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विज्ञान क्या है ? : यानि की बाजू में रखा मेरा पेन वस्तु है। सामने से गुजरने वाली महिला मनुष्य है। गाना सुनाने वाला उपकरण मशीन (यंत्र) है। मुँह से निकलने वाली वाणी भाषा है। हमारा समाज या देश एक व्यवस्था है। रोड पर बाईं ओर से चलना नियम है। पहचान पत्र के लिए आवेदन करना एक प्रक्रिया है। तो विज्ञान क्या है ? यानि की विज्ञान को किस वर्ग में रखा जाता हैं ? ताकि उसकी प्रकृति को आसानी से जाना और समझा जा सके। याद रहे मैं विज्ञान की परिभाषा नहीं पूँछ रहा हूँ। यदि मैं आपसे विज्ञान की परिभाषा जानना चाहता। तो मेरा आपसे यह प्रश्न होता कि विज्ञान किसे कहते हैं ? विज्ञान एक पद्धति है। घटनाओं और भौतिकता के रूपों को समझने और समझाने की पद्धति। अब आप उस घटना या भौतिकता के रूप को किस युक्ति द्वारा समझते हैं। और अपने उस अनुभव, अनुभूति या युक्ति को लोगों तक कैसे पहुंचाते हैं। ये आप पर निर्भर करता है। इसलिए विज्ञान में किसी भी घटना या भौतिकता के रूपों के विश्लेषण के लिए एक से अधिक कार्यविधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। और उन्हें मान्यता दी जाती है। तो क्या आप किसी भी घटना अथवा भौतिकता के रूप को देखते से ही पहचान लेते हैं। उसको समझ लेते हैं ! नहीं न, तो अब प्रश्न यह उठता है कि हम घटनाओं अथवा भौतिकता के रूपों को कैसे समझते हैं ? उन्हें किस समझ के साथ स्वीकारते हैं ? उनके प्रति हमारी समझ कैसे विकसित होती है ? किन आधारों पर हम घटनाओं अथवा भौतिकता के रूपों के प्रति अपनी धारणा निर्मित करते हैं ? आइये इन प्रश्नों को समझने की कोशिश करते हैं।

ऐसा नही है कि समझना, जो एक प्रक्रिया है। वह केवल मनुष्यों में ही विकसित हुई है। छुईमुई और घटपर्णी जैसी वनस्पति से लेकर लगभग सभी जीव-जंतुओं में समझने की प्रक्रिया विकसित हुई है। क्योंकि मनुष्यों सहित छुईमुई, घटपर्णी और लगभग सभी जीव-जंतु घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। ध्यान से देखने पर हमें ज्ञात होता है इस प्रतिक्रिया के पीछे एक सोच है। जो मनुष्यों सहित सभी जीव-जंतु और वनस्पतियों में जीवन की उत्पत्ति के समय से ही विकसित हो गई थी। और उस समय इस सोच का मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन था। वास्तव में जीवन की उत्पत्ति का या मानव जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। क्योंकि हम मनुष्य किसी विशेष लक्ष्य के लिए जीवित नहीं हैं। परन्तु उस समय की उस सोच के मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन की आवश्यकता की पूर्ति द्वारा हम में जो विकास हुआ है। वो आज हम सब के सामने है। मानव ने अपने इस विकास से जो अर्जित किया है। वह उसकी अपनी सहजता (परिणाम) है। सहजता को हम मानव के जीवन का उद्देश्य कह सकते हैं। परन्तु वास्तव में मानव जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। विकास के इस क्रम में जो हासिल होता गया। कुछ समय बाद वह आने वाली पीढ़ी के लिए सहज होते गया। आज भी मानव जीवन की सोच का मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन ही है। ठीक है चलो भाई, ये भी मान लिया। परन्तु हम मनुष्य सोचते कैसे हैं ? यह सोच कैसे विकसित हुई ?

सोच कैसे विकसित हुई !
जीवन की उत्पत्ति लगभग १ अरब साल पहले समुद्र में हुई। और जिसका समय के साथ धरातल की ओर रुख होना प्रारम्भ हो गया। इस सुन्दर सी नीली धरती में धरातल परिवर्तन की दर शुरूआती दौर में वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक थी। बेशक, इस धरातल परिवर्तन ने ही उस सोच को जन्म दिया है। जिसके पीछे का आधार सिर्फ भोजन, सुरक्षा और प्रजनन आज हमको कई रूपों में दिखाई दे रहा है। हम मनुष्यों, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए कौन-कौन सी चीजें भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोगी होगीं ? किन-किन चीजों से सुरक्षित रहने की आवश्यकता है ? और प्रजनन का स्वरुप क्या होगा ? इसको भी पृथ्वी के उस बदलते हुए वातावरण ने ही निर्धारित किया है। परन्तु उस वातावरण ने यह कैसे संभव कर दिखाया है ? इसको जानना भी तो जरुरी है। "पुनरावृत्ति ही वह गुण है जिसने मनुष्यों सहित सभी जीव-जंतुओं और वनस्पतियों में सोचने-समझने के गुण का विकास किया। घटनाओं की पुनरावृत्ति ने भोजन और सुरक्षा के प्रति सोच विकसित की। और परिस्थितियों (वातावरण) की पुनरावृत्ति ने प्रजनन के प्रति सोच विकसित की।" घटनाओं की पुनरावृत्ति ने मनुष्य की सोच में विकास किया। जबकि परिस्थितयों की पुनरावृत्ति ने मनुष्यों के जीवन जीने के तरीके और कार्यशैली को निर्धारित किया। दूसरे शब्दों में मनुष्यों के स्वभाव को निश्चित किया। जहाँ एक तरफ घटनाओं की पुनरावृत्ति ने गुणात्मक विकास में वृद्धि की। वहीं परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने संख्यात्मक विकास के द्वारा मनुष्यों को सहज बनाया। आज हम इस कार्य प्रणाली को समझ पाए हैं। तो इसके पीछे का कारण वर्तमान में हमारी सोच के विकसित होने के प्रक्रिया को पहचान पाना है। वर्तमान में भी हम मनुष्य कुछ इसी तरह से अपनी सोच विकसित करते हैं।

जब कभी आदि-मानव (होमो इरेक्टस / होमो एर्गेस्टर) ने प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न आग को जलते देखा होगा। और उनमें से कोई मनुष्य आग के प्रभाव में आ गया होगा। तब भी मनुष्य की सोच विकसित नही हो पाई होगी। केवल आग से भय पैदा हुआ होगा। परन्तु जब उन्ही कुछ आदि-मानव के सामने इस घटना का दोहराव हुआ होगा। तब उस आग से झुलस जाने की वजह ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। आग के फैलने की प्रकृति ने सुरक्षा के प्रति एक समझ विकसित की होगी। याद रहे उस समय जो समझ विकसित हो रही थी। वह शुरुआती समझ थी। जो आज की परिपक्व समझ की तरह नहीं थी। वह समझ एक नई सोच को जन्म नही दे सकती थी। समय के साथ आदि-मानव की यह समझ एक प्रक्रिया के तहत आज की समझ के समरूप विकसित हुई। फलस्वरूप एक समय जिस आग ने आदि-मानव के मन में डर पैदा किया था। कुछ समय बाद वही मानव उस प्रक्रिया द्वारा विकसित समझ के प्रयोग से आग का उपयोग भोजन के लिए कर रहा था। और यह प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है। "माना, समझा और जाना" ये तीनों क्रियाओं के क्रम ने मनुष्यों की समझ को आज बहुत ऊँचे पायदान में पहुंचा दिया है। मनुष्य की समझ आज कई मायनों में बहुत अधिक विकसित हो गई है। यहीं देख लो न, जिस सोच से हमारी वर्तमान की समझ विकसित हुई है। आज हम उसी सोच को समझने का प्रयास कर रहे हैं। प्रारंभिक समझ एक ऐसी अपरिपक्व समझ थी। जिसे उस समय के आदि-मानव ने एक घटना "माना"। जिससे की उस आधार पर एक समझ विकसित (हुई) हो सके। और इस प्रकार उस आदि-मानव ने घटना के घटकों को जाना। घटना की पुनः पुनरावृत्ति होने पर उस घटना की पहचान पुनः "माना" क्रिया के साथ शुरू हुई। घटना के घटकों में थोड़े से परिवर्तन ने भी मनुष्य की समझ को बदला। तब एक बार फिर मनुष्य घटना के नए घटकों को जान पाया। यह क्रम आज भी इसी तरह से चला आ रहा है। और हमारी समझ विकसित हो रही है। याद रहे घटना की पुनरावृत्ति के शुरुआत में हम जिस समझ को आधार "मानकर" चलते हैं। वह मानी गई समझ पिछली सारी समझ से अधिक विकसित होती है। अर्थात प्रत्येक "मानना" अपने आप में एक दूसरे से भिन्न होता है।

जैसा की आपने देखा कि किस तरह से आदि-मानवों में घटना की पुनरावृत्ति के कारण भोजन और सुरक्षा के प्रति सोच विकसित हुई। ठीक उसी तरह से परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने प्रजनन के प्रति हमारी सोच विकसित की। जब बाह्य कारकों के प्रति मनुष्य सहज होता गया। तब उसे आंतरिक कारकों ने सोचने पर मजबूर किया। परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने समाज और सभ्यता के विकास में योगदान दिया। मनुष्य जिस वातावरण के संपर्क में आता गया। उसे अपने अनुकूल बनाता गया या वह उस वातावरण के अनुकूल होते गया। जहाँ एक तरफ घटनाओं की पुनरावृत्ति ने मनुष्य के दिमाग को अस्थिर किया। वहीं परिस्थितयों की पुनरावृत्ति ने दिमाग की स्थिरता को सहजता में बदला। तब जाकर मनुष्यों में आपसी निर्भरता की समझ विकसित हुई। परिस्थितियों की पुनरावृत्ति का आशय वातावरण या भौतिकता के रूपों के उस दृश्य के सामने आ जाने से है। जिसको इससे पहले एक या दो बार ही देखा गया था। ये क्या है ? ये यहाँ क्यों है ? ऐं, तुम कौन हो ? और तुम ? तुम एक जैसे हो ! नहीं, तुम दोनों एक जैसे हो ! नहीं, हम सब एक "जैसे" हैं ? जैसे ? बराबर ? समान ? थोड़ा अलग ? फ़र्क ? भिन्न ? अज्ञात ? इन छोटे-छोटे समझ विकसित करने वाले प्रश्नों ने ही जो आज हमें बेवाकूफी वाले प्रश्न लगते हैं, ने ही हमारी सोच विकसित की है। एक सोच जिसे हमने एक विशेष दर्जा दे रखा है। उस वैज्ञानिक सोच की नींव कुछ शताब्दी वर्ष पूर्व की नहीं बल्कि उन आदि-मानवों ने आग की खोज करने के साथ ही रख दी गई थी। जिसमें आज कई फ्लैट्स एक साथ भिन्न-भिन्न माले में बनाए जा रहे हैं। एक साधारण सोच एक वैज्ञानिक सोच से सिर्फ इस बिंदु को लेकर पिछड़ जाती है। क्योंकि वह सम्भावना पर आधारित होती है। जबकि एक वैज्ञानिक सोच घटना के अनुभव, करंट की अनुभूति और कारण को पहचानने की युक्ति से परिपूर्ण होती है। इसलिए एक वैज्ञानिक सोच समाज के लिए विश्वसनीय है। ऐसा नहीं है कि एक साधारण सोच हमेशा गलत होगी। अरे भाई, किसी घटना के घटित होने की सम्भावना शत-प्रतिशत भी तो हो सकती है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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