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विज्ञान का स्वरूप

ज्ञान और विज्ञान में सिर्फ इतना सा फर्क है कि ज्ञान हमें सिद्धांत, नियम, तथ्य अथवा जानकारी के रूप में ज्ञात होता है। जबकि विज्ञान उस ज्ञात ज्ञान तक पहुँचने का माध्यम है। अर्थात किसी भी ज्ञान तक पहुंचने की पद्धति का ज्ञान विज्ञान कहलाता हैं। "स्वाभाविक रूप से विज्ञान, ज्ञान का एक विशेष रूप है। जिसकी सहायता से एक वैज्ञानिक अथवा एक खोजी प्रवृत्ति का व्यक्ति सिद्धांत, नियम, तथ्य अथवा सम्बंधित जानकारी तक पहुँचता है। और जब वह व्यक्ति खोजे गए ज्ञान को उस पद्धति के ज्ञान के साथ समाज के सामने रखता है। जिससे की सम्बंधित पद्धति के ज्ञान से पुनः खोजे गए ज्ञान तक पहुंचा जा सके। तो उसे विज्ञान कहा जाता है।" विज्ञान के इसी प्रकार्य (Function) के कारण विज्ञान को विशिष्ट ज्ञान का दर्जा दिया जाता है। जब कोई वैज्ञानिक अथवा एक खोजी प्रवृत्ति का व्यक्ति विज्ञान के अनुप्रयोगों का उपयोग करके ज्ञान के जिस रूप को प्राप्त करता है। ज्ञान का वह रूप वैज्ञानिक गुणों से परिपूर्ण कहलाने लगता है। उदाहरण के लिए ज्ञान का वह रूप वैज्ञानिक अर्थात वैज्ञानिक सिद्धांत, वैज्ञानिक नियम, वैज्ञानिक तथ्य अथवा वैज्ञानिक जानकारी कहलाने लगता हैं। जैसा की पृथ्वी गिने-चुने परमाणवीय कणों (इलेक्ट्रान, प्रोटोन और न्यूट्रॉन) से मिलकर बनी है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। जबकि पूर्व मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी पांच महाभूत तत्वों (भूमि, गगन, वायु, अग्नि और पानी) से मिलकर बनी हुई है। बेशक यह भी एक तथ्य है। परन्तु यह एक वैज्ञानिक तथ्य नहीं है।


सिद्धांत, नियम, तथ्य अथवा जानकारी ज्ञान के चार रूप हैं। जबकि "सैद्धांतिक प्रकरण" और "व्यवहारिक प्रकरण" ज्ञान के दो प्रकार हैं। सिद्धांत ज्ञान का एक मात्र ऐसा रूप है, जो सैद्धांतिक प्रकरण के अंतर्गत रखा जाता है। जबकि नियम, तथ्य और जानकारी ज्ञान के ऐसे तीन रूप हैं जो व्यवहारिक प्रकरण के अंतर्गत रखे जाते हैं। कुछ विशेषज्ञों का ये भी मानना है कि ज्ञान का पहला प्रकार "सैद्धांतिक प्रकरण" दूसरे प्रकार "व्यवहारिक प्रकरण" से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। परन्तु हमारा ऐसा सोचना गलत होगा। क्योंकि ज्ञान के ये दोनों प्रकार स्वतंत्र रूप से मानव जाति को संतुष्ट नहीं कर सकते। इसलिए समस्त मानव जाति ज्ञान के दोनों प्रकार का उपयोग एक दूसरे के सहयोगी विषय के रूप में करती है। समस्त मानव जाति स्वयं के विकास के लिए ज्ञान के दोनों प्रकार के मध्य स्थापित गहरे सम्बन्ध का उपयोग करती है। और यह सम्बन्ध कुछ इस तरह से परिभाषित होता है। "जहाँ एक तरफ सैद्धांतिक प्रकरण, प्रायोगिक प्रकरण को सत्यापित करता है। और वहीं दूसरी तरफ प्रायोगिक प्रकरण, सैद्धांतिक प्रकरण को प्रमाणित करता है।" ध्यान रहे प्रायोगिक प्रकरण, व्यवहारिक प्रकरण का एक अंग है। जो नियम आधारित ज्ञान का एक रूप है।

वैज्ञानिक सिद्धांत : विज्ञान के अनुप्रयोगों (Applications) का उपयोग करके जिन सिद्धांतों का ज्ञान मानव जाति को होता है। वे सभी सिद्धांत वैज्ञानिक सिद्धांत कहलाते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांत के लिए यह जरुरी नहीं है कि वह भौतिकी, रसायनिकी या जैविकी का ही सिद्धांत हो ! प्रकृति का अपना एक सिद्धांत है जिसके अनुसार वह चीजों में भेद नहीं करती है। और जो भेद हमको दिखलाई देता है वह उसका व्यव्हार कहलाता है। प्रकृति के इस सिद्धांत को जानने और समझने के लिए हम जिस सिद्धांत का उपयोग करते हैं। वह वैज्ञानिक सिद्धांत कहलाता है। क्योंकि इस सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड की अवस्था परिवर्तन से निर्मित व्यवस्था प्रकृति कहलाती है। जो हर समय स्वयं को एक व्यवस्था के रूप में परिभाषित करती है। अर्थात वह चीजों में भेद नहीं कर सकती। मानव जाति कुछ इसी तरह से प्रकृति, दर्शन, धर्म, संविधान और अध्यात्म के सिद्धांतो को वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा निर्धारित करती है। जब दर्शन, धर्म, संविधान और अध्यात्म के सिद्धांतो को वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा निर्धारित किया जा रहा होता है। तब वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा धर्म, दर्शन, संविधान, अध्यात्म और भौतिकता के रूपों की प्रकृति और उसके व्यवहार को पहले से ही जान लिया जाता है। उदाहरण के लिए "आग चीजों को जलाती है, यह उसका स्वभाव (Nature) है। परन्तु पानी के संपर्क में आने से वह बुझ जाती है, यह उसका व्यव्हार (Behavior) है।" ठीक इसी तरह से प्रकाश सरल रेखा में गति करता है। यह उसकी प्रकृति है। जबकि परावर्तन, अपवर्तन, वर्ण-विक्षेपण, विवर्तन, व्यतिकरण, ध्रुवण, प्रकाश का विद्युत प्रभाव और चुंबकीय प्रभाव जिसके कारण प्रकाश का मार्ग विक्षेपित होता है, प्रकाश का व्यवहार कहलाता है। जो सदैव संरचना आधारित होता है। वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा न सिर्फ प्रकृति और उसके व्यव्हार के भेद को जाना जाता है। बल्कि साथ ही प्रयोगों के परिणाम से निष्कर्ष निकाले जाते हैं। जिससे की उस विषय-वस्तु के प्रति मनुष्य की समझ विकसित हो सके। और प्रयोग सत्यापित कहलाएँ।

वैज्ञानिक नियम : वैज्ञानिक सिद्धांतों की तरह ही वैज्ञानिक नियमों को भी विज्ञान के अनुप्रयोगों के उपयोग द्वारा जाना जा सकता है। परन्तु वैज्ञानिक नियमों का उपयोग किसी विशेष मान को सुनिश्चित करने के लिए होता है। जबकि वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग निष्कर्षों को निर्धारित करने में होता है। अर्थात वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियाँ कुछ इस तरह से की जाती हैं कि "एक दिन मानव जाति गुरुत्वीय तरंगों और श्याम पदार्थ को खोज लेगी।" जबकि वैज्ञानिक नियमों के द्वारा की जाने वाली भविष्यवाणियाँ कुछ इस तरह से की जाती हैं कि "३ बजकर २० मिनिट में मंगल यान मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित हो जाएगा।" अर्थात वैज्ञानिक सिद्धांतों के द्वारा भविष्य को निर्धारित किया जाता है। जबकि वैज्ञानिक नियमों के द्वारा भविष्य को सुनिश्चित किया जाता है। इस तरह से वैज्ञानिक नियम प्रायोगिक विधि, कार्य करने के तरीके, समाज और ब्रह्माण्ड के नियमों को सुनिश्चित करते हैं। वास्तव में ये वैज्ञानिक नियम इस कथन को सत्यापित कर रहे होते हैं कि हर विधि का अपना एक विधान होता है। अर्थात उस विधि के द्वारा हमेशा एक निश्चित परिणाम प्राप्त होंगे। फिर चाहे वे परिणाम समाज, अर्थव्यवस्था, ब्रह्माण्ड या एक प्रयोग से ही सम्बंधित क्यों न हों ! वैज्ञानिक नियम सदैव उस व्यवस्था के अस्तित्व के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिस पर वे लागू होते हैं। अर्थात ब्रह्माण्ड के अस्तित्व के लिए भौतिकी के नियम जिम्मेदार हैं। न की ब्रह्माण्ड के वे सिद्धांत जिम्मेदार हैं। जो ब्रह्माण्ड के उस पदार्थ के अपने सिद्धांत होते हैं। जिससे की वह ब्रह्माण्ड बना होता है। ठीक इसी तरह से वैज्ञानिक नियम एक समाज, अर्थव्यवस्था और प्रयोगों पर लागू होते हैं।


वैज्ञानिक तथ्य : संरचना आधारित वे कथन जो किसी भी तरह के तंत्र की भौतिकी को निर्धारित करते हैं। तथ्य कहलाते हैं। अर्थात भौतिकी को निर्धारित करने वाले बिंदु (अवयव, तत्व, पदार्थ/ऊर्जा, अवस्था और गति/स्थिति) से सम्बंधित कथन तथ्य कहलाते हैं। तंत्र भी ऊर्जा और गणितीय संरचना अर्थात जड़त्वीय आधार पर दो-दो प्रकार के होते हैं। ऊर्जा के आधार पर बंद निकाय और खुला निकाय के अपने अलग-अलग तथ्य होते हैं। जो प्रत्येक खुले और बंद निकाय के लिए भिन्न-भिन्न होते हैं। ठीक इसी तरह से गणितीय संरचना अर्थात जड़त्वीय आधार पर जड़त्वीय निर्देशित तंत्र और अजड़त्वीय निर्देशित तंत्र के भी अपने अलग-अलग तथ्य होते हैं। जो प्रत्येक जड़त्वीय और अजड़त्वीय निर्देशित तंत्र के लिए भिन्न-भिन्न होते हैं। अर्थात तथ्य भौतिकता के किसी एक रूप के बारे में निरपेक्षीय ज्ञान कराते हैं। बेशक गति या स्थिति हमेशा सापेक्षीय ज्ञात की जाती है। परन्तु तथ्य भौतिकता के उस रूप की अवस्था को निर्धारित करते हैं जिसके बारे में वे कहे गए हैं। न कि भौतिकता के उस रूप की अवस्था को निर्धारित करते हैं। जिसके आधार पर वे कहे गए हैं। इस तरह से तथ्य एक बार में भौतिकता के किसी एक रूप की संरचना का निरपेक्षीय ज्ञान कराते हैं। फलस्वरूप भौतिकता के किसी एक रूप की संरचना का अध्ययन करने से उस संरचना के तथ्य ज्ञात होते हैं।

वैज्ञानिक जानकारी : जानकारी ज्ञान का वह रूप है। जो हमेशा संयोगवश घटित घटना से निर्मित होती है। उस घटना में कितने घटक कार्यरत थे ? उन घटकों का आपसी व्यव्हार क्या था ? उनका यह संयोग किस माध्यम में या किसके माध्यम से हुआ ? उस समय की परिस्थिति क्या थी ? घटना कितने समय के लिए प्रभावी हुई ? आदि-आदि.. इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानकारी के रूप में प्राप्त होते हैं। और जब इन्ही प्रश्नों के उत्तर को पुनः प्राप्त करने की बारी आती है। तब यदि प्राप्त होने वाले सभी उत्तर पहले वाले उत्तरों से मेल खाते हैं। और घटना के सभी पहलुओं के प्रति मनुष्य की समझ स्पष्ट होती है। तब प्राप्त जानकारी वैज्ञानिक जानकारी कहलाती है। अन्यथा प्राप्त जानकारी वैज्ञानिक जानकारी नही कहलाती। जैसा की डायनासोर का विलुप्त हो जाना ! खगोलीय वैज्ञानिकों ने उल्का पिंडों को डायनासोर के विलुप्त हो जाने का कारण माना है। जबकि जीव वैज्ञानिकों ने डायनासोर के विलुप्त होने का कारण उनका विशालकाय शरीर माना है। स्वाभाविक है, हमारा दिमाग एक ही कारण को स्वीकारेगा। परन्तु विज्ञान दोनों कारणों से निर्मित होने वाली घटना और उसके घटकों को वैज्ञानिक जानकारी का दर्जा देता है। जैसा की हमने ऊपर भी लिखा है कि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सैद्धांतिक प्रकरण व्यवहारिक प्रकरण से अधिक महत्व रखता है। क्योंकि वह मनुष्य की समझ को विकसित करता है। इसी प्रकरण के आधार पर भविष्य निर्धारित होता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है। परन्तु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जानकरी ज्ञान का वह रूप है। जहाँ किसी घटना की पूर्ण जानकारी एक नए सिद्धांत को जन्म देती है। और ज्ञान का यही रूप उस संभावित सिद्धांत की प्रमाणिकता सिद्ध करता है। इसलिए प्रत्येक घटना का विश्लेषण उसके घटक, कारक और परिणाम के आधार पर जानकारी एकत्रित करने के लिए किया जाता है।

विज्ञान के लेखन में हमेशा से यह समस्या देखने को मिलती है कि विज्ञान को सरल और सहज बनाते-बनाते, विज्ञान की शब्दावली को दरकिनार किया जाने लगता है। फलस्वरूप विज्ञान अपना स्वरुप खोने लगता है। तब विज्ञान तथ्यों और जानकारियों का एक बड़ा जमावड़ा बनकर रह जाता है। वैज्ञानिक सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और जानकारियों को समाज के सामने रखने का एक तरीका होता है। यदि आप एक वैज्ञानिक सिद्धांत को नियम की तरह या वैज्ञानिक तथ्य को सिद्धांत की तरह समाज के सामने रखेंगे। तो यकीन मानिये एक समय बाद आप विज्ञान को अंधा, लंगड़ा और बहरा बना हुआ पाएंगे। क्योंकि तब विज्ञान से अछूती आने वाली पीढ़ी यह कैसे जान पाएगी कि मानव जाति ने विज्ञान के किन-किन क्षेत्रों में किस प्रकार महारथ हासिल की है ? और किन क्षेत्रों में अब तक महारथ हासिल नहीं हो पाई है। यह इसलिए होगा क्योंकि जानकारी को सिद्धांत की तरह समाज के सामने रखने से वह जानकारी एक आधार की तरह उपयोगी होगी। जिससे की इस आधार पर निकाले जाने वाले सभी निष्कर्ष गलत होंगे। और इस छोटी सी गलती का खामियाजा पूरी मानव जाति को भुगतना पड़ता है।

शिक्षा का महत्व

वाणिज्य संकाय के १२ वी. पास उस लड़के के इस कथन ने मुझे अंदर से झकझोर दिया कि भैया, पढ़ाई-लिखाई करने से क्या मिलेगा ? पढ़ाई-लिखाई करने से तो नौकरी भी नहीं मिलती ! इसलिए चने बेच रहा हूँ।

कुछ नहीं कह सकता था। इसलिए चुपचाप वहाँ से चने लेकर अपने कमरे में लौट आया। बेशक, वह लड़का गलत नहीं कह रहा था। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति और उनकी आवश्यकता कैसी और क्या होगी ? ये हम जान भी नहीं सकते।

पढ़ाई-लिखाई करके नौकरी मिल जाना, ये समाज की आवश्यकता और नौकरी पाने वाले के सामर्थ्य दोनों के सामंजस्य की बात है। इसलिए धन अर्जित करने के लिए वैकल्पिक मार्ग व्यवसाय या कृषि को चुनना अच्छी बात है। परन्तु पढ़ाई-लिखाई करने से क्या मिलेगा ? उस लड़के का ऐसा सोचना मुझे अच्छा नहीं लगा। अरे, वो लड़का पढ़ा-लिखा था। उसमें यह सोच कैसे आ सकती है ? क्या उसकी शिक्षा ने उस पर सकारात्मक प्रभाव नहीं डाले थे ? क्या वह चने बेचने के कार्य से परेशान था ? जो भी हो, पर उसका ऐसा सोचना गलत है।

एक कहानी : शिक्षा सिर्फ धन अर्जित करने का साधन नहीं है। शिक्षा के द्वारा आप अपने संरक्षित धन को अपना बनाए रख सकते हैं ! आपका अपना कमाया हुआ धन, जब आपकी संतान बिना मतलब के कार्यों में खर्च करने लगती है या आपको अँधेरे में रखकर आपसे पैसे मांगती है। या नई-नई तकनीकों या क़ानूनी नियमों का ज्ञान न होने की वजह से आपको जो नुक्सान होता है। या फिर एक व्यापारी नई योजना के तहत आपको शब्दों के द्वारा भ्रमित करते हुए। १५ की चीज २० में आपको यह कहकर बेच देता है कि आपको इस वस्तु को खरीदने में फलां-फलां प्रतिशत का फायदा होगा। तो यकीन मानिये ये आपकी अशिक्षा का ही परिणाम होगा कि आप शर्मिंदगी की वजह से कुछ न कह सकने के बाबजूद लुट जाएंगे। आपका संरक्षित धन अशिक्षित होने के कारण दूसरों का हो जाएगा। जबकि धन अर्जित करने के लिए आपको शाररिक या दिमागी मेहनत की आवश्यकता होती है।


एक बड़े व्यापारी का बड़ा लड़का जब शहर पड़ने को गया। तो उसके दोस्तों की संगत ने उस लड़के को बिगाड़ दिया। जिस लड़के को महीने में पांच हज़ार रुपयों की आवश्यकता होती थी। आज वही लड़का पिताजी से कहकर दस हज़ार रूपये अपने बैंक अकाउंट में बुलवा रहा था। पिताजी आखिर पिताजी जो ठहरे। दस हज़ार कहने के बाद भी बारह हज़ार रूपये अकाउंट में भेज दिए जाते थे। लड़के ने पिताजी से ज्यादा रूपये मंगवाने का कारण बढ़ती हुई मंहगाई और नए-नए पढ़ाई के कोर्सों को बताया। महीने के बीच में जब कभी लड़के को अचानक से अधिक रुपयों की आवश्यकता होती। तब वह लड़का किसी भी कंप्यूटर या अन्य तकनीकी कोर्सों के नाम गिना देता था। लड़के के पिता जी कोर्स के नाम के अक्षरों की बढ़ती हुई गिनती गिनकर अपने बेटे को रूपये पहुंचा देते थे। लड़का अब इतना शातिर होने लगा था कि कोर्स के नाम याद नहीं होने की वजह से नए कोर्सों के नाम गढ़ने लगा था। "हुला-लला-लु" कुछ इसी तरह के कोर्स के नाम लड़का अपने पिता जी को अंधकार में रखने के लिए उपयोग में ला रहा था। अब पिताजी क्या जाने कोर्स हिंदी में पढ़ाया जाना है या किसी अन्य भाषा में पढ़ाया जाना है ? अन्य भाषाओं के कोर्स में ज्यादा रूपये देने होते होंगे ? जितना बड़ा कोर्स का नाम होगा उतने ही अधिक रूपये देने होंगे ? पिता जी की इसी गलत समझ ने उस लड़के को और बिगड़ जाने दिया। बेशक पिता जी यह नही चाहते थे। परन्तु ऐसा हो रहा था। दादा-परदादा की संचित पूंजी उनका नाती गलत संगत में होने के कारण उस पूंजी को खर्च कर रहा था। पिता जी अपनी समझ के अनुसार कोर्स के नाम के अक्षरों को गिनना नहीं भूलते थे। पहली की अपेक्षा कोर्स के नाम में एक अक्षर बढ़ जाने से उस कोर्स की कीमत दो हज़ार बढ़ जाया करती थी। कुछ कोर्स कभी समाप्त नहीं होते थे। उन कोर्सों की क़िस्त हर महीने अकाउंट में पहुँच जाती थी। क्योंकि पिता जी यह भी नहीं जानते थे कि कोई भी कोर्स लगभग कितने दिनों में समाप्त होता है ?

और अंत में एक दिन पिताजी को यह पता चलता है कि उनके पुत्र ने विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई के लिए प्रवेश ही नहीं लिया है। यह केवल एक कहानी ही नहीं हकीकत भी है। शिक्षा कई मायनों में अहमियत रखती है। शिक्षा सिर्फ धन अर्जित करने के लिए नहीं बल्कि उस संचित धन को अपना बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है। जिसे आपने मेहनत करके कमाया हुआ है। शिक्षा के माध्यम से आप अपनी बात लोगों के सामने उचित अर्थ के साथ रख सकते हैं। शिक्षा महान पुरुषों का एक मात्र अचूक अस्त्र है। जिसका उपयोग वे समाज की भलाई के लिए करते हैं। एक शिक्षित व्यक्ति शिक्षा के महत्व को हमेशा पहचानता है। वह शिक्षा को साधन के रूप में एक स्थान में पड़ा नहीं रहने देता। बल्कि हर दिन हर समय वह शिक्षा का उपयोग स्वयं और समाज के लिए करता है। क्योंकि वह जानता है कि यदि वह अपने आपको शिक्षित कहलवाना चाहता है। तो उसे लोगों को शिक्षित करना होगा।

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