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संभावना (Possibility) और प्रायिकता (Probability) एक ही चीज नहीं है। इतना तो आप हमारे पिछले लेख को पढ़कर के जान गए होंगे। परन्तु अभी भी कुछ लोगों के लिए संभावना और प्रायिकता की भिन्नता को समझ पाना कठिनाई वाला कार्य है। इसलिए इस लेख में हम संभावना और प्रायिकता के अनुप्रयोगों पर चर्चा करेंगे। ताकि उदाहरणों के द्वारा संभावना और प्रायिकता के उपयोग से आपसी भिन्नता को स्पष्ट किया जा सके। इसके साथ ही साथ हम संभावना और प्रायिकता की भिन्नता के प्रमुख बिन्दुओं को भी समझने का प्रयास करेंगे। और अंत में संभावना और प्रायिकता की उपयोगिता पर चर्चा करेंगे। ताकि संभावना और प्रायिकता के महत्व को समझा जा सके।

उदाहरण न. 1 : सबसे पहले हम इस गणितीय समस्या का हल खोजते हैं। ताकि प्रायिकता के बारे में हमें कुछ जानकारी प्राप्त हो सके। समस्या : "चार दरवाजे में से किसी एक दरवाजे के पीछे एक बिल्ली छुपकर बैठी है। दाईं ओर से पहले दरवाजे को खोला जा चुका है। शेष तीन दरवाजे में से बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली होने की प्रायिकता क्या होगी ? जबकि दाईं ओर से जिस पहले दरवाजे को खोला गया था। उसके पीछे बिल्ली थी या नहीं थी। इसके बारे में हमें जानकारी नहीं है।" सबसे पहले तो हम यह बताना चाहते हैं कि यह एक मनगढ़त समस्या है। जिसे इस बात को समझाने के लिए समस्या के रूप में सामने लाया गया है कि यह प्रायिकता की सीमा से बाहर का प्रश्न है। गणित में इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं खोजा गया है। क्योंकि जब तक हमें दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती। तब तक हम बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता ज्ञात नहीं कर सकते। वास्तव में इस समस्या का समाधान न होने का मूल कारण प्रश्न का व्यवहारिक होना है। क्योंकि यदि हम यह मानकर चलते हैं कि दाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली पाई गई है। तो बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता शून्य होगी। और यदि हम यह मानकर चलते हैं कि दाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली नहीं पाई गई है। तो बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता 1/3 (33.33%) होगी। जो लोग इस प्रश्न को एक चुनौती मानकर के हल करते हैं। तो उनमें से कुछ लोगों का उत्तर 1/4 (25%) भी होता है। क्योंकि इस उत्तर के पीछे उनका तर्क यह होता है कि बिल्ली जरूर से इन्ही चार दरवाजों में से किसी एक दरवाजे के पीछे छुपी होगी। जैसा की प्रश्न में कहा भी गया है। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर 1/4 (25%) होना चाहिए।

स्पष्टीकरण : बेशक कहने को यह एक मनगढ़त समस्या है। परन्तु इस प्रश्न की एक परिस्थिति ने इस प्रश्न को व्यवहारिक बना दिया है। और वह परिस्थिति दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे बिल्ली की वास्तविक स्थिति का पता न होना है। इस तरह से यह समस्या एक व्यवहारिक समस्या बन जाती है। और व्यवहारिक रूप से किसी भी विशेष घटना के घटित होने की प्रायिकता कभी भी शून्य नहीं होती। अर्थात यदि आप किसी भी घटना के घटित होने या न होने की प्रायिकता शून्य कहना चाहते हैं। तो आपको मनगढ़त शर्तों और परिस्थितियों का सहयोग लेना पड़ेगा (प्रायिकता का महत्वपूर्ण तथ्य न. 3 पढ़ें)। इसके अलावा यह समस्या पूर्ववर्ती घटना अर्थात दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की स्थिति पर निर्भर करती है। इसलिए यह एक भौतिकीय अवधारणा है। न की एक गणितीय अवधारणा है। इसलिए इस समस्या का हल प्रायिकता द्वारा नहीं निकाला जा सकता। यह घटना पूर्णतः संभावना पर टिकी है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 5, 6 और 7 पढ़ें)

उदाहरण न. 2 : जब एक लालची व्यक्ति जो पैसा कमाना चाहता है, को इस बात का पता चलता है कि किसी पांसे को ऊपर उछालने पर एक (1) आने की संभावना छः बार में एक होती है। वह हर बार एक अंक आने के लिए दाव लगाता है। वह जैसे-तैसे चालाकी से पांच बार पांसा उछालने पर कम पैसे का दाव खेलता है। अब आपसे एक प्रश्न है कि क्या छटवी बार में उस पांसे पर एक (1) अंक आएगा ? जबकि उस लालची इंसान ने इस बार सारे पैसे दाव में लगा दिए हैं !

स्पष्टीकरण : बेशक इस बार भी एक आने की प्रायिकता छः में से एक (1/6 या 16.66%) ही है। उस लालची इंसान ने प्रायिकता को संभावना समझकर पूरे पैसे दाव में लगा दिए। इसीलिए हमने उस लालची इंसान की सोच के मुताबिक पहले गद्यांश में प्रायिकता के स्थान पर संभावना शब्द का उपयोग किया है। जबकि वहां प्रायिकता शब्द होना चाहिए था। और इस छटवी बार में पांसे को उछालने पर क्या परिणाम प्राप्त होगा ? यह हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते। इसके अलावा यह भी निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता है कि जिस 1 अंक आने की प्रायिकता 6 में से 1 बार है। वह पहली चाल में आएगा ? या दूसरी चाल में आएगा ? या आखिरी चाल में आएगा ? और हो भी सकता है कि 6 चाल हो जाने के बाद भी 1 अंक न आए ! (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 8 पढ़ें)

पांसा, सिक्का, तांस की पत्ती अर्थात ऐसी सभी प्रणालियाँ जिनमें घटना के घटित होने की "सभी संभावनाओं" को हम जान सकते हैं या जानते हैं। ऐसी प्रणालियों में प्रायिकता कार्यरत होती है। शेष प्रणालियों में संभावना कार्यरत होती है। अर्थात जिन प्रणालियों अथवा तंत्रों में संभावनाओं की गणना की जाती है। वहाँ प्रायिकता कार्यरत होती है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 4 पढ़ें)

उदाहरण न. 3 को लिखने से पहले हम आपको कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं के बारे में बताना चाहते हैं। ताकि आपको उदाहरण न. 3 को समझने में आसानी हो। "किसी क्रिया के परिणाम स्वरूप विशेष प्रतिक्रिया की अपेक्षा रखना संभावना व्यक्त करना कहलाता है। जबकि किसी क्रिया के परिणाम स्वरूप संभावित अथवा निश्चित प्रक्रियाओं में से किसी एक के घटित होने की संभावना व्यक्त करना प्रायिकता कहलाता है।" इसीलिए संभावना का घटित होना आवश्यक नहीं होता है। क्योंकि यह किसी एक विशेष प्रतिक्रिया को लेकर के व्यक्त की जाती है। जबकि प्रायिकता में घटना का घटित होना जरुरी होता है। ताकि परिणाम स्वरूप किसी एक संभावित या निश्चित प्रतिक्रिया के परिणाम प्राप्त किये जा सकें। अर्थात संभावना किसी विशेष (एक) परिणाम को लेकर के व्यक्त की जाती है। जबकि प्रायिकता उसी परिणाम के विभिन्न रूपों में से एक के घटित होने को लेकर के व्यक्त की जाती है।

संभावना हमेशा तर्क के साथ व्यक्त की जाती है। उस विशेष घटना के घटित होने को लेकर के जितनी अधिक मजबूती के साथ तर्क दिए जाएंगे। उस घटना के घटित होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। और ये तर्क संयोग पर आधारित होते हैं। जब कभी किसी विशेष घटना के घटित होने का संयोग बनता है। तो निश्चित तौर पर वह विशेष घटना घटित होती है। प्रत्येक संयोग के पीछे एक कारण होता है। जो पूर्ववर्ती घटना से निर्मित होता है। अर्थात हम किसी भी विशेष घटना के घटित होने अथवा विशेष परिणाम की संभावना को उस संयोग की परिस्थितियों का अध्ययन करके व्यक्त करते हैं। जबकि प्रायिकता में हम केवल घटकों का अध्ययन करते हैं। ताकि उन घटकों से निर्मित होने वाले प्रत्येक संयोग और उन संयोग से निर्मित होने वाले एक समान परिणामों की गिनती की जा सके। एक समान परिणाम वाली जितनी अधिक घटनाओं के घटित होने की संभावना व्यक्त होगी। प्रायिकता का मान उतना ही कम होते जाएगा। इसलिए प्रायिकता में तर्क नहीं किये जाते। क्योंकि प्रायिकता हमेशा "निश्चित मान" को लेकर के व्यक्त की जाती है। भले ही उस मान की सार्थकता सिद्ध हो चाहे न हो ! अर्थात जिस घटना के घटित होने को लेकर के प्रायिकता का मान निश्चित किया गया है। जरुरी नहीं है कि वह घटना घटित हो ! वो कैसे ? उसके लिए उदाहरण न. 3 देखते हैं। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 1, 2, 3, 4 और 5 पढ़ें)

उदाहरण न. 3 : संभावना और प्रायिकता की भिन्नता को उजागर करती एक कहानी
एक दिन जब मैं और मेरे दोस्त के पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। तब हम दोनों ने एक सिक्के के साथ खेलना शुरू किया। चूँकि सिक्के को उछालने वाला यह खेल शर्तिया तौर पर खेला जाता है। इसलिए हम दोनों को इस खेल को खेलने में खूब मज़ा आ रहा था। परन्तु कुछ लोगों के लिए यह खेल अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अच्छा साधन उपलब्ध कराता है। इसलिए वे लोग इस खेल में पैसे लगाते हैं। सिक्के को उछालने का काम मैं स्वयं कर रहा था। और अपनी किस्मत को आजमाने का काम मेरा दोस्त कर रहा था। मैं लगातार एक-एक करके पांच चाल हार चुका था। मेरा दोस्त हर बार चित आने की संभावना को लेकर शर्त लगाता। और वह जीत जाता। अब मेरे दोस्त को लगने लगा कि आज उसकी किस्मत जोरों पर है। तो फिर क्या था। इस बार उसने अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अपना दाव चित के स्थान पर पट पर लगाया। सोचिये और बताइये, क्या वाकई में मेरे दोस्त की किस्मत जोरों पर थी ? और जब हम दूसरे दिन भी इसी खेल को खेलते हैं। तब क्या फिर से मेरे दोस्त की किस्मत उसको जिताएगी ? जबकि इस बार भी मैं स्वयं सिक्के को उछालने का और मेरा दोस्त दाव लगाने का कार्य कर रहे हैं।

स्पष्टीकरण : जैसा की हमने पहले ही लिख दिया है कि मैं लगातार चित आने के कारण अपने दोस्त से पांच बार हार चुका हूँ। तो इस बार चित आने की संभावना चौथी और पांचवी बार की अपेक्षा कहीं अधिक हो जाती है। इसका सीधा सा मतलब है कि इस बार मेरे दोस्त के हारने की संभावना 100% है। क्योंकि इस बार मेरे दोस्त ने अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अपना दाव पट आने पर लगाया है। वहीं इस बार भी चित या पट आने की प्रायिकता 1/2 यानि 50% ही है। अर्थात यह जरुरी नहीं है कि हज़ार बार सिक्का उछालने पर 500 बार चित आएगा। हो सकता है कि 5 बार भी चित न आए।

मेरे दोस्त की किस्मत सिर्फ इस बात पर जोरों पर थी कि परिस्थितियों के अनुसार सिक्के को उछालने पर चित आने को था। और मेरा दोस्त चित ही बोल रहा था। भाई गज़ब का संयोग था। वो भी पांच बार..

दूसरे दिन भी इसी खेल को खेलते समय चित या पट आने की प्रायिकता 1/2 यानि 50% ही रहती है। जबकि संभावना पुनः संयोग पर निर्भर करती है। और यह संयोग घटकों के कारक बनने पर निर्भर करता है। अर्थात दूसरे दिन भी दूसरी बार में चित या पट आने की संभावना पहली बार में चित या पट आने पर निर्भर करेगी। जितने अधिक बार चित या पट आएगा उसके आने की संभावना उन्हीं परिस्थितयों के लिए उतनी ही अधिक हो जाएगी। अर्थात संभावना का मान परिस्थितियों के आधार पर चर और प्रायिकता का मान विशेष शर्तों अथवा संयोग के आधार पर अचर होता है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 5, 6, 7 और 8 पढ़ें)

प्रायिकता के नियम : हमने आलेख में ऊपर कइयों बार संभावनाओं को गिनने या एक समान परिणामों की गणना करने की बात कही है। और साथ में लिखा है कि प्रायिकता का मान निर्मित होने वाले संयोग, एक समान परिणामों अथवा संभावनाओं की गणना करके ज्ञात किया जाता है। इसलिए प्रायिकता को संभाविता भी कहा जाता है। परन्तु प्रायिकता में संभावनाओं की गणना कैसे की जाती है ? क्या प्रायिकता के भी गणना करने के कुछ नियम है ? जी हाँ, संभावनाओं की गणना दो नियमों के द्वारा की जाती है। पहला नियम "संभाविताओं के गुणन" का नियम है। और दूसरा नियम "संभाविताओं के योग" का नियम है। प्रायिकता में संभावित संयोगों की गणना की जाती है। इस तथ्य से हम इसलिए अनजान रहते हैं। क्योंकि प्रायिकता का मान प्रतिशत (%) या दशमलव (0 से 1 के बीच) में लिखा जाता है। और हम सोचते हैं कि गणना तो पूर्णांक अंकों में की जाती है। परन्तु हमें याद रखना चाहिए कि प्रायिकता संयोग, एक समान परिणाम वाली घटनाओं अथवा संभावनाओं की गणना को लेकर है। आज हम इन दोनों नियमों के उपयोग से प्रायिकता को हल करने के लिए उदाहरण प्रस्तुत करेगें। ताकि आपको प्रायिकता हल करते भी आने लगे और आप प्रायिकता की उपयोगिता भी समझ लें।

संभाविताओं के गुणन का नियम : जब आप एक से अधिक भिन्न घटनाओं के संयुक्त परिणाम से कोई विशेष परिणाम की अपेक्षा रखते हैं। तब आपको इस नियम का उपयोग करना होता है। अर्थात जब आप किसी विशेष परिणाम की प्राप्ति हेतु दो या दो से अधिक क्रियाओं का क्रम निश्चित करते हैं। तब उन दो या दो से अधिक क्रियाओं के संयुक्त परिणाम के विशेष होने की प्रायिकता प्रत्येक क्रिया की अपेक्षित प्रतिक्रिया की प्रायिकता के गुणनफल के बराबर होती है।

उदाहरण : चार बार सिक्का उछालने पर चारों बार चित आने की प्रायिकता = पहली बार में चित आने की प्रायिकता × दूसरी बार में चित आने की प्रायिकता × तीसरी बार में चित आने की प्रायिकता × चौथी बार में चित आने की प्रायिकता

अर्थात चारों बार चित आने की प्रायिकता = 1/2 × 1/2 × 1/2 × 1/2 = 1/8

इसका सीधा सा मतलब है कि हम विशेष परिणाम की प्राप्ति के लिए जितनी अधिक शर्त्तें रखते हैं। उस परिणाम के प्राप्त होने की प्रायिकता उतनी ही कम होती है। क्योंकि हम विशेष परिणाम की प्रायिकता के लिए प्रत्येक शर्त के पूर्ण होने की स्वतंत्र प्रायिकता का आपस में गुणनफल ज्ञात करते हैं। इसलिए विशेष परिणाम की प्रायिकता अपेक्षाकृत कम हो जाती है। तास की पत्तियों द्वारा खेला जाने वाला तीन पत्ती का खेल भी प्रायिकता और संभावना दोनों पर आधारित होता है। तीन पत्ती के इस खेल में जिस संयोग की प्रायिकता सबसे कम होती है। वह संयोग जिस किसी व्यक्ति के पास बनता है। उसकी जीत होती है। यह खेल संभावना पर आधारित इसलिए होता है। क्योंकि इस खेल में सभी खिलाड़ियों को एक-एक करके तीन बार पत्ती बांटी जाती है। दूसरा खिलाड़ियों की संख्या निश्चित नहीं होती है। और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि सबसे बड़ी पत्ती एक्का को माना जाता है। परिणाम स्वरुप बादशाह, एक्का और दुप्पी के संयोग को रन नहीं गिना जाता। यदि यह खेल में संभावना कार्यरत नहीं होती। तो लगभग 60 प्रतिशत खेल के परिणाम प्राप्त नहीं होते। खेल में किसी की जीत नहीं होती। वो कैसें ? आइये हम इस खेल में बनने वाले प्रत्येक संयोग की प्रायिकता को ज्ञात करते हैं। नीचे लिखे गए प्रत्येक संयोग में एक ही व्यक्ति को एक-एक करके तीन पत्ती बांटी गई हैं। और विशेष परिणाम आने की प्रायिकता ज्ञात की गई है।

1. त्रिल आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती एक ही अंक की हों = 3/51 × 2/50 = 6/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। त्रिल आने के लिए दूसरी पत्ती भी उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 3 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 3/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 2 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 2/50.
2. फ़्लैश आने की प्रायिकता : अर्थात एक ही रंग की तीनों पत्ती के अंक क्रमशः हों = 1/51 × 1/50 = 1/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। फ़्लैश आने के लिए दूसरी पत्ती उसी रंग की अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से 1 (उसी रंग की अगले अंक की) पत्ती के आने की प्रायिकता 1/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी रंग की अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में 1 (उसी रंग की अगले अंक की) पत्ती के आने की प्रायिकता 1/50.
3. रन आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती क्रमशः हों = 4/51 × 4/50 = 16/ 2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। रन आने के लिए दूसरी पत्ती अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 4 (अगले अंक की किसी भी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 4/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 4 (अगले अंक की किसी भी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 4/50.
4. कलर आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती एक ही रंग की हों = 12/51 × 11/50 = 132/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। कलर आने के लिए दूसरी पत्ती भी उसी रंग की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 12 (किसी भी अंक की उसी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 12/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी रंग की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 11 (किसी भी अंक की उसी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 11/50.
5. डबल आने की प्रायिकता : अर्थात तीन में से दो पत्ती एक ही अंक की हों = 3/51 × 48/50 = 144/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी या तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। डबल आने के लिए दूसरी पत्ती उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 3 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 3/51. और तीसरी पत्ती उसी अंक के सिवाय कोई भी चलेगी। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 48 (उसी अंक को छोड़कर के) पत्तियों के आने की प्रायिकता 48/50.

तीन पत्ती के खेल में पांच विशेष संयोग और एक सामान्य संयोग बनता है। कुल 6 संयोगों में सामान्य संयोग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। खिलाड़ियों की संख्या बढ़ने के साथ विशेष संयोग बनने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसलिए लगभग 60% खेलों में सभी के पास सामान्य संयोग बनने से खेल में जीत-हार का फैसला नहीं हो पाता। इसके निवारण के लिए पत्तियों को क्रमशः एक दूसरे से बड़ा माना गया है। और साथ में एक ही खिलाड़ी को एक-एक करके तीनों पत्ती एक साथ नहीं दी जाती। और इस तरह से तीन पत्ती का खेल संभावना और प्रायिकता दोनों पर आधारित होता है।

संभाविताओं के योग का नियम : जब आपको घटना के किसी भी परिणाम से आपत्ति नहीं होती है। अर्थात संभावित परिणामों में से कोई भी एक परिणाम आए। या आपके द्वारा अपेक्षित शर्तों में से कोई भी एक परिणाम आने की प्रायिकता को इस नियम द्वारा ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए पांसा में सम संख्या आने की प्रायिकता को हम शर्तों में इस तरह लिखते हैं। या तो 2 आ जाए या तो 4 आ जाए या 6 आ जाए। अर्थात प्रायिकता = 2 आने की प्रायिकता + 4 आने की प्रायिकता + 6 आने की प्रायिकता

अर्थात पांसा में सम संख्या आने की प्रायिकता = 1/6 + 1/6 + 1/6 = 3/6 या 1/2

संभाविता की गणना का एक और रोचक उदाहरण : जैसा की हम सभी जानते हैं कि वर्ष में 365 दिन होते हैं। तो किसी एक दिन आपके दो मित्रों के एक साथ जन्मदिन आने की प्रायिकता क्या होगी ? भाई, गणित तो यही कहता है कि आप यादृच्छिक तरीके से सिर्फ 24 मित्रों की सूची बनाइये। और उन 24 मित्रों में से एक साथ जन्मदिन आने वाली एक जोड़ी होने की प्रायिकता न होने की प्रायिकता से कहीं अधिक होती है। यानि की सीधा सा मतलब है कि उन 24 मित्रों में एक जोड़ी ऐसी अवश्य होगी। जिनका जन्मदिन एक साथ आता है। आइये इस प्रायिकता की भी गणना कर ही लेते हैं। सबसे पहले हम इस बात की गणना करते हैं कि 24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आए। अर्थात पहले मित्र का जन्मदिन किसी भी दिन हो चलेगा। मतलब की प्रायिकता 365/365. दूसरे मित्र का जन्मदिन शेष 364 दिनों में से कोई भी एक दिन। तीसरे मित्र का जन्मदिन 363 दिनों में से कोई भी एक दिन। इसी प्रकार 24 वे. मित्र का जन्मदिन 365-23 = 342 शेष दिनों में से कोई भी एक चलेगा।


24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आने की प्रायिकता = 365/365 × 364/365 × 363/365 × ........ 342/365 (विशेष परिणाम के लिए एक से अधिक शर्तें रखी गईं हैं अर्थात प्रत्येक प्रायिकता का आपस में गुणा होगा।)

इस प्रकार 24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आने की प्रायिकता 0.46 अर्थात 46% होती है। जबकि 24 मित्रों में से किसी एक जोड़ी के एक साथ जन्मदिन आने की प्रायिकता 1 - 0.46 = 0.54 अर्थात 54% होती है। इस उदाहरण द्वारा आप समझ ही गए होंगे कि कैसे जटिल घटनाओं की प्रायिकता के मामले में सहज-बुद्धि से आँका गया परिणाम बिलकुल गलत सिद्ध होता है। इसके बाद भी हम इस बात को दोहराना चाहते हैं कि विभिन्न घटनाओं के संभावित परिणामों में से सर्वाधिक प्रायिकता वाले परिणाम का दोहराव होना जरुरी नहीं है।

तो अब प्रश्न ये उठता है कि तो फिर प्रायिकता का क्या मतलब है ? क्योंकि जिसका होना ही निश्चित न हो। तो उसकी विज्ञान में क्या उपयोगिता है ? जबकि संभावना अपेक्षाकृत अधिक सटीक बैठती है। तो अब हम प्रायिकता की उपयोगिता के बारे में बात करते हैं। प्रायिकता का उपयोग प्रकृति और भौतिकता के विकास को समझने में और संभावित ब्रह्माण्ड अर्थात समान्तर ब्रह्माण्ड की जानकरी एकत्रित करने में किया जाता है। यानि की प्रायिकता का उपयोग क्वांटम भौतिकी और ब्रह्माण्डिकी को जानने-समझने में किया जाता है। क्वांटम भौतिकी में प्रायिकता का उपयोग क्वांटम जगत अर्थात नए आयामों की खोज में और भौतिकता के निर्माण को समझने में किया जाता है। अर्थात भौतिकता का स्वरुप ऐसा ही क्यों है ? दूसरी तरह से क्यों नहीं है ? जबकि ब्रह्माण्डिकी में प्रायिकता का उपयोग इस ब्रह्माण्ड और समान्तर ब्रह्माण्ड के नियम और नियतांकों की आपसी भिन्नता को समझने में किया जाता है। इसके अलावा प्रायिकता का उपयोग आम जीवन में इस बात को ज्ञात करने में किया जाता है कि हमारे पास इसके अलावा और कितने विकल्प हैं ?

प्रायिकता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :
1. प्रायिकता के लिए यादृच्छिक (Random) घटनाओं के परिणामों का एक समष्टि समुच्चय बनाया जाता है।
2. निश्चित घटना की प्रायिकता सदैव 1 अर्थात 100% होती है। अर्थात घटना का परिणाम संभावित परिणामों में से कोई एक होता है।
3. असंभव घटना की प्रायिकता सदैव 0 अर्थात 0% होती है।
4. कोई भी संभावित परिणाम एक निश्चित आवृत्ति में अपने आप को दोहराए यह जरुरी नहीं है। अर्थात प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है। संभावना पर नहीं।
5. दो या दो से अधिक शर्तों के संयुक्त परिणाम की प्रायिकता प्रत्येक शर्त की प्रायिकता के गुणनफल के बराबर होती है। जबकि दो या दो से अधिक शर्तों में से किसी एक शर्त के पूरे होने की प्रायिकता प्रत्येक शर्त की प्रायिकता के योग के बराबर होती है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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