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अंधविश्वास को पहचानो !

हमारे संविधान में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने और अंधविश्वास को त्यागने की सलाह स्पष्ट रूप से वर्णित है। संविधान अर्थात सिद्धांत जिन्हे हम सभी भारतीयों ने न केवल व्यक्ति विकास के लिये बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विकास को ध्यान में रखकर के 26 नवम्बर 1950 को सहर्ष आत्मार्पित किया है। जहाँ एक तरफ संविधान ने रीति-रिवाजों, परम्पराओं और धर्म को बनाए रखने की स्वतंत्रता दे रखी है। वहीं दूसरी ओर हमने अपने सिद्धांतों (संविधान) में अंधविश्वास को समाज से दूर रखने (फैंकने) का निर्णय लिया है। क्योंकि जहाँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, वहाँ अंधविश्वास का अस्तित्व ही नही है। ठीक वैंसे ही जैसे जहाँ प्रकाश है वहाँ अँधेरा संभव नही है। और बिना प्रकाश के चारों और गहन अँधेरा पसर जाता है। इस तरह से अंधविश्वास और वैज्ञानिक दृष्टकोण एक-दूसरे के विरोधी हैं। अंधविश्वास न सिर्फ सामाजिक और राष्ट्रीय विकास में अवरोध उत्पन्न करता है। बल्कि वह साथ ही साथ व्यक्ति के मानसिक, आर्थिक और शारीरिक विकास में भी अवरोध उत्पन्न करता है। इसी कारण अंधविश्वास का समाज के बीच में रहना सभी के लिए हानिकारक है।

वर्तमान समय में कुछ लोग मुझे एक दूसरे को अंधविश्वासी कहते हुए मिले। मानो एक दूसरे को गाली दे रहे हों ! मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि इस शब्द (अंधविश्वासी) को सुनने वाला सच में उसी तरह से प्रतिक्रिया दे रहा था। जैसे कि सच में सामने वाले ने उसे उपशब्द कहें हों ! तो क्या अंधविश्वास समाज के लिए एक बुराई है ? अंधविश्वासी होना अपने आप में एक गाली है ? जी हाँ, अंधविश्वास एक सामाजिक बुराई है। कहने को तो यह जीवन के किसी एक पहलु से प्रारम्भ होता है। और यही स्थिति बने रहने की वजह से पूरी जिंदगी अंधविश्वास की कारागाह में गुजर जाती है। अंधविश्वास की कारागाह अशिक्षा के कारण उत्पन्न होती है। परन्तु आम लोगों की अंधविश्वास के प्रति यह सोच है कि अंधविश्वास भ्रम में जीने वालों का अपना एक विश्वास होता है। जो उन्हें हमेशा के लिए भ्रमित बनाए रखता है। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है। क्योंकि किसी भी वैज्ञानिक निष्कर्ष के प्रति हमारा विश्वास एक भ्रम ही है जो वर्तमान समय तक नहीं टूटा। जिसकी भविष्य में गलत होने की सम्भावना बनी रहती है। इसलिए हम उसके अपने व्यक्तिगत विश्वास को अंधविश्वासी होने का कारण नहीं मान सकते।


जैसा की हमने ऊपर लिखा है कि जिस तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रकाश से संबंध है ठीक उसी तरह से अंधविश्वास का अंधकार से संबंध है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और शिक्षा का आभाव अंधविश्वास को जन्म देता है। तो क्या फिर आम लोगों की यह अवधारणा गलत है कि अंधविश्वासी मनुष्य का अंधविश्वास उनका अपना विश्वास होता है ? जी हाँ, आम लोगों की यह अवधारणा गलत है। तो अब प्रश्न ये उठता है कि अंधविश्वास की वास्तविकता क्या है ? तो सुनिए जिसे आप अंधविश्वासी मनुष्य का उसका अपना विश्वास कहते हैं। वह उसका किसी और के प्रति प्रेम, आदर, संस्कार, रीति-रिवाज, परम्पराएँ, कला या उसकी अपनी सहजता या आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में आपके द्वारा उसको अंधविश्वासी कहना सर्वदा अनुचित होता है। आप किसी और से प्रेम न करें, चलेगा। अपनी परम्पराओं का निर्वाह न करें, चलेगा। आपके पास अपनी कोई कला न हो, चलेगा। या फिर आप बिना विषय-वस्तु के भी सहजता महसूस करते हों, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ! परन्तु दूसरों के इस व्यव्हार को आप उसका अंधविश्वास नहीं कह सकते।

एक उदाहरण देकर समझाने की इच्छा रखता हूँ। कोशिश करूँगा कि समझाने में सफल हो सकुं। एक बालक का उसके अपने माता-पिता को आदर देना। नित्य-प्रतिदिन प्रातः काल उनके चरण स्पर्श करना। यह उस बालक का अपने माता-पिता के प्रति प्रेम हो सकता है। या संरक्षण प्राप्त करने की इच्छा हो सकती है। बेशक यह उस बालक का अपने माता-पिता के प्रति विश्वास ही है। जो यह जानता है कि प्रेम के बदले में मुझे भी प्रेम और संरक्षण प्राप्त होगा। और यदि वह बालक निःस्वार्थ प्रेम किये जा रहा है। तब तो ये उस बालक के अपने संस्कार हैं। आप उस बालक के विश्वास या संस्कार को अंधविश्वास नहीं कह सकते। इसके बाबजूद यदि आप ऐसा कहते हैं तो ये आपके अपने शब्दकोष में शब्दों की कमी कहलाएगी। या फिर यह आपकी अंधविश्वास को न पहचान पाने की असमर्थता कहलाएगी। बाजार में एक नई तकनीक का मोबाइल फोन आ जाने से यह जरुरी नहीं है कि हम सभी उस नई तकनीक का उपयोग करें। समय के साथ न चल पाने की असमर्थता अंधविश्वास नहीं कहलाती। हमको इस अंधविश्वास की पहचान करना आना चाहिए। ताकि स्वयं और समाज दोनों का भला हो सके।

इस अंतिम गद्यांश में हम यह भी जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर किन कारणों के चलते अंधविश्वास व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हानिकारक होता है। अंधविश्वास के अपने तीन चरण होते हैं। जिसके आधार पर हम उसके कुप्रभाव और उस प्रभाव के बने रहने तक का समय निर्धारित कर सकते हैं।
  1. जिस कार्य, कार्यशैली या तरीका को आप आजमा रहे हैं। उसे आप दूसरों को भी करने की सलाह देते हैं। या उस कार्य, कार्यशैली या तरीके में दूसरों की सहभागिता की अपेक्षा रखते हैं।
  2. आपके सुझाव को दूसरों के द्वारा अपनाए जाने के बाद भी आपके और दूसरों के परिणाम में कोई मेल न होने के बाबजूद आप स्वयं या किसी और को वही सुझाव अपनाने की सलाह देते हैं।
  3. और जब आप एक समान परिणाम प्राप्त न होने का कारण संयोग न बन पाना (अर्थात अनुकूलित परिस्थिति का आभाव होना) मानते हैं। तब तो आप पूर्ण रूप से अंधविश्वासी हैं।
जबकि पहले और दूसरे चरण तक आप अंधविश्वासी नहीं कहलाते। परन्तु उन स्थितियों में अंधविश्वास आप पर हावी हो रहा होता है। कहने का सीधा सा अर्थ है कि जब तक आप अपने कार्य में दूसरों को सम्मलित नहीं करते हैं। तब तक आप किसी भी सूरत में अंधविश्वास वाला कार्य नहीं कर रहे होते। दूसरों के सम्मलित हो जाने मात्र से आपका कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आने की सम्भावना बन जाती है। हॉलीवुड की फिल्म अपोलो 13 में मिशन अपोलो 13 के डायरेक्टर को अपनी प्रिय जैकिट का इंतज़ार करते हुए दिखाया गया है। वहीं उनके सहभागी मित्र उनका मज़ाक उड़ाते हुए उस इंतज़ार को अंधविश्वास का नाम देते हैं। उनका उस जैकिट के लिए इंतज़ार अंधविश्वास नहीं है। वह उनकी अपनी सहजता है। बेशक उस सहजता का कारण उस जैकिट का रंग या उस जैकिट में उचित स्थान पर जेब (Pocket) का होना हो सकता है। या ये भी हो सकता है उन डायरेक्टर का उस जैकिट के प्रति मोह हो ! जिस तरह से हम किसी भी कारण को पुख्ता रूप से नहीं कह सकते हैं। ठीक उसी तरह से हम उस सहजता को अंधविश्वास का नाम नहीं दे सकते हैं। और ऐसा करना सर्वदा अनुचित होगा।

अंधविश्वास का सबसे बुरा प्रभाव यह है कि बिना कारण या आवश्यकता के चलते लोगों में एक रूपता आने लगती है। फलस्वरूप लोगों में कटटरता, कला का आभाव, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में कमी, सहजता में कमी और नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आभाव समाज में देखने को मिलने लगता है। जो समाज के लिए हानिकारक है। वर्तमान में लोगों के लिए यह जरुरी है कि वे अपने रीति-रिवाजों और परम्पराओं को पहचाने। और अंधविश्वास का समाज से बहिष्कार करें। इसके लिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम अपने बड़े-बुजुर्गों से प्रत्येक रीति-रिवाजों और परम्पराओं को करने कारण पूछें ? हम स्वयं अपने स्तर में उनका कारण खोजें। और जो रीति-रिवाज और परम्पराएँ अनुकूलित परिस्थिति आधारित पाई जाती हैं। उनका हम बहिष्कार करें। क्योंकि उन रीति-रिवाज और परम्पराओं को करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। इसके बाबजूद आपको उन्हें करने में ख़ुशी प्राप्त होती है। तो बेशक आप उन्हें निरंतर बनाए रख सकते हैं। किन्तु अब से उन्हें रीति-रिवाज और परम्पराओं का नाम देना छोड़ दें।

ध्यान देने योग्य बिंदु : तीसरा चरण अपने आप में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जो लोगों को भ्रमित करता है। और अपनी सोच को वैज्ञानिक सोच ठहराने में बल देता है। यह लोगों में झूठा विश्वास उत्पन्न करता है। बेशक यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि परिस्थिति (घटक) बदल जाने से परिणाम भी बदल जाते हैं। अर्थात एक समान परिणाम प्राप्त नहीं हो सकते हैं। परन्तु इस स्थिति में व्यक्ति विशेष को भिन्न घटक नहीं माना जा सकता। इसलिए इस स्थिति में यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं कहलाएगा।

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