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केप्लर के नियमों को जानने से ज्यादा रोमांचक है। उन नियमों के पीछे की कहानी को जानना। जिसकी शुरुआत महान दार्शनिक अरस्तु के एक मत से होती है। तथा उस अवधारणा को टॉलमी के द्वारा एक स्वरूप प्रदान किया जाता है। जिसके अनुसार "सारे पदार्थ चार तत्वों से मिलकर बने होते हैं। पृथ्वी तत्व का घनत्व सबसे अधिक होता है। जबकि अग्नि तत्व का घनत्व सबसे कम होता है। चूँकि पृथ्वी गोलाकार है। और घटते घनत्व के क्रमानुसार तत्वों ने पृथ्वी को ढक रखा है। इसलिए पृथ्वी सर्वप्रथम जल मंडल से फिर वायु मंडल से और तत्पश्चात अग्नि मंडल से ढकी हुई है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता था कि जब हम किसी वस्तु को जलाते हैं तब उसके सभी तत्व अपने-अपने मंडल (क्षेत्र) में चले जाते हैं। भारी तत्व शेष तत्व के रूप में पृथ्वी में बचे रहते हैं। जबकि हल्के तत्व ऊपर की ओर गमन कर जाते हैं।"

अरस्तु-टॉलमी का निदर्श (मॉडल)
ठीक इसी तरह निगमन विधि के अंतर्गत पृथ्वी को ब्रह्माण्ड का केंद्र मान लिया गया था। क्योंकि हम पृथ्वी को गति करते हुए नहीं देख सकते हैं। इसलिए पृथ्वी को स्थिर कहा गया। तथा ग्रहों को "प्लेनेट" यानि की भटकने वाला कहा गया। जो अपने खगोल में जड़े होते हैं और पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। ग्रहों के खगोल पारदर्शी और शुद्ध तत्वों से मिलकर बने होते हैं। इसलिए ये अभेद और शाश्वत हैं। पृथ्वी के सबसे निकट चन्द्रमा उसके बाद बुध, शुक्र, सूर्य, मंगल, बृहस्पति, शनि, नक्षत्र, तारे और तत्पश्चात स्वर्ग है। स्वर्ग इन सभी खगोलों की गति को नियंत्रित करता है। और उनमें सामंजस्य बैठाकर इन खगोलों को बांधे रखता है। याद रहे उस समय तक अरुण, वरुण और यम (ग्रह) की खोज नहीं हुई थी। (खगोल का आशय ग्रहों की उस कक्षा से है जो ग्रह को गति करने के लिए दिशा निर्देशित करती (मार्ग) हैं। तथा जो पदार्थ से मिलकर बनी हैं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।)

सभी ग्रह गोल हैं। तथा एक समान वेग से गतिशील रहते हैं। परन्तु जब प्रेक्षण के द्वारा ग्रहों की गति में अनियमितता पाई गई तब इसके समाधान के लिए दो नई संकल्पनाएं सुझाई गईं। क्योंकि अरस्तु बल के प्रभाव को भलीभांति जानते थे। और चूँकि खगोल शुद्ध तत्वों में मिलकर बना है। जो अभेद है। इसलिए ग्रहों की गति को असमान कहने का सवाल ही नहीं उठता है। इसलिए अरस्तु ने दो शर्तों को और जोड़ दिया।
  1. खगोलों में ग्रहों की गति स्वतंत्र नहीं होती है। बल्कि सभी खगोल एक दूसरे को संचालित तथा प्रभावित करते हैं।
  2. प्रत्येक खगोल जो पृथ्वी के सकेंद्रीय वृत्ताकार होते हैं। उनमें और भी वृत्ताकार छोटे खगोल जुड़े होते हैं। अर्थात कहने का अर्थ था कि खगोल में जड़े ग्रह न सिर्फ वृत्ताकार मार्ग में गति करते हैं। बल्कि वे ग्रह अन्य छोटे खगोलों की भी परिक्रमा करते हैं। जो बड़े खगोल के उपखगोल होते हैं। (छोटे खगोलों का आशय घूर्णन गति से नहीं है।) इस तरह उपखगोलों की संख्या बढ़ते-बढ़ते लगभग 80 तक पहुँच गई थी। परन्तु ग्रहों की गति की अनियमितता का समाधान नहीं हुआ था।
अरस्तु ने न ही अपने मॉडल में सुधार की आवश्यकता को पहचाना और न ही ग्रहों की एक समान गति करने वाले तथ्य में कोई बदलाव किया। बल्कि अपने ही मॉडल को और अधिक जटिल कर दिया था। अरस्तु का यह मॉडल निगमन विधि का उदाहरण है। जिसके अंतर्गत दैनिक जीवन से जुड़े तथ्यों को सिद्ध (प्रमाणित) मानकर संगत तथ्यों की खोज की जाती है। तथा उन काल्पनिक तथ्यों के माध्यम से एक नई दुनिया की रचना की जाती है। जिसे सिद्धांत के रूप में समाज के सामने रखा जाता है। और दावा किया जाता है कि दुनिया बतलाए गए सिद्धांत के जैसी ही है। याद रहे सर अल्बर्ट आइंस्टीन के लगभग सभी वैचारिक प्रयोग निगमन विधि की देन है। इसलिए विज्ञान में अरस्तु के योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। इसके अलावा उस समय तक गुरुत्वाकर्षण बल की खोज नहीं हुई थी। फलस्वरूप उन्होंने ग्रहों की गति को निर्देशित करने के लिए खगोलों (शुद्ध पदार्थों से निर्मित ढांचे) की बात कही थी।


इस कहानी के दूसरे भाग की शुरुआत सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में (सन 1514) हुई। जब कोपरनिकस ने अपनी 30 वर्षों की मेहनत में यह पाया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं है। और न ही सूर्य सहित अन्य ग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि निकोलस कोपरनिकस ने सर्वप्रथम सूर्य केंद्रित ब्रह्माण्ड की कल्पना (मॉडल) की थी। इसके पहले समोस के अरिस्टार्कस (Aristarchus) और भारत के आर्यभट्ट ने भी सूर्य केंद्रित ब्रह्माण्ड की कल्पना (मॉडल) की थी। परन्तु समय के साथ उन्हें मान्यता नहीं मिल पाई। तो अब कोपरनिकस के मॉडल में ऐसी क्या विशेषता थी ? जिसने उस मॉडल को मान्यता प्रदान की ? क्योंकि जिस समय कोपरनिकस ने अपने मॉडल को समाज के सामने रखा। उस समय अरस्तु-टॉलमी के मॉडल को चर्च से समर्थन प्राप्त था। जिसका विरोध करने पर आपको चर्च के कोपभजन का सामना करना होता। और दूसरी बात कोपरनिकस का यह मॉडल जिस पुस्तक के माध्यम से समाज के सामने रखा गया था। उस पुस्तक (स्वर्गीय गोलों का चक्रण) को पोप तृतीय को समर्पित कर दिया गया था। फलस्वरूप सूर्य केंद्रित मॉडल की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। पुस्तक के प्रकाशन के समय कोपरनिकस मृत्यु शैया में थे। जिसे दो भागों में प्रकाशित किया गया था। इन पुस्तकों के मुख्य बिंदु निम्न लिखित हैं।
  1. पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं है। बल्कि सूर्य सभी ग्रहों के केंद्र में स्थित है।
  2. पृथ्वी सहित अन्य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते  हैं।
  3. चन्द्रमा, पृथ्वी का उपग्रह है। परन्तु सूर्य एक तारा है के बारे में इस पुस्तक में कोई बात नहीं कही गई थी।
  4. पृथ्वी 24 घंटे में स्वयं के अक्ष का और 1 वर्ष में सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती (परिक्रमा) है। इसके अलावा पृथ्वी का अक्ष स्थिर नहीं है। जिसे अयन में परिवर्तन कहा गया।
  5. सूर्य से अन्य सभी ग्रहों की दूरी के क्रमानुसार बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति और शनि ग्रह सूर्य की परिक्रमण गति करते हैं। सूर्य से क्रमशः दूरी बढ़ने के साथ-साथ ग्रहों का परिक्रमण काल भी बढ़ जाता है। बुध का परिक्रमणकाल तीन महीने, पृथ्वी का एक वर्ष और शनि का 12 वर्ष होता है।
निकोलस कोपरनिकस ने अपनी खोज के शुरूआती दिनों (सन 1514) में सात बिन्दुओं को लेकर खोज करने का प्रस्ताव रखा था। जो निम्नलिखित हैं।
  1. सभी आकाशीय पिंड एक ही केंद्र की परिक्रमा नहीं करते हैं।
  2. पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केंद्र में नहीं है। चन्द्रमा इस कथन का अपवाद है।
  3. सूर्य ग्रहीय तंत्र के केंद्र में है।
  4. तारे सूर्य की तुलना में हमसे बहुत दूर हैं।
  5. पृथ्वी की अपने ही अक्ष में घूमने की गति उसकी दैनिक गति है।
  6. जबकि पृथ्वी की परिक्रमण गति उसकी वार्षिक गति है।
  7. ग्रहों का एक समय के बाद पुनः दिखाई देना अर्थात सभी ग्रहों की प्रतिगामी गति का एक ही कारण है। जिसकी खोज आगे चलकर गुरुत्वाकर्षण बल कहलाई।
और इस प्रकार निकोलस कोपरनिकस ने जूलियन कैलेंडर और सौर कैलेंडर के बीच के 10 दिनों के अंतर की विसंगति
कोपरनिकस मॉडल बनाते हुए
को समाप्त कर दिया। परन्तु कोपरनिकस ने भी ग्रहों की गति को एक समान माना। कोपरनिकस के मॉडल को सर्वप्रथम जिओरडनो ब्रूनो ने अपना समर्थन दिया था। वैसे तो वे एक दार्शनिक प्रवृत्ति के पादरी थे। जिन्होंने छुपकर रोम दार्शनिक और कवि लुक्रेटियस की पुस्तक को पढ़ा था। जो वस्तुओं की प्रकृति पर आधारित थी। जिसमें अनंत ब्रह्माण्ड की कल्पना की गई थी। और वह अरस्तु-टॉलमी के मॉडल का समर्थन नहीं करती थी। फलस्वरूप चर्च ने शुरू में जिओरडनो ब्रूनो को आठ वर्ष के लिए कठोर कारावास की सजा सुनाई। परन्तु जिओरडनो ब्रूनो के व्यव्हार में कोई परिवर्तन न दिखाई देने पर उन्हें आग में जलाकर मृत्युदंड दे दिया गया। जबकि जिओरडनो ब्रूनो चर्च में एक पादरी थे। जिन्होंने दैवी प्रकटीकरण सिद्धांत का विरोध किया था। और पृथ्वी को विशेष मानने से मना किया था। क्योंकि ब्रूनो के अनुसार सूर्य एक तारा है। सृष्टि में अनेकों तारे हैं। और उन तारों की अपनी अलग-अलग पृथ्वियां हैं। तो फिर पृथ्वी विशेष कैसे हो सकती है ? चन्द्रमा और सूर्य आखिर पृथ्वी की आरती (परिक्रमा) क्यों करते होंगे ? जैसा कि चर्च के द्वारा कहा जाता था। लुक्रेटियस का अनंत ब्रह्माण्ड वाला मॉडल तार्किक रूप से अपनी बात कहता है। उनके अनुसार जब हम ब्रह्माण्ड के किसी छोर से तीर छोड़े तो यदि वह तीर निरंतर रूप से आगें बढ़ता है। तो इसका मतलब यह है कि ब्रह्माण्ड वहां तक नहीं है जहाँ तक हमने सोचा था। और यदि वह तीर किसी से टकराकर रुक जाता है। तो इसका मतलब ये हुआ कि अब पुनः उस स्थान से तीर छोड़ा जा सकता है। अर्थात दोनों ही स्थिति में ब्रह्माण्ड अनंत सिद्ध होता है। 
कोपरनिकस के मॉडल के पहले तक मनुष्य उस मकड़ी की भांति था। जिसका विश्व उसके द्वारा बुने गए जाले तक सीमित था।                               - रोबर्ट बॉयल (आधुनिक रसायनशास्त्र के प्रवर्तक)
कोपरनिकस के ग्रहीय तंत्र के मॉडल को समर्थन देने की सूचि में टायको ब्राहे, जोहन्स केप्लर, गैलिलियो गैलीली और रेने दिकार्त जैसी हस्तियां के नाम प्रमुख रूप से गिने जाते हैं। जिस समय दूरबीन का निर्माण भी नहीं हुआ था। उस समय नग्न आँखों से लगभग 30 वर्षों में रात-रातभर जागकर टायको ब्राहे ने मंगल ग्रह के आंकड़े एकत्रित किये। और उन्होंने अरस्तु-टॉलमी के निदर्श का समर्थन तो नहीं किया। परन्तु उनका विरोध भी नहीं किया। उनका मॉडल अरस्तु-टॉलमी के मॉडल और कोपरनिकस के मॉडल का मिला जुला रूप था। कहने का अर्थ था कि सभी ग्रह अर्थात बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य की परिक्रमा करते हैं। परन्तु यह पूरा तंत्र और चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। अर्थात उन्होंने अपने मॉडल के माध्यम से पृथ्वी का केंद्र में बने रहने का समर्थन किया। टायको ब्राहे अपने नोट्स में सन 1572 के बारे में लिखते हैं कि मैंने रात को आकाश में एक चमकता हुआ तारा देखा। जो सिर्फ तीन माह तक दीप्तिमान रहा। इसी प्रकार 1577 में उन्होंने एक गतिशील तारे को देखा था। इन दोनों प्रमाण से वे इस नतीजे पर पहुंचे थे कि अरस्तु-टॉलमी के मॉडल में जो खगोल होने की बात कही जाती है। वह गलत है। क्योंकि 1572 और 1577 की घटना तभी संभव है। जब खगोल जैसी कोई चीज न हो। क्योंकि 1577 की घटना वाला तारा शुद्ध खगोल को कैसे भेद सकता है ? (टायको ब्राहे ने 1572 में जिस तारे को देखा था वह नव तारा और जो 1577 में देखा था वह पुच्छल तारा था।) याद रहे टायको ब्राहे की खोज प्रेक्षण विधि के अंतर्गत आती है। भले ही उन्होंने गलत विश्लेषण किया हो।


9 वर्ष की उम्र में जोहन्स केप्लर ने 1577 का पुच्छल तारा और 1580 का चंद्रग्रहण देखा था। जिसे देखकर वे प्रभावित हुए थे। फलस्वरूप उनका रुझान खगोल, दर्शन और गणित की ओर हुआ। वैसे तो जोहन्स केप्लर पहले से ही कोपरनिकस के मॉडल का समर्थन करते थे। और उन्होंने अपना समर्थन देते हुए, अपनी पहली पुस्तक "विश्व के रहस्य" सन 1596 में प्रकाशित करवाई। परन्तु जब चर्च ने उनका विरोध किया। तो वे सन 1600 में ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय को छोड़कर प्राग आ गए। और टायको ब्राहे की सहायता में जुट गए। परन्तु एक वर्ष बाद ही टायको ब्राहे की मृत्यु हो जाती है। और मंगल ग्रह से जुड़े उनके सभी आंकड़े जोहन्स केप्लर को प्राप्त हो जाते हैं। सन 1604 का सुपरनोवा तारा को देखकर वे इस घटना से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं। और इस तरह उनका मत और अधिक प्रबल हो जाता है। गणितज्ञ होने के नाते वे उन आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं। कई बार गणितीय विश्लेषण गलत होने के बाद सन 1605 में आखिर वे सही निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं। और अपनी दूसरी पुस्तक के रूप में सन 1609 में मंगल ग्रह से संबंधी दो नियम प्रतिपादित करते हैं। इन दोनों नियमों के माध्यम से वे कोपरनिकस के मॉडल में दो बदलाव करते हैं। पहला मंगल ग्रह की कक्षा गोल नहीं है। अपितु वह दीर्घवृत्ताकार है। और दूसरा मंगल ग्रह की कक्षा में मंगल ग्रह की गति एक समान नहीं रहती है। बल्कि घटती-बढ़ती रहती है। याद रहे ब्राहे का सहयोगी होने के बाद भी वे कोपरनिकस के मॉडल को सही ठहराते है। "नूतन खगोलिकी" पुस्तक के माध्यम से केप्लर निम्न दो नियम प्रतिपादित हैं।

  1. मंगल ग्रह दीर्घवृत्ताकार कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता है। और सूर्य केंद में स्थित न होकर उस कक्षा की नाभि में स्थित होता है।
  2. मंगल ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली रेखा परिक्रमण मार्ग में समान समय में समान क्षेत्रफल तय करती है।
इस प्रकार दूसरे नियम के द्वारा केप्लर ने उपखगोल की आवश्यकता को समाप्त कर दिया। और दस वर्ष बाद सन 1619 में केप्लर ने अपनी तीसरी पुस्तक "कोपरनिकस की खगोलिकी का सारांश" में ग्रहों की गति से संबंधी तीसरे नियम का प्रतिपादन किया। यह नियम आगमन विधि के अंतर्गत आता है। क्योंकि आगमन विधि के अंतर्गत प्रतिरूप (पैटर्न) की पहचान की जाती है। और सिद्धांत, नियम और तथ्यों का व्यापकीकरण किया जाता है। याद रहे अरुण, वरुण और यम ग्रह तब तक नहीं खोजे गए थे। जब ये ग्रह खोजे गए। तब ये नियम उन पर भी लागू पाए गए। यह नियम शनि, अरुण, वरुण और यम में शत प्रतिशत लागू होते हैं। जबकि अन्य ग्रहों में 2% तक ऊपर-नीचे लागू होते है। न खोजे गए ग्रहों पर भी जब इस नियम को लागू पाया गया। तो केप्लर के नियम प्रमाणित मान लिए गए। वर्तमान में ये नियम तारों और आकाशगंगा के लिए भी सत्य माने गए हैं।

3. ग्रहों के परिक्रमणकाल का वर्ग ग्रह से सूर्य की औसत दूरी के घन के अनुक्रमानुपाती होता है।

गैलिलियो गैलीली कोपरनिकस के मॉडल का समर्थन तो करते थे। परन्तु वे केप्लर के गणितीय निरूपण के पक्षधर नहीं थे। क्योंकि उस समय तक गुरुत्वाकर्षण की खोज नहीं हुई थी। और उनका मत था कि बिना किसी कारण के ग्रहों की गति कैसे कम या ज्यादा (नियंत्रित) हो सकती है ? हालांकि उन्होंने दोलन गति (जो घटती-बढ़ती है) की खोज की थी। और उसका गणितीय निरूपण भी किया था। परन्तु वे गुरुत्वाकर्षण को नहीं समझ पाए थे। उनके पास कोपरनिकस के मॉडल को प्रमाणित करने के लिए कई प्रमाण थे। इन प्रमाणों की खोज में दूरबीन का सबसे बड़ा योगदान था। जिसकी सहायता से गैलिलियो गैलीली ने ग्रहों, तारों और तारामंडल (आठवे और नौवे खगोल के बीच भेद किया) में अंतर ढूंढा था। आकाशगंगा में असंख्य तारे होने की बात कही थी। सूर्य में धब्बे और चन्द्रमा में गहरे गर्त होने की बात कही थी। शुक्र ग्रह और चन्द्रमा की कलाओं का ज्ञान कराया था। बृहस्पति ग्रह के उपग्रहों की खोज की थी। और सबसे बड़ी बात कोपरनिकस के समान गैलिलियो ने भी सन 1618 में तीन पुच्छल तारे देखे थे। जिनसे प्रभावित होकर उन्होंने सन 1623 में "पुच्छल तारों का परिक्षण" नामक पुस्तक लिखी थी। इसी प्रकार आधुनिक दर्शन के प्रवर्तक रेने दिकार्त ने भी कोपरनिकस के मॉडल के समर्थन में अपनी पहली पुस्तक "ले मोंडे" प्रकाशित करवाई थी।

व्यापकीकरण होने के बाद केप्लर के नियम
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
1. कक्षीय संरचना का नियम : प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्तीय कक्षा (जिसकी दो नाभि होती हैं) में परिक्रमा करते हैं। और प्रत्येक दीर्घवृत्तीय कक्षा की एक नाभि में सूर्य स्थित होता है। इसे ही केप्लर का प्रथम नियम कहते हैं।


2. ग्रहों की कक्षीय गति का नियम : किसी क्षण ग्रह को सूर्य से मिलाने वाली काल्पनिक रेखा एक समान समय-अंतराल में एक समान क्षेत्रफल तय करती है। इसे ही केप्लर का दूसरा नियम कहते हैं। इस नियम के द्वारा ग्रह की कक्षीय गति (चाल) परिभाषित होती है। सरल शब्दों में कहूँ तो कक्षीय गति करते समय जब कोई ग्रह सूर्य से दूर होता है। तब उस ग्रह की गति कम होती है। जबकि वही ग्रह जब सूर्य के नज़दीक पहुँचता है। तब उस ग्रह की गति बढ़ जाती है।


3. ग्रहों के परिक्रमणकाल का नियम : ग्रह के परिक्रमणकाल का वर्ग सूर्य से उस ग्रह की औसत दूरी के घन के अनुक्रमानुपाती होता है। अर्थात जो ग्रह सूर्य से जितना अधिक दूर रहेगा। उसका परिक्रमणकाल उतना ही अधिक होगा। इसे ही केप्लर का तीसरा नियम कहते हैं। यह नियम केप्लर के दूसरे नियम का ही विस्तृत रूप है।



हम सभी ग्रहों की कक्षाओं को वृत्त मानकर ही चलते हैं। क्योंकि सूर्य से सभी ग्रहों की कक्षाओं का निकटतम और दूरस्थ बिंदु की दूरी का अंतर सिर्फ 3 % प्रतिशत ही होता है। इसलिए विशेष प्रयोजन में ही इन कक्षाओं को दीर्घवृत्तीय मानकर गणना की जाती है।

विशेष बिंदु :
1. अरिस्टार्कस (310 BC- 230 BC) जो एक गणितज्ञ होने के साथ-साथ खगोलविद और दार्शनिक थे, ने पृथ्वी से चन्द्रमा और सूर्य तक की दूरी और पृथ्वी ग्रह सहित चन्द्रमा और सूर्य के आकार का पता लगाया था। उनके गणितीय आकलन विधि द्वारा बतलाए गए आंकड़े वास्तविक आंकड़ों से मेल खाते हैं।
2. हालांकि गैलिलियो गैलीली ने अरस्तु के इस मत का खंडन किया था कि "पदार्थ के तत्वों की प्रकृति अपने मंडलों (क्षेत्र) की ओर गमन करने की होती है।" इसके लिए जरुरी था कि पृथ्वी तत्व से बनी भारी वस्तुएं अर्थात जिनमें पृथ्वी तत्व की अधिकता होती है। वे स्वतंत्र गति करते हुए पृथ्वी के धरातल में अधिक गति से पहुँचती हैं। जबकि हल्की वस्तुएं अर्थात जिनमें पृथ्वी तत्व अपेक्षाकृत कम होता है। वे वस्तुएं स्वतंत्र गति करते हुए पृथ्वी के धरातल में कम वेग से नीचे की ओर गिरती हैं। अर्थात भारी वस्तुओं की तुलना हल्की वस्तुएं बाद में पहुँचती हैं। गैलिलियो गैलीली ने अपने प्रयोगों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया था। सभी वस्तुएं चाहे वे हल्की हों या भारी पृथ्वी तल में एक साथ पहुँचती हैं। इसके बाद भी गैलिलियो गैलीली गुरुत्वाकर्षण बल को नहीं समझ पाए थे।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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