ads

Style1

Style2

Style3[OneLeft]

Style3[OneRight]

Style4

Style5

किसी भी विषय-वस्तु की पहचान करना आसान होता है। जबकि उसी विषय-वस्तु को परिभाषित करना अपेक्षाकृत कठिन होता है। क्योंकि किसी भी विषय-वस्तु की पहचान तभी संभव हो पाती है। जब हम पहले से उस विषय-वस्तु से परिचित होते हैं। अन्यथा पहचान करना संभव नहीं है। जबकि परिभाषित करने के लिए जरुरी है कि आप उस विषय-वस्तु को निर्मित करने वाले घटकों को जानते हों। तभी आप उसे परिभाषित कर पाएंगे। अन्यथा घटकों की पहचान किये बिना विषय-वस्तु को परिभाषित करने पर हो सकता है कि आप जाने-अनजाने में किसी और को भी परिभाषित कर रहे हों ! उदाहरण के लिए आप कार्य होता देख, ये तो कह सकते हैं कि यहाँ कार्य हो रहा है। और फलां-फलां व्यक्ति या जीव उस कार्य को कर रहा है। परन्तु आप उस कार्य की परिभाषा आसानी से नहीं दे सकते। आप सरल रेखा तो खींच सकते हैं। किसी दूसरे के द्वारा बनाई गई सरल रेखा की पहचान भी कर सकते हैं। परन्तु सरल रेखा की परिभाषा देना आसान नही है। इसी प्रकार आप व्यक्ति या पिंड को गति करते देख, पहचान सकते हो कि वह व्यक्ति या पिंड गति कर रहा है। परन्तु गति को आप कैसे परिभाषित करोगे ? घटकों की पहचान किये बिना आप पास स्थित पिंड की गति एक घड़ी पहचान भी लोगे, परन्तु दूर स्थित पिंड की गति को कैसे पहचानोगे ? चलो एक घड़ी पृथ्वी के धरातल में होने वाली गतियों को भी पहचान लोगे। परन्तु साफ आसमान या अंतरिक्ष में होने वाली गतियों को कैसे पहचानोगे ? आखिर गति के कौन-कौन से घटक और कारक हैं ? जो गति को निर्मित करते हैं। गति किसे कहते हैं ? गति क्या है ? गति के कितने प्रकार हैं ? आइये इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानते हैं।

गति किसे कहते हैं ?
स्थिति परिवर्तन की माप गति कहलाती है। या पृथ्वी के संदर्भ में स्थान परिवर्तन की माप गति कहलाती है। दोनों परिभाषाओं में सिर्फ इतना सा अंतर है कि दूसरी परिभाषा में धरातल का आभाव नहीं है। जबकि पहली परिभाषा धरातल के आभाव में गति को परिभाषित करती है। अब दूसरा प्रश्न यह है कि गति क्या है ? तो हम बताना चाहते हैं कि गति एक क्रिया है। अर्थात गति के लिए यह जरुरी नहीं है कि जीवित प्राणी ही गति कर सकते हैं। गति तो भौतिकता का गुणधर्म है। अर्थात जिसका भी अस्तित्व है। वे सभी या तो गतिमान हैं या फिर उनमें (अवयवी कणों में) गति हो रही है। क्योंकि किसी कार्य का होना या करना क्रिया कहलाता है। इसलिए सजीव स्वयं की इच्छा से भी गति करते हैं। जबकि निर्जीव कणों अथवा पिंडों में (अवयवी कणों में) निरंतर गति होती है। इसलिए गति की पहचान क्रिया के रूप में की जाती है। हम में से ही कुछ लोगों को लगता है कि जो वस्तु कुछ देर पहले हमारे पास थी। और अब हमसे दूर हो रही है। इसे ही गति कहते हैं। बेशक वह वस्तु गति कर रही है। परन्तु प्रत्येक गतिशील वस्तु हमसे दूर जाए। यह जरुरी नहीं है। अर्थात हमारे पास की वस्तु का हमसे दूर होना। एक विशेष प्रकार की गति का परिणाम है। अब प्रश्न ये उठता है कि गति को निर्मित करने वाले घटक कौन-कौन से हैं ? ये घटक किस पर निर्भर करते हैं ? और अंत में किन आधारों पर गति के प्रकारों का वर्णन किया जाता है ?

गति के घटक :
गति के तीन घटक होते हैं। बल, दिशा और स्थिति तीनों गति के घटक हैं। अर्थात गति इन तीनों घटकों के द्वारा निर्मित होती है। परन्तु गति का प्रदर्शन केवल बल द्वारा ही संभव है। अर्थात बल कारक के रूप में भी कार्य करता है। आइये जड़त्व के नियम द्वारा जानने का प्रयास करते हैं कि कैसे बल द्वारा गति का प्रदर्शन संभव होता है। "यदि कोई वस्तु स्थिर है तो वह स्थिर ही रहेगी और यदि कोई वस्तु गतिमान है तो नियत वेग से गतिशील ही रहेगी। जब तक उस पर कोई परिणामी बाह्य बल न लगाया जाय।" इसे ही गति का प्रथम नियम अथवा जड़त्व का नियम कहते हैं। पहला घटक (बल) गति की दिशा को निर्धारित करता है। अर्थात बल की दिशा ही वस्तु या पिंड की गति की दिशा होती है। और तीसरा घटक (स्थिति) गति की पूरी व्याख्या करता है। यही एक मात्र ऐसा घटक है। जो किन्ही दो वस्तुओं की गति में भेद करता है। परन्तु किन्ही भी दो वस्तुओं की गति में भेद करने से पहले जरुरी है कि हम स्थिति की व्याख्या और पहचान करना सीखें। चूँकि पृथ्वी का धरातल होने के कारण स्थिति निर्धारित करने में कोई समस्या नहीं होती है। इसलिए हम पृथ्वी के धरातल में होने वाली दो गतियों के बीच में भेद कर पाते हैं। परन्तु अंतरिक्ष में निरपेक्ष धरातल के आभाव के कारण होने वाली गतियों के बीच में भेद करना मुश्किल होता है। इसलिए हम अंतरिक्ष में सापेक्ष गति मापते हैं। वास्तव में गति सापेक्षीय होती है। निरपेक्षीय गति का अस्तित्व ही नही है। परन्तु मानव हजारों सालों से गति को निरपेक्षीय मानते आया है। उसके भ्रम का कारण पृथ्वी द्वारा धरातल उपलब्ध होना है। किसी दूसरे पिंड के सापेक्ष गति ज्ञात करने की शर्त सर्वप्रथम सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने मानव जाति को बताई। और ये शर्त इस तथ्य का खंडन करती है कि ब्रह्माण्ड पृथ्वी के समतुल्य नहीं है। बल्कि यह ब्रह्माण्ड विशाल है। जिसमें पृथ्वी से लाखों गुना बड़े पिंड अस्तित्व रखते हैं। और इन बड़े-बड़े आकाशीय पिंडों में बीच में अंतरिक्ष विधमान है। "यदि ब्रह्माण्ड के संदर्भ में यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है कि ब्रह्माण्ड ससीम और अपरिवर्तित है। तब हम पुनः गति के निरपेक्षीय होने को एक तथ्य मानने लगेंगे। क्योंकि तब हमारे पास गति को ज्ञात करने के लिए एक निरपेक्षीय आधार (स्थित निर्धारण के लिए अदृश्य धरातल) उपलब्ध हो जाएगा।"

गति के तीन घटक : बल, दिशा और स्थिति
किसी भी वस्तु या पिंड की स्थिति परिवर्तन की माप दो रूपों में ज्ञात होती है। इसलिए स्वाभविक है कि गति के दो रूप होते हैं। गति का पहला रूप वेग (Velocity) है। तथा दूसरा रूप चाल (Speed) है। जहाँ एक तरफ वेग वस्तु या पिंड की क्षणिक गति है। वहीं चाल उन क्षणिक गति का औसतन मान है। इसलिए वेग विस्थापन (Displacement) पर और चाल वस्तु या पिंड द्वारा चली गई दूरी (Distance) पर निर्भर करती है। फलस्वरूप वेग एक सदिश (Vector) और चाल एक अदिश (Scalar) राशि है। याद रहे विस्थापन किन्ही दो बिन्दुओं अथवा स्थानों के बीच की न्यूनतम दूरी को कहते हैं। जबकि किन्ही दो स्थानों के बीच की दूरी माध्यम और उसको तय करने वाले साधनों पर निर्भर करती है। अर्थात मुंबई से चैन्नई के बीच की दूरी जलमार्ग, वायुमार्ग और सड़कमार्ग पर निर्भर करेगी। जबकि मुंबई से चैन्नई की न्यूनतम दूरी (विस्थापन) सदैव जलमार्ग, वायुमार्ग और सड़कमार्ग से तय की गई दूरियों से कम होती है।

घटकों के आधार पर गतियों का वर्गीकरण
  1. बल के आधार पर : नाभिकीय क्षीण बल, नाभिकीय तीव्र बल, विद्युत-चुंबकीय बल और गुरुत्वीय बल द्वारा निर्मित गतियाँ बल आधारित गतियाँ हैं। शायद आपको लगता हो कि इनके अलावा और कौन सी गतियाँ हैं जिनमें ये चारों बल नहीं लगते हैं ? अरे ये सभी प्राकृतिक बल हैं। जिनके माध्यम से प्रकृति संचालित होती है / कार्य करती है। परन्तु हम भी तो कार्य करते हैं। हम किसी को धक्का देकर बल ही तो लगा रहे हैं। प्राकृतिक और कृत्रिम बल के परिणामी बल से भी कई प्रकार की गतियाँ निर्मित होती हैं।
  2. दिशा के आधार पर : एक विमीय गति, दो विमीय गति और तीन विमीय गति दिशा आधारित गतियाँ हैं। एक विमीय गति का उदाहरण राकेट का ऊपर उठना अर्थात किसी एक दिशा में गति करना। दो विमीय गति का उदाहरण पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना अर्थात किसी एक तल पर गति करना। जबकि तीन विमीय गति का उदाहरण स्वतंत्र आकाश में पक्षी का उड़ना अर्थात दिशाओं की बिना पाबंदी के गति करना।
  3. स्थिति के आधार पर : सरल रेखीय गति, वृत्तीय गति, आवर्ती गति, घूर्णन गति, वक्रीय गति, ब्राउनी गति आदि सभी स्थिति आधारित गतियाँ हैं। स्थिति आधारित गतियों में इस बात का ध्यान रखता है कि पिंड गति कर रहा है ? या उसका कोई एक तल घूम रहा है ? या फिर अवयवी कण गति के माध्यम से किसी तंत्र को बनाए रखने में सहायक हैं ?
इस ब्रह्माण्ड में एक समान वेग से स्वतः गतिशील पिंड का अस्तित्व अवश्य होगा। - अरस्तु (गति और समय का संबंध)
गति के प्रमुख प्रकार :
दो बिंदुओं के मध्य कण की गति
  1. स्पंदन : जब कोई कण किन्हीं दो बिंदुओं के मध्य सरल रेखीय गति करता है। तब उस गति को स्पंदन कहते हैं। अर्थात जब कोई कण सरल रेखा में गति करते हुए किसी एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक और उसी दूसरे बिंदु से पहले बिंदु तक गति करता है। तब इस गति को स्पंदन कहते हैं। इस गति में कण दो बिन्दुओं के मध्य सीमित होता है। यही उस कण की स्थिति है।
  2. कंपन : जब कोई वस्तु या पिंड अपने किसी अक्ष के परिप्रेक्ष्य पूर्ण चक्कर (360 अंश) से कम घूमती
    है। और इसी क्रिया के विपरीत दिशा में पुनः उसी घुमाव के बराबर चक्कर का दोहराव करती है। तब इस गति को वस्तु का कंपन करना कहते हैं। इस गति के दौरान वस्तु के स्थान (स्थिति) में कोई बदलाव नही आता है। बल्कि वस्तु का कोई एक तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कण गति करते हुए दिखाई देते हैं। इस गति के दौरान वस्तु अपनी दो अवस्थाओं के मध्य गतिशील रहती है। अर्थात वस्तु अपने तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कणों की गति द्वारा अवस्था में परिवर्तन लाती है। और पुनः उसी अवस्था की प्राप्ति हेतु वस्तु के वही तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कण पुनः गति करते हैं।
  3. दोलन गति : यह गुरुत्वीय बल से निर्मित गति है। इस गति के दौरान वस्तु अपनी स्थिति (स्थान) परिवर्तित करती है। परन्तु गति के दौरान वस्तु की स्थिति सदैव एक पाथ में सीमित होती है। अर्थात गति के दौरान किसी भी समय वस्तु की स्थिति सदैव एक निश्चित पाथ में 
    होती है। जब किसी वस्तु को किसी धागे से बांधकर या किसी छड़ को उसके किसी एक किनारे के सहारे लटका कर हिलाया जाता है। और यदि वह वस्तु किसी तल (दो विमीय) के परिप्रेक्ष्य गति करती है। तो उस गति को दोलन गति कहते हैं। इस गति की यह विशेषता हैं कि यह गति एक समय के बाद रुक सी जाती है। दोलन गति ही वह गति है, जिसको देखकर के गैलिलियो के मन में समय को मापने का विचार आया था। क्योंकि जैसे-जैसे दोलन छोटे होते जाते हैं। उस वस्तु की क्षणिक गति (वेग) कम होती जाती है। अर्थात दोलन करती हुई प्रत्येक वस्तु का दोलनकाल निश्चित होता है। बिना गुरुत्वीय बल के यह गति संभव नही है।
  4. घूर्णन गति : घूर्णन गति और कम्पन गति एक समान ही हैं। क्योंकि दोनों गतियों में 
    वस्तु या पिंड अपने किसी अक्ष के परिप्रेक्ष्य गति करते हैं। परन्तु घूर्णन गति में पिंड पूरा चक्कर (360 अंश) लगाता है। जबकि कंपन गति में वस्तु पूरा चक्कर नहीं लगाती है। और साथ ही घूर्णन गति में विपरीत चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। दिन-रात का होना पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण संभव हुआ है। सभी आकाशीय पिंड घूर्णन गति करते हैं। यहाँ तक की श्याम विवर भी घूर्णन गति करता हैं। और पृथ्वी लगभग 23.56 घंटे में अपनी घूर्णन गति समाप्त करती है। प्रदर्शित घूर्णन गति विषुवतीय तल के लंबवत है।
  5. अयन गति : इस गति के दौरान वस्तु के केंद्र के परिप्रेक्ष्य वस्तु डोलती है। ठीक वैसे ही जैसे लट्टू डोलता है। परन्तु लट्टू स्वयं के केंद्र के परिप्रेक्ष्य नहीं डोलता है। जबकि अयन गति में सारा पिंड अपने केंद्र के परिप्रेक्ष्य 
    डोलता है। फलस्वरूप उस पिंड में दो ध्रुव अलग ही नज़र आते हैं। आपको ये जानकार ख़ुशी होगी कि पृथ्वी तीन प्रकार की गतियाँ करती है। न की पृथ्वी सिर्फ दो प्रकार की गतियाँ करती है। अर्थात पृथ्वी अयन गति (Axial Precession) भी करती है। परन्तु इसका आवर्तकाल लगभग 26,000 वर्ष का होता है। जो बहुत धीमा है। इसलिए इस गति के प्रभाव को मनुष्य आसानी से नहीं समझ पाता। पृथ्वी का साढ़े 23 अंश झुका हुआ होना। और इसी झुकाव का पृथ्वी के केंद्र के परिप्रेक्ष्य डोलना अथवा अपने अपेक्षित अक्ष के द्वारा वृत्तीय गति करना, अयन गति (Axial Precession) करना कहलाता है। अर्थात पृथ्वी का यह झुकाव समय के साथ किसी एक तारे को इंगित (की ओर इशारा) करता है। वर्तमान में उत्तरी ध्रुव का यह झुकाव यामा तारा की ओर संकेत करता है। भविष्य में यह झुकाव अल्फा तारे की ओर होगा। याद रहे पृथ्वी का झुकाव उसके उत्तरी ध्रुव द्वारा मापा जाता है।
  6. परिक्रमण गति : जब कोई पिंड या वस्तु किसी तल के परिप्रेक्ष्य वृत्तीय गति करती है। तो इस गति को परिक्रमण गति कहते हैं। व्यवहारिक रूप से परिक्रमण गति किसी न किसी पिंड या वस्तु की लगाई जाती है। इस गति के दौरान पिंड या वस्तु अपनी स्थिति परिवर्तित करती है। परन्तु यह स्थिति 
    हमेशा एक वृत्त की परिधि में निश्चित होती है। हमारी पृथ्वी (ग्रह) भी सूर्य की परिक्रमा करती है। फलस्वरूप ऋतुओं में परिवर्तन होता है। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगभग 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं। याद रहे "मौसम (Weather) परिवर्तन का कारण क्षेत्रीय हवाएं, ऋतू (Season) परिवर्तन का कारण पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की ऊर्ध्वाधर प्रकाश की स्थिति और जलवायु (Climate) परिवर्तन का कारण उस स्थान की पृथ्वी पर स्थिति होती है।" ये तीनों परिवर्तन प्राकृतिक रूप से हमारे चारों ओर के वातावरण में देखने को मिलते हैं। परन्तु इनका समय अंतराल एक दूसरे से क्रमशः व्यापक होता जाता है। क्योंकि क्षेत्रीय हवाएँ घूर्णन गति पर, सूर्य का ऊर्ध्वाधर प्रकाश परिक्रमण गति पर और उस स्थान की अवस्थिति चक्रण गति पर निर्भर करती है।
  7. अवस्था परिवर्तन : जब किसी वस्तु में विस्तार या संकुचन होता है। तब उसके अवयवी कणों अथवा हिस्से की गति को उस वस्तु की अवस्था परिवर्तन कहते हैं। अर्थात इस क्रिया से वस्तु या पिंड के अवयवी कणों अथवा हिस्से की गति के कारण वस्तु के आयतन में कमी या वृद्धि होती है। इसलिए आपने ब्रह्माण्ड के गतिशील होने के बारे में सुना होना। वास्तव में होना तो ये चाहिए था कि जब ब्रह्माण्ड अपनी स्थिति एक स्थान से दूसरे स्थान पर दर्शाता। तब हम उसे गतिशील ब्रह्माण्ड कहते। परन्तु गतिशील ब्रह्माण्ड का अर्थ उसके अवयवी कणों, पिंडों और तंत्रों द्वारा ब्रह्माण्ड का विस्तार करना है। इस प्रकार की गति अवस्था परिवर्तन कहलाती है। ब्रह्माण्ड की अवस्था परिवर्तन का कारण गुरुत्वाकर्षण बल का कमजोर पड़ना अथवा ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की मात्रा का बढ़ना बताया जाता है। अवस्था परिवर्तन को आयु के रूप में मापा जाता है।
  8. दर : इतनी देर से लेख में आपको जो कमी महसूस हो रही थी। वह इस गति द्वारा पूरी होगी। वास्तव में मुझे नहीं लगता है कि लेख में ऊपर कहीं भी समय के बारे में लिखना जरुरी था। क्योंकि समय एक भ्रम मात्र है। चूँकि गति का सीधा संबंध समय से है और हम सभी इसी समय के परिप्रेक्ष्य मापन और गणना करते हैं। फलस्वरूप लेख में समय की गति पर चर्चा करना जरूरी था। हम में से ही कुछ लोगों का मानना है कि समय गति करता है। क्योंकि लोग जब खुश रहते हैं तो उन्हें दिन जल्दी बीतता हुआ महसूस होता है। और जबकि दुखी रहने पर दिन बड़ी मुश्किल से गुजरता हुआ महसूस होता है। यानि समय भी धीमा और जल्दी चलता है ? अर्थात समय गति करता है ? वास्तव में समय जैसी कोई चीज नहीं है। तो फिर वह गति कैसे कर सकता है ! समय महज एक भ्रम है। और इसकी उत्पत्ति का कारण गति का विस्थापन और दूरी पर आधारित होना है। एक समय इस भ्रम को पुख्ता करने का काम परिवहन के सीमित साधनों ने किया था। क्योंकि जब एक व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान के बीच की दूरी पूंछता था। तो सामने वाला व्यक्ति परिवहन के सीमित साधन के अनुरूप उसे कहता था कि तुम दूसरे पहर तक वहाँ पहुँच जाओगे। आज के परिप्रेक्ष्य में यही बात कहूँ, तो चार घंटे में पहुँच जाओगे। वास्तव में दर समय की एक काल्पनिक गति है। जिसे हम नियत (मान) मानकर अन्य दूसरी गतियों की माप में अथवा परिवर्तन की माप में उपयोग करते हैं। समय की इस गति के बारे में अन्य दूसरे लेख पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
गति में परिवर्तन : गति परिवर्तन का मुख्य कारण बल होता है। चाहे वह परिवर्तन गुरुत्वीय बल के कारण हो अथवा घर्षण बल के कारण हो। जब गति बढ़ जाती है, तो उसे त्वरण कहते हैं। और जब गति कम हो जाती है, तो उसे मंदन कहते हैं। अर्थात जिस दर से गति में वृद्धि होती है। उसे त्वरण कहते हैं। और जिस दर से गति में कमी आती है। उसे मंदन कहते हैं। फलस्वरूप त्वरण और मंदन में समय दो रूपों में कार्य करता है। इसलिए तो त्वरण और मंदन का मात्रक मीटर प्रति सेकेण्ड2 होता है। त्वरण और मंदन को समझना इसलिए जरुरी होता है। क्योंकि इसके (त्वरण और मंदन) और गति के आधार पर हम किसी भी वस्तु की क्षणिक स्थिति का वर्णन यथार्थता के साथ कर सकते हैं। गति के इसी परिवर्तन के कारण विस्थापन और दूरी में भेद करना संभव हो पाया है। क्योंकि जब किसी वस्तु में बल आरोपित होता है। तब न सिर्फ उस वस्तु की गति परिवर्तित होती है। बल्कि उस वस्तु की दिशा परिवर्तन की संभावना बनती है। फलस्वरूप वस्तु को अधिक दूरी तय करनी पड़ेगी। और इस स्थिति में वस्तु अपनी निश्चित विस्थापन से अधिक दूरी तय करती है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
«
अगला लेख
नई पोस्ट
»
पिछला लेख
पुरानी पोस्ट
  • 4Blogger
  • Facebook
  • Disqus

4 Comments

comments powered by Disqus

शीर्ष