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विज्ञान के पास एक सुन्दर कारण

विषय से थोड़ा हटकर के लिखा गया हमारा यह दूसरा लेख भी भौतिकी से सीधा सम्बन्ध रखता है। जैसा कि विषय से हटकर के हमने पहले लेख में ईश्वर से सम्बंधित विषय पर चर्चा की थी। और सर स्टीफन हॉकिंग की सन 2007 में प्रकाशित पुस्तक "द ग्राण्ड डिज़ाइन" का हवाला देते हुए, ब्रह्माण्ड के निर्माण के तरीकों को चर्चा में शामिल किया था। ठीक उसी तरह से ईश्वर को लेख का मूल विषय मानते हुए, आज हम भौतिकी की चर्चा विज्ञान को परिभाषित करते हुए करेंगे। विज्ञान को इससे कोई फ़र्क नही पड़ता कि आप ईश्वर पर विश्वास रखते हैं अथवा नही रखते हैं। परन्तु क्या विज्ञान के एक जानकार अथवा खोजकर्ता द्वारा ईश्वर पर विश्वास रखने या उसको मानने से विज्ञान में कोई प्रभाव देखने को मिल सकता है ? आज की इस चर्चा में इस विषय को भी सम्मलित करने का हमारा प्रयास रहेगा।

लोगों का एक बहुत बड़ा समूह ईश्वर पर विश्वास रखता है और लोगों का एक दूसरा बड़ा समूह ईश्वर पर विश्वास नही रखता है। लोगों का ईश्वर में विश्वास रखने का कारण समझ में आता है। वहीं दूसरी ओर लोगों द्वारा ईश्वर में विश्वास न रखने का एक कारण ईश्वर में एक बार विश्वास करके देख लेने पर भी कुछ हाथ न लगना हो सकता है। तो क्या ईश्वर भेदभाव करता है ? और यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो उसे भेदभाव करने की क्या आवश्यकता है ? अब हम ईश्वर से जुड़ी चर्चा को विशेष क्रिया "मानना" से जोड़ते हैं। कहने का तात्पर्य लोगों का वह समूह जो ईश्वर के अस्तित्व होने को मानता है और लोगों का एक दूसरा समूह जो ईश्वर के अस्तित्व को नकारता है दोनों स्थिति में ईश्वर को हस्तक्षेप के रूप में परिभाषित किया जाता है। ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाला समूह यह मानकर चलता है कि ईश्वर हमारी प्रार्थना सुनकर या स्वप्रेरण से एक सीमा के बाद हस्तक्षेप करेगें। और दूसरी ओर ईश्वर को न मानने वाले लोगों का समूह यह मानकर चलता हैं कि ईश्वर हस्तक्षेप नही करते हैं क्योंकि उसका अस्तित्व ही नही है।

परन्तु अभी तक की चर्चा में ईश्वर को न मानने वाले लोगों में ईश्वर को मानने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक अंधविश्वास नज़र आता है। क्योंकि ईश्वर को न मानने वालों के पास अंतिम गद्यांश तक कोई तार्किक कारण नहीं है। क्या वाकई में ईश्वर को न मानने वाले समूह के पास ईश्वर को न मानने का कोई तार्किक कारण नही होता है ? क्या वो भी किसी अन्य से प्रभावित होकर ईश्वर को नही मानते हैं ? या भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने के उद्देश्य से वे ईश्वर को नकारते हैं ? या ऐसा तो नही कि विज्ञान जगत में अपनी पहचान बनाने के उद्देश्य से लोगों का वह समूह ईश्वर को नकारता हो ? जो भी हो लेकिन विज्ञान के पास ईश्वर को न मानने का एक बहुत ही सुन्दर और तार्किक कारण है। यह कारण सिर्फ़ ईश्वर को न मानने तक सीमित नही है। बल्कि इस कारण से भौतिकी की सुन्दर व्याख्या होती है। सर फ्रांसिस बेकॉन (1561-1626) के अनसुार "विज्ञान बिना किसी पूर्वाग्रह के अवलोकनों को एकत्रित करने का तरीका है।" सभी गंभीर चिंतकों ने इस बात पर असहमति जताई और कहा कि हम शायद ही कभी एक कोरी स्लेट से शुरुआत करते हैं। यह दुनिया कैसे चलती है, यह हम अपनी पूर्वधारणाओं के आधार पर ही समझते हैं। विज्ञान के बारे में भी हम अपनी समझ कुछ इसी तरह से बनाते हैं।" अब आप समझ ही गए होंगे कि सर फ्रांसिस बेकॉन की यह शर्त विज्ञान का वह कारण नही है। और आप इस शर्त को ईश्वर को न मानने का कारण नही कह सकते।


बेशक, असंगत परिस्थितियों का अस्तित्व असंभव है। परन्तु इन असंगत परिस्थितियों की सम्भावना तब बन जाती है। जब हम यह जान जाते हैं कि कैसे इन असंगत परिस्थितियों का अस्तित्व संभव हो सकता है ! तब विज्ञान में इस स्थिति को विश्लेषण में की गई एक बड़ी चूक कहा जाता है। और इसके अलावा इस स्थिति को कुछ भी कहना गलत होगा। ईश्वर का अस्तित्व भी उन्ही असंगत परिस्थितियों में से एक है। विज्ञान के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व असंभव है। क्योंकि यदि ईश्वर का अस्तित्व है तो वह भौतिकी का हिस्सा है। और यदि ईश्वर भौतिकी का हिस्सा नहीं है तो उसका अस्तित्व भी नही है। क्योंकि तब हम उसको प्रमाणित नहीं कर सकते। यानि कि भौतिकी के नियम ईश्वर के लिए भी होंगे। और वह उन नियमों का पालन भी करता होगा ! भले ही ईश्वर अपनी शक्ति के प्रयोग से भौतिकी के नियमों को परिवर्तित कर सकने में सक्षम हो। तब भी भौतिकी के वे परिवर्तित नियम उस ईश्वर (संरचना) पर भी लागू होंगे। जिसने भौतिकी के इन नए नियमों को बनाया है। इसलिए हम ईश्वर को मानने वाले लोगों के अनुसार की गई ईश्वर की व्याख्या को असंगत कहते हैं। यह भौतिकी की सुंदरता और ईश्वर के अस्तित्व को न मानने का तार्किक कारण भी है।

अब प्रश्न उठता है कि जो वैज्ञानिक ईश्वर को मानते हैं तब हम उसे क्या कहेंगे ? यदि हम किसी भी वैज्ञानिक की निजी ज़िंदगी में जाए बिना अपने इस प्रश्न पर सोचें तो पाएंगे कि वे सभी वैज्ञानिक या तो ईश्वर के अस्तित्व होने की संगत परिस्थितियों को खोज रहे होते हैं ! या फिर ईश्वर को भौतिकी के नियमों के विश्लेषण में हुई चूक द्वारा परिभाषित करने का प्रयास करते हैं ! ईश्वर को परिभाषित करने वाला वैज्ञानिकों का वह समूह संभवतः ईश्वर को एक उन्नत विकसित प्रजाति के रूप में देखता है। जैसा कि हमने लेख में एक और विषय को चर्चा में सम्मलित करने का वादा किया था। इसलिए हम संक्षिप्त में बताना चाहेंगे कि ईश्वर को मानने या न मानने वाला विज्ञान का एक जानकार अथवा खोजकर्ता द्वारा उसके विज्ञान के कार्य पर कोई प्रभाव नही पड़ता है। इसका कारण लेख में निहित है। इसके बाबजूद यदि आपको कारण स्पष्ट नही होता है। तो हम आपके साथ चर्चा के लिए हमेशा से ही हैं। या तो फिर आने वाले संबंधित लेख में विस्तृत चर्चा करेंगे।

विज्ञान का जानकार होना एक प्रदर्शन

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि किसी वस्तु को लाल दिखने के लिए श्वेत प्रकाश में से केवल लाल रंग की तरंगदैर्ध्य को उत्सर्जित करना होता है। और शेष रंग की तरंगदैर्ध्य को अवशोषित करना होता है। ताकि वह वस्तु लाल दिख सके। यह क्रिया लाल रंग को दर्शाती है। किन्तु जब वहीं एक गतिशील वस्तु के द्वारा स्थिर वस्तु का प्रदर्शन किया जाता है। तब वह क्रिया स्थिति का प्रदर्शन करती है। अब आप समझ गए होंगे कि हम क्रियाओं के दर्शन और प्रदर्शन की चर्चा कर रहे हैं। आज का लेख प्रदर्शन की क्रिया पर आधारित है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान तक किसी संदेश के पहुँचने को संचार नहीं कहा जाता। क्योंकि संचार के लिए आवश्यक है कि संदेश के एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने पर प्रतिक्रिया दी जाए। यानि कि प्रतिक्रिया का प्रदर्शन संचार कहलाता है। यह प्रतिक्रिया किसी भी रूप में दी जा सकती है। हो सकता है कि प्रतिक्रिया के रूप में एक और संदेश पहुँचाया जाए। संचार के लिए आवश्यक नहीं होता है कि आपका संचार प्रभावी हो ! ठीक इसी तरह से साक्षरता का मतलब यह नहीं होता कि आपसे लोगों की भाषा (शब्दों के अर्थों) को समझना आता है अथवा नहीं ! साक्षरता का मतलब यह है कि क्या आप उचित शब्दों के प्रयोग से अपनी बात को औरों तक पहुंचा सकते हो अथवा नहीं ? यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो आप साक्षर हैं। अब यदि मैं पूंछूं कि शिक्षित कौन है ? तब आप कहेंगे कि जो लोगों को शिक्षित कर सके। यानि कि वह व्यक्ति कदापि शिक्षित नहीं कहलाता है जो सिर्फ पास हुआ हो अथवा जिसने केवल ज्ञान को अर्जित किया हो। शिक्षा अथवा ज्ञान वह चीज है जिसको ग्रहण करने वाला व्यक्ति उसके (शिक्षा/ज्ञान) महत्व को समझने लगता है। और वह लोगों को शिक्षित होने की सलाह अथवा शिक्षा देने लगता है। यहाँ पर भी शिक्षित होना अपने आप को शिक्षित प्रदर्शित करना है।


आपने संचार, साक्षरता और शिक्षण तीनों उदाहरणों में देखा कि किस प्रकार से संचार, साक्षरता और शिक्षित होना एक प्रदर्शन की क्रिया है। तीनों क्रियाओं में परिणाम महत्वपूर्ण नहीं होता बल्कि प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होती है। अब हम विज्ञान के प्रदर्शन पर चर्चा करेंगे। विज्ञान के इन चारों स्तंभों को समझने के बाद आप स्वयं निर्णय लेने में सक्षम सिद्ध होंगे। विज्ञान के एक जानकार में कुछ गुण स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं जिससे कि वह जानकार अध्ययन, वर्गीकरण, विश्लेषण और निर्णय लेने में सक्षम हो जाता है। इस तरह से वह व्यक्ति विज्ञान का जानकार होने का प्रदर्शन करता है। इन सभी प्रदर्शन की क्रियाओं का संबंध विशेषण की गुणवत्ता से नहीं होता है। बल्कि इन क्रियाओं का संबंध सिर्फ विशेषण को परिभाषित करना होता है।

टीप : पहले गद्यांश में यदि आपको स्थिति के प्रदर्शन की क्रिया को समझने में दिक्कत आ रही है तो आप सापेक्षता को ध्यान में ला सकते हैं। इसके बाबजूद समझने में कठनाई बनी रहती है तो हम चर्चा के लिए हमेशा से आपके साथ हैं।

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