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अंधविश्वास को पहचानो !

हमारे संविधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने और अंधविश्वास को त्यागने की सलाह स्पष्ट रूप से वर्णित है। संविधान अर्थात सिद्धांत जिन्हे हम सभी भारतीयों ने न केवल व्यक्ति विकास के लिये बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विकास को ध्यान में रखकर के 26 नवम्बर 1950 को सहर्ष आत्मार्पित किया है। जहाँ एक तरफ संविधान ने रीति-रिवाजों, परम्पराओं और धर्म को बनाए रखने की स्वतंत्रता दे रखी है। वहीं दूसरी ओर हमने अपने सिद्धांतों (संविधान) में अंधविश्वास को समाज से दूर रखने (फैंकने) का निर्णय लिया है। क्योंकि जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, वहाँ अंधविश्वास का अस्तित्व ही नही है। ठीक वैंसे ही जैसे जहाँ प्रकाश है वहाँ अँधेरा संभव नही है। और बिना प्रकाश के चारों और गहन अँधेरा पसर जाता है। इस तरह से अंधविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टकोण एक-दूसरे के विरोधी हैं। अंधविश्वास न सिर्फ सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में अवरोध उत्पन्न करता है। बल्कि वह साथ ही साथ व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक और शारीरिक विकास में भी अवरोध उत्पन्न करता है। इसी कारण अंधविश्वास का समाज के बीच में रहना सभी के लिए हानिकारक है।

वर्तमान समय में कुछ लोग मुझे एक दूसरे को अंधविश्वासी कहते हुए मिले। मानो एक दूसरे को गाली दे रहे हों ! मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इस शब्द (अंधविश्वासी) को सुनने वाला सच में उसी तरह से प्रतिक्रिया दे रहा था। जैसे कि सच में सामने वाले ने उसे उपशब्द कहें हों ! तो क्या अंधविश्वास समाज के लिए एक बुराई है ? अंधविश्वासी होना अपने आप में एक गाली है ? जी हाँ, अंधविश्वास एक सामाजिक बुराई है। कहने को तो यह जीवन के किसी एक पहलु से प्रारम्भ होता है। और यही स्थिति बने रहने की वजह से पूरी जिंदगी अंधविश्वास की कारागाह में गुजर जाती है। अंधविश्वास की कारागाह अशिक्षा के कारण उत्पन्न होती है। परन्तु आम लोगों की अंधविश्वास के प्रति यह सोच है कि अंधविश्वास भ्रम में जीने वालों का अपना एक विश्वास होता है। जो उन्हें हमेशा के लिए भ्रमित बनाए रखता है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। क्योंकि किसी भी वैज्ञानिक निष्कर्ष के प्रति हमारा विश्वास एक भ्रम ही है जो वर्तमान समय तक नहीं टूटा। जिसकी भविष्य में गलत होने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए हम उसके अपने व्यक्तिगत विश्वास को अंधविश्वासी होने का कारण नहीं मान सकते।


जैसा की हमने ऊपर लिखा है कि जिस तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रकाश से संबंध है ठीक उसी तरह से अंधविश्वास का अंधकार से संबंध है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शिक्षा का आभाव अंधविश्वास को जन्म देता है। तो क्या फिर आम लोगों की यह अवधारणा गलत है कि अंधविश्वासी मनुष्य का अंधविश्वास उनका अपना विश्वास होता है ? जी हाँ, आम लोगों की यह अवधारणा गलत है। तो अब प्रश्न ये उठता है कि अंधविश्वास की वास्तविकता क्या है ? तो सुनिए जिसे आप अंधविश्वासी मनुष्य का उसका अपना विश्वास कहते हैं। वह उसका किसी और के प्रति प्रेम, आदर, संस्कार, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, कला या उसकी अपनी सहजता या आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में आपके द्वारा उसको अंधविश्वासी कहना सर्वदा अनुचित होता है। आप किसी और से प्रेम न करें, चलेगा। अपनी परम्पराओं का निर्वाह न करें, चलेगा। आपके पास अपनी कोई कला न हो, चलेगा। या फिर आप बिना विषय-वस्तु के भी सहजता महसूस करते हों, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ! परन्तु दूसरों के इस व्यव्हार को आप उसका अंधविश्वास नहीं कह सकते।

एक उदाहरण देकर समझाने की इच्छा रखता हूँ। कोशिश करूँगा कि समझाने में सफल हो सकुं। एक बालक का उसके अपने माता-पिता को आदर देना। नित्य-प्रतिदिन प्रातः काल उनके चरण स्पर्श करना। यह उस बालक का अपने माता-पिता के प्रति प्रेम हो सकता है। या संरक्षण प्राप्त करने की इच्छा हो सकती है। बेशक यह उस बालक का अपने माता-पिता के प्रति विश्वास ही है। जो यह जानता है कि प्रेम के बदले में मुझे भी प्रेम और संरक्षण प्राप्त होगा। और यदि वह बालक निःस्वार्थ प्रेम किये जा रहा है। तब तो ये उस बालक के अपने संस्कार हैं। आप उस बालक के विश्वास या संस्कार को अंधविश्वास नहीं कह सकते। इसके बाबजूद यदि आप ऐसा कहते हैं तो ये आपके अपने शब्दकोष में शब्दों की कमी कहलाएगी। या फिर यह आपकी अंधविश्वास को न पहचान पाने की असमर्थता कहलाएगी। बाजार में एक नई तकनीक का मोबाइल फोन आ जाने से यह जरुरी नहीं है कि हम सभी उस नई तकनीक का उपयोग करें। समय के साथ न चल पाने की असमर्थता अंधविश्वास नहीं कहलाती। हमको इस अंधविश्वास की पहचान करना आना चाहिए। ताकि स्वयं और समाज दोनों का भला हो सके।

इस अंतिम गद्यांश में हम यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर किन कारणों के चलते अंधविश्वास व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक होता है। अंधविश्वास के अपने तीन चरण होते हैं। जिसके आधार पर हम उसके कुप्रभाव और उस प्रभाव के बने रहने तक का समय निर्धारित कर सकते हैं।
  1. जिस कार्य, कार्यशैली या तरीका को आप आजमा रहे हैं। उसे आप दूसरों को भी करने की सलाह देते हैं। या उस कार्य, कार्यशैली या तरीके में दूसरों की सहभागिता की अपेक्षा रखते हैं।
  2. आपके सुझाव को दूसरों के द्वारा अपनाए जाने के बाद भी आपके और दूसरों के परिणाम में कोई मेल न होने के बाबजूद आप स्वयं या किसी और को वही सुझाव अपनाने की सलाह देते हैं।
  3. और जब आप एक समान परिणाम प्राप्त न होने का कारण संयोग न बन पाना (अर्थात अनुकूलित परिस्थिति का आभाव होना) मानते हैं। तब तो आप पूर्ण रूप से अंधविश्वासी हैं।
जबकि पहले और दूसरे चरण तक आप अंधविश्वासी नहीं कहलाते। परन्तु उन स्थितियों में अंधविश्वास आप पर हावी हो रहा होता है। कहने का सीधा सा अर्थ है कि जब तक आप अपने कार्य में दूसरों को सम्मलित नहीं करते हैं। तब तक आप किसी भी सूरत में अंधविश्वास वाला कार्य नहीं कर रहे होते। दूसरों के सम्मलित हो जाने मात्र से आपका कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आने की सम्भावना बन जाती है। हॉलीवुड की फिल्म अपोलो 13 में मिशन अपोलो 13 के डायरेक्टर को अपनी प्रिय जैकिट का इंतज़ार करते हुए दिखाया गया है। वहीं उनके सहभागी मित्र उनका मज़ाक उड़ाते हुए उस इंतज़ार को अंधविश्वास का नाम देते हैं। उनका उस जैकिट के लिए इंतज़ार अंधविश्वास नहीं है। वह उनकी अपनी सहजता है। बेशक उस सहजता का कारण उस जैकिट का रंग या उस जैकिट में उचित स्थान पर जेब (Pocket) का होना हो सकता है। या ये भी हो सकता है उन डायरेक्टर का उस जैकिट के प्रति मोह हो ! जिस तरह से हम किसी भी कारण को पुख्ता रूप से नहीं कह सकते हैं। ठीक उसी तरह से हम उस सहजता को अंधविश्वास का नाम नहीं दे सकते हैं। और ऐसा करना सर्वदा अनुचित होगा।

अंधविश्वास का सबसे बुरा प्रभाव यह है कि बिना कारण या आवश्यकता के चलते लोगों में एक रूपता आने लगती है। फलस्वरूप लोगों में कटटरता, कला का आभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कमी, सहजता में कमी और नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आभाव समाज में देखने को मिलने लगता है। जो समाज के लिए हानिकारक है। वर्तमान में लोगों के लिए यह जरुरी है कि वे अपने रीति-रिवाजों और परम्पराओं को पहचाने। और अंधविश्वास का समाज से बहिष्कार करें। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम अपने बड़े-बुजुर्गों से प्रत्येक रीति-रिवाजों और परम्पराओं को करने कारण पूछें ? हम स्वयं अपने स्तर में उनका कारण खोजें। और जो रीति-रिवाज और परम्पराएँ अनुकूलित परिस्थिति आधारित पाई जाती हैं। उनका हम बहिष्कार करें। क्योंकि उन रीति-रिवाज और परम्पराओं को करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। इसके बाबजूद आपको उन्हें करने में ख़ुशी प्राप्त होती है। तो बेशक आप उन्हें निरंतर बनाए रख सकते हैं। किन्तु अब से उन्हें रीति-रिवाज और परम्पराओं का नाम देना छोड़ दें।

ध्यान देने योग्य बिंदु : तीसरा चरण अपने आप में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जो लोगों को भ्रमित करता है। और अपनी सोच को वैज्ञानिक सोच ठहराने में बल देता है। यह लोगों में झूठा विश्वास उत्पन्न करता है। बेशक यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि परिस्थिति (घटक) बदल जाने से परिणाम भी बदल जाते हैं। अर्थात एक समान परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते हैं। परन्तु इस स्थिति में व्यक्ति विशेष को भिन्न घटक नहीं माना जा सकता। इसलिए इस स्थिति में यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं कहलाएगा।

वैज्ञानिक पद्धति और प्रक्रियाओं की पारिभाषिक शब्दावली

भौतिकी जो एक प्रकार्य (Function) है, को जानने (समझने) के लिए जिस पद्धति (Method) का उपयोग किया जाता है। उस पद्धति की समझ विज्ञान है। और वहीं भौतिकी के प्रकार्य की समझ का उपयोग जिस प्रक्रिया (Process) के तहत किया जाता है। उसे तकनीक कहते हैं। यानि की भौतिकी एक प्रकार्य, विज्ञान एक पद्धति और तकनीक एक प्रक्रिया का नाम है। आज के इस लेख में हम भौतिक प्रणाली के प्रकार्य (Function) को जानने-समझने की पद्धति (Method) और उसके उपयोग की प्रक्रियाओं (Process) पर चर्चा करेंगे। विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित वैज्ञानिक क्रियाओं पर चर्चा करने से पहले हम आपको ये जानकारी देना चाहते हैं कि "विज्ञान के प्रति अपनी समझ या तकनीक विकसित करने के लिए विज्ञान के पास न ही कोई एक विशेष क्रिया है और न ही कुछ विशेष क्रियाओं का कोई एक क्रम है।" अर्थात विज्ञान और तकनीक न ही कोई एक विशेष क्रिया/विधि और न ही कोई एक विशेष क्रियाओं के क्रम का नाम है। इसलिए विज्ञान में क्रियाओं का क्रम मायने रखता है। न की उन क्रियाओं की विशेषता मायने रखती है। विज्ञान और तकनीक से सम्बंधित प्रत्येक क्रिया का उपयोग आवश्यक परिणाम प्राप्त करने के लिए किया जाता हैं। अर्थात इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता है कि हम प्राप्त परिणाम के पूर्व धारणाओं से मेल खाने पर ही उन परिणामों को विज्ञान का दर्जा देते हैं। अन्यथा उन परिणामों को विज्ञान का दर्जा नहीं देते हैं। हाँ, इतना जरूर है कि कोई विशेष वैज्ञानिक विधि/क्रिया (जैसा की प्रयोग) या कुछ विशेष क्रियाओं का क्रम भौतिकी के स्तर या भौतिकता के विशेष रूप के आधार पर अन्य दूसरी क्रियाओं या उनके क्रम की अपेक्षा विज्ञान में अधिक मायने रखता है ! परन्तु वह क्रिया या उन क्रियाओं का क्रम विज्ञान के लिए सर्वदा विशेष नहीं रहता। विज्ञान और तकनीक में वैज्ञानिक क्रिया और उन क्रियाओं का क्रम भौतिकी के स्तर या भौतिकता के विशेष रूप के आधार पर हमेशा बदलता रहता है।

प्रमाण (Proof) प्रस्तुत करना, विज्ञान के लिए सबसे जरुरी कार्य है। जरुरी नहीं है कि प्रमाण सिर्फ प्रयोग द्वारा ही प्रस्तुत किये जाएं। क्योंकि प्रयोग अपने आप में प्रमाण प्रस्तुत करने का सिर्फ एक तरीका है। प्रमाण प्रस्तुत करना इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस बात के लिए प्रमाण दे रहे हैं। सिद्धांत, नियम, तथ्य, कथन, खोज, सूत्र, तकनीकी ज्ञान, भौतिकीय गुण और जानकारियों के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों द्वारा प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। प्रमाण का उपयोग साधन के रूप में विश्वसनीयता को सिद्ध करने के लिए किया जाता है। इसीलिए प्रमाण "प्रस्तुत" किये जाते हैं। जरुरी नहीं है कि वे समाज में स्वीकारे ही जाएं। क्योंकि किसी भी प्रमाण को तभी मान्यता दी जाती है। जब वह प्रमाण उस खोज या कहे गए कथन के प्रति हमारी समझ को विकसित करता है। विज्ञान के प्रति हमारी यह समझ कई चरणों में संपन्न होती है। विज्ञान की जिस समझ के साथ हम तकनीकी विकास करते हैं। उसी तकनीकी ज्ञान के द्वारा हम अपनी सोच को पुनः परिवर्तित करने के लिए विवश हो जाते हैं। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। और हमारी यह सोच विकसित होती चली जाती है। आइये हम विज्ञान के प्रति हमारी सोच के विकसित होने के क्रम को समझने की कोशिश करते हैं।


  1. खोज (Discovery) : खोज उस प्रक्रिया या कार्य को कहते हैं, जिसके सहयोग से हम इस दुनिया में पहले से मौजूद भौतिकता के किसी भी रूप की जानकारी अथवा अवस्थित स्थान का पता लगाते हैं। अर्थात खोजकर्ता वह पहला व्यक्ति होता है, जो व्यक्तिगत रूप से उस खोजे गए भौतिकता के रूप अथवा स्थान का दुनिया के साथ सर्वप्रथम परिचय कराता है। खोजकर्ता हमारे सामने अपनी सूझबूझ के आधार पर खोजी गई भौतिकता या स्थान की जानकारी रखता है। जरुरी नहीं है कि जिस जानकारी के साथ खोजकर्ता हमारा परिचय खोजी गई भौतिकता के साथ करा रहा है। वह सच साबित हो ! कहने का सीधा सा अर्थ है कि इस जीवाश्म की खोज मैंने की है। और उस जीवाश्म की खोज आपने की है। "खोजना, एक सामान्य क्रिया है। परन्तु जब हम किसी विधि के सहयोग से, किसी विशेष उद्देश्य से या फिर किसी ज्ञात ज्ञान की समझ से अज्ञात को खोजते हैं। तो उसे विज्ञान कहते हैं।" और जिस विधि या प्रक्रिया के सहयोग से अज्ञात को खोजते हैं उन्हें वैज्ञानिक विधि/प्रक्रिया कहते हैं।
  2. अवलोकन (Observation) : अवलोकन उस प्रक्रिया या कार्य को कहते हैं, जिसके सहयोग से हम खोजी गई वस्तु अथवा स्थान के बारे में एक निश्चित क्रम में जानकारी एकत्रित करते हैं। अवलोकन एक नज़र में खोजी गई भौतिकता के रंग-रूप, आकार और संरचना की जानकारी देता है। निश्चित क्रम में जानकारी एकत्रित करने का मूल उद्देश्य सिर्फ इतना सा होता है कि उस विषय-वस्तु अथवा स्थान का कोई भी पहलु हमारी जानकारी से अछूता न रह जाए। अवलोकन भी एक सामान्य क्रिया है। जिसका उपयोग प्रेक्षण, प्रयोग और परीक्षण तीनों वैज्ञानिक विधियों में किया जाता है।
  3. वर्गीकरण (Classification) : इस प्रक्रिया के तहत हम अवलोकन से प्राप्त जानकारी के आधार पर उस खोजी गई विषय-वस्तु को एक वर्ग (समूह), श्रेणी या स्तर और स्थान को स्थिति प्रदान करते हैं। ताकि उस विषय-वस्तु अथवा स्थान की पुनः पहचान आसानी से की जा सके। इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य उस विषय-वस्तु अथवा स्थान को चिन्हित करना होता है। ताकि उसी खोज के लिए दोबारा कोई अन्य व्यक्ति आसानी से दावा पेश न कर सके।
  4. विश्लेषण (Analysis) : इस प्रक्रिया के तहत हम वर्गीकृत भौतिकता के रूपों को कुछ निश्चित बिन्दुओं के आधार पर परिभाषित (विश्लेषित) करते हैं। क्योंकि ये गुणात्मक बिंदु उस समूह की विशेषता, गुण या उसके अपने लक्षण होते हैं। फलस्वरूप ये निश्चित बिंदु एक ही समूह में स्थित अनेक भौतिकता के रूपों में भेद करने में सहयोगी सिद्ध होते हैं। ऐसा करने से हमारे पास उस खोजी गई भौतिकता अथवा स्थान की जानकारी और अधिक विस्तृत हो जाती है। क्योंकि इस प्रक्रिया के तहत हम पूर्व में खोजी गई संबंधित भौतिकता का सम्बन्ध वर्तमान में खोजी गई भौतिकता के साथ ज्ञात करते हैं। इसी प्रक्रिया का एक दूसरा पहलु आकलन (Estimate) हमारी जानकारी को और अधिक विस्तार देता है। इसके तहत हम खोजी गई भौतिकता अथवा स्थान के बारे में अनुमान बैठाते हैं। जरुरी नहीं है कि वह अनुमान सही साबित हो। यह अनुमान खोजी गई विषय-वस्तु की प्रकृति, उसके व्यव्हार और भौतिकीय मान (राशियों) को लेकर के बैठाले जाते हैं। आकलन के द्वारा मापन की प्रक्रिया की नींव रखी जाती है। मापन का सैद्धांतिक पक्ष इसी क्रिया (आकलन) पर आधारित होता है।
  5. प्रयोग (Experiment) : अनुमानित प्रकृति, उसके व्यव्हार और भौतिकीय मान को सिद्ध करने के लिए जिस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। उसे प्रयोग कहते हैं। याद रहे प्रयोग की पूरी रूपरेखा पहले से ही विश्लेषण के अंतर्गत बना ली जाती है। प्रयोग के दौरान सिर्फ इस बात को ध्यान में रखा जाता है कि विश्लेषण की सम्बंधित शर्तों को ध्यान में रखकर के सावधानी पूर्वक प्रत्येक बिंदु का क्रमवार उपयोग किया जाए। प्रयोग के दौरान होने वाली संभावित त्रुटियों को अलग से ध्यान में रखा जाता है। तत्पश्चात प्रायोगिक परिणाम की तुलना अनुमानित परिणाम से की जाती है।
  6. मापन (Measurement) : कहने को तो हम भौतिकीय राशियों का मापन यांत्रिकी साधनों द्वारा ज्ञात करते हैं। परन्तु इसको ज्ञात करने की जरुरत हमें इस स्थिति में जान पड़ती है। जब हम प्रायोगिक परिणाम की तुलना अनुमानित परिणाम से करते हैं। दोनों परिणामों के मध्य का एक छोटा सा भी अंतर हमें भौतिकीय राशियों के रूप में स्वयं को परिभाषित करने को बाध्य करता है। अर्थात दोनों परिणामों के मेल न होने पर हम उस असमानता को भौतिकीय राशियों की मदद से माप सकते हैं। और यहाँ मजेदार बात यह है कि इन भौतिकीय राशियों की माप का तरीका और मापन के यंत्रों की प्रक्रिया दोनों हमें इसी स्थिति में जाकर के ज्ञात हो जाती हैं। याने कि "जहाँ शंका है वहीं निदान है।"
  7. गणना (Calculate/Tally) : इस प्रक्रिया का उपयोग परिवर्तन की दर, भौतिकता की प्रकृति, नए गुणों की उत्पत्ति और उनकी सीमाओं को निर्धारित करने में होता है। जब किसी भी प्रयोग को सावधानी पूर्वक करने के बाद भी यदि उस प्रयोग के किसी एक गुण में लयबद्ध परिवर्तन देखने को मिलता है। तब हम उस प्रयोग की गणना के आधार पर परिवर्तन की दर अथवा भौतिकता की प्रकृति को निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार इलेक्ट्रॉनों की गणना (संख्या) परमाणुओं के गुणों की जानकारी देती है।
  8. प्रतिपादन (Rending) : इस प्रक्रिया के तहत हम भौतिकीय तंत्र (Physical System) और उसके प्रकार्य (Function) को भलीभांति समझने का प्रयास करते हैं। इसके लिए हम उस तंत्र को परिभाषित करने में सक्षम सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हैं। ताकि इन सिद्धांतो के उपयोग से हम उस भौतिकीय तंत्र (Physical System) की नियति और उस तंत्र के महत्व को समझ सकें। जिसका एक हिस्सा हमें खोज के दौरान प्राप्त हुआ है। अर्थात इस प्रक्रिया के दौरान हम सिद्धांतों और नियमों का प्रतिपादन करते हैं।
  9. अध्ययन (Study) : इस प्रक्रिया के दौरान हम भौतिकीय तंत्र के प्रकार्य को भलीभांति संचालित करने वाले कारणों और नियमों को जानने की कोशिश करते हैं। जो उस तंत्र के अपने नियतांक (भौतिक राशियों के रूप में) कहलाते हैं। अध्ययन के अंतर्गत परिसीमन का कार्य किया जाता है। जिसके लिए हम आंकड़े एकत्रित करते हैं। फलस्वरूप हम एक निष्कर्ष तक पहुँच पाते हैं। उदाहरण के लिए 1.4 सौर द्रव्यमान को चंद्रशेखर सीमा कहते हैं। भौतिकता के उसी रूप में बने रहने अथवा प्रकृति और गुण परिवर्तन की सीमा को जानने के लिए परिसीमन का कार्य किया जाता है। इस प्रक्रिया के तहत ही हमें उस तंत्र की व्यापकता और उस तंत्र या भौतिकता के अस्तित्व का औचित्य ज्ञात होता है।
"अदृश्य होने का मतलब गायब होना नहीं होता।" ये हमारी अपनी सीमाएँ हैं जो तकनीकी विकास के लिए हमें प्रोत्साहित करती हैं। और इन्ही सीमाओं के कारण हम तकनीकी विकास कर पाते हैं। अर्थात जिन कार्यों को मानव स्वयं नहीं कर सकता। उसकी अपनी सीमाएं उसे उस कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं कि हाँ, तुम उस कार्य को कर सकते हो ! भले ही तुम्हे उस कार्य को करने के लिए किसी और के सहयोग की आवश्यकता क्यों न लेनी पड़े ! परन्तु जब मनुष्य अपने आप में उस कार्य को कर सकने में सक्षम नहीं होता है। तब वह जिन साधनों के उपयोग से अपने कार्य को अंजाम देता है। ये उन साधनों की अपनी सीमाएं होती हैं। जिसके ज्ञान से मनुष्य अपने कार्य को अंजाम दे पाता है। कहने का अर्थ है कि मनुष्य स्वयं की सीमाओं से किसी भी कार्य को करने के लिए प्रोत्साहित होता है। और उपयोगी साधनों की सीमाओं के कारण उन कार्यों को कर पाता है। जिन्हे वह अपनी क्षमताओं द्वारा नहीं कर पाता था। इतनी सारी बात कहने का सिर्फ इतना सा उद्देश्य है कि तकनीकी विकास करने के लिए हमें असंगत सी प्रतीत होने वाली उन परिस्थितियों को खोजना होता है। जो वास्तव में तो संगत होती हैं। जिनका अस्तित्व होना संभव है। परन्तु भौतिकता के ये रूप प्राकृतिक रूप से अस्तित्व में देखने को नहीं मिलते हैं। और तब हम विज्ञान अर्थात भौतिकी के प्रकार्य के प्रति अपनी सोच को विकसित करके संगत परिस्थितियों की पहचान करते हैं। जिससे की निर्धारित परिणामों को प्राप्त करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया को विकसित किया जा सके। और उन परिस्थितियों को साकार रूप दिया जा सके। जिनका सह-अस्तित्व इस ब्रह्माण्ड के लिए संभव है। और जो मानव जाति के लिए उपयोगी हैं। आइये अब हम तकनीकी प्रक्रियाओं के प्रति अपनी सोच को विकसित करने की कोशिश करते हैं।


  1. अनुसंधान (Research) : अनुसंधान का अर्थ खोज करना ही है। परन्तु यह खोज प्रायः उन खोजे जा चुके भौतिकता के गुणों की खोज है। जिसे अभी तक दुनिया के सामने नहीं लाया गया है। अनुसंधान को तकनीकी प्रक्रिया के अंतर्गत इसीलिए रखा जाता है। क्योंकि ये वही गुण होते हैं जिसकी अज्ञानता के चलते हम अपनी तकनीकी क्षमताओं को कम आंकने लगते हैं। हम संगत परिस्थितियों को असंगत मानने लगते हैं। इन गुणों को हम अक्सर खोजे जा चुके भौतिकता के रूपों में ही ढूंढते हैं। यह कार्य एक तरह से अँधेरे में तीर चलने जैसा होता है। परन्तु इस कार्य के पूर्व में लगभग-लगभग इतना तय हो जाता है कि हम जिन गुणों की खोज कर रहे हैं। यदि वे निर्देशित दिशा में पाए जाते हैं तो वे कितने प्रभावी और उपयोगी सिद्ध होंगे !
  2. आविष्कार (Invention) : यह मानव जाति की सबसे छोटी इकाई की कल्पना होती है। जिसे वह साकार रूप दे रहा होता है। इस प्रक्रिया में मानव अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपने आसपास के साधनों और संसाधनों की क्षमताओं का उपयोग अपने हित को सँवारने के प्रयास हेतु करता है। जरुरी नहीं है कि मानव अपने पहले प्रयास में ही सफल हो जाए। जबकि वह यह पहले से जानता है कि वह इन्ही साधनों के उपयोग से अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। आविष्कार के सफल न होने का कारण मानव की उस प्रणाली को न समझ पाने की कमी है। जो वास्तव में उस अविष्कार को चलायमान बनाने के लिए आवश्यक होती है।
  3. परीक्षण (Testing) : आविष्कार के सफल होने का ज्ञान हमें परीक्षण के दौरान ही ज्ञात होता है। बिना परीक्षण के किसी भी आविष्कार को सफल या असफल नहीं कहा जा सकता। परीक्षण सिर्फ इस बात के लिए किया जाता है कि आविष्कार चलायमान है अथवा नहीं है ?
  4. निरीक्षण (Inspection) : जांच-पड़ताल इस बात के लिए की जाती है कि आविष्कार यदि सफल पाया गया है तो आविष्कार हमारी अनुमानित आवश्यकताओं की पूर्ति में कितना खरा उतरता है ? और यदि आविष्कार असफल पाया गया है तो इसके पीछे के क्या-क्या कारण हो सकते हैं ? याद रहे निरीक्षण हमेशा नियमानुसार किया जाता हैं। निरीक्षण के अपने नियम/तरीके होते हैं। ताकि वास्तविकता की पहचान आसानी से हो।
  5. अन्वेषण (Exploration) : अपरिचित क्षेत्र, धरातल या स्तर की यात्रा के दौरान जब हम क्रमवार तरीके से उस क्षेत्र, धरातल या स्तर की जानकारी किसी युक्ति या उपकरणों के माध्यम से एकत्रित करते हैं। तो इस प्रक्रिया को अन्वेषण कहते हैं। अन्वेषण को तकनीकी प्रक्रिया के साथ जोड़ने का मकसद सिर्फ इतना सा है कि इस प्रक्रिया में तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक होता है।
आने वाले लेखों में तकनीकी विकास और उसके क्रम पर चर्चा की जाएगी। सबसे अच्छी तकनीक होने के मापदंड कौन-कौन से हैं ? इन सभी प्रश्नों को लेकर के एक लेख लिखना बांकी है।

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