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विज्ञान के अनुप्रयोग

भारतीय विज्ञान कांग्रेस का मुम्बई अधिवेशन समाप्त हुआ ही था कि विज्ञान के जानकारों ने अधिवेशन की चर्चाओं में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया। कुछ ही समय बाद यह सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बन गया। मजेदार बात यह है कि सोशल मीडिया के जिस किसी प्लेटफार्म में यह मंथन का विषय बनने को होता ही था कि लोग चर्चा से कन्नी काटने लगते। चर्चा में शामिल होने के बाद भी लोग चर्चा से धीरे-धीरे दूर जा रहे थे। न केवल इसलिए कि उनके पास समय का आभाव था। और न केवल इसलिए कि उनके पास अपने ही कथनों को लेकर तर्कों का आभाव था। बल्कि चर्चा से दूर होने का कारण अपनी छवि को साफ़-सुथरा दिखाना था। कुछ लोग तो चर्चा में शामिल होते और उगल कर चले जाते। किसी को विज्ञान के अनुप्रयोगों का ख्याल तक नहीं आया। न ही अपने कथन के लिए तर्क देने की आवश्यकता को लेकर और न ही इस ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए कि "विज्ञान की चर्चाओं में शामिल होने वाले किसी भी जानकार की छवि धूमिल नहीं होती है।" अधिवेशन की चर्चा का विषय था कि "क्या भारत में सचमुच हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे ?" आज का लेख न तो इस कथन का खंडन करता है कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे और न ही इस कथन के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध कराता है कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे। आज का लेख विज्ञान के अनुप्रयोगों का उपयोग करना सिखाता है।


सोशल मीडिया के जिस किसी प्लेटफार्म में कोई व्यक्ति अपनी बात कहता। उसी समय अन्य दूसरा व्यक्ति उससे प्रमाण मांग लेता। प्रमाण विज्ञान का पहला अनुप्रयोग है। जिसका उपयोग प्रमाण मांगने वाला जानकार भली-भांति करता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बिंदु यह है कि "साक्ष्य, प्रमाण का एक रूप है। बिना साक्ष्य (Evidence) के भी तथ्य, नियम और सिद्धांत प्रमाणित किए जा सकते हैं। आवश्यकता है तो अपनी सोच को विकसित करने की। ताकि हम सामने वाले के दावे की प्रमाणिकता को समझ सकें और उसे स्वीकार सकें।" जैसे ही चर्चा आगे बढ़ी। वैसे ही हमारा यह भ्रम टूट गया कि प्रमाण मांगने वाला जानकार विज्ञान के अनुप्रयोगों का भली-भांति प्रयोग कर रहा है। क्योंकि वह जानकार प्रमाण के केवल एक ही रूप से परिचित था। और वह केवल साक्ष्य के रूप में प्रमाण चाहता था। वह इस बात को भूल गया था कि साक्ष्य के आलावा भी प्रमाण देने के कई साधन है। जानकारी, तथ्य, नियम और सिद्धांतों के प्रमाण अलग-अलग प्रकार से अलग-अलग साधनों के द्वारा दिए जाते हैं। साक्ष्य के अलावा संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व, तथ्यों के उपयोग, मापन की वैज्ञानिक विधि, तकनीकी विकास और वैकल्पिक व्यवस्थाओं का सुझाव देकर भी प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं।

चर्चा की इस स्थिति में अब वर्गीकरण की आवश्यकता जान पड़ती है। वर्गीकरण उन बिन्दुओं के आधार पर किया जाता है, जिससे की चर्चा के प्रति समझ विकसित हो सकते। और हम जान सकें कि विषय "क्या हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे ?" मात्र एक जानकारी है ? / तथ्य है ? / किसी तरह का नियम है ? / या फिर कोई सिद्धांत तो नहीं है ? हमारी समझ कथन अथवा चर्चा के विषय को एक जानकारी मानती है। और इसकी प्रमाणिकता के लिए "संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व और तकनीकी विकास" जैसे दो ही साधन उपलबध हैं। जो इस जानकारी को प्रमाणित कर सकते हैं कि हजारों वर्ष पहले विमान उड़ा करते थे। और जो जानकार इस कथन के खंडन को प्रमाणित करना चाहता है। उसके पास केवल एक ही साधन ("संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व") उपलब्ध है। जिसका उपयोग वह कथन के खंडन में कर सकता है। यानि कि कथन की प्रमाणिकता के लिए ऐसे प्रमाण (संगत परिस्थितिओं के अस्तित्व के रूप में) चाहिए। जो यह कहता हो कि उस समय मनुष्य इतना विकसित हो गया था कि वह उस विमान की तकनीक को समझता था। या उस तकनीक की लिखित क्रियाविधि प्राप्त हो जाए। या फिर उस विमान की कार्यक्षमता या विशेषता का पता चले। जिसे अभी तक विकसित नहीं किया गया हो। और जिसकी सैद्धांतिक सम्भावना हो। तब ऐसे प्रमाण को मान्यता दी जा सकती है।

तार्किक अभियोग्यता (Reasoning) में जब कथन और निष्कर्ष को पढ़ाया जाता है। तब किन्ही दो वस्तुओं के आंशिक या पूर्ण सम्बन्ध (Partial Relations) के बारे में "निश्चित तौर" पर कुछ न कह सकने की स्थिति में कथन को अस्वीकार किया जाता है। परन्तु दूसरी और "सम्भावना" की स्थिति में वही कथन स्वीकार किया जाता है। याद रहे तार्किक अभियोग्यता की यह विधि संबंध आधारित विधि है। न कि भाषा आधारित विधि है। और कुछ न कह पाने की स्थिति में कथन को अस्वीकार किया जाता है।
एक प्रश्न जो मन में उठा है कि अभी तक तो किसी भी जानकारी, तथ्य, नियम और सिद्धांत की प्रमाणिकता उस विषय का विशेषज्ञ करता था। और यह समाज विशेषज्ञ के उस निर्णय को मान्यता भी देता था। क्योंकि विशेषज्ञ के पास निर्णय को स्वीकारने के लिए कुछ न कुछ आधार होते हैं। इस मुद्दे में भी यही तो हुआ है न ?
चलो मान के चलते हैं कि भारतीय विज्ञान कांग्रेस की चर्चा में भाग लेने वाले विशेषज्ञ भटक गए हैं। या विज्ञान को समझने में असमर्थ हैं। वास्तविकता और कल्पना में भेद नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि उनके पास कोई प्रमाण नहीं है। तो अब प्रश्न उठता है कि हम तो वास्तविकता और कल्पना में भेद कर पा रहे हैं। हम तो भ्रमित नहीं हुए हैं। तो फिर हमारे पास उनके भ्रमित होने का कारण भी होगा। तो फिर हम उस भ्रम को क्यों दूर नहीं करते हैं ? या फिर उन्हें हंसी का पात्र बनाए रखना चाहते हैं। क्योंकि हम सब तो व्यस्त आदमी रहे। अपने दैनिक जीवन में व्यस्त रहते हैं। अपने व्यक्तिगत शोधकार्यों में व्यस्त रहते हैं। आदि-आदि...

दरअसल ऐसी बात करने के पीछे भी एक कारण है कि बचपन में रेगिस्तान की मरीचिका को जब भ्रम बताया जाता है। तब विज्ञान के एक सिद्धांत से हमें अवगत कराया जाता है। आखिर हम उस चीज को भ्रम कैसे कह सकते हैं ? जिसे देखने पर हर व्यक्ति वैसी ही प्रतिक्रिया देता है जैसा कि एक वैज्ञानिक देता है। एक वैज्ञानिक भी उस परिस्थिति में वही देखता है जो एक सामान्य मनुष्य देखता है। क्योंकि उन सभी को एक समान परिदृश्य दिख रहा है। उन सब की नज़र एक ही ओर है। भौतिकी उन लोगों में भेद नहीं कर पा रही है। जो उस परिदृश्य को देख रहे हैं। फिर विज्ञान का वह सिद्धांत कहता है कि यदि आप वास्तविकता और भ्रम में भेद के साथ-साथ उसके कारण को ढूंढ पा रहे हैं। तब तो आप वाकई में इतनी देर से भ्रमित हो रहे थे। क्योंकि उस कारण के जरिये आप उन लोगों को वास्तविकता से परिचित करा सकते हैं। जिसे लोग अब भी वास्तविकता मान रहे हैं। आप उनकी समझ को उस कारण के उपयोग से परिवर्तित कर सकते हैं। यह विज्ञान है।

मैं यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूँ। विज्ञान केवल तथ्यों का जमावाड़ा नहीं है। और न ही सिर्फ भौतिकी का दूसरा नाम विज्ञान है। विज्ञान मनुष्य की सोच को विकसित करता है। जिससे कि जिनका अस्तित्व हो ! उन भौतिकता के रूपों को स्वीकारा जा सके। संगत रूप से जो अस्तित्व रखते रहे हों ! और जिनको हम निर्मित कर सकते हों ! उनका सैद्धांतिक निर्धारण हो सके।

जो व्यक्ति पुष्पक विमान जैसे मिथकों को लेकर प्रमाण मांगते हैं। वे भी गलत नहीं हैं। परन्तु उनकी मंशा समाज और विज्ञान दोनों के लिए खतरनाक है। क्योंकि वे विज्ञान के जिस कूट-करण सिद्धांत का उपयोग करते हुए, अपनी बात कहते हैं। वे नहीं जानते हैं कि आखिर कूट-करण सिद्धांत कहता क्या है ? उस सिद्धांत का विज्ञान में क्या महत्व है ? क्या भौतिकी के नियमों की प्रमाणिकता में यह सिद्धांत लागू होता है ? इस सिद्धांत की सीमा कहाँ तक है ? बेशक वे लोग सिद्धांत का अनुप्रयोग करते हैं। परन्तु विज्ञान के प्रति उनकी समझ तथ्यों तक ही सीमित रहती है। वास्तव में वे विज्ञान को समझते नहीं हैं। सिर्फ उसे जानते हैं।
कूटकरण सिद्धांत के अनुसार किसी भी नियम या सिद्धांत को सहमति और अवलोकन के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। परन्तु अवलोकन के आधार पर बनी असहमति के द्वारा अमान्य घोषित जरुर किया जा सकता है।
जब तक इस कथन की प्रमाणिकता सत्यापन या खंडन के रूप में नहीं हो जाती है। तब तक यह चर्चा चलती रहेगी। तार्किक अभियोग्यता जिस क्रियाविधि का उपयोग करती है उस क्रियाविधि में सम्भावना की स्थिति में कथन को स्वीकार करती है। और "निश्चित तौर" पर यह कथन कुछ भी न कह सकने की स्थिति में अस्वीकार किया जाता है। यदि इस कथन के लिए कोई प्रमाण प्राप्त नहीं होते हैं। तो बेशक यह कथन विज्ञान में स्वीकार करने योग्य नही है। परन्तु यह चर्चा और कथन दोनों ही समाज और विज्ञान के विकास के लिए आवश्यक है। चर्चा या कथन को समाज या विज्ञान के लिए भ्रम कहना गलत होगा। समाज और विज्ञान इसी तरह विकसित होते हैं। भ्रम कहकर इस पर प्रतिबन्ध लगाना। समाज और विज्ञान को लंगड़ा बनाना है। जिसका अस्तित्व तो होगा। पर वह चल नहीं सकेगा। और कुछ समय बाद विज्ञान धर्म बन जाएगा। वैसे कहा भी जाता है कि एक विकसित स्थिर सभ्यता का विज्ञान ही उसका धर्म होता है।

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