिस्थितियों से गुजरा है उसका रास्ता छोटा था या फिर लम्बा था। इस बात से यह निर्धारित होता है कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप कैसा है ? और उसका अंत कैसे होगा ! यदि वर्तमान को पाने में ब्रह्माण्ड को कम समय लगा है यानि कि ब्रह्माण्ड का अंत महा-संकुचन (पतन) के रूप में होगा। ठीक इसी क्रम में महा-शीतलन और महा-विच्छेद के परिदृश्य में महा-संकुचन के सापेक्ष ब्रह्माण्ड को वर्तमान तक पहुँचने में अधिक समय लगता है।
दूसरे शब्दों में यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 6 अरब वर्ष पूर्व हुई है तो ब्रह्माण्ड का अंत संकुचन (पतन) द्वारा होगा। और यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 9 अरब वर्ष पहले हुई है तो ब्रह्माण्ड के अंत के बारे में कहना मुश्किल है। और यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति लगभग 12 या 14 अरब वर्ष पहले हुई है तो क्रमशः ब्रह्माण्ड का अंत शीतलन या विच्छेद के रूप में होता है। जैसे की आपने देखा कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का समय यह निर्धारित करता है कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप कैसा है ? ठीक उसी तरह से अन्य घटक भी यह निर्धारित करते हैं कि ब्रह्माण्ड का स्वरुप कैसा है और उसका अंत कैसे हो ! आपको सभी घटकों का अध्ययन करते समय साथ ही साथ यह भी समझना होता है कि ब्रह्माण्ड की नियति के चारों परिदृश्य सभी घटकों के साथ अपना भिन्न-भिन्न संगत संबंध रखते हैं। ये चारों परिदृश्य कहीं से कहीं तक एक दूसरे को अभिव्याप्त (Overlap) नहीं करते हैं।

समय : आपने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड के अंत के परिदृश्यों को थोड़ा बहुत समझा है। और जाना कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति कब हुई है ? का उत्तर ब्रह्माण्ड के अंत को निर्धारित करता है जो समय और अंतराल की उत्पत्ति के रूप में यह बतलाता है कि ब्रह्माण्ड को वर्तमान अवस्था तक पहुँचने में कितना समय लगा है यानि कि ब्रह्माण्ड के विस्तार (दूसरे शब्दों में अंतराल में वृद्धि) की दर क्या थी ? यदि आज के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर ब्रह्माण्ड उत्पत्ति के समय अधिक
थी। यानि कि हम महा-संकुचन परिदृश्य या सैद्धांतिक रूप से आइंस्टीन के मानक नमूने की संगत परिस्थितियों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। और आइंस्टीन का यह मानक नमूना खुले ब्रह्माण्ड का समर्थक है। महा-संकुचन के परिदृश्य के अनुसार नियत समय पर ब्रह्माण्ड का पतन होता है और आइंस्टीन के मानक नमूने के अनुसार ब्रह्माण्ड का अंत अनिश्चित काल तक लगातार विस्तार होते हुए होता है। महा-संकुचन में विस्तार की दर नकारात्मक यानि कि मंदन प्रारम्भ हो जाता है जबकि आइंस्टीन के मानक नमूने के अनुसार विस्तार की दर न्यूनतम होने लगती है। यदि ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर ब्रह्माण्ड उत्पत्ति के समय से अब तक एक समान बनी हुई है तो इसका तात्पर्य यह है कि ब्रह्माण्ड का अंत अनंत (अधिकतम) समय के साथ महा-विच्छेद परिदृश्य के रूप में होगा। जबकि यदि आज के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर ब्रह्माण्ड उत्पत्ति के समय कम थी। तो ब्रह्माण्ड का अंत महा-शीतलन परिदृश्य के अंतर्गत सीमित समय के साथ होगा। महाद्रव अवस्था के अनुसार ब्रह्माण्ड का अंत अनिश्चित है। तात्पर्य हिग्स-बोसोन कण के द्वारा एक विशेष परिमाण को प्राप्त हो जाने के साथ ही ब्रह्माण्ड का अंत शुरू हो जाएगा और ब्रह्माण्ड के अंत होने की गति प्रकाश के वेग के समान होगी।

अंतराल : अभी तक हमने देखा कि ब्रह्माण्ड का अंत कितने समय पर ब्रह्माण्ड के विस्तार की किस दर के कारण होता है। अब हम यह जानने की भी कोशिश करेंगे कि ब्रह्माण्ड के अंत में अंतराल का क्या महत्व होता है ? दूसरे शब्दों में समय के साथ-साथ अंतराल में क्या-क्या परिवर्तन आते हैं ? और ये परिवर्तन कैसे ब्रह्माण्ड का अंत कर सकते हैं ? जैसा कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के
साथ ही समय के रूप में अंतराल का विस्तार होता है उसी तरह से पुनः अंतराल में कमी (पतन) आने से भी ब्रह्माण्ड का अंत हो सकता है। इस परिदृश्य को हम महा-संकुचन कहते हैं। महा-संकुचन परिदृश्य में विस्तार के समय मंदन होता है और संकुचन के समय त्वरण उत्पन्न होता है। महा-शीतलन परिदृश्य के अंतर्गत मंदाकिनियों के मध्य की दूरी लगातार बढ़ने से ब्रह्माण्ड का अंत होगा। इस परिदृश्य में हब्बल के मंदाकिनियों का प्रतिसरण का नियम लागू होता है। जिसके अनुसार जो मंदाकिनी किसी अन्य मंदाकिनी से जितनी अधिक दूरी पर स्थित रहती है वह उतनी ही गति से उससे दूर जाती है। जबकि महा-विच्छेद परिदृश्य के अंतर्गत परमाणु और उसके अवयवों के मध्य भी अंतराल बढ़ या बन जाता है। जिससे कि प्रत्येक अवयव का स्वतंत्र रूप में होने से ब्रह्माण्ड का अंत होता है। महाद्रव अवस्था के अंतर्गत ब्रह्माण्ड का अंत पुनः सममित अवस्था को पाने से होगा। इस परिदृश्य के अनुसार ब्रह्माण्ड का अंत अपनी संहति (द्रव्यमान) खो देने के रूप में होगा। जैसा कि हम सभी जानते भी हैं कि द्रव्यमान स्थान घेरता है। ब्रह्माण्ड संहति खो देने से उसके क्षेत्र (स्थान) को भी खो देगा। और हमें मजबूरन कहना पड़ेगा कि ब्रह्माण्ड अब अस्तित्व में नही रहा !

श्याम ऊर्जा : श्याम ऊर्जा बाह्य कारक के रूप में अंतराल में वृद्धि करते हुए ब्रह्माण्ड का विस्तार करती है। वैज्ञानिक आज तक श्याम ऊर्जा को पूर्णतः नहीं समझ पाएं हैं। जिसके बहुत से कारण है। परन्तु इस ऊर्जा को अव्यवस्था की माप (एन्ट्रापी ऊर्जा) के रूप में ब्रह्माण्ड का एक महत्वपूर्ण घटक माना जाता है। जो गुरुत्वाकर्षण बल पर भी प्रभावी हो सकता है। महा-संकुचन के परिदृश्य के अंतर्गत ब्रह्माण्ड का संकुचन तो हो सकता है क्योंकि श्याम ऊर्जा संकुचन के लिए संगत होती है। किन्तु हम ब्रह्माण्ड के स्वरुप को दोलित ब्रह्माण्ड के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते हैं। क्योंकि इस स्वरुप के लिए श्याम ऊर्जा संगत
परिस्थिति के रूप में कार्यरत नहीं रहती। और यह ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के खिलाफ भी होता है। ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम ऊर्जा के प्रवाह की दिशा को दर्शाता है। जिसके अनुसार भूतकाल में ब्रह्माण्ड कम आयतन के रूप में छोटा था। और भविष्य में ब्रह्माण्ड एक सीमा तक आयतन में वृद्धि करेगा और पुनः अपनी महा-विस्फोट की स्थिति में पहुँच जाएगा। यानि कि पुनः संकुचित हो जाएगा। परन्तु उष्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार ब्रह्माण्ड स्वतः निम्नतापीय तंत्र से उच्चतापीय तंत्र में परिवर्तित नहीं हो सकता है। तात्पर्य जिस तरह से हमने ऊपर इस बात की सम्भावना जताई थी कि हो सकता है कि यह ब्रह्माण्ड भी किसी अन्य ब्रह्माण्ड के पतन के पश्चात् ही संकुचन के परिणाम स्वरुप अस्तित्व में आया हो। ऐसा हो नहीं सकता। श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर को अंतराल में वृद्धि की दर को निश्चित करके निर्धारित करती है। महा-संकुचन के परिदृश्य में श्याम ऊर्जा गुरुत्वाकर्षण बल पर प्रभावी नहीं हो पाती है। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड का अंत संकुचन (पतन) के रूप में होता है। महा-शीतलन के परिदृश्य में श्याम ऊर्जा की दर अचानक से बढ़ती है। परिणाम स्वरुप श्याम ऊर्जा अपना प्रभाव सिर्फ अंतराल में ही डाल पाती है। इस प्रभाव से गुरुत्वाकर्षण बल अछूता रह जाता है। जिससे कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर भी अचानक से बढ़ती है और मंदाकिनियों के मध्य की दूरी बढ़ने से एक मंदाकिनी का सम्बन्ध दूसरी मंदाकिनी से नहीं हो पाता है। और ब्रह्माण्ड के ताप में आने वाली कमी (परम शून्य तापमान की स्थिति) ब्रह्माण्ड का अंत कर देती है। वहीं दूसरी ओर महा-विच्छेद के परिदृश्य में श्याम ऊर्जा की दर एक समान (नियत) बनी रहती है। फलस्वरूप श्याम ऊर्जा ब्रह्माण्ड के गुरुत्वाकर्षण बल पर प्रभावी हो जाती है। और ब्रह्माण्ड का अंत व्यापक स्तर के गुरुत्वाकर्षण बल से निम्नतर स्तर के गुरुत्वाकर्षण बल की ओर होता है। इस तरह का विनाश भले ही एक ही समय पर चारों ओर एक समान न होता हो। परन्तु यह विनाश परमाणु तक को अपने अवयवों में विखंडित कर देता है। यानि कि प्रत्येक मूल अवयव के स्वतंत्र अवस्था के टूटने तक ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा का प्रवाह होता रहता है। और इस परिदृश्य के अनुसार श्याम ऊर्जा की इस अवस्था में दोबारा परिवर्तन नहीं होता है।

अंतरिक्ष की वक्रता : अंतरिक्ष की वक्रता को ब्रह्माण्ड का स्वरुप नहीं कहा जा सकता। भले ही अंतरिक्ष की वक्रता ब्रह्माण्ड के स्वरुप को समझने में हमारी मदद करती हो। अंतरिक्ष की वक्रता धनात्मक, ऋणात्मक या शून्य हो सकती है। अंतरिक्ष की वक्रता ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व, श्याम ऊर्जा, गर्म धब्बे (Hot Spots) और गुरुत्वाकर्षण बल आदि से संबंध रखती है। अंतरिक्ष की वक्रता ही हमको यह बतलाती है कि ब्रह्माण्ड खुला, बंद या समतल है ! ब्रह्माण्ड का खुला, बंद
या समतल होना ब्रह्माण्ड के स्वरुप की सम्भावनाओं को निर्धारित करने में हमें सहयोग प्रदान करता है। अंतरिक्ष की धनात्मक वक्रता बंद ब्रह्माण्ड के रूप में महा-संकुचन के परिदृश्य को उजागर करती है। जबकि अंतरिक्ष की ऋणात्मक वक्रता खुले ब्रह्माण्ड के रूप में महा-विच्छेद और महा-शीतलन के परिदृश्य को उजागर करती है। और अंतरिक्ष की शून्य वक्रता ब्रह्माण्ड को समतल रूप में अनिश्चित समय पर ब्रह्माण्ड के अंत का परिदृश्य महाद्रव-अवस्था के समान उजागर करती है। अंतरिक्ष की वक्रता का सीधा संबंध गुरुत्वाकर्षण बल से होता है। बंद ब्रह्माण्ड में गुरुत्वाकर्षण बल ब्रह्माण्ड के विस्तार को मंदित करने में सक्षम होता है। और अंततः गुरुत्वाकर्षण बल ब्रह्माण्ड के पतन का कारण बनता है। खुले ब्रह्माण्ड में गुरुत्वाकर्षण बल ब्रह्माण्ड के विस्तार को रोकने में सक्षम नहीं होता है। और हमेशा के लिए ब्रह्माण्ड का लगातार विस्तार होता रहता है। यद्यपि ब्रह्माण्ड के विस्तार की यह दर महा-शीतलन परिदृश्य में कम होती है। समतल ब्रह्माण्ड में गुरुत्वाकर्षण बल कार्यरत तो अवश्य होता है परन्तु प्रभावी नहीं हो पाता। यानि कि ब्रह्माण्ड के विस्तार की दर में कमी अवश्य आती है परन्तु ब्रह्माण्ड लगातार कम दर से विस्तार करता रहता है।


क्रांतिक घनत्व : क्रांतिक मान ताप, दाब, आयतन, कोण अथवा घनत्व आदि.. की वह सीमा है जिस मान पर कोई पिन्ड, निकाय अथवा निर्देशित तंत्र अपनी प्रकृति को खो देता है। क्रांतिक मान कहलाता है। क्रांतिक सीमा न्यूनतम और अधिकतम दोनों मान के लिए हो सकती है। अब हम क्रांतिक घनत्व की चर्चा घटक के रूप में करेंगे। क्रांतिक घनत्व ब्रह्माण्ड के घनत्व का एक सैद्धांतिक मान है। जो यह तय करने में सहायता प्रदान करता है कि अंतरिक्ष में कौन सी वक्रता है। यानि कि जब क्रांतिक घनत्व का मान ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व के मान से कम होता है तो वक्रता धनात्मक होती है। और जब क्रांतिक घनत्व का मान ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व के मान से अधिक होता है तो वक्रता ऋणात्मक होती है। परन्तु जब क्रांतिक घनत्व का मान ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व के मान के बराबर होता है तो वक्रता शून्य होती है। इस तरह क्रांतिक घनत्व और अंतरिक्ष की वक्रता संगत परिस्थितियों के रूप में जान पड़ती हैं। ब्रह्माण्ड के विस्तार को रोकने के लिए आवश्यक द्रव्य के औसतन घनत्व को क्रांतिक घनत्व कहते हैं। किन्तु इस स्थिति के लगातार बने रहने से ब्रह्माण्ड का अंत अंतरिक्ष की वक्रता खो देने के साथ ही समतल अंतरिक्ष के रूप में होता है। जिसे आइंस्टीन का मानक नमूना कहा जाता है। आइंस्टीन के साधारण सापेक्षता के सिद्धांत के अनुसार क्रांतिक घनत्व द्रव्य के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण अंतरिक्ष में आई वक्रता, ब्रह्माण्ड के सम्पूर्ण द्रव्य की ज्यामिति संरचना और ब्रह्माण्ड की नियति को निर्धारित करता है। ब्रह्माण्ड के लिए क्रांतिक घनत्व का मान लगभग 9.47 x 10-27 कि.ग्रा./मी.3 (या 10 हाइड्रोजन परमाणु प्रति घन मीटर) होता है। जैसा कि ब्रह्माण्ड का क्रांतिक घनत्व = वास्तविक घनत्व / क्रांतिक घनत्व
क्रांतिक घनत्व के मान को हम सैद्धांतिक रूप से निम्न सूत्र (क्रांतिक घनत्व = 3H2 / 8PiG) द्वारा ज्ञात कर सकते हैं परन्तु ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व को मापने के लिए मूल रूप से दो विधियों का उपयोग किया जाता है।
1. अनुमानित विधि : ब्रह्माण्ड के किसी एक भाग के चयनित आयतन का द्रव्यमान जिसका एक ही प्रयास में आंकलित अनुमान लगाया जा सकता है, को सीधे उस आयतन के द्रव्यमान के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है। या तो यह अनुमान मंदाकिनियों के गुच्छों की गतियों के गतिज गुणों की माप को ज्ञात करके लगाया जाता है। या फिर मंदाकिनियों के आयतन का संबंध उससे आने वाले प्रकाश की तीव्रता से जोड़कर अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञात किया जाता है। मंदाकिनियों और उसके आसपास मौजूद श्याम पदार्थ के ज्ञान को इस अप्रत्यक्ष विधि में अनदेखा कर दिया जाता है। हालाँकि अभी भी इस तकनीक का उपयोग आने वाले प्रकाश की तीव्रता और श्याम ऊर्जा के अनुपात को त्रुटि के रूप में उचित अवधारणा के साथ एक चयनित आयतन के द्रव्यमान को ज्ञात करने के लिए किया जाता है।
2. ज्यामितीय दृष्टिकोण : यह विधि अंतरिक्ष की वक्रता के संगत परिस्थितियों के रूप में उपयोग में लाई जाती है। इस विधि के द्वारा केवल यह ज्ञात किया जा सकता है कि ब्रह्माण्ड का वास्तविक घनत्व क्रांतिक घनत्व से कम है या अधिक है या फिर बराबर है। इस विधि के द्वारा वास्तविक
घनत्व के मान को ज्ञात नहीं किया जा सकता है। इस विधि के अनुसार यदि दो समांतर रेखाएँ आंगे चलकर अभिसारी रेखाओं के समान व्यव्हार करती हैं तो ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व को क्रांतिक घनत्व के मान से अधिक माना जाता है। क्योंकि दूरस्थ आकाशगंगाओं के प्रेक्षित घनत्व का मान उसकी स्थानीय पीछे की ओर की आकाशगंगा के आपेक्षित घनत्व के मान से कम होता है। परन्तु जब दो समांतर रेखाएँ आंगे चलकर अपसारी रेखाओं के समान व्यव्हार करती हैं। तो ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व को क्रांतिक घनत्व के मान से कम माना जाता है। क्योंकि दूरस्थ आकाशगंगाओं के प्रेक्षित घनत्व का मान उसकी स्थानीय पीछे की ओर की आकाशगंगा के आपेक्षित घनत्व के मान से अधिक होता है।
इन दोनों तकनीक का उपयोग करके हम संगत परिस्थिति के रूप में ब्रह्माण्ड के वास्तविक घनत्व को ज्ञात कर पाते हैं। परन्तु कभी-कभी आश्चर्य रूप से हमें जो आंकड़े प्राप्त हुए हैं। वो इस ओर इशारा करते हैं कि ब्रह्माण्ड का अंत महाद्रव-अवस्था के परिदृश्य के समान होगा। क्योंकि ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा के प्रभाव में मंदन देखा गया है। जो इस ओर इशारा करता है कि ब्रह्माण्ड लगभग समतल अंतरिक्ष में स्थित है।




अब यदि वास्तविक घनत्व के मान और सैद्धांतिक घनत्व (क्रांतिक घनत्व) के मान का अनुपात एक से अधिक प्राप्त होता है। तो ब्रह्माण्ड का पतन महा-संकुचन के परिदृश्य के समान होगा। यदि वास्तविक घनत्व के मान और क्रांतिक घनत्व के मान का अनुपात एक से कम प्राप्त होता है। तो ब्रह्माण्ड का अंत महा-विच्छेद या महा-शीतलन के परिदृश्य के समान होगा। महा-विच्छेद और महा-शीतलन के परिदृश्य में ब्रह्माण्ड के क्रांतिक घनत्व का मान एक से तो कम प्राप्त होता है परन्तु दोनों के मानों में अंतर पाया जाता है। और यदि ब्रह्माण्ड के क्रांतिक घनत्व का मान एक के बराबर पाया जाता है। तो ब्रह्माण्ड का अंत महाद्रव-अवस्था के परिदृश्य के समान होगा। वर्तमान में ज्ञात ब्रह्माण्ड के क्रांतिक घनत्व का मान Ω0 = 1.02 +/- 0.02 है। अर्थात ज्ञात ब्रह्माण्ड का स्वरुप बंद ब्रह्माण्ड के परिदृश्य के समान प्रतीत होता है। जिसे ब्रह्माण्ड के कुल घनत्व के तीनों प्राचल (Parameter) के योग के रूप में पाया गया है। ब्रह्माण्ड के कुल घनत्व के ये तीनों प्राचल निम्न लिखित हैं। पहला : सामान्य और श्याम पदार्थ का द्रव्यमान घनत्व, दूसरा : प्रकाश और न्युट्रीनो जैसे कणों का प्रभावी द्रव्यमान घनत्व और तीसरा : अंतरिक्ष नियतांक के रूप में कार्यरत श्याम ऊर्जा का प्रभावी द्रव्यमान घनत्व

ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं ?

ब्रह्माण्ड को कई तरह से परिभाषित किया जा सकता है। कुछ लोग ब्रह्माण्ड को अवस्था के आधार पर परिभाषित करते हैं तो कुछ लोग उसे कारक के रूप में परिभाषित करते हैं। चूँकि ब्रह्माण्ड मंदाकिनियों, तारों, ग्रहों, उपग्रहों और आकाशीय पिंडों से मिलकर बना हुआ है इसलिए इसे ब्रह्माण्ड की परिभाषा के रूप में स्वीकारा जाता है। कुछ लोग "हमारा ब्रह्माण्ड" कहकर एक नई संकल्पना को जन्म देते हैं। तो क्या अब ब्रह्माण्ड की परिभाषा बदल जाएगी ! तो क्या इसके पहले तक हम ब्रह्माण्ड को गलत तरीके से परिभाषित कर रहे थे ? आइए, ब्रह्माण्ड को परिभाषित करने से पूर्व हम कुछ और बातों को भी जानें।

घटक : किसी भौतिक संरचना के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली सामग्री घटक कहलाती है। याद रहे घटक के लिए यह जरुरी नहीं होता है कि वह उस भौतिक संरचना में अपनी मौजूदगी दर्शाए। अर्थात घटक बाह्य कारक भी हो सकते हैं। अवयव : प्रत्येक भौतिक संरचना अपने अवयवी भौतिकता के रूपों में विखंडित होती है। अर्थात अवयव, उस भौतिक संरचना के आंतरिक भौतिकता के रूप होते हैं। घटक और अवयव में बुनियादी भिन्नता यह है कि जरुरी नहीं कि घटक, उस भौतिक संरचना में अपनी मौजूदगी दर्शाए, जबकि अवयव के लिए यह जरुरी होता है कि वह भौतिक संरचना में अपनी मौजूदगी दर्शाए। और दूसरा प्रमुख अंतर यह है कि घटक को निर्माण की सामग्री के रूप में और अवयव को विखंडन से प्राप्त सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है। यदि हम थोड़ा गौर करें, तो हम यह पाते हैं कि अवयव भौतिक संरचना की अवस्था को दर्शाते हैं जबकि घटक उस मूल तत्व के रूप होते हैं जिससे भौतिक संरचना का निर्माण होता है।


अब आप ब्रह्माण्ड को किस तरह से परिभाषित करना पसंद करेंगे। ताकि ब्रह्माण्ड की व्यापकता भी बनी रही और संकल्पनाओं के साथ उसका अर्थ भी परिवर्तित न हो। लोगों को ब्रह्माण्ड को परिभाषित करने में कठनाई इसलिए भी आती है क्योंकि ब्रह्माण्ड सीमित है या असीम, ब्रह्माण्ड परिवर्तनशील है या उसमें परिवर्तन होता है को समझने में मुश्किल होती है। घटकों के संयुक्त रूप को ब्रह्माण्ड कहते हैं। मूल रूप से ब्रह्माण्ड दो घटकों द्रव्य और ऊर्जा से मिलकर बना है। प्रारम्भ में दी गई परिभाषा अवस्था आधारित परिभाषा है। क्योंकि ब्रह्माण्ड उस अवस्था से भी गुजरा है। जब ब्रह्माण्ड अस्तित्व में तो आ गया था। परन्तु न तो कोई तारा था और न ही कोई ग्रह था। इस परिभाषा से एक चीज और स्पष्ट हो जाती है कि ब्रह्माण्ड के अंत के बाद भी ये घटक मौजूद रहते हैं जैसे कि ऊर्जा..  और जैसा की हम सभी जानते भी हैं कि ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार ऊर्जा न तो नष्ट होती है और न ही निर्मित होती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है।

अभी तक हमने केवल ब्रह्माण्ड को परिभाषित किया है और जाना है कि ब्रह्माण्ड अपने दो मूल घटक ऊर्जा और द्रव्य से मिलकर बना है। मंदाकिनियां, तारे, ग्रह, उपग्रह और आकाशीय पिंड ब्रह्माण्ड के अवयव हैं। और ब्रह्माण्ड के अवयवों की सूची में अणु, परमाणु और उनके अवयवी कण भी सम्म्लित हैं। परन्तु आधारभूत ब्रह्माण्ड के चार मूल घटक हैं। पहला : पदार्थ, दूसरा : ऊर्जा, तीसरा : स्थिति और चौथा : भौतिक राशियाँ ये चारों मूल घटक हमेशा से विधमान हैं और ब्रह्माण्ड के अंत के बाद तक विधमान रहते हैं। आधारभूत ब्रह्माण्ड का पहला और दूसरा घटक सैद्धांतिक और तीसरा और चौथा घटक व्यावहारिक होता है। आप किसी भी वस्तु, व्यक्ति या पिंड की ओर इशारा करते हुए यह तो कह सकते हो कि यह ब्रह्माण्ड है। परन्तु यह कदापि नहीं कह सकते हो कि यही ब्रह्माण्ड है ! ऐसा करने से ब्रह्माण्ड अपनी व्यापकता खो देता है।

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