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हबल दूरदर्शी के रजत जयंती दिवस के उपलक्ष्य पर "ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त परिचय" आपके सामने प्रस्तुत है। जैसा हम सभी जानते हैं कि हमें सुदूर स्थित प्रत्येक खगोलीय पिंड की सारी जानकारी उस पिंड से आने वाले प्रकाश द्वारा प्राप्त होती है। परन्तु इन नग्न आँखों के लिए वे सभी आकाशीय पिंड एक समान होते हैं। क्योंकि हम उन आकाशीय पिंडों अथवा तंत्रों में उनकी गति, स्थिति, आकृति, आकर, घटक और उनमें होने वाले परिवर्तन के आधार पर भेद नहीं कर सकते हैं। परन्तु आज हम ब्रह्माण्ड का अंतरिक्ष की गहराई तक जो अध्ययन कर पाते हैं। वो इन्ही जैसी शक्तिशाली दूरबीनों के सहयोग से संभव हो पाता है। आज का लेख ब्रह्माण्ड और उसके अवलोकन पर आधारित है। ताकि गति, स्थिति, आकृति, आकर, घटक और परिवर्तन के आधार पर सभी आकाशीय पिंडों के भेद को पढ़ाया और समझाया जा सके।

ब्रह्माण्ड उस विशाल निकाय को परिभाषित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है, जिसमें शामिल होने के लिए ऐसा कुछ भी शेष नहीं रह जाता। जो अस्तित्व रखता हो। वर्तमान में हम ब्रह्माण्ड को खुला निकाय के रूप में परिभाषित करते हैं। क्योंकि हमें ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की वृद्धि के संकेत देखने को मिलते हैं। इसलिए हम कहते हैं कि ब्रह्माण्ड में प्रसार हो रहा है। जो कभी संकुचित रहा होगा। ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं ? इसे आप हमारे पिछले लेख में पढ़ सकते हैं।

घटक : किसी भौतिक संरचना के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली सामग्री घटक कहलाती है। याद रहे घटक के लिए यह जरुरी नहीं है कि वह उस भौतिक संरचना में अपनी मौजूदगी दर्शाए। अर्थात घटक बाह्य कारक भी हो सकते हैं। घटक को निर्माण की सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है। घटक उस मूल तत्व के रूप होते हैं जिससे भौतिक संरचना का निर्माण होता है।
  1. ऊर्जा : कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। बिना ऊर्जा के किसी भी तरह से कार्य करना संभव नहीं होता है। अर्थात ऊर्जा ब्रह्माण्ड का प्रमुख घटक है। ऊर्जा न सिर्फ ब्रह्माण्ड के निर्माण के लिए आवश्यक घटक है बल्कि ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार के लिए भी आवश्यक है। ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की सतत वृद्धि ब्रह्माण्ड के अंत का कारण भी बन सकती है। अर्थात ब्रह्माण्ड के साथ एक ऐसी स्थिति भी बन सकती है। जिसके बाद समझ लो ब्रह्माण्ड का अंत ही हो गया है। क्योंकि तब आकाशगंगा एक दूसरे से इतनी दूर हो जाएंगी कि आकाशगंगा का एक दूसरे से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रह जाएगा। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड के ताप में अत्यधिक कमी आएगी। और ब्रह्माण्ड का अंत अंततः शीतलन के रूप में होगा। ऊष्मा, ऊर्जा के अनेक रूपों में से एक है।
  2. पदार्थ : जो स्थान घेरता है उसे द्रव्य (Matter) कहते हैं। और द्रव्य के आयतन की माप को हमेशा पदार्थ की उपस्थिति के रूप में जाना जाता है। अर्थात द्रव्य और उसके बीच का अंतरिक्ष सम्मलित रूप से पदार्थ का निर्माण करते हैं। हम पदार्थ के सभी अवयवी अणु, परमाणु अथवा यौगिक में एक रूपता को खोजने का प्रयास करते हैं। और जब अणु, परमाणु अथवा यौगिक में एक रूपता देखने को मिल जाती हैं। तब हम उस पदार्थ को उसी अणु, परमाणु अथवा यौगिक के नाम से जानने लगते हैं। उदाहरण के लिए पानी (पदार्थ) को यौगिक के नाम से जाना जाता है। जबकि लोहा (पदार्थ) को अणु के नाम से जाना जाता है।
  3. अंतरिक्ष : वर्तमान ज्ञान (गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा) के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक सूक्ष्म पिंड से हुई है। उसके पहले अंतरिक्ष का कोई अस्तित्व नहीं था। और न ही उस स्थिति में अंतरिक्ष का कोई अर्थ निकलता है। अंतरिक्ष ही वह घटक है जिसने परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। अर्थात अंतरिक्ष न सिर्फ पदार्थ के निर्माण में योगदान देता है बल्कि पदार्थ उस अंतरिक्ष का अधिग्रहण (घेरता) भी करता है। हम जिस अंतरिक्ष को कहते हैं कि वह कुछ भी नहीं है। परन्तु वर्तमान ज्ञान के अनुसार हम उस अंतरिक्ष में श्याम ऊर्जा (ब्रह्माण्ड का 68% भाग) और श्याम पदार्थ (ब्रह्माण्ड का 27% भाग) की उपस्थिति की सम्भावना जताते हैं। अर्थात निर्देशित अंतरिक्ष में या तो श्याम ऊर्जा अथवा श्याम पदार्थ उपस्थित रहता है। फलस्वरूप इस अंतरिक्ष का तापमान भी परम शून्य नहीं होता है। और यही वो अंतरिक्ष है। जो भौतिक राशियों के निर्माण में भी योगदान देता है। इसकी अनुपस्थिति में भौतिकीय राशियों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
रजत जयंती वर्ष पर विशेष प्रस्तुति
अवयव : प्रत्येक भौतिक संरचना अपने अवयवी भौतिकता के रूपों में विखंडित होती है। अर्थात सभी अवयव भौतिक संरचना के आंतरिक भौतिकता के रूप होते हैं। अवयव को विखंडन से प्राप्त सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है। यदि हम थोड़ा गौर करें, तो हम पाते हैं कि अवयव भौतिक संरचना की अवस्था को दर्शाते हैं। अर्थात ब्रह्माण्ड उस अवस्था से भी गुजरा है जब न तो कोई तारा था और न ही कोई आकाशगंगा थी। महाविस्फोट के परिणाम स्वरुप एक समय के बाद परमाणु से लेकर विशाल तारों तक का निर्माण हुआ है। अर्थात नीचे लिखे गए सभी भौतिकता के रूप ब्रह्माण्ड के अवयव हैं।
  • तंत्र : भौतिकता का वह रूप जो इकाई अथवा इसके रूपों से निर्मित होता है। जिसे एक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। तंत्र कहलाता है। ब्रह्माण्ड में कई प्रकार के तंत्र हैं। जो ग्रह, उपग्रह तथा तारों द्वारा निर्मित होते हैं। इन तंत्रों की पहचान तंत्रों को निर्मित करने वाले अवयवी पिंडों की गति पर निर्भर करती है। फलस्वरूप एक ही प्रकार के अवयवी पिंडों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार के तंत्रों का निर्माण होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आपको लेख में पढ़ने को मिलेगा।
  1. मंदाकिनी / आकाशगंगा : यह भौतिकता का सबसे बड़ा तंत्र है। जो मुख्यतः तारों से निर्मित होता है। इस तंत्र में अन्य कई प्रकार के तंत्र (मंदाकिनी पुंज, तारामंडल, सौरमंडल आदि), गैस और धूल के कण शामिल होते हैं। कहा जाता है कि आकाशगंगा के केंद्र में श्याम विवर होता है। आकाशगंगा का शेष भाग इसी केंद्र (श्याम विवर) की परिक्रमा करता है। आकाशगंगा अपनी आकृति के आधार पर तीन प्रकार की होती हैं। शेष जानकारी को आप इस लेख में पढ़ सकते हैं। सर्पिलाकार मंदाकिनी अपेक्षाकृत सबसे बड़ी होती है। सर्पिलाकार आकाशगंगा के केन्द्र की आकृति के आधार पर सर्पिलाकार आकाशगंगा की अवस्थाएँ (मंदाकिनी पुंज का विस्तार, उसकी परिक्रमण गति, आकाशगंगा की घूर्णन गति और उसका आकार) निर्धारित होती हैं। इन आकाशगंगाओं का केंद्र गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण बिंदु अथवा रेखा की आकृति का होता है। जो सर्पिलाकार आकाशगंगा की नियति निर्धारित करता है।
    E = दीर्घवृत्तीय मंदाकिनी, S = सर्पिलाकार मंदाकिनी
  2. मंदाकिनी पुंज : मंदाकिनी पुंज आकाशगंगा का वह भाग होता है। जो आकाशगंगा की पूँछ के समान दिखाई देता है। इसलिए एक आकाशगंगा में एक से अधिक मंदाकिनी पुंज होते हैं। और प्रत्येक मंदाकिनी पुंज तारामंडल और सौरमंडल जैसे तंत्रों सहित गैस और धूल के कणों से निर्मित होती हैं। दो कारणों के रहते, हमको मंदाकिनी पुंज को जानने-समझने की आवश्यकता हुई। पहला सबसे महत्वपूर्ण कारण कि मंदाकिनी की घूर्णन गति उसके पुंज की परिक्रमण गति से भिन्न होती है। इसलिए मंदाकिनी एक तंत्र है। न की एक इकाई रूप (Uniform) है। और दूसरा कारण कि हम स्वयं की आकाशगंगा (दुग्धमेखला) को एक ही दृश्य में नहीं देख सकते हैं। क्योंकि हम उस दुग्धमेखला आकाशगंगा के ही एक अंग है। इसलिए एक हम एक ही प्रयास में एक संपूर्ण मंदाकिनी का अवलोकन नहीं कर सकते। फलस्वरूप हमने मंदाकिनी के अध्ययन को मंदाकिनी पुंज में बाँट दिया है। हमारी आकाशगंगा के 4 पुंज है।
  3. तारामंडल / नक्षत्र : तारों का ऐसा समूह जिनके बीच की आपसी दूरी लगभग-लगभग स्थिर रहती है। ऐसा समूह तारामंडल या नक्षत्र कहलाता है। अथवा आकाश के किसी एक निश्चित क्षेत्र में स्थिर तारों का ऐसा समूह जो एक साथ गतिमान होता है। तारामंडल कहलाता है। तारामंडल की पहचान कर पाना उस तारामंडल की गति के कारण संभव होता है। उदाहरण : सप्त ऋषि तारामंडल, ओरियन्स, राशियों के तारामंडल आदि, पृथ्वी अपनी परिक्रमा के दौरान जिन तारामंडल के नजदीक से गुजरती है। उन तारामंडल की स्थिति को जिस परिक्रमा की कक्षा द्वारा ज्ञात किया है। उस कक्षा को राशि चक्र (Zodiac) कहते हैं। इसे बारह भागों में बांटा जाता है। परन्तु इसका ये अर्थ नहीं है कि ब्रह्माण्ड में सिर्फ बारह ही नक्षत्र होते हैं। इन तारा नक्षत्रों की पहचान उन तारों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा अर्थात उस तारामंडल की आकृति द्वारा की जाती है।
  4. ध्यान से देखिये : दोनों तारों की वृत्तीय कक्षा भिन्न-भिन्न है
  5. द्वितारा / द्विसंगी तारा / युग्म तारा : गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण जब दो तारे परस्पर आपस में बंधे हुए होते हैं। तब ऐसे तारे के जोड़े को युग्म तारे कहते हैं। उदाहरण : साइरस-1, युग्म तारे की पहचान तारे की गति को पहचानने के बाद संभव हो पाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पांच प्रकार के ऐसे संयोग बनते हैं। जिससे कि दो तारे युग्म तारे कहलाते हैं। वास्तव में तारे का ऐसा युग्म अपने गुरुत्वीय केंद्र की परिक्रमा करता है। युग्म तारे के द्वारा ऐसी सम्भावना जताई जाती है कि भविष्य के ये दोनों तारे आपस में मिलकर एक बृहद तारे का निर्माण करेंगे।
  6. दोहरा तारा : दोहरा तारा तारों के ऐसे युग्म को कहते हैं या तो जिन तारों की आपसी गति कक्षीय गति का एक हिस्सा होती है या उन दोनों तारों की आपसी गति प्रेक्षक की स्थिति के आधार पर विपरीत होती है। या फिर उन दोनों तारों की गति का अंतर तारों की गति की तुलना में बहुत कम होता है। तारों का ऐसा युग्म दोहरा तारा कहलाता है। वास्तव में दोहरा तारा युग्म तारे की एक विशेष स्थिति है। जो पर्यवेक्षक की स्थिति पर निर्भर करती है। युग्म तारे को दोहरा तारा समझने का कारण कम समय तक युग्म तारे का अवलोकन करना है।
  7. सौर मंडल : आकाशीय पिंडों का ऐसा समूह या तंत्र जिसका मुखिया एक तारा होता है। तारे का परिवार कहलाता है। तारे के परिवार के सभी सदस्य ग्रह, उनके उपग्रह और अन्य सभी आकाशीय पिंड (अवांतर ग्रह) उस तारे की परिक्रमा करते हैं। और इसके साथ ही पूरा परिवार उस तारे के साथ आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा भी करता है। चूँकि हम पृथ्वी के परिवार के मुखिया को सूर्य (तारा) कहते हैं। इसलिए हम पृथ्वी के परिवार का नाम सौर मंडल कहते हैं।
  8. वासयोग्य क्षेत्र : तारों के पास का ऐसा क्षेत्र जहाँ पर जीवन की संभावना व्यक्त की जाती है। उस क्षेत्र को वासयोग्य क्षेत्र कहते हैं। वैसे तो वासयोग्य क्षेत्र कई बिन्दुओं पर आधारित होता है। परन्तु वासयोग्य क्षेत्र प्रमुख रूप से तारे की अवस्था और उस तारे के परिवार में ग्रह होने की सम्भावना को लेकर व्यक्त किया जाता है। कुछ वर्ष पूर्व मित्र तारा (Alpha Centauri) के अपने ग्रह में जीवन की सम्भावना इसी क्षेत्र को ध्यान में रखकर के व्यक्त की गई थी।
  • भौतिकता के रूप : भौतिकता अथवा ब्रह्माण्ड का एक नज़र में अथवा एक बार में परिक्षण कर पाना संभव नहीं है। इसलिए हम ब्रह्माण्ड का परिक्षण कई हिस्सों में करते हैं। और भौतिकता अथवा ब्रह्माण्ड का परिक्षण जिन भौतिक हिस्सों के माध्यम से किया जाता है। ब्रह्माण्ड के उस भौतिक हिस्से को ही "भौतिक के रूप" कहते हैं। वर्तमान में भौतिकता के पांच ज्ञात रूप हैं। जिसे अवयव, कण, पिंड, निकाय (बंद या खुला) और निर्देशित तंत्र (जड़त्वीय या अजड़त्वीय) कहते हैं। भौतिकता के सभी रूप इकाई या इकाई रूप में होते हैं। याद रहे भौतिकता के सभी रूप भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित होते हैं। इन सभी को एक मान लेना हमारी सबसे भूल होती है। आइये इनकी आपसी भिन्नता को समझने का प्रयास करते हैं।
  1. श्याम विवर : श्याम विवर एक ऐसा पिंड होता है। जिसे उसके आयतन के लिए नहीं बल्कि उसे उसके घनत्व के लिए जाना जाता है। इसलिए एक निश्चित आयतन में श्याम विवर के पदार्थ की मात्रा अपेक्षाकृत बहुत अधिक होती है। फलस्वरूप श्याम विवर में गुरुत्वाकर्षण बल का मान बहुत अधिक होता है। श्याम विवर को उसके क्षेत्र और उसके पदार्थ के अनुरूप अलग-अलग रूपों में देखा जाता है। श्याम विवर के क्षेत्र के अनुरूप श्याम विवर को एक नए ब्रह्माण्ड के जन्म के रूप में जाना जाता है। जबकि उसके पदार्थ के अनुरूप श्याम विवर को एक दानवकार पिंड माना जाता है। जिसके क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद प्रकाश भी लौटकर नहीं आ सकता। माना जाता है कि श्याम विवर भी गति करते हैं। श्याम विवर के अस्तित्व की जानकारी हमें उसके अधिक घनत्व के कारण उत्पन्न प्रभाव से प्राप्त होती है। अर्थात अंतरिक्ष में जब अधिक घनत्व के कारण कोई गोलीय रिक्तता दिखाई देती है। तब हम वहां श्याम विवर के होने की संभावना जताते हैं। श्याम विवर को तारे की अवस्था के रूप में भी जाना जाता है। इसके अनुसार श्याम विवर (कृष्ण क्षेत्र) एक क्षेत्र है न कि पदार्थ से बना हुआ एक पिंड है।
  2. नीहारिका : तारों के मध्य के अंतरिक्ष (अंतरतारकीय माध्यम) में स्थित ऐसे बादल जो धूल, हाइड्रोजन, हीलियम और अन्य आयनीकृत प्लाज़्मा गैस से बने होते हैं। ऐसे बादल नीहारिका कहलाते हैं। एक समय सभी खगोलीय विस्तृत संरचनाओं को नीहारिका कहा जाता था। यहाँ तक की आकाशगंगाओं को भी नीहारिका कहा जाता था। एडविन हबल दूरबीन के सहयोग से ही हमें ज्ञात हुआ कि आकाशगंगा और नीहारिका दोनों भिन्न-भिन्न खगोलीय तंत्र और पिंड हैं। उदाहरण के लिए देवयानी आकाशगंगा को पहले देवयानी नीहारिका के नाम से जाना जाता था। नीहारिकाओं के माध्यम से ही तारे और सौरमण्डलीय तंत्रों का निर्माण होता है। चील नीहारिका इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
  3. तारा : तारा एक ऐसा खगोलीय पिंड है। जो स्वयं के प्रकाश से दीप्तिमान होता है। तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। फलस्वरूप तारे का अपना प्रकाश होता है। तारे मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से बने होते हैं। एक समय के बाद तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। क्योंकि तारे की सम्पूर्ण हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित हो जाती है। तारे का अपना एक जीवन होता है। तारे की अवस्थाओं को उनका चरण कहा जाता है। क्योंकि तारे की अवस्थाओं का एक निश्चित क्रम तो होता है। परन्तु प्रत्येक तारा इन सभी चरणों का पालन करे यह जरुरी नहीं होता है। अर्थात किसी तारे का जीवन तीन चरण में पूरा हो जाता है। तो किसी तारे का जीवन पांच चरण में पूरा होता है। परन्तु उन चरणों का क्रम कभी नहीं बदलता। वैज्ञानिकों के अनुसार सात प्रकार के संभावित जीवन है। जिनमें से तारा किसी एक प्रकार के चरण आधारित जीवन को पूरा करता है। रात के समय साफ़ आसमान में दिखाई देने वाले तारे वास्तव में गोलाकार होते हैं। न कि अक्सर हम जिस तरह से कागज में तारे को बनाते हैं। उस तरह से पांच-छः नुकीले त्रिभुज से निर्मित होने वाली संरचना के समान तारे नहीं होते।
  4. स्पंदन तारा : जब अधिनव तारे (Supernova Star) का निर्माण कम द्रव्यमान के रूप में होता है। तो वह तारा पूर्ण रूप से विखंडित (विस्फोटित) न होकर जिस तारे का निर्माण करता है। उस तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। ऐसे तारे जब विकिरण का उत्सर्जन अत्याधिक चुंबकीय प्रभाव में रहते हुए तेजी से घूर्णन करते हैं। तब ऐसे न्यूट्रॉन तारों को हम स्पंदन तारे कहते हैं। इन तारों की उपस्थिति का ज्ञान हमको उनसे आने वाले विकिरण से प्राप्त होता है। अवलोकन से प्राप्त जानकारी के अनुसार वास्तव में इन तारों के विकिरण की दिशा परिवर्तित होती रहती है। जो एक क्षण के लिए पृथ्वी की ओर होती है। और एक निश्चित समय के बाद विकिरण की दिशा पुनः एक क्षण के लिए पृथ्वी की ओर हो जाती है। फलस्वरूप नग्न आँखों से ये तारे फैलते और सिकुड़ते (दिल के धड़कने के समान) दिखाई देते हैं। जो महज एक भ्रम के सिवाय कुछ भी नहीं है।
    स्पंदन तारा : न्यूट्रॉन तारे का निर्माण और उसकी वास्तविकता
  5. चर कांति तारा / परिवर्ती तारा : ऐसे तारे जिनकी चमक समय के साथ बदलती रहती है। उन तारों को चर कांति तारा अथवा परिवर्ती तारा कहा जाता है। चूँकि इन तारों की चमक में कोई एक निश्चित प्रतिमान (Pattern) देखने को नहीं मिलता है। इसलिए इन तारों को स्पंदन तारे से अलग माना जाता है। इन तारों की चमक परिवर्तन के कारणों को दो भागों में विभक्त किया जाता है। पहले भाग में ऐसे कारणों का अध्ययन किया जाता हैं। जो उस तारे की अवस्था परिवर्तन (फैलना और सिकुड़ना) के लिए जिम्मेदार होते हैं। जबकि दूसरे भाग में ऐसे कारणों का अध्ययन किया जाता है। जिसके अनुसार उस तारे का प्रकाश हमारे पास तक क्यों नहीं पहुंचता रहा है ? अथवा उस प्रकाश की तीव्रता की कमी के क्या-क्या कारण हो सकते हैं ?
  6. विशिष्ट तारा : ऐसे तारे जिनका अध्ययन उसके रासायनिक पदार्थों को जानने के लिए किया जाता है। विशिष्ट तारे कहलाते हैं। इन तारों की ऊपरी सतह में ही असामान्य धातुओं की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। चूँकि हम एक बार में ही इन तारों के उस असामान्य पदार्थ को ज्ञात नहीं कर सकते हैं। जिसको जानने के लिए हम अध्ययन करते हैं। इसलिए ऐसे तारे विशिष्ट तारे कहलाते हैं। हो सकता है कि हम जिस तारे का अध्ययन उसके असामान्य पदार्थ को जानने के लिए कर रहे हैं। उस पदार्थ को हम पहले से जानते हों। वास्तव में हम इन तारों का अध्ययन परिसीमन के कार्य के लिए करते है। जिससे की जिस ताप को हम पृथ्वी पर प्रयोग के लिए निर्मित नहीं कर सकते। उस ताप पर रासायनिक पदार्थों की प्रक्रिया का अध्ययन हम इन तारों के अध्ययन द्वारा कर पाते हैं।
  7. ग्रह : ग्रह ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं। जिनका स्वयं का प्रकाश नहीं होता है। जिनकी स्वयं की एक निश्चित कक्षा होती है। ये सभी पिंड किसी न किसी तारे की परिक्रमा करते हैं। और तारों के प्रकाश को परावर्तित करके स्वयं की उपस्थिति का बोध कराते हैं। ग्रह कहलाते हैं। माना जाता है कि ग्रहों का निर्माण नीहारिकाओं के आदिग्रह चक्र से होता है। अर्थात जब नीहारिकाओं से आदिग्रह चक्र का निर्माण होता हैं। तब आदिग्रह चक्र की घूर्णन गति ग्रहों के निर्माण के लिए सहयोगी सिद्ध होती है।
    सौरमंडल (तारा), ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और वलय
  8. उपग्रह : उपग्रह ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं जो अपने ग्रहों के साथ-साथ किसी तारे की भी परिक्रमा करते हैं। इन पिंडों का भी अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। ये पिंड भी अपने ग्रहों की भांति प्रकाश को परावर्तित कर अपनी उपस्थिति का बोध कराते हैं। इन पिंडों का निर्माण भी आदिग्रह चक्र के घूर्णन से होता है। उपग्रह की उत्पत्ति का एक और कारण ग्रहों से उल्कापिंडों का टकराना माना जाता है। जिस तरह से किसी तारे के परिवार में एक से अधिक ग्रह हो सकते हैं। ठीक उसी तरह से किसी ग्रह के एक से अधिक उपग्रह भी हो सकते हैं। हो सकता है किसी ग्रह के एक भी उपग्रह न हों। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बुध और शुक्र ग्रह हैं।
  9. क्षुद्रग्रह / अवांतर ग्रह : जब किसी परिक्रमण कक्षा में एक से अधिक छोटे-छोटे आकाशीय पिंड गति करते हैं। तब उन छोटे-छोटे आकाशीय पिंडों को क्षुद्रग्रह अथवा अवांतर ग्रह कहते हैं। ये सभी आकाशीय पिंड एक ही दिशा में एक दूसरे से एक निश्चित अंतराल बनाकर गति करते हैं। ऐसा माना जाता है कि अवांतर ग्रह की उत्पत्ति का कारण उल्कापिंड है। जब कभी एक ग्रह में एक बड़ा सा उल्कापिंड टकराया होगा। तो उसी ग्रह की परिक्रमण गति की दिशा में उसी ग्रह के टुकड़े गति करने लगे होंगे। फलस्वरूप इस तरह से अवांतर ग्रह की उत्पत्ति हुई होगी। और ये भी हो सकता है कि अवांतर ग्रह वे आकाशीय पिंड हैं जो कभी किसी ग्रह के हिस्सा ही नहीं रहे हों। बल्कि आदिग्रह चक्र का यह हिस्सा कभी ग्रह के रूप में विकसित ही न हो पाया हो। वर्तमान में हमारे सौरमंडल में इन अवांतर ग्रह की स्थिति मंगल और बृहस्पति ग्रह के मध्य में है। एक क्षुद्रग्रह का नाम कल्पना चावला जी के नाम पर भी रखा गया है।
  10. धूमकेतु / पुच्छल तारा : ऐसे आकाशीय पिंड जो एक सौरमंडल से दूसरे सौरमंडल का अथवा एक सौरमंडल से अंतरतारकीय माध्यम (किन्ही दो या दो से अधिक तारों के परिवार के मध्य का अंतरिक्ष) तक की परिक्रमा करते हैं। धूमकेतु अथवा पुच्छल तारा कहलाते है। वास्तव में इस पिंड की न ही कोई पूंछ होती है। और न ही यह एक तारा है। वास्तव में यह पिंड बर्फ, गैस और धूल के कणों से बना होता है। फलस्वरूप जब यह पिंड सूर्य के नजदीक से गुजरता है। तो सूर्य की ऊष्मा के कारण पिघलती हुई बर्फ चमकने लगती है। जिसके कारण हमें एक भ्रम होता है कि यह उसी पिंड का प्रकाश है। इसलिए हम उस पिंड को तारे की संज्ञा देते हैं। उस पिंड की गति के कारण पिघलते बर्फ की पूंछ बन जाती है। इसलिए हम धूमकेतु को पुच्छल तारा भी कहते हैं। चूँकि इन पिंडों की कक्षा अन्य ग्रहों की कक्षा को काटती है। इसलिए हम इन पिंडों को ग्रह की संज्ञा नहीं देते हैं। भले ही इनकी एक निश्चित कक्षा और एक निश्चित परिक्रमण का ही क्यों न हो ! उदाहरण : हेली का धूमकेतु (परिक्रमण काल = 76.8 वर्ष)
  11. उल्कापिंड : बाहरी अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करने वाले धूलकण अथवा पत्थर के ऐसे टुकड़े जो अत्याधिक घर्षण के कारण गर्म हो जाते हैं। और जिनका क्षरण (भस्म) होने लगता है। पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले शेष भाग को उल्कापिंड कहते हैं। इनकी अपनी कोई निश्चित दिशा नहीं होती है। और न ही ये पिंड अंतरिक्ष में सूर्य की परिक्रमा करते है। जब घर्षण के कारण यही गर्म पिंड पृथ्वी की ओर गिरते दिखाई देते हैं। तो इन्ही को टूटता हुआ तारा कहा जाता है। वास्तव में ये पिंड भी तारे नहीं होते हैं। और न ही इनका अपना कोई प्रकाश होता है। यह चमक केवल घर्षण के कारण उत्पन्न होती है।
  12. वलय / छल्ला : धूल, बर्फ, पत्थर और अन्य पदार्थों से निर्मित ऐसे पिंड जो वृत्तीय गति करते हुए किसी अन्य बड़े पिंड (ग्रह अथवा उपग्रह) की परिक्रमा करते हैं। तब ऐसी संरचना को वलय अथवा छल्ला कहते हैं। हमारे सौर परिवार में चार ग्रहों बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण के पास अपने-अपने वलय हैं। इसलिए इन्हे उपग्रही छल्ला भी कहते है। हमारे सौरमंडल में शनि का वलय सबसे बड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन वलय के निर्माण का कारण भी क्षुद्रग्रह के निर्माण के समान ही है। परन्तु इन वलयों (उपग्रही छल्ला) का आकार क्षुद्रग्रह की कक्षा से अपेक्षाकृत काफी छोटा होता है।
घटनाएँ : ब्रह्माण्ड के अवयव और घटकों के आपसी संयोग को घटना कहते हैं। इन घटनाओं का परिणाम सदैव मापने और गणना करने योग्य होता है। ब्रह्माण्ड में भौतिक और रासायनिक दो प्रकार के संयोग बनते हैं। फलस्वरूप उन क्रियाओं के अनुसार ही परिणाम प्राप्त होते हैं। हम लेख में सिर्फ भौतिक क्रियाओं के बारे में लिखेंगे। जो निम्न हैं।
  1. तारकीय आंधी : जब किसी तारे से अंतरिक्ष में प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और भारी धातुओं के परमाणुओं का प्रवाह होता है। तो ऐसे शक्तिशाली पदार्थ के प्रवाह को तारकीय आंधी कहते हैं। इस आंधी का प्रवाह 20 से 2000 कि. मी. प्रति सेकंड तक होता है। हमारे सौरमंडल के मुखिया सूर्य से भी तारकीय आंधी उत्पन्न होती है। जिसकी गति लगभग 200 से 700 कि. मी. प्रति सेकंड तक होती है। तारकीय आंधी से कृत्रिम उपग्रह में काफी नुकसान होता है। तारकीय आंधी में अत्याधिक गति होने के कारण ये तूफ़ान काफी शक्तिशाली होते हैं।
  2. ध्रुवीय ज्योति : आसमान में ध्रुवों की ओर आयन मंडल में जो रंग-बिरंगी प्रभा दिखाई देती है। उसे ध्रुवीय ज्योति कहते हैं। ध्रुवीय ज्योति का यह सुन्दर दृश्य सूर्य की विकिरण द्वारा आयनित गैस के कारण दिखलाई देता है। वास्तव में ध्रुवीय ज्योति की घटना में न सिर्फ दृश्य प्रकाश दिखलाई देता है। बल्कि इस घटना में पराबैगनी और अवरक्त प्रकाश की भी उत्पत्ति होती है।
    दक्षिणी ध्रुव में ध्रुवीय ज्योति की घटना सन-2011
  3. ग्रहण : जब किसी पिंड के परिप्रेक्ष्य (प्रेक्षक) किसी दूसरे पिंड के अवलोकन (देखने पर) में किसी अन्य तीसरे पिंड के कारण बाधा उत्पन्न होती है। तो उस परिप्रेक्ष्य पिंड के सापेक्ष ऐसी घटना को ग्रहण होना कहते हैं। ग्रहण की घटना के लिए सबसे आवश्यक शर्त यह है कि हम जिस पिंड का अवलोकन करना चाहते हैं या तो वह पिंड अथवा अवलोकन में बाधा उत्पन्न करने वाला पिंड एक तारा अर्थात स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होने वाला पिंड होना चाहिए। चूँकि हम पृथ्वी से अन्य ग्रहों का अवलोकन करते हैं। फलस्वरूप चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। वास्तव में ग्रहण आकाशीय पिंडों की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले विशेष संयोग है। इसलिए चंद्रग्रहण हमेशा रात के समय में पूर्णिमा के दिन होता है। और वहीं सूर्यग्रहण हमेशा दिन के समय अमावस्या के दिन होता है।
इतना सब जान लेने के बाद भी चूँकि हम ब्रह्माण्ड की संरचना को निर्धारित नहीं कर सकते हैं। इसलिए विज्ञान में तथ्यों पर आधारित कई अवधारणाओं का जन्म होता है। उन तथ्यों के द्वारा ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्य से जुड़ी भविष्यवाणियाँ की जाती है। यदि वे तथ्य अवलोकन के आधार पर गलत पाए जाते हैं। तो उन भविष्यवाणियों से जुड़ी अवधारणाओं को भी गलत मान लिया जाता है। और इस तरह से हम ब्रह्माण्ड को गतिशील ब्रह्माण्ड के रूप में प्रमाणित करते आ रहे हैं।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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  1. ज्ञानवर्धक और उपयोगी आलेख! :) :) हब्बल अन्तरिक्षीय दूरदर्शी के 25 वर्ष पूर्ण होने पर बधाईयाँ। भैया! मेरे ज्ञान के अनुसार तारों में केवल संलयन होता हैं, विखंडन की कोई भी नाभिकीय-प्रक्रिया नही होती हैं। यदि आप मुझे बता सके कि तारों के अंदर विखंडन की प्रक्रिया कैसे सम्भव हैं तो ठीक रहेगा! यदि तारों के अंदर विखंडन होता हैं, तो उसकी उर्जा का सबंध परमाणु ऊर्जा से होना चाहिए, परन्तु ऐसा नही हैं। तारे संलयन से सम्बंद्ध होते हैं, उनके अंदर हाइड्रोजन बम फूटते हैं, नाकि परमाणु बम। मेरे ख्याल से आपने विखंडन का मतलब विस्फोटन समझा हैं, मगर विखंडन का अभिप्राय विभाजन से हैं, नाकि विस्फोट से हैं। और शनि ग्रह का केवल एक वलय नही हैं, बल्कि इसके वलयों की संख्या तीन हैं। और दूसरी बात अभी तक ज्ञात वलयों (उपग्रही छल्ला) का आकार अनेक क्षुद्रग्रहों की कक्षा से काफी बड़ा पाया गया हैं। और हमारे सौरमंडल के ज्यादातर ग्रहों के वलय धूल, बर्फ, पत्थर इत्यादि ठोस पदार्थों से नही निर्मित हैं, और न ही यह द्रवों से बना हुआ हैं, यह मैक्सवेल ने अपने निबन्ध में सिद्ध किया था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण शनि ग्रह के वलय हैं।

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    1. प्रदीप, ऐसा लगता है मानों आपने जल्दबाजी में प्रतिक्रिया दी है। जिन तथ्यों को स्कूल स्तर पर नहीं पढ़ाया जाता। आपने उन तथ्यों का भी उपयोग किया है। लगता है काफी जल्दी में हो ! स्कूल की पढ़ाई में कम ध्यान देते हो। क्योंकि आज भी स्कूलों में यही पढ़ाया जाता है कि सूर्य में संलयन और विखंडन दोनों क्रियाएँ होती हैं। और दोनों क्रियाओं के घटित होने के पीछे बहुत स्पष्ट कारण दिया जाता है।

      बेशक विखंडन का तात्पर्य भारी परमाणु का हल्के परमाणुओं में टूटने से है। और जबकि हीलियम गैस भारी परमाणु नहीं है। और विस्फोट के दौरान हीलियम का नाभिक विखंडित नहीं होता। इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि सूर्य में विखंडन की क्रिया होती है।

      टिप्पणी पढ़ने पर समझ में नहीं आ रहा था कि लेख की गलती बता रहे हो ? या प्रश्न पूछ रहे हो ? या फिर इस विषय पर हमारा मत जानना चाहे हो ? गलती बताने के लिए शुक्रिया और बधाई।

      आपके द्वारा शेष जानकारी में पुनः ध्यान देने की आवश्यकता है। और सामने वाले के कहने के अर्थ को समझने की आवश्यकता है।

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  2. Achchh lekh.. Kripya taramandal ke bare mein aur bhi likhein... Bachpan mein Shri Gunakar Mule ji ke lekh NBT mein parhe the, unki yaad as gai ye sab parh kar... Dhanyawad...

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