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शिक्षा किसे कहते हैं ? इसको जानने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप आठ-दस लोगों के समूह में यह निश्चित करने का प्रयास करें कि बच्चों की शिक्षा का स्वरुप क्या होना चाहिए ? बच्चों को किस विषय के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए ? आप पाएंगे कि आपको एक मत होने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा क्यों ? क्योंकि आप में से ही कोई आदर्शों को शिक्षा में शामिल करने की पैरवी कर रहा है। तो कोई विज्ञान को शामिल करने की पैरवी कर रहा है। कोई संस्कारों की बात कर रहा है। तो कोई कला और साहित्य को शामिल करने की पैरवी कर रहा है। इन सबके अलावा विषयों के सम्मलित पाठ्यक्रम पर भी एक मत होना बहुत मुश्किल होता है। दरअसल हमारा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बच्चों की शिक्षा का स्वरुप कैसा हो ? बच्चों को किस विषय के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए ? बल्कि हमारा प्रश्न इस बात को जानने के लिए होना चाहिए कि आखिर हम बाल-बच्चों को क्यों शिक्षित करना चाहते हैं ? शिक्षा का क्या उद्देश्य है ? और जिन विषयों को हम बच्चों की शिक्षा में शामिल करना चाहते हैं, क्या वाकई में हम उन विषयों के द्वारा शिक्षा का उद्देश्य पूरा कर रहे हैं ?

जैसा कि हमने अपने पिछले लेख में लिखा था कि साक्षरता का मतलब यह नहीं होता कि आपसे लोगों की भाषा (शब्दों और उनके अर्थों का ज्ञान) को समझना आता है अथवा नहीं ! साक्षरता का मतलब यह है कि आप उचित शब्दों के प्रयोग से अपनी बात को औरों तक पहुंचा सकते हो अथवा नहीं ? यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो आप साक्षर हैं। अब यदि मैं पूंछूं कि शिक्षित कौन है ? तब आप कहेंगे कि जो लोगों को शिक्षित कर सके। यानि कि वह व्यक्ति कदापि शिक्षित नहीं कहलाता है जो सिर्फ पास हुआ हो अथवा जिसने केवल ज्ञान को अर्जित किया हो। शिक्षा वह साधन है जिसको ग्रहण करने वाला व्यक्ति शिक्षा के महत्व को समझने लगता है। और वह लोगों को शिक्षित होने की सलाह अथवा शिक्षित करने लगता है। और तीसरा प्रश्न यह होना चाहिए कि आखिर हम बच्चों को क्यों शिक्षित करना चाहते हैं ? ताकि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञात हो सके। क्योंकि शिक्षा का सही महत्व वही व्यक्ति जानता है, जो वास्तव में शिक्षित होता है।


"शिक्षा वह साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने भविष्य को निर्धारित करता है। बल्कि बाह्य कारकों के प्रभाव से व्यक्ति के भविष्य को सुरक्षित भी करता है।" शिक्षा के निम्न उद्देश्य हैं। जिनको पढ़कर के आपको ऐसा लगेगा। मानो इसे ही शिक्षा या सीख कहते हैं। वास्तव में इन बिन्दुओं को ध्यान में रखकर के शिक्षा का स्वरुप निर्धारित करना चाहिए। और प्रत्येक विषय की सहभागिता इन्ही उद्देश्यों की पूर्ति को ध्यान में रख कर के सुनिश्चित करनी चाहिए। क्योंकि ये वही कारण हैं जिसके महत्व को जानकर के एक शिक्षित व्यक्ति लोगों को शिक्षित करने का प्रयत्न करता है। न सिर्फ समाज की भलाई के लिए बल्कि वह शिक्षित व्यक्ति स्वयं की भलाई के लिए भी ऐसा करता है।

  1. सर्वप्रथम सबसे पहले हमें अपने सेहत के प्रति सजग रहना चाहिए।
  2. न केवल मनुष्यों बल्कि मशीनों के प्रति भी हमें अपनी निर्भरता को हमेशा कम करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  3. किसी भी कार्य के लिए हमें किसी एक युक्ति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अर्थात वैकल्पिक साधनों की खोज हमेशा करते रहना चाहिए। और किसी भी नई वैकल्पिक युक्ति के प्रयोग से नहीं झिझकना चाहिए।
  4. हमें उस भाषा के प्रति अपनी समझ विकसित करनी चाहिए। जिससे कि मनुष्य अपनी आपसी समझ को विकसित कर सके। एक-दूसरे के कहने के अर्थ को समझ सके। यहाँ भाषा का तात्पर्य हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू या बंगाली आदि भाषाओँ से नहीं है। बल्कि अभिव्यक्त करने उस तरीके से है। जिसमें व्यावहारिकता सबसे अधिक होती है।
  5. शिक्षा कभी भी इस बात के लिए नहीं दी जाती है कि फलां चीज सत्य है और फलां चीज असत्य, फलां चीज अच्छाई है और फलां चीज बुराई है। बल्कि शिक्षा तो इस बात के लिए दी जाती है कि हम सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई को पहचान सकें ? उसके प्रभावों को जान सकें। और फिर स्वयं निर्णय ले सकें कि हमारे लिए क्या अच्छाई है और क्या बुराई है ? क्या सत्य है और क्या असत्य है ? साधारण शब्दों में शिक्षा परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। हम्में मानवता का बोध कराती है। इस प्रकार शिक्षा समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।
आपको यह लग सकता है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना भी तो है। वास्तव में प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना होता है। न की शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना होता है। हाँ, इतना जरूर है कि यदि हम शिक्षा के माध्यम से मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा कर पाए। तो यह शिक्षा की सबसे अच्छी प्रणाली कहलाएगी। याद रहे शिक्षा के इन चारों उद्देश्यों की पूर्ति करके भी हम व्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रख सकते हैं। परन्तु मनुष्य की आजीविका के साधन (प्रशिक्षण के माध्यम से) निर्धारित करके हम एक तरह से उनकी स्वतंत्रता को छीनते हैं।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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3 Comments

  1. सही और सटिक जानकारी

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    1. मुझे ऐसी शिक्षा/सीख कतई पसंद नहीं है। जो व्यक्ति को व्यक्ति, विषय या व्यवस्था का विरोधी या समर्थक बनाती है। और न ही ऐसी शिक्षा/सीख पसंद है जो वैकल्पिक साधनों और युक्तियों के उपयोग और उनकी खोज पर पाबन्दी लगाती है।

      बल्कि मैं ऐसी शिक्षा पद्धति का समर्थक हूँ जो विज्ञान के क्षेत्र में संशय उत्पन्न करने में सहायक हो और प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देती हो। तथा कला के क्षेत्र अभ्यास करने के लिए मुक्त करती हो।

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