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प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीके

प्रमाण विज्ञान का वह सहायक विषय है जिसका उपयोग समाज में वैज्ञानिक सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और जानकारियों की विश्वसनीयता के प्रति समझ विकसित करने के लिए किया जाता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रमाण का उपयोग साधन के रूप में विश्वसनीयता को सिद्ध करने के लिए किया जाता है। आज हमारी सोच इतनी विकसित हो गई है कि हम प्रत्येक सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और जानकारियों के लिए प्रमाण की मांग करते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण आज के समय में मनुष्य की कम आयु उसके व्यक्तिगत विकास में बाधा उत्पन्न करती है। और इस दुनिया में अपने लिए वह अकेला मनुष्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता। इसलिए उसे दूसरों पर निर्भर होना पड़ेगा। और इस निर्भरता की पूर्ति हेतु आपसी विश्वास की आवश्यकता जान पड़ती है। यहीं से समाज में प्रमाण की आवश्यकता की जानकारी प्राप्त होने लगती है। और यह सही भी है कि समग्र विकास और उचित तरीके से विकसित समाज के लिए प्रमाण देना चाहिए। परन्तु सामने वाले के द्वारा प्रमाण प्रस्तुत किये जाने के बाद भी यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि प्रमाण मान्यता देने योग्य है ? अर्थात प्रमाण के प्रति अपनी सोच कैसे विकसित की जाए ? उस प्रमाण की सार्थकता कैसे सुनिश्चित की जाए ? और अंत में उस प्रमाण को किस आधार पर स्वीकारा जाए ?

अब तक के ज्ञान को सिर्फ छः तरीकों द्वारा मान्यता प्रदान की गई है। ऐसा नहीं है कि प्रमाण प्रस्तुत करने के सिर्फ छः ही तरीके हैं। और भी तरीके होने की सम्भावना है। जिन्हे आपको स्वयं की खोज या कथन की प्रमाणिकता के लिए प्रयोग में लाना होगा। क्योंकि ये छः तरीके भी कभी न कभी किसी सिद्धांत, नियम, तथ्य या जानकारी की प्रमाणिकता के लिए किसी न किसी के द्वारा पहली बार प्रयोग में लाए गए होंगे। नीचे दिए गए सभी छः तरीकों को उदाहरणों द्वारा समझाने की कोशिश हमारे द्वारा की जाएगी। साथ में आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रमाण "प्रस्तुत" किये जाते हैं। जरुरी नहीं है कि वे स्वीकारे ही जाएं। क्योंकि किसी भी प्रमाण को तभी मान्यता दी जाती है। जब वह प्रमाण उस खोज या कहे गए कथन के प्रति हमारी समझ को विकसित करता है। यदि प्रस्तुत किया गया प्रमाण दी गई शर्त को पूरा नहीं करता है। तब तक वह प्रमाण समाज या विज्ञान में मान्य नहीं होता। मान्यता प्राप्त करने के लिए जिन शर्तों का पूरा होना आवश्यक है, उन्हें इस लेख में पढ़ा जा सकता है।

प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीके :
साक्ष्य द्वारा (By Evidence) :
सबसे पहले तो हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि किन-किन विषय-वस्तुओं को प्रमाण की आवश्यकता होती है ? सिद्धांत, नियम, तथ्य, कथन, खोज, सूत्र, तकनीकी ज्ञान और जानकारियों के लिए प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। अर्थात प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जैसा की ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि ये सभी आठों बिना प्रमाण के समाज में नहीं स्वीकारे जाते हैं। और न ही ये आठों प्रत्यक्ष अर्थात भौतिक अवस्था में पाए जाते हैं। जिनकी उपस्थिति को हम छूकर, देखकर या सूंघकर ज्ञात कर लेते। इसलिए हम इनकी उपस्थिति की प्रमाणिकता को अपनी समझ को विकसित करके स्वीकारते हैं। जिनमें से साक्ष्य विज्ञान का सबसे कम विश्वसनीय प्रमाण है। क्योंकि प्रमाण के इसी तरीके के उपयोग द्वारा विज्ञान में नए गुणों की खोज को लेकर उदाहरण दिए जाते हैं। भले ही न्यायालय में साक्ष्य को बहुत अहमियत दी जाती हो। परन्तु विज्ञान में साक्ष्य देने का तरीका सबसे कम विश्वास करने योग्य माना जाता है। आप १९८६ की चर्चित फिल्म "एक रुका हुआ फैसला" को देखकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि साक्ष्य को विज्ञान में कम अहमियत क्यों दी जाती है। इस फिल्म में १९ वर्षीय एक लड़के को उसके पिता की हत्या के आरोप में सजा देने से पहले इस केस के पुनः अध्ययन के लिए १२ अलग-अलग पेशे के लोगों को न्यायलय द्वारा कहा जाता है। न्यायलय द्वारा यह शर्त रखी जाती है कि आप सभी १२ लोगों को कसूर या बेक़सूर के लिए एक मत होना पड़ेगा। फिल्म की शुरुआत में ही ११ व्यक्ति एक मत होकर उस लड़के को कसूरवार ठहराते हैं। जबकि शेष एक व्यक्ति की समझ उस हत्या की घटना का स्पष्ट चित्रण बना सकने में असमर्थ थी। इसलिए उस व्यक्ति ने कुछ भी न कह सकने की स्थिति में उस कथन अर्थात वह लड़का कसूरवार है, को नहीं स्वीकारा। निश्चित नहीं होने की स्थिति में उस व्यक्ति ने घटना के पुनः अध्ययन की मांग उठाई। और फ़िल्म के अंत में वह लड़का दोषमुक्त ठहराया गया। जबकि फिल्म में एक से अधिक घटना के साक्षी अर्थात साक्ष्य को गवाह के रूप में दिखाया गया है। तो फिर विज्ञान में साक्ष्य को किस स्थिति में स्वीकारा जाता है ? और किन कारणों से अस्वीकारा जाता है ?

लिखित दस्तावेज साक्ष्य के अंतर्गत रखे जाते हैं।
मैं यहाँ मेरा सबसे पसंदीदा उदाहरण देना चाहूंगा। क्योंकि यह उदाहरण भ्रम की स्थिति को सबके सामने स्पष्ट करता है। क्योंकि इस भ्रम की स्थिति में एक आम व्यक्ति के साथ-साथ एक वैज्ञानिक भी धोका खा जाता है। और यह भ्रम गर्मी के दिनों में रेगिस्तान की मरीचिका के रूप में सामने आता है। यदि हमको उस उलटे दृश्य का कारण स्पष्ट हो जाता है। तब तो हम इस दृश्य को भ्रम कहेंगे अन्यथा हमें उसे वास्तविकता के रूप में स्वीकारना होगा। इसी तरह से ठन्डे प्रदेशों में भी समुद्र में तैरता जहाज या दूर का दृश्य आसमान में उल्टा लटका दिखाई देता है। ठीक इसी तरह से इटली के दक्षिणी किनारे का एक गांव पूरा का पूरा आसमान में उल्टा दिखलाई देता है। यह फैटा मोरगाना कहलाता है। ये तीनों भ्रम प्रकाश के व्यव्हार के कारण दिखाई देते हैं। इसी तरह से एक साक्ष्य (साक्षी) अपनी स्थिति, अवस्था (उम्र) और अपनी ज्ञानेन्द्रियों की सीमा के कारण भ्रमित हो सकता है। भ्रमित होने की सम्भावना के कारण साक्ष्य को विज्ञान में बराबर का प्रमाण नहीं माना जाता। ठीक इसी तरह से एक जादूगर अपनी कला को दिखाकर लोगों को छलता है। जिसे देखकर व्यक्ति आश्चर्यचकित होता है। और विज्ञान इस आश्चर्य में पानी फेर देता है। विज्ञान हमें जादू दिखाता है। और कहता है कि जादू जैसी कोई चीज नहीं होती। परन्तु विज्ञान से अनजान व्यक्तियों के लिए भौतिकी और विज्ञान किसी जादू से कम भी नहीं। क्योंकि उस जादू को आप भी कर सकते हैं। विज्ञान इसी सोच को समाज के लिए आम बनाता है। जादू, जादूगर की सोची-समझी चाल होती है। जिसे आपको फ़साने के लिए बनाया जाता है। हमारे चलने और रुकने के साथ-साथ चन्द्रमा का रुकना और चलना यह भी एक भ्रम है। जिसे तथ्य के रूप में एक वैज्ञानिक भी अनुभव करता है। परन्तु उस वैज्ञानिक की समझ उसे तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं करने देती। अर्थात साक्ष्य को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने के लिए जरुरी है कि प्रस्तुत साक्षी की समझ उस घटना और परिस्थिति दोनों के घटकों की मौजूदगी के प्रति स्पष्ट होनी चाहिए। फिर भले ही वह साक्षी घटना या भौतिकता के उस रूप के कारण की पहचान करने में सक्षम हो चाहे न हो। चाहे वह उस घटना को देखकर आश्चर्य महसूस करता हो या न करता हो। ऐसा साक्ष्य विज्ञान में मान्यता प्राप्त करता है।

संगत परिस्थितियों की पहचान द्वारा (By Relevant Circumstances) : बाकी शेष पांचों तरीके चुनौती भरा दावा पेश करते हैं कि देख लेना उनका प्रस्तुत प्रमाण सिद्ध होगा। अर्थात ये पांचों प्रमाण किसी और के द्वारा सहमति जताने से प्रमाणित नहीं माने जाते। इन प्रमाणों के प्रति हमारी समझ विकसित होनी चाहिए। इसलिए ये प्रमाण अधिक विश्वसनीय होते हैं। जिनमें से सबसे अधिक विश्वसनीय प्रमाण वह माना जाता है। जो भविष्य आधारित होता है। या तो वह भविष्य तय करने में सहायक हो या भविष्य में जाकर प्रमाणित हो। विज्ञान भी दो तरह से भविष्यवाणियाँ करता है। पहली भविष्यवाणी आंकड़ों के आधार पर की जाती है। जबकि दूसरी भविष्यवाणी भविष्य में खोजे जाने वाले भौतिकता के रूपों अथवा उनके गुणों की सम्भावना के लिए की जाती है। पहली भविष्यवाणी गणित आधारित होती है। जबकि दूसरी भविष्वाणी संगत परिस्थितियों की पहचान अर्थात दर्शन आधारित होती है। पहली भविष्यवाणी "सुनिश्चित" जबकि दूसरी भविष्वाणी "निर्धारित" की जाती है। पहली भविष्वाणी समय से लेकर उसकी रूपरेखा तक सभी घटकों को निश्चित करती है। जबकि दूसरी भविष्वाणी भौतिकता के रूपों की खोज होने की सम्भावना को व्यक्त करती है। संगत परिस्थितियों की पहचान द्वारा प्रमाण प्रस्तुत करना अवस्था आधारित प्रमाण प्रस्तुत करना है। कहने का आशय यह है कि जिस किसी विशेष समय या समयांतराल के विषय में प्रमाण दिए गए हैं। उस समय या समयांतराल में किन-किन परिस्थितियों का अस्तित्व संभव था, है या होगा। इन परिस्थितियों का निर्धारण ही प्रमाण को स्वीकारने या न स्वीकारने का आधार बनता है। क्योंकि हम जानते हैं कि परिवर्तन और विकास एक निश्चित क्रम में होता है। भले ही उस प्रक्रिया की दर धीमी या तेज क्यों न हो ! ब्रह्माण्ड की उम्र निर्धारण में सूक्ष्म तरंगो की भूमिका इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। बेशक यह तरीका संभावना आधारित प्रमाण है। परन्तु इसे स्वीकारने का कारण विज्ञान के पास है। इसलिए इस प्रमाण को मान्यता दी जाती है।

प्रयोग तथा तथ्यों के उपयोग द्वारा (By Experiments and Application of Facts) : प्रमाण के इस तरीके में एक पूरी प्रक्रिया कार्य करती है। उद्देश्य से लेकर उपयोगी सामग्री, कार्यविधि, परिणाम और फिर उस परिणाम के निष्कर्ष इसी क्रम में प्रक्रिया में कार्यरत होते हैं। इस प्रक्रिया का हर पहला पद बाद वाले पद का कारण होता हैं। इसलिए इस प्रक्रिया को कभी भी दोहराया जा सकता है। जिसे हम प्रयोग कहते हैं। हमें इस तरीके का ध्यान पूर्वक उपयोग करना चाहिए। क्योंकि जिस तरीके में जितनी अधिक विश्वसनीयता होती है, उसमें उतनी ही अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। एक छोटा सा परिवर्तन भी उसी कार्यविधि का उपयोग करके भिन्न परिणाम देता है। अर्थात इस प्रमाण की अपनी एक सीमा होती है। इस प्रक्रिया का उपयोग सभी जगह (सिद्धांत, नियम, तथ्य, कथन, खोज, सूत्र, तकनीकी ज्ञान और जानकारियोंके लिए) नहीं किया जा सकता। साथ ही इस प्रक्रिया में जो परिणाम निकलते हैं। वे जरुरी नहीं है कि निष्कर्ष से मेल खाते हों ! बेशक प्रयोगों के बारे में यह सही है कि एक ही परिणाम के एक से अधिक निष्कर्ष निकलते या निकाले जाते हैं। अर्थात यह आप पर निर्भर करता है कि आप प्रयोगों के परिणाम का उपयोग किस तरह से करते हैं या किन के हित संवारने में करते हैं। भूतकाल में ऐसे कई उदाहरण प्रसंगों में पढ़ने को मिलते हैं। जो इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि एक ही परिणाम के एक से अधिक निष्कर्ष निकलते या निकाले जाते हैं।

तथ्यों का उपयोग करके अपने दावे को मान्यता दिलाना भी एक तरह का प्रयोग ही है। परन्तु यह ऐसा प्रयोग है जिसको सीधे तरीके से प्रमाणित नहीं किया जा सकता। इसके लिए हम उस प्रक्रिया का उल्टा उपयोग करते हैं। जिसके पहले तक हम प्रक्रिया के दावे को प्रमाणित करके उसका उपयोग करते थे। परन्तु इस प्रक्रिया में हम गणित का उपयोग करके अपने दावे की प्रमाणिकता के लिए दावे को तथ्य मानकर उसका उपयोग अपने किसी उद्देश्य की पूर्ति में करते हैं। यदि हमारा उद्देश्य पूरा होता है तो हम उस दावे को तथ्य की तरह ही स्वीकारते हैं। उदाहरण के लिए हमें इस तथ्य को प्रमाणित करना है कि "पृथ्वी गोल है।" हम इस तथ्य के पक्ष में तर्क दे सकते हैं। परन्तु प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते। तब क्या किया जाए ? प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए हम एक उद्देश बनाते हैं। जिसकी पूर्ति के लिए हम गणित का उपयोग पृथ्वी को गोल मानकर के गोल होने के सूत्रों का उपयोग करके एक उपग्रह को उसकी कक्षा में स्थापित करते हैं। यदि हम अपने मकसद में कामयाब होते हैं। अर्थात माना गया तथ्य वाकई में एक तथ्य ही है।

मापन की वैज्ञानिक कार्यविधि द्वारा (Technique of Experimental Measurements) : प्रमाण देते समय हमें ध्यान रखना चाहिए कि जरुरत पड़ने पर गणित और दर्शन का उपयोग साधन के रूप में किया जाए। दरअसल विज्ञान में गणित और दर्शन से परहेज करने की आवश्यकता ही नहीं है। हम ऐसी बातें इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह तरीका गणित और दर्शन के संयुक्त रूप पर आधारित होता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो यह मापन की उस कार्यविधि पर आधारित है। जिस कार्यविधि का निर्धारण गणित और दर्शन दोनों मिलकर करते हैं। यदि कार्यविधि ही गलत ठहरा दी जाती है। तो मापन का वह मान भी गलत सिद्ध हो जाता है। यानि की मापन का वह मान किसी कार्यविधि द्वारा प्रमाणित माना जाता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से किसी क्वासर या पड़ोसी आकाशगंगा देवयानी की दूरी जिसे प्रकाश वर्ष में मापा जाता है। यानि की प्रकाश द्वारा एक वर्ष में चली गई दूरी, जिसकी गति स्वतंत्र अंतरिक्ष में लगभग तीन लाख किलो मीटर प्रति सेकेण्ड होती है, को मापना है। ध्यान रहे हम दूरी के विषय में बात कर रहे हैं न की विस्थापन के बारे में बात कर रहे हैं। अब आपको मेरे इस कथन से वैज्ञानिक कार्यविधि की उपयोगिता समझ में आ गई होगी कि क्यों किसी भी मापन की माप उसकी कार्यविधि पर आधारित होती है। इस तरह के प्रमाण स्वतंत्र रूप से नहीं स्वीकारें जाते। वे अपने साथ कार्यविधि की शर्तों को हमेशा साथ में लेकर चलते हैं।

तकनीकी विकास द्वारा (By Technical Developments) : प्रमाण प्रस्तुत करते वक्त दावे को सम्बंधित शर्तों के आधार पर लिखा या कहा जाता है। जिससे की दावे की सम्भावना को उन शर्तों के आधार पर परखा जा सके। आइये इस तरीके के उपयोग को भी उदाहरण द्वारा समझ लेते हैं। जब मैं कहता हूँ कि "मनुष्य उड़ सकता है।" तो स्वाभाविक है की समाज मुझसे इस कथन के लिए प्रमाण मांगेगा। तब मुझे इसी तरीके का उपयोग करके प्रमाण देना होगा। बेशक जो लोग मेरे इस कथन "मनुष्य उड़ सकता है", से सहमत नहीं है। वे भी गलत नहीं है। और मैं भी गलत नहीं हूँ। क्योंकि उन्होंने सिर्फ मेरे कथन पर ध्यान दिया। उसकी शर्तों पर ध्यान नहीं दिया। उनका सोचना था कि चूँकि मनुष्यों में पंख अर्थात उड़ने की क्षमता नहीं होती है। इसलिए मनुष्य नही उड़ सकता। परन्तु हम अपने कथनों की प्रमाणिकता तकनीकी विकास करके दे सकते हैं। और हमने आज तकनीकी विकास करके मनुष्य को उड़ने में मदद की है। दरअसल यह तरीका संगत परिस्थितयों की खोज करके प्रस्तुत किया जाता है। जिसे अभी तक समाज के लोगों ने असंगत मान रखा था। इस तरीके का उपयोग करके कथनों की प्रमाणिकता तथ्यों के रूप में की जाती है। और समाज आगे चलकर उन कथनों को तथ्यों का दर्जा दे देता है।

वैकल्पिक व्यवस्था के सुझाव द्वारा (By Substitutional Advisory) : प्रमाण का यह तरीका भी तकनीक से सीधा सम्बन्ध रखता है। परन्तु इस तरीके के उपयोग से न केवल तकनीक विकसित होती है बल्कि तकनीक उन्नत होती है। बेशक विज्ञान का उपयोग ही तकनीक को जन्म देता है। अर्थात मनुष्य की विकसित समझ तकनीक के लिए जरुरी है। जब मनुष्य की सोच इस स्तर तक पहुँच जाती है कि वह संगत परिस्थितियों की पहचान कर उसका उपयोग तंत्र कैसे कार्य करेगा, को समझने लगता है। तब तकनीक विकसित होने में समय नहीं लगता। तब केवल पदार्थ ज्ञान की आवश्यकता शेष बचती है। परन्तु तकनीकी उन्नति के लिए आवश्यक है कि हम तंत्र के नियमों को समझें। जो एक व्यवस्था या निकाय के रूप में कार्य करती है। तकनीकी उन्नति में पहले की तकनीक और उन्नत तकनीक का निष्कर्ष एक समान होता है। परन्तु दक्षता से लेकर पदार्थ और आवश्यक सभी परिणाम भिन्न-भिन्न प्राप्त होते हैं। कहने का आशय है कि हमारे देश की अपनी एक अर्थव्यवस्था है। परन्तु ये देश की सरकार पर निर्भर करता है कि वह उस अर्थव्यवस्था को किस (बंद, खुली या मिश्रित) अर्थव्यवस्था की तरह व्यव्हार में लाना चाहती है ? परन्तु याद रहे सभी अर्थव्यवस्था का एक ही निष्कर्ष निकलता है कि बाजार में मुद्रा का प्रवाह बना रहे। परन्तु सभी अर्थव्यवस्था के भिन्न-भिन्न घटक, अवस्था और परिणाम होते हैं। ये आप पर निर्भर करता है कि आप उसके घटक को अपने नियंत्रण या पक्ष में रखना चाहते हैं। या उसकी अवस्था अर्थात दौर को अपने पक्ष में रखना चाहते हैं। या फिर उस व्यवस्था से किसी विशेष परिणाम अथवा कोई कीर्तिमान स्थापित करना चाहते हैं। इन सबके चुनाव के लिए आप स्वतंत्र होते हैं। ठीक इसी तरह से नई-नई तकनीक का जन्म किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति हेतु होता है। प्रमाण का यह तरीका तकनीक के साथ-साथ किसी भी सामाजिक या आर्थिक व्यवस्था के लिए शत प्रतिशत दक्षता के साथ प्रमाण प्रस्तुत नही सकता। क्योंकि ब्रह्माण्ड जो एक व्यवस्था है उसके किसी भी एक भाग में एक नई पूर्ण व्यवस्था का जन्म कैसे हो सकता है ? हाँ, आंशिक व्यवस्था का जन्म संभव और स्वाभाविक है।

हम सोचते कैसे हैं ?

विज्ञान क्या है ? : यानि की बाजू में रखा मेरा पेन वस्तु है। सामने से गुजरने वाली महिला मनुष्य है। गाना सुनाने वाला उपकरण मशीन (यंत्र) है। मुँह से निकलने वाली वाणी भाषा है। हमारा समाज या देश एक व्यवस्था है। रोड पर बाईं ओर से चलना नियम है। पहचान पत्र के लिए आवेदन करना एक प्रक्रिया है। तो विज्ञान क्या है ? यानि की विज्ञान को किस वर्ग में रखा जाता हैं ? ताकि उसकी प्रकृति को आसानी से जाना और समझा जा सके। याद रहे मैं विज्ञान की परिभाषा नहीं पूँछ रहा हूँ। यदि मैं आपसे विज्ञान की परिभाषा जानना चाहता। तो मेरा आपसे यह प्रश्न होता कि विज्ञान किसे कहते हैं ? विज्ञान एक पद्धति है। घटनाओं और भौतिकता के रूपों को समझने और समझाने की पद्धति। अब आप उस घटना या भौतिकता के रूप को किस युक्ति द्वारा समझते हैं। और अपने उस अनुभव, अनुभूति या युक्ति को लोगों तक कैसे पहुंचाते हैं। ये आप पर निर्भर करता है। इसलिए विज्ञान में किसी भी घटना या भौतिकता के रूपों के विश्लेषण के लिए एक से अधिक कार्यविधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं। और उन्हें मान्यता दी जाती है। तो क्या आप किसी भी घटना अथवा भौतिकता के रूप को देखते से ही पहचान लेते हैं। उसको समझ लेते हैं ! नहीं न, तो अब प्रश्न यह उठता है कि हम घटनाओं अथवा भौतिकता के रूपों को कैसे समझते हैं ? उन्हें किस समझ के साथ स्वीकारते हैं ? उनके प्रति हमारी समझ कैसे विकसित होती है ? किन आधारों पर हम घटनाओं अथवा भौतिकता के रूपों के प्रति अपनी धारणा निर्मित करते हैं ? आइये इन प्रश्नों को समझने की कोशिश करते हैं।

ऐसा नही है कि समझना, जो एक प्रक्रिया है। वह केवल मनुष्यों में ही विकसित हुई है। छुईमुई और घटपर्णी जैसी वनस्पति से लेकर लगभग सभी जीव-जंतुओं में समझने की प्रक्रिया विकसित हुई है। क्योंकि मनुष्यों सहित छुईमुई, घटपर्णी और लगभग सभी जीव-जंतु घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। ध्यान से देखने पर हमें ज्ञात होता है इस प्रतिक्रिया के पीछे एक सोच है। जो मनुष्यों सहित सभी जीव-जंतु और वनस्पतियों में जीवन की उत्पत्ति के समय से ही विकसित हो गई थी। और उस समय इस सोच का मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन था। वास्तव में जीवन की उत्पत्ति का या मानव जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। क्योंकि हम मनुष्य किसी विशेष लक्ष्य के लिए जीवित नहीं हैं। परन्तु उस समय की उस सोच के मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन की आवश्यकता की पूर्ति द्वारा हम में जो विकास हुआ है। वो आज हम सब के सामने है। मानव ने अपने इस विकास से जो अर्जित किया है। वह उसकी अपनी सहजता (परिणाम) है। सहजता को हम मानव के जीवन का उद्देश्य कह सकते हैं। परन्तु वास्तव में मानव जीवन का कोई उद्देश्य नहीं है। विकास के इस क्रम में जो हासिल होता गया। कुछ समय बाद वह आने वाली पीढ़ी के लिए सहज होते गया। आज भी मानव जीवन की सोच का मुख्य आधार भोजन, सुरक्षा और प्रजनन ही है। ठीक है चलो भाई, ये भी मान लिया। परन्तु हम मनुष्य सोचते कैसे हैं ? यह सोच कैसे विकसित हुई ?

सोच कैसे विकसित हुई !
जीवन की उत्पत्ति लगभग १ अरब साल पहले समुद्र में हुई। और जिसका समय के साथ धरातल की ओर रुख होना प्रारम्भ हो गया। इस सुन्दर सी नीली धरती में धरातल परिवर्तन की दर शुरूआती दौर में वर्तमान की अपेक्षा कहीं अधिक थी। बेशक, इस धरातल परिवर्तन ने ही उस सोच को जन्म दिया है। जिसके पीछे का आधार सिर्फ भोजन, सुरक्षा और प्रजनन आज हमको कई रूपों में दिखाई दे रहा है। हम मनुष्यों, जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए कौन-कौन सी चीजें भोज्य पदार्थ के रूप में उपयोगी होगीं ? किन-किन चीजों से सुरक्षित रहने की आवश्यकता है ? और प्रजनन का स्वरुप क्या होगा ? इसको भी पृथ्वी के उस बदलते हुए वातावरण ने ही निर्धारित किया है। परन्तु उस वातावरण ने यह कैसे संभव कर दिखाया है ? इसको जानना भी तो जरुरी है। "पुनरावृत्ति ही वह गुण है जिसने मनुष्यों सहित सभी जीव-जंतुओं और वनस्पतियों में सोचने-समझने के गुण का विकास किया। घटनाओं की पुनरावृत्ति ने भोजन और सुरक्षा के प्रति सोच विकसित की। और परिस्थितियों (वातावरण) की पुनरावृत्ति ने प्रजनन के प्रति सोच विकसित की।" घटनाओं की पुनरावृत्ति ने मनुष्य की सोच में विकास किया। जबकि परिस्थितयों की पुनरावृत्ति ने मनुष्यों के जीवन जीने के तरीके और कार्यशैली को निर्धारित किया। दूसरे शब्दों में मनुष्यों के स्वभाव को निश्चित किया। जहाँ एक तरफ घटनाओं की पुनरावृत्ति ने गुणात्मक विकास में वृद्धि की। वहीं परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने संख्यात्मक विकास के द्वारा मनुष्यों को सहज बनाया। आज हम इस कार्य प्रणाली को समझ पाए हैं। तो इसके पीछे का कारण वर्तमान में हमारी सोच के विकसित होने के प्रक्रिया को पहचान पाना है। वर्तमान में भी हम मनुष्य कुछ इसी तरह से अपनी सोच विकसित करते हैं।

जब कभी आदि-मानव (होमो इरेक्टस / होमो एर्गेस्टर) ने प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न आग को जलते देखा होगा। और उनमें से कोई मनुष्य आग के प्रभाव में आ गया होगा। तब भी मनुष्य की सोच विकसित नही हो पाई होगी। केवल आग से भय पैदा हुआ होगा। परन्तु जब उन्ही कुछ आदि-मानव के सामने इस घटना का दोहराव हुआ होगा। तब उस आग से झुलस जाने की वजह ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। आग के फैलने की प्रकृति ने सुरक्षा के प्रति एक समझ विकसित की होगी। याद रहे उस समय जो समझ विकसित हो रही थी। वह शुरुआती समझ थी। जो आज की परिपक्व समझ की तरह नहीं थी। वह समझ एक नई सोच को जन्म नही दे सकती थी। समय के साथ आदि-मानव की यह समझ एक प्रक्रिया के तहत आज की समझ के समरूप विकसित हुई। फलस्वरूप एक समय जिस आग ने आदि-मानव के मन में डर पैदा किया था। कुछ समय बाद वही मानव उस प्रक्रिया द्वारा विकसित समझ के प्रयोग से आग का उपयोग भोजन के लिए कर रहा था। और यह प्रक्रिया तीन चरणों में पूर्ण होती है। "माना, समझा और जाना" ये तीनों क्रियाओं के क्रम ने मनुष्यों की समझ को आज बहुत ऊँचे पायदान में पहुंचा दिया है। मनुष्य की समझ आज कई मायनों में बहुत अधिक विकसित हो गई है। यहीं देख लो न, जिस सोच से हमारी वर्तमान की समझ विकसित हुई है। आज हम उसी सोच को समझने का प्रयास कर रहे हैं। प्रारंभिक समझ एक ऐसी अपरिपक्व समझ थी। जिसे उस समय के आदि-मानव ने एक घटना "माना"। जिससे की उस आधार पर एक समझ विकसित (हुई) हो सके। और इस प्रकार उस आदि-मानव ने घटना के घटकों को जाना। घटना की पुनः पुनरावृत्ति होने पर उस घटना की पहचान पुनः "माना" क्रिया के साथ शुरू हुई। घटना के घटकों में थोड़े से परिवर्तन ने भी मनुष्य की समझ को बदला। तब एक बार फिर मनुष्य घटना के नए घटकों को जान पाया। यह क्रम आज भी इसी तरह से चला आ रहा है। और हमारी समझ विकसित हो रही है। याद रहे घटना की पुनरावृत्ति के शुरुआत में हम जिस समझ को आधार "मानकर" चलते हैं। वह मानी गई समझ पिछली सारी समझ से अधिक विकसित होती है। अर्थात प्रत्येक "मानना" अपने आप में एक दूसरे से भिन्न होता है।

जैसा की आपने देखा कि किस तरह से आदि-मानवों में घटना की पुनरावृत्ति के कारण भोजन और सुरक्षा के प्रति सोच विकसित हुई। ठीक उसी तरह से परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने प्रजनन के प्रति हमारी सोच विकसित की। जब बाह्य कारकों के प्रति मनुष्य सहज होता गया। तब उसे आंतरिक कारकों ने सोचने पर मजबूर किया। परिस्थितियों की पुनरावृत्ति ने समाज और सभ्यता के विकास में योगदान दिया। मनुष्य जिस वातावरण के संपर्क में आता गया। उसे अपने अनुकूल बनाता गया या वह उस वातावरण के अनुकूल होते गया। जहाँ एक तरफ घटनाओं की पुनरावृत्ति ने मनुष्य के दिमाग को अस्थिर किया। वहीं परिस्थितयों की पुनरावृत्ति ने दिमाग की स्थिरता को सहजता में बदला। तब जाकर मनुष्यों में आपसी निर्भरता की समझ विकसित हुई। परिस्थितियों की पुनरावृत्ति का आशय वातावरण या भौतिकता के रूपों के उस दृश्य के सामने आ जाने से है। जिसको इससे पहले एक या दो बार ही देखा गया था। ये क्या है ? ये यहाँ क्यों है ? ऐं, तुम कौन हो ? और तुम ? तुम एक जैसे हो ! नहीं, तुम दोनों एक जैसे हो ! नहीं, हम सब एक "जैसे" हैं ? जैसे ? बराबर ? समान ? थोड़ा अलग ? फ़र्क ? भिन्न ? अज्ञात ? इन छोटे-छोटे समझ विकसित करने वाले प्रश्नों ने ही जो आज हमें बेवाकूफी वाले प्रश्न लगते हैं, ने ही हमारी सोच विकसित की है। एक सोच जिसे हमने एक विशेष दर्जा दे रखा है। उस वैज्ञानिक सोच की नींव कुछ शताब्दी वर्ष पूर्व की नहीं बल्कि उन आदि-मानवों ने आग की खोज करने के साथ ही रख दी गई थी। जिसमें आज कई फ्लैट्स एक साथ भिन्न-भिन्न माले में बनाए जा रहे हैं। एक साधारण सोच एक वैज्ञानिक सोच से सिर्फ इस बिंदु को लेकर पिछड़ जाती है। क्योंकि वह सम्भावना पर आधारित होती है। जबकि एक वैज्ञानिक सोच घटना के अनुभव, करंट की अनुभूति और कारण को पहचानने की युक्ति से परिपूर्ण होती है। इसलिए एक वैज्ञानिक सोच समाज के लिए विश्वसनीय है। ऐसा नहीं है कि एक साधारण सोच हमेशा गलत होगी। अरे भाई, किसी घटना के घटित होने की सम्भावना शत-प्रतिशत भी तो हो सकती है।

विज्ञान के अनुप्रयोग

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का मुम्बई अधिवेशन समाप्त हुआ ही था कि विज्ञान के जानकारों ने अधिवेशन की चर्चाओं में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया। कुछ ही समय बाद यह सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बन गया। मजेदार बात यह है कि सोशल मीडिया के जिस किसी प्लेटफार्म में यह मंथन का विषय बनने को होता ही था कि लोग चर्चा से कन्नी काटने लगते। चर्चा में शामिल होने के बाद भी लोग चर्चा से धीरे-धीरे दूर जा रहे थे। न केवल इसलिए कि उनके पास समय का आभाव था। और न केवल इसलिए कि उनके पास अपने ही कथनों को लेकर तर्कों का आभाव था। बल्कि चर्चा से दूर होने का कारण अपनी छवि को साफ़-सुथरा दिखाना था। कुछ लोग तो चर्चा में शामिल होते और उगल कर चले जाते। किसी को विज्ञान के अनुप्रयोगों का ख्याल तक नहीं आया। न ही अपने कथन के लिए तर्क देने की आवश्यकता को लेकर और न ही इस ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए कि "विज्ञान की चर्चाओं में शामिल होने वाले किसी भी जानकार की छवि धूमिल नहीं होती है।" अधिवेशन की चर्चा का विषय था कि "क्या भारत में सचमुच हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे ?" आज का लेख न तो इस कथन का खंडन करता है कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे और न ही इस कथन के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध कराता है कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे। आज का लेख विज्ञान के अनुप्रयोगों का उपयोग करना सिखाता है।


सोशल मीडिया के जिस किसी प्लेटफार्म में कोई व्यक्ति अपनी बात कहता। उसी समय अन्य दूसरा व्यक्ति उससे प्रमाण मांग लेता। प्रमाण विज्ञान का पहला अनुप्रयोग है। जिसका उपयोग प्रमाण मांगने वाला जानकार भली-भांति करता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बिंदु यह है कि "साक्ष्य, प्रमाण का एक रूप है। बिना साक्ष्य (Evidence) के भी तथ्य, नियम और सिद्धांत प्रमाणित किए जा सकते हैं। आवश्यकता है तो अपनी सोच को विकसित करने की। ताकि हम सामने वाले के दावे की प्रमाणिकता को समझ सकें और उसे स्वीकार सकें।" जैसे ही चर्चा आगे बढ़ी। वैसे ही हमारा यह भ्रम टूट गया कि प्रमाण मांगने वाला जानकार विज्ञान के अनुप्रयोगों का भली-भांति प्रयोग कर रहा है। क्योंकि वह जानकार प्रमाण के केवल एक ही रूप से परिचित था। और वह केवल साक्ष्य के रूप में प्रमाण चाहता था। वह इस बात को भूल गया था कि साक्ष्य के आलावा भी प्रमाण देने के कई साधन है। जानकारी, तथ्य, नियम और सिद्धांतों के प्रमाण अलग-अलग प्रकार से अलग-अलग साधनों के द्वारा दिए जाते हैं। साक्ष्य के अलावा संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व, तथ्यों के उपयोग, मापन की वैज्ञानिक विधि, तकनीकी विकास और वैकल्पिक व्यवस्थाओं का सुझाव देकर भी प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं।

चर्चा की इस स्थिति में अब वर्गीकरण की आवश्यकता जान पड़ती है। वर्गीकरण उन बिन्दुओं के आधार पर किया जाता है, जिससे की चर्चा के प्रति समझ विकसित हो सकते। और हम जान सकें कि विषय "क्या हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे ?" मात्र एक जानकारी है ? / तथ्य है ? / किसी तरह का नियम है ? / या फिर कोई सिद्धांत तो नहीं है ? हमारी समझ कथन अथवा चर्चा के विषय को एक जानकारी मानती है। और इसकी प्रमाणिकता के लिए "संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व और तकनीकी विकास" जैसे दो ही साधन उपलबध हैं। जो इस जानकारी को प्रमाणित कर सकते हैं कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे। और जो जानकार इस कथन के खंडन को प्रमाणित करना चाहता है। उसके पास केवल एक ही साधन ("संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व") उपलब्ध है। जिसका उपयोग वह कथन के खंडन में कर सकता है। यानि कि कथन की प्रमाणिकता के लिए ऐसे प्रमाण (संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व के रूप में) चाहिए। जो यह कहता हो कि उस समय मनुष्य इतना विकसित हो गया था कि वह उस विमान की तकनीक को समझता था। या उस तकनीक की लिखित क्रियाविधि प्राप्त हो जाए। या फिर उस विमान की कार्यक्षमता या विशेषता का पता चले। जिसे अभी तक विकसित नहीं किया गया हो। और जिसकी सैद्धांतिक सम्भावना हो। तब ऐसे प्रमाण को मान्यता दी जा सकती है।

तार्किक अभियोग्यता (Reasoning) में जब कथन और निष्कर्ष को पढ़ाया जाता है। तब किन्ही दो वस्तुओं के आंशिक या पूर्ण सम्बन्ध (Partial Relations) के बारे में "निश्चित तौर" पर कुछ न कह सकने की स्थिति में कथन को अस्वीकार किया जाता है। परन्तु दूसरी और "सम्भावना" की स्थिति में वही कथन स्वीकार किया जाता है। याद रहे तार्किक अभियोग्यता की यह विधि संबंध आधारित विधि है। न कि भाषा आधारित विधि है। और कुछ न कह पाने की स्थिति में कथन को अस्वीकार किया जाता है।
एक प्रश्न जो मन में उठा है कि अभी तक तो किसी भी जानकारी, तथ्य, नियम और सिद्धांत की प्रमाणिकता उस विषय का विशेषज्ञ करता था। और यह समाज विशेषज्ञ के उस निर्णय को मान्यता भी देता था। क्योंकि विशेषज्ञ के पास निर्णय को स्वीकारने के लिए कुछ न कुछ आधार होते हैं। इस मुद्दे में भी यही तो हुआ है न ?
चलो मान के चलते हैं कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस की चर्चा में भाग लेने वाले विशेषज्ञ भटक गए हैं। या विज्ञान को समझने में असमर्थ हैं। वास्तविकता और कल्पना में भेद नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। तो अब प्रश्न उठता है कि हम तो वास्तविकता और कल्पना में भेद कर पा रहे हैं। हम तो भ्रमित नहीं हुए हैं। तो फिर हमारे पास उनके भ्रमित होने का कारण भी होगा। तो फिर हम उस भ्रम को क्यों दूर नहीं करते हैं ? या फिर उन्हें हंसी का पात्र बनाए रखना चाहते हैं। क्योंकि हम सब तो व्यस्त आदमी रहे। अपने दैनिक जीवन में व्यस्त रहते हैं। अपने व्यक्तिगत शोधकार्यों में व्यस्त रहते हैं। आदि-आदि...

दरअसल ऐसी बात करने के पीछे भी एक कारण है कि बचपन में रेगिस्तान की मरीचिका को जब भ्रम बताया जाता है। तब विज्ञान के एक सिद्धांत से हमें अवगत कराया जाता है। आखिर हम उस चीज को भ्रम कैसे कह सकते हैं ? जिसे देखने पर हर व्यक्ति वैसी ही प्रतिक्रिया देता है जैसा कि एक वैज्ञानिक देता है। एक वैज्ञानिक भी उस परिस्थिति में वही देखता है जो एक सामान्य मनुष्य देखता है। क्योंकि उन सभी को एक समान परिदृश्य दिख रहा है। उन सब की नज़र एक ही ओर है। भौतिकी उन लोगों में भेद नहीं कर पा रही है। जो उस परिदृश्य को देख रहे हैं। फिर विज्ञान का वह सिद्धांत कहता है कि यदि आप वास्तविकता और भ्रम में भेद के साथ-साथ उसके कारण को ढूंढ पा रहे हैं। तब तो आप वाकई में इतनी देर से भ्रमित हो रहे थे। क्योंकि उस कारण के जरिये आप उन लोगों को वास्तविकता से परिचित करा सकते हैं। जिसे लोग अब भी वास्तविकता मान रहे हैं। आप उनकी समझ को उस कारण के उपयोग से परिवर्तित कर सकते हैं। यह विज्ञान है।

मैं यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूँ। विज्ञान केवल तथ्यों का जमावाड़ा नहीं है। और न ही सिर्फ भौतिकी का दूसरा नाम विज्ञान है। विज्ञान मनुष्य की सोच को विकसित करता है। जिससे कि जिनका अस्तित्व हो ! उन भौतिकता के रूपों को स्वीकारा जा सके। संगत रूप से जो अस्तित्व रखते रहे हों ! और जिनको हम निर्मित कर सकते हों ! उनका सैद्धांतिक निर्धारण हो सके।

जो व्यक्ति पुष्पक विमान जैसे मिथकों को लेकर प्रमाण मांगते हैं। वे भी गलत नहीं हैं। परन्तु उनकी मंशा समाज और विज्ञान दोनों के लिए खतरनाक है। क्योंकि वे विज्ञान के जिस कूट-करण सिद्धांत का उपयोग करते हुए, अपनी बात कहते हैं। वे नहीं जानते हैं कि आखिर कूट-करण सिद्धांत कहता क्या है ? उस सिद्धांत का विज्ञान में क्या महत्व है ? क्या भौतिकी के नियमों की प्रमाणिकता में यह सिद्धांत लागू होता है ? इस सिद्धांत की सीमा कहाँ तक है ? बेशक वे लोग सिद्धांत का अनुप्रयोग करते हैं। परन्तु विज्ञान के प्रति उनकी समझ तथ्यों तक ही सीमित रहती है। वास्तव में वे विज्ञान को समझते नहीं हैं। सिर्फ उसे जानते हैं।
कूटकरण सिद्धांत के अनुसार किसी भी नियम या सिद्धांत को सहमति और अवलोकन के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। परन्तु अवलोकन के आधार पर बनी असहमति के द्वारा अमान्य घोषित जरुर किया जा सकता है।
जब तक इस कथन की प्रमाणिकता सत्यापन या खंडन के रूप में नहीं हो जाती है। तब तक यह चर्चा चलती रहेगी। तार्किक अभियोग्यता जिस क्रियाविधि का उपयोग करती है उस क्रियाविधि में सम्भावना की स्थिति में कथन को स्वीकार करती है। और "निश्चित तौर" पर यह कथन कुछ भी न कह सकने की स्थिति में अस्वीकार किया जाता है। यदि इस कथन के लिए कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होते हैं। तो बेशक यह कथन विज्ञान में स्वीकार करने योग्य नही है। परन्तु यह चर्चा और कथन दोनों ही समाज और विज्ञान के विकास के लिए आवश्यक है। चर्चा या कथन को समाज या विज्ञान के लिए भ्रम कहना गलत होगा। समाज और विज्ञान इसी तरह विकसित होते हैं। भ्रम कहकर इस पर प्रतिबन्ध लगाना। समाज और विज्ञान को लंगड़ा बनाना है। जिसका अस्तित्व तो होगा। पर वह चल नहीं सकेगा। और कुछ समय बाद विज्ञान धर्म बन जाएगा। वैसे कहा भी जाता है कि एक विकसित स्थिर सभ्यता का विज्ञान ही उसका धर्म होता है।

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