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वाणिज्य संकाय के १२ वी. पास उस लड़के के इस कथन ने मुझे अंदर से झकझोर दिया कि भैया, पढ़ाई-लिखाई करने से क्या मिलेगा ? पढ़ाई-लिखाई करने से तो नौकरी भी नहीं मिलती ! इसलिए चने बेच रहा हूँ।

कुछ नहीं कह सकता था। इसलिए चुपचाप वहाँ से चने लेकर अपने कमरे में लौट आया। बेशक, वह लड़का गलत नहीं कह रहा था। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति और उनकी आवश्यकता कैसी और क्या होगी ? ये हम जान भी नहीं सकते।

पढ़ाई-लिखाई करके नौकरी मिल जाना, ये समाज की आवश्यकता और नौकरी पाने वाले के सामर्थ्य दोनों के सामंजस्य की बात है। इसलिए धन अर्जित करने के लिए वैकल्पिक मार्ग व्यवसाय या कृषि को चुनना अच्छी बात है। परन्तु पढ़ाई-लिखाई करने से क्या मिलेगा ? उस लड़के का ऐसा सोचना मुझे अच्छा नहीं लगा। अरे, वो लड़का पढ़ा-लिखा था। उसमें यह सोच कैसे आ सकती है ? क्या उसकी शिक्षा ने उस पर सकारात्मक प्रभाव नहीं डाले थे ? क्या वह चने बेचने के कार्य से परेशान था ? जो भी हो, पर उसका ऐसा सोचना गलत है।

एक कहानी : शिक्षा सिर्फ धन अर्जित करने का साधन नहीं है। शिक्षा के द्वारा आप अपने संरक्षित धन को अपना बनाए रख सकते हैं ! आपका अपना कमाया हुआ धन, जब आपकी संतान बिना मतलब के कार्यों में खर्च करने लगती है या आपको अँधेरे में रखकर आपसे पैसे मांगती है। या नई-नई तकनीकों या क़ानूनी नियमों का ज्ञान न होने की वजह से आपको जो नुक्सान होता है। या फिर एक व्यापारी नई योजना के तहत आपको शब्दों के द्वारा भ्रमित करते हुए। १५ की चीज २० में आपको यह कहकर बेच देता है कि आपको इस वस्तु को खरीदने में फलां-फलां प्रतिशत का फायदा होगा। तो यकीन मानिये ये आपकी अशिक्षा का ही परिणाम होगा कि आप शर्मिंदगी की वजह से कुछ न कह सकने के बाबजूद लुट जाएंगे। आपका संरक्षित धन अशिक्षित होने के कारण दूसरों का हो जाएगा। जबकि धन अर्जित करने के लिए आपको शाररिक या दिमागी मेहनत की आवश्यकता होती है।


एक बड़े व्यापारी का बड़ा लड़का जब शहर पड़ने को गया। तो उसके दोस्तों की संगत ने उस लड़के को बिगाड़ दिया। जिस लड़के को महीने में पांच हज़ार रुपयों की आवश्यकता होती थी। आज वही लड़का पिताजी से कहकर दस हज़ार रूपये अपने बैंक अकाउंट में बुलवा रहा था। पिताजी आखिर पिताजी जो ठहरे। दस हज़ार कहने के बाद भी बारह हज़ार रूपये अकाउंट में भेज दिए जाते थे। लड़के ने पिताजी से ज्यादा रूपये मंगवाने का कारण बढ़ती हुई मंहगाई और नए-नए पढ़ाई के कोर्सों को बताया। महीने के बीच में जब कभी लड़के को अचानक से अधिक रुपयों की आवश्यकता होती। तब वह लड़का किसी भी कंप्यूटर या अन्य तकनीकी कोर्सों के नाम गिना देता था। लड़के के पिता जी कोर्स के नाम के अक्षरों की बढ़ती हुई गिनती गिनकर अपने बेटे को रूपये पहुंचा देते थे। लड़का अब इतना शातिर होने लगा था कि कोर्स के नाम याद नहीं होने की वजह से नए कोर्सों के नाम गढ़ने लगा था। "हुला-लला-लु" कुछ इसी तरह के कोर्स के नाम लड़का अपने पिता जी को अंधकार में रखने के लिए उपयोग में ला रहा था। अब पिताजी क्या जाने कोर्स हिंदी में पढ़ाया जाना है या किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाना है ? अन्य भाषाओं के कोर्स में ज्यादा रूपये देने होते होंगे ? जितना बड़ा कोर्स का नाम होगा उतने ही अधिक रूपये देने होंगे ? पिता जी की इसी गलत समझ ने उस लड़के को और बिगड़ जाने दिया। बेशक पिता जी यह नही चाहते थे। परन्तु ऐसा हो रहा था। दादा-परदादा की संचित पूंजी उनका नाती गलत संगत में होने के कारण उस पूंजी को खर्च कर रहा था। पिता जी अपनी समझ के अनुसार कोर्स के नाम के अक्षरों को गिनना नहीं भूलते थे। पहली की अपेक्षा कोर्स के नाम में एक अक्षर बढ़ जाने से उस कोर्स की कीमत दो हज़ार बढ़ जाया करती थी। कुछ कोर्स कभी समाप्त नहीं होते थे। उन कोर्सों की क़िस्त हर महीने अकाउंट में पहुँच जाती थी। क्योंकि पिता जी यह भी नहीं जानते थे कि कोई भी कोर्स लगभग कितने दिनों में समाप्त होता है ?

और अंत में एक दिन पिताजी को यह पता चलता है कि उनके पुत्र ने विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई के लिए प्रवेश ही नहीं लिया है। यह केवल एक कहानी ही नहीं हकीकत भी है। शिक्षा कई मायनों में अहमियत रखती है। शिक्षा सिर्फ धन अर्जित करने के लिए नहीं बल्कि उस संचित धन को अपना बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। जिसे आपने मेहनत करके कमाया हुआ है। शिक्षा के माध्यम से आप अपनी बात लोगों के सामने उचित अर्थ के साथ रख सकते हैं। शिक्षा महान पुरुषों का एक मात्र अचूक अस्त्र है। जिसका उपयोग वे समाज की भलाई के लिए करते हैं। एक शिक्षित व्यक्ति शिक्षा के महत्व को हमेशा पहचानता है। वह शिक्षा को साधन के रूप में एक स्थान में पड़ा नहीं रहने देता। बल्कि हर दिन हर समय वह शिक्षा का उपयोग स्वयं और समाज के लिए करता है। क्योंकि वह जानता है कि यदि वह अपने आपको शिक्षित कहलवाना चाहता है। तो उसे लोगों को शिक्षित करना होगा।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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