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ब्रह्माण्ड के समूह की अवधारणा

हम मानवों की यह मज़बूरी है कि हम भौतिकता के प्रत्येक रूपों, गुणों, घटनाओं और विषयों को उदाहरणों द्वारा समझते हैं। और यह मानव जाति के लिए अच्छा भी है कि हम उन घटनाओं, गुणों, भौतिकता के रूपों और चर्चा के विषयों की आपसी भिन्नता को पहचान सकते हैं। ताकि कोई भी दो घटना, गुण, रूप और विषय की तुलना समानता और भिन्नता के आधार पर हो सके। प्रत्येक गुण, घटना, रूप अथवा विषय की तुलना उसके समकक्षीय गुणों, घटनाओं, रूपों अथवा विषयों से सम्बंधित तथ्यों द्वारा होती है। परिणाम स्वरूप एलन गुथ ने ब्रह्माण्ड के प्रसार की परिघटना को अर्थशास्त्र से मुद्रा-स्फीति (Inflation) के रूप में और कृष्ण विवर की अभिव्यक्ति के लिए कालेधन को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। परन्तु जन सामान्य के लिए वे उदाहरण ही वे गुण, घटना, रूप अथवा विषय बन जाते हैं। जिनको समझाने के लिए उदाहरण प्रयोग में लाए गए हैं। इसके अलावा कुछ ऐसे उदाहरण भी देखने-सुनने को मिलते हैं। जिनको जन सामान्य के अलावा एक विज्ञान का जानकार भी वास्तविकता मान लेता है। परन्तु ऐसा इसलिए होता है कि हम जिस गुण, घटना, रूप अथवा विषय को जानने के लिए प्रयोग करते हैं। उसका परिणाम तथ्य के रूप में सामने आता है। और जब उस तथ्य को समझाने के लिए या निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए उदाहरणों का सहारा लिया जाता है तब तक वे तथ्य उदाहरण के समकक्षीय होने के कारण निष्कर्ष में अपना प्रभाव छोड़ देते हैं। फलस्वरूप एक ही परिणाम के एक से अधिक निष्कर्ष और संभावित नमूने प्राप्त होते हैं। जिससे कि भ्रम की उत्पत्ति समय नष्ट करती है। परन्तु विज्ञान को इससे नुकसान नहीं पहुँचता। बल्कि विज्ञान यथार्थ की ओर अपना एक कदम और बढ़ा लेता है। क्योंकि अब विज्ञान में एकीकरण के मायने सिर्फ मूलभूत बलों तक ही सीमित नहीं रह गए। बल्कि संभावित परिदृश्यों, भौतिक राशियों और मूलभूत अवयवों के एकीकरण की चर्चा भी जोरों पर हैं। इस अवधारणा के साथ भी कुछ ऐसा ही है।

"ब्रह्माण्ड के समूह" में होने की सम्भावना प्रायोगिक तथ्यों से निर्मित अवधारणा है। परन्तु यह अवधारणा कुछ 2-3 सदी वर्ष पुरानी नहीं है। जो प्रयोगों द्वारा सामने आई हो। बल्कि "ब्रह्माण्ड के समूह" में होने की अवधारणा प्राचीन वैदिक और चीनी सभ्यता से प्रचलित है। परन्तु तब तक यह अवधारणा तथ्यात्मक नहीं थी। क्योंकि सम्बंधित तथ्यों की प्रमाणिकता के लिए उपयुक्त साधन के रूप में भौतिकी के नियम और उपकरण उपलब्ध नहीं थे। इस अवधारणा के साथ सबसे मजेदार बात यह है कि "ब्रह्माण्ड का समूह" में होने के लिए जिन शर्तों का होना जरुरी है। उन शर्तों को लेकर अब तक हुए सभी प्रयोगों के परिणामों ने "ब्रह्माण्ड के समूह" में होने को भिन्न-भिन्न नमूने के रूप में बतलाया है। दरअसल इस अवधारणा की उत्पत्ति ही संख्यात्मक अनुदेशों से हुई है। अर्थात एक से अधिक ब्रह्माण्ड के होने की सम्भावना है। और यह सम्भावना ब्रह्माण्ड की संख्या पर भी आधारित है। ब्रह्माण्ड की विशिष्ट संख्या समान्तर ब्रह्माण्ड और शिशु ब्रह्माण्ड नामक ब्रह्माण्ड की दो अवधारणाओं को जन्म देती है। इसलिए यह अवधारणा इकलौते ब्रह्माण्ड की अवधारणा से भिन्न है। क्योंकि यह अवधारणा एक ब्रह्माण्ड के अस्तित्व को नकारती है। परन्तु फिर नए प्रश्न उठते हैं कि कितने ब्रह्माण्ड हैं ? क्या इनका आपसी कोई सम्बन्ध है भी या नहीं ? क्या ये एक ही ब्रह्माण्ड के प्रतिरूप हैं ? या सिर्फ इन सभी में भौतिकी के नियम एक समान हैं ? आदि-आदि...

भिन्न-भिन्न भौतिकी नियम और नियतांक का परिदृश्य
एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने की सम्भावना के कुछ चुनिंदा आधार है। जिनके आधार पर यह अवधारणा टिकी हुई है। यह अवधारणा उन तथ्यों के आधार पर टिकी हुई है। जिनसे ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है। अर्थात ब्रह्माण्ड का पदार्थ, उसका अंतरिक्ष, ऊर्जा और कार्यरत नियम ही वे आधार हैं। जिनके आधार पर इस अवधारणा का जन्म हुआ है। चूँकि हम आज भी इन चारों घटकों से पूर्ण रूप से अपरिचित हैं। और इन घटकों को जानने के लिए जब हम प्रयोग करते हैं तो एक ही घटक के लिए भिन्न-भिन्न परिणाम प्राप्त होते हैं। जिससे कि ब्रह्माण्ड को समझाने के लिए वैज्ञानिकों द्वारा कई संभावित नमूने सुझाए जाते हैं। एक से अधिक ब्रह्माण्ड के होने की अवधारणा का पता चलने पर हमारे सामने भी कुछ सामान्य परिदृश्य प्रश्न के रूप में बनते हैं। परन्तु इनका मूल अवधारणा से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। पहला परिदृश्य : कहीं ऐसा तो नहीं कि मंदाकिनियों के समूहों की आपसी दूरी समूह में उपस्थित किन्ही भी दो मंदाकिनियों के बीच की दूरी की तुलना में बहुत अधिक होती है। जिसके कारण हम मंदाकिनियों के समूह को ब्रह्माण्ड कहते हैं ? दूसरा परिदृश्य : ब्रह्माण्ड की भिन्न- भिन्न स्थिति में ऊर्जा का असामान्य वितरण कहीं इस अवधारणा जन्मदाता तो नहीं ? तीसरा परिदृश्य : जीव-जंतु, पेड़-पौधों और मानव जाति की अपनी-अपनी दुनिया के समान दूरस्थ मंदाकिनियों में जीवन की सम्भावना या जीव-जंतु, पेड़-पौधों और मानव जाति की दुनिया का एक ही तंत्र (Platform) में गुथा होना ? चौथा परिदृश्य : ब्रह्माण्ड में दूरस्थ भौतिकी के नियम अलग -अलग तो नहीं ! नीचे अवधारणा को जन्म देने वाले आधारों पर चर्चा की जा रही है। जो इस अवधारणा के वास्तव में होने के कारक हैं।

  1. ब्रह्माण्ड की उम्र, आकर, सीमा और उसका केंद्र : ये चारों घटक आपसी समन्वय द्वारा हमेशा से ब्रह्माण्ड को एक नए नमूने के रूप में सामने लाते हैं। इनमें से एक भी घटक अन्य दूसरे घटक से स्वतंत्र नहीं होता। यदि हम किसी भी तरह इन चारों घटकों के मान ज्ञात कर सके। तब यह इस बात के प्रमाण होंगे कि एक से अधिक ब्रह्माण्ड अस्तित्व में हैं। क्योंकि यह इस बात के संकेत होंगे कि ब्रह्माण्ड सीमित पदार्थ से निर्मित है। फिर चाहे हमारा ब्रह्माण्ड कोई भी संभावित परिदृश्य को वास्तविकता प्रदान करता हो ! फिर चाहे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की कोई भी संकल्पना सच साबित होती हो !
  2. अनंत ऊर्जा : यह वह दूसरा कारक है, जो एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने पर उस तंत्र का परिचालक कहलाएगा। अनंत ऊर्जा की मौजूदगी एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने की संकल्पना की ओर संकेत करती है न कि इकलौते ब्रह्माण्ड की संकल्पना होने का समर्थन करती है। क्योंकि इकलौते ब्रह्माण्ड में अनंत ऊर्जा के स्रोत होने की सम्भावना इस ब्रह्माण्ड के लिए असंगत परिस्थिति कहलाएगी।
  3. अनंत अंतरिक्ष : यह कारक भी अनंत ऊर्जा के समान स्वतः कुछ परिस्थितियों की उत्पत्ति करता है। जिनसे ब्रह्माण्ड के एकाधिक होने की पुष्टि होती है। जैसा कि हम जानते हैं कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही अंतरिक्ष की भी उत्पत्ति हुई है। और ब्रह्माण्ड के फैलाव के साथ ही इसका भी फैलाव होता है। भले ही इस परिदृश्य में अनंत अंतरिक्ष के दर्शन न होते हों। पर इस परिदृश्य के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति या उसके फैलाव के लिए एक बाह्य बल की आवश्यकता होगी। जो अनंत अंतरिक्ष की संकल्पना का जन्म देने के लिए काफी है। और बाह्य बल की वह दुनिया एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने की सम्भावना की और संकेत करती है।
  4. ब्रह्माण्ड का स्वतंत्र अस्तित्व और उसके नियम : यह वह चौथा और आखिरी घटक है जिससे ब्रह्माण्ड के एकाधिक होने की संकल्पना का जन्म होता है। परन्तु यह घटक अन्य तीनों घटकों की तुलना में भिन्न तरीके से ब्रह्माण्ड के एक से अधिक होने की सम्भावना जताता है। क्योंकि इस घटक द्वारा कमी रहित ब्रह्माण्ड के जन्म लेने या अस्तित्व में होने की सम्भावना बनती है। दूसरे शब्दों में कमी रहित ब्रह्माण्ड को जन्म दिया जा सकता है ! या फिर हमारा ब्रह्माण्ड ही वह कमी रहित ब्रह्माण्ड है ? जो भी हो। परन्तु इस घटक द्वारा आधारित अवधारणा के अनुसार कमी रहित ब्रह्माण्ड स्वतंत्र अस्तित्व रखता है। अर्थात उस स्वतंत्र ब्रह्माण्ड के भौतिकी के नियम उस ब्रह्माण्ड को एक व्यवस्था के रूप में निरूपित करते हैं। ब्रह्माण्ड के एक से अधिक होने की अवधारणा में यह घटक हमारे दिमाग में जो चित्र बनाता है वह ऐसे ब्रह्माण्डों का है। जिनका आपसी सम्बन्ध संभव ही नहीं है। वे सभी ब्रह्माण्ड सिर्फ स्वतंत्र अवस्था में अस्तित्व रखते हैं। फलस्वरूप इस अवधारणा को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। और यही वो एक घटक है जिसे विज्ञान एक सुन्दर कारण के रूप में ईश्वर के अस्तित्व को नकारते हुए देता है
ब्रह्माण्ड के एक से अधिक होने के संभावित परिदृश्य
वैदिक और चीनी अवधारणा : इस अवधारणा के द्वारा एक से अधिक ब्रह्माण्ड और बहुत से आयाम होने की सम्भावना जताई जाती रही। और बहुत से आयाम की इस स्थिति ने ही हमारे ब्रह्माण्ड को एक विशिष्ट संरचना दी। साथ ही समूह में इन अनगिनित ब्रह्माण्ड के अस्तित्व की तुलना उस समुद्र के ऊपरी सतह में फैले झाग से की जाती थी। जिसे उस काल में अनंत माना जाता था। ये सभी ब्रह्माण्ड एक दूसरे से अपनी खोलों के सहारे स्वतंत्र हैं। और इनका आपस में कोई संपर्क नहीं है। इसलिए ये विशाल होने के साथ ही सीमित भी हैं। जिसकी आकृति गेंद के समान है। और जिसे आठ प्रकार के खोलो ने ढ़क रखा है। ब्रह्माण्ड के इन खोलों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति में पदार्थ के मूलभूत तत्वों का प्रभाव देखने को मिलता है। प्रत्येक खोल एक नए तत्व को प्रगट और संग्रहित करता है। जब हम उस ब्रह्माण्ड में अन्दर की ओर जाएंगे। तब हम कुछ खोखले और कुछ ग्रहों से बसे हुए क्षेत्र से गुजरेंगे। यह ब्रह्माण्ड के समूह में होने के परिदृश्य का चित्रण था। जो उस समय के वैदिक और चीनी लोगों के दिमाग में बनता था।

बेशक यह अवधारणा बहुत ही व्यापक सुंदरता को लिए हुए है। परन्तु उस समय की यह अवधारणा अधूरी है। क्योंकि यह तथ्यों पर आधारित अवधारणा नहीं थी। इस अवधारणा के आधार पर हम इससे जुड़े किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकते थे। बाबजूद यह उस काल के लोगों की सुन्दर और समकक्षीय उदाहरण को ली हुई अवधारणा है। तार्किक दृष्टी से एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने की बात सर्वप्रथम अमेरिकी दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स ने 1895 में कही। उन्ही ने सबसे पहले एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने को शब्द मल्टीवर्स (Multiverse) से सम्बोधित किया। आज इस अवधारणा के पक्ष में स्टीफ़न हाकिंग, स्टीवन वेंबर्ग, ब्रायन ग्रीन, मैक्स टेगमार्क, एलन गुथ, अंद्रेई लिंडे, मिचिओ काकू, डेविड डायचे, लियोनार्ड सुशकाइंड, राज पथरिआ, सीन कररोल्ल, एलेक्स विलेंकिन, लौरा मर्सिनी-हौघटोंन और नील देग्रास्से टाइसन जैसे वैज्ञानिक अहम भूमिका निभाते हैं। इस अवधारणा को समझने और समझाने के लिए कुछ वैज्ञानिकों ने अपने अपने मापदंड दिए हैं। ताकि दिमाग में स्पष्ट चित्र बन सके। जहाँ एक तरफ मैक्स टेगमार्क ने एक से अधिक ब्रह्माण्डों को स्तर के आधार पर चार वर्गों में विभाजित किया है। वहीं ब्रायन ग्रीन ने संभावनाओं के आधार पर नौ मापदंड दिए हैं। जो उस ब्रह्माण्ड की क्वांटम क्षेत्र से लेकर के गुरुत्वीय क्षेत्र तक की भौतिकी और उस ब्रह्माण्ड के भविष्य तक को निर्धारित करने वाले मापदंड हैं।

मैक्स टेगमार्क का वर्गीकरण : मैक्स टेगमार्क ने हमारे ब्रह्माण्ड के परे के ब्रह्माण्डों को जिन स्तरों में बांटा है। उसके अनुसार हमारे ब्रह्माण्डीय क्षितिज के पार के बारे में मैक्स टेगमार्क कहते हैं कि यदि हमारा ब्रह्माण्ड अनियंत्रित रूप से प्रसार कर रहा है अर्थात अनंत ब्रह्माण्ड का समूह अनंत अंतरिक्ष में अस्तित्व रखता है। और प्रत्येक ब्रह्माण्ड के नियम और भौतकीय नियतांक एक समान होंगे। भले ही वहां की वर्तमान परिस्थिति कुछ भी क्यों न हो। अब दूसरे स्तर के ब्रह्माण्डों के बारे में मैक्स टेगमार्क कहते हैं कि इस तरह के परिदृश्य में ब्रह्माण्ड दोलित्र रूप में होंगे। अर्थात उनकी उत्पत्ति और उनका अंत वे स्वयं नियमों और नियतांकों द्वारा निर्धारित करेंगे। न कि उत्पत्ति और अंत को निश्चित करेंगे। इस परिदृश्य के अनुसार वे ब्रह्माण्ड एक नए ब्रह्माण्ड को जन्म देने में सक्षम होंगे। इस परिदृश्य के साथ मजेदार बात यह है कि भिन्न-भिन्न नियमों का अनुसरण करने वाले ये ब्रह्माण्ड भिन्न-भिन्न नियतांकों की वजह से हमारे ब्रह्माण्ड के इस परिदृश्य के साथ सह-अस्तित्व रख सकते हैं। यानि कि यह परिदृश्य संभावित परिदृश्यों की दौड़ में आज भी शामिल है। परन्तु यह परिदृश्य पहले वाले परिदृश्य की तुलना में सीमित ब्रह्माण्डों को अस्तित्व में रखता है। इस परिदृश्य के अनुसार अनंत ब्रह्माण्ड नहीं हो सकते। तीसरे स्तर क्वांटम दुनिया के परिदृश्य के बारे में मैक्स टेगमार्क कहते हैं कि यह परिदृश्य गिने-चुने ब्रह्माण्डों के ही अस्तित्व की सम्भावना जताता है। क्योंकि यह परिदृश्य एक अद्वितीय और विशेष अंतरिक्ष की बात करता है। जिसमें एक से अधिक अंतरिक्ष एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं। परन्तु हम एक समय में एक ही ब्रह्माण्ड की वास्तविकता को देख पाएंगे, छू पाएंगे। जबकि अन्य दूसरे ब्रह्माण्ड हमारे भविष्य को तय करने में जुटे हुए होंगे। इस परिदृश्य में ब्रह्माण्डों की संख्या ऊपर दिखाए गए परिदृश्यों की तुलना में सबसे कम होती है। इस परिदृश्य के अनुसार सभी ब्रह्माण्डों में भौतिक नियतांक एक समान होते हैं। परन्तु अंतरिक्ष एक ही होता है। फिर चाहे वह अंतरिक्ष सीमित या असीम ही क्यों न हो ! अन्य बांकी ब्रह्माण्ड उस अंतरिक्ष की किसी दूसरी आयाम में छुपे होते हैं। इस अनंत आयम के अंतरिक्ष को "हिल्बर्ट अंतरिक्ष" कहा गया। चौथे और आखिरी परिदृश्य की अवधारणा को स्वयं मैक्स टेगमार्क ने दिया है। यह उस महा-ब्रह्माण्ड की अवधारणा है जिसमें एक से अधिक ब्रह्माण्ड एक साथ अस्तित्व में रहते हैं। या इस अवधारणा को इस तरह से भी समझ सकते हैं कि यदि हम सारे ब्रह्माण्डों को एक शब्द में परिभाषित करें तो उसे क्या कहेंगे ? या इन सभी ब्रह्माण्डों को किसने घेर रखा है ? आदि-आदि...  यह महा-ब्रह्माण्ड एक गणितीय परिदृश्य को सामने लाता है। और यह "थ्योरी ऑफ़ एवरीथिंग" के संभावित परिदृश्यों की दौड़ में शामिल है। "मंडेलब्रॉट सेट" (Mandelbrot Set) भी एक गणितीय महा-ब्रह्माण्ड है जो संभावित परिदृश्यों की दौड़ में शामिल है।

बुलबुले रूप में ब्रह्माण्ड : सर्वप्रथम बुलबुला ब्रह्माण्ड की अवधारणा टफ्ट्स विश्वविद्यालय के खगोलविद एलेग्जेंडर विलेंकिन ने रखी। आपके अनुसार एक से अधिक ब्रह्माण्डों का सृजन असीम दिक्-काल के विस्तार द्वारा संभव है। महा-विस्फोट के बाद भी तेजी से विस्तार कर रहे ब्रह्माण्ड को देखते हुए एलन गुथ ने एक से अधिक ब्रह्माण्ड

होने के संकेत देते हुए बुलबुले ब्रह्माण्ड के ढांचे के बारे में कहा कि ये सभी ब्रह्माण्ड एक सुपर अंतरिक्ष में अस्तित्व रखते हैं। यह अंतरिक्ष असंतुलित अर्थव्यवस्था जैसी परिस्थिति जिसमें अराजकता तेजी से फ़ैल रही है के समान फ़ैल रहा है। इसका फैलाव नए-नए ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति का कारण है। ये ब्रह्माण्ड उस अंतरिक्ष से बुदबुदाते हुए अस्तित्व में आकर अपनी संख्या को बढ़ा रहे हैं। जिससे पदार्थ की मात्रा में वृद्धि हो रही है। इस अंतरिक्ष में होने वाले गुरुत्वीय उतार-चढ़ाव अंतरिक्ष को समुद्र के परिदृश्य बना देते हैं। और अंतरिक्ष में ये ब्रह्माण्ड अनियमित तरीके से फैले हैं। जब कभी इन ब्रह्माण्डों में प्रसार रुक जाता है तो इनका अंत उसी अंतरिक्ष में भिन्न-भिन्न तरीकों द्वारा हो सकता है। क्योंकि उस अंतरिक्ष में बुदबुदाने वाले ब्रह्माण्डों के भौतिकी के नियम और भौतिक नियतांक भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इन सब में हमारे ब्रह्माण्ड को खोजना खाक छानने के समान है।

समान्तर ब्रह्माण्ड की अवधारणा : यह अवधारणा चूँकि क्वांटम भौतिकी से निकली अवधारणा है। और इस विषय पर हमारे द्वारा पहले से कोई लेख नहीं लिखा गया है। इसलिए हम इस अवधारणा को इसकी भौतिकी के साथ एक नए लेख के रूप में आपके सामने लाएंगे। बस संक्षिप्त में इतना जान लें कि अभी तक आप अपने दिमाग में इस अवधारणा को लेकर जैसा चित्र बना रहे थे। वे सब गलत हो जाने हैं। क्योंकि क्वांटम भौतिकी के मुख्य (अनिश्चितता का) सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक अनिश्चितता (स्थिति या संवेग) एक नए नमूने को प्रस्तावित करती है। और जब तक आप इस अनिश्चितता को नहीं समझ लेते। तब तक आप ब्रह्माण्ड के उस नमूने और उस नमूने द्वारा दिए जाने वाले उत्तरों के प्रश्न को नहीं समझ पाएंगे।

शिशु ब्रह्माण्ड की अवधारणा : यह अवधारणा के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यह अवधारणा भी विज्ञान की विशिष्ट भौतिकी की एक शाखा गुरुत्वीय भौतिकी से जुड़ी हुई है। फिर भी इस अवधारणा को समझना आसान है। यदि यह अवधारणा समान्तर ब्रह्माण्ड से जुड़ी हुई न होती। शिशु ब्रह्माण्ड की अवधारणा एक ऐसे ब्रह्माण्ड से हमारा परिचय कराती है। जिसमें संख्यात्मक और गुणात्मक दोनों विकास होते है। और इस ब्रह्माण्ड की उपस्थिति इस बात के संकेत देती है कि ब्रह्माण्ड का जन्म उसके अभिभावक ब्रह्माण्ड द्वारा हुआ है।

यदि ब्रह्माण्ड सब कुछ नहीं है तो फिर यह किसकी अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है ? क्या हम अपनी अभिव्यक्ति में ब्रह्माण्ड के लिए सिर्फ उनको शामिल करते हैं जिनका हम अवलोकन कर सकते हैं ? या फिर हम जिसका अवलोकन कर पा रहे हैं उसके भविष्य और उससे जुड़े भूतकाल की स्थिति को ब्रह्माण्ड में शामिल मानते हैं ? या फिर वे सभी संभावनाएँ जिनका सैद्धांतिक रूप से अस्तित्व स्वीकारा जाता है ! फिर चाहे उनका अवलोकन हम कर सकते हों या फिर न कर सकते हों ? हम एक से अधिक ब्रह्माण्ड के होने की सम्भावना को तब अच्छी तरह से समझ सकेंगे। जब हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्य महा-विस्फोट की स्थिति से पहले की परिस्थित्तियों को जान पाएंगे। यदि वह सच में हुआ रहा हो तो ! और यह जानकारी हमें उस स्वतंत्र अस्तित्व वाले ब्रह्माण्ड से मुखबिर कराएगी। जो कमी रहित ब्रह्माण्ड कहलाएगा। यह जानकारी से हमें इस बात का भी पता लग पाएगा कि आखिर हम मनुष्य की उत्पत्ति नाम के लिए कुछ नियमों की देन है या फिर हमारे अस्तित्व का भी कुछ मकसद है ?

एक से अधिक ब्रह्माण्ड होने के संभावित परिदृश्यों का चित्रण


मैक्स टेगमार्क का पहला परिदृश्य
मैक्स टेगमार्क का दूसरा परिदृश्य

अनंत ऊर्जा (कारक) से निर्मित परिदृश्य
अनंत अंतरिक्ष (कारक) से निर्मित परिदृश्य

मैक्स टेगमार्क का तीसरा परिदृश्य
(समान्तर ब्रह्माण्ड से)
स्वतः निर्मित ब्रह्माण्ड
मैक्स का तीसरा परिदृश्य
(शिशु ब्रह्माण्ड से)
मैक्स का चौथा परिदृश्य
(स्ट्रिंग सिद्धांत से)
मैक्स का पहला परिदृश्य
(विभिन्न परिस्थितियों वाला)

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