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ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त परिचय

हबल दूरदर्शी के रजत जयंती दिवस के उपलक्ष्य पर "ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त परिचय" आपके सामने प्रस्तुत है। जैसा हम सभी जानते हैं कि हमें सुदूर स्थित प्रत्येक खगोलीय पिंड की सारी जानकारी उस पिंड से आने वाले प्रकाश द्वारा प्राप्त होती है। परन्तु इन नग्न आँखों के लिए वे सभी आकाशीय पिंड एक समान होते हैं। क्योंकि हम उन आकाशीय पिंडों अथवा तंत्रों में उनकी गति, स्थिति, आकृति, आकर, घटक और उनमें होने वाले परिवर्तन के आधार पर भेद नहीं कर सकते हैं। परन्तु आज हम ब्रह्माण्ड का अंतरिक्ष की गहराई तक जो अध्ययन कर पाते हैं। वो इन्ही जैसी शक्तिशाली दूरबीनों के सहयोग से संभव हो पाता है। आज का लेख ब्रह्माण्ड और उसके अवलोकन पर आधारित है। ताकि गति, स्थिति, आकृति, आकर, घटक और परिवर्तन के आधार पर सभी आकाशीय पिंडों के भेद को पढ़ाया और समझाया जा सके।

ब्रह्माण्ड उस विशाल निकाय को परिभाषित करने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला शब्द है, जिसमें शामिल होने के लिए ऐसा कुछ भी शेष नहीं रह जाता। जो अस्तित्व रखता हो। वर्तमान में हम ब्रह्माण्ड को खुला निकाय के रूप में परिभाषित करते हैं। क्योंकि हमें ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की वृद्धि के संकेत देखने को मिलते हैं। इसलिए हम कहते हैं कि ब्रह्माण्ड में प्रसार हो रहा है। जो कभी संकुचित रहा होगा। ब्रह्माण्ड किसे कहते हैं ? इसे आप हमारे पिछले लेख में पढ़ सकते हैं।

घटक : किसी भौतिक संरचना के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली सामग्री घटक कहलाती है। याद रहे घटक के लिए यह जरुरी नहीं है कि वह उस भौतिक संरचना में अपनी मौजूदगी दर्शाए। अर्थात घटक बाह्य कारक भी हो सकते हैं। घटक को निर्माण की सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है। घटक उस मूल तत्व के रूप होते हैं जिससे भौतिक संरचना का निर्माण होता है।
  1. ऊर्जा : कार्य करने की क्षमता को ऊर्जा कहते हैं। बिना ऊर्जा के किसी भी तरह से कार्य करना संभव नहीं होता है। अर्थात ऊर्जा ब्रह्माण्ड का प्रमुख घटक है। ऊर्जा न सिर्फ ब्रह्माण्ड के निर्माण के लिए आवश्यक घटक है बल्कि ऊर्जा ब्रह्माण्ड के विस्तार के लिए भी आवश्यक है। ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की सतत वृद्धि ब्रह्माण्ड के अंत का कारण भी बन सकती है। अर्थात ब्रह्माण्ड के साथ एक ऐसी स्थिति भी बन सकती है। जिसके बाद समझ लो ब्रह्माण्ड का अंत ही हो गया है। क्योंकि तब आकाशगंगा एक दूसरे से इतनी दूर हो जाएंगी कि आकाशगंगा का एक दूसरे से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रह जाएगा। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड के ताप में अत्यधिक कमी आएगी। और ब्रह्माण्ड का अंत अंततः शीतलन के रूप में होगा। ऊष्मा, ऊर्जा के अनेक रूपों में से एक है।
  2. पदार्थ : जो स्थान घेरता है उसे द्रव्य (Matter) कहते हैं। और द्रव्य के आयतन की माप को हमेशा पदार्थ की उपस्थिति के रूप में जाना जाता है। अर्थात द्रव्य और उसके बीच का अंतरिक्ष सम्मलित रूप से पदार्थ का निर्माण करते हैं। हम पदार्थ के सभी अवयवी अणु, परमाणु अथवा यौगिक में एक रूपता को खोजने का प्रयास करते हैं। और जब अणु, परमाणु अथवा यौगिक में एक रूपता देखने को मिल जाती हैं। तब हम उस पदार्थ को उसी अणु, परमाणु अथवा यौगिक के नाम से जानने लगते हैं। उदाहरण के लिए पानी (पदार्थ) को यौगिक के नाम से जाना जाता है। जबकि लोहा (पदार्थ) को अणु के नाम से जाना जाता है।
  3. अंतरिक्ष : वर्तमान ज्ञान (गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा) के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एक सूक्ष्म पिंड से हुई है। उसके पहले अंतरिक्ष का कोई अस्तित्व नहीं था। और न ही उस स्थिति में अंतरिक्ष का कोई अर्थ निकलता है। अंतरिक्ष ही वह घटक है जिसने परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। अर्थात अंतरिक्ष न सिर्फ पदार्थ के निर्माण में योगदान देता है बल्कि पदार्थ उस अंतरिक्ष का अधिग्रहण (घेरता) भी करता है। हम जिस अंतरिक्ष को कहते हैं कि वह कुछ भी नहीं है। परन्तु वर्तमान ज्ञान के अनुसार हम उस अंतरिक्ष में श्याम ऊर्जा (ब्रह्माण्ड का 68% भाग) और श्याम पदार्थ (ब्रह्माण्ड का 27% भाग) की उपस्थिति की सम्भावना जताते हैं। अर्थात निर्देशित अंतरिक्ष में या तो श्याम ऊर्जा अथवा श्याम पदार्थ उपस्थित रहता है। फलस्वरूप इस अंतरिक्ष का तापमान भी परम शून्य नहीं होता है। और यही वो अंतरिक्ष है। जो भौतिक राशियों के निर्माण में भी योगदान देता है। इसकी अनुपस्थिति में भौतिकीय राशियों का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
रजत जयंती वर्ष पर विशेष प्रस्तुति
अवयव : प्रत्येक भौतिक संरचना अपने अवयवी भौतिकता के रूपों में विखंडित होती है। अर्थात सभी अवयव भौतिक संरचना के आंतरिक भौतिकता के रूप होते हैं। अवयव को विखंडन से प्राप्त सामग्री के रूप में परिभाषित किया जाता है। यदि हम थोड़ा गौर करें, तो हम पाते हैं कि अवयव भौतिक संरचना की अवस्था को दर्शाते हैं। अर्थात ब्रह्माण्ड उस अवस्था से भी गुजरा है जब न तो कोई तारा था और न ही कोई आकाशगंगा थी। महाविस्फोट के परिणाम स्वरुप एक समय के बाद परमाणु से लेकर विशाल तारों तक का निर्माण हुआ है। अर्थात नीचे लिखे गए सभी भौतिकता के रूप ब्रह्माण्ड के अवयव हैं।
  • तंत्र : भौतिकता का वह रूप जो इकाई अथवा इसके रूपों से निर्मित होता है। जिसे एक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। तंत्र कहलाता है। ब्रह्माण्ड में कई प्रकार के तंत्र हैं। जो ग्रह, उपग्रह तथा तारों द्वारा निर्मित होते हैं। इन तंत्रों की पहचान तंत्रों को निर्मित करने वाले अवयवी पिंडों की गति पर निर्भर करती है। फलस्वरूप एक ही प्रकार के अवयवी पिंडों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार के तंत्रों का निर्माण होता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण आपको लेख में पढ़ने को मिलेगा।
  1. मंदाकिनी / आकाशगंगा : यह भौतिकता का सबसे बड़ा तंत्र है। जो मुख्यतः तारों से निर्मित होता है। इस तंत्र में अन्य कई प्रकार के तंत्र (मंदाकिनी पुंज, तारामंडल, सौरमंडल आदि), गैस और धूल के कण शामिल होते हैं। कहा जाता है कि आकाशगंगा के केंद्र में श्याम विवर होता है। आकाशगंगा का शेष भाग इसी केंद्र (श्याम विवर) की परिक्रमा करता है। आकाशगंगा अपनी आकृति के आधार पर तीन प्रकार की होती हैं। शेष जानकारी को आप इस लेख में पढ़ सकते हैं। सर्पिलाकार मंदाकिनी अपेक्षाकृत सबसे बड़ी होती है। सर्पिलाकार आकाशगंगा के केन्द्र की आकृति के आधार पर सर्पिलाकार आकाशगंगा की अवस्थाएँ (मंदाकिनी पुंज का विस्तार, उसकी परिक्रमण गति, आकाशगंगा की घूर्णन गति और उसका आकार) निर्धारित होती हैं। इन आकाशगंगाओं का केंद्र गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण बिंदु अथवा रेखा की आकृति का होता है। जो सर्पिलाकार आकाशगंगा की नियति निर्धारित करता है।
    E = दीर्घवृत्तीय मंदाकिनी, S = सर्पिलाकार मंदाकिनी
  2. मंदाकिनी पुंज : मंदाकिनी पुंज आकाशगंगा का वह भाग होता है। जो आकाशगंगा की पूँछ के समान दिखाई देता है। इसलिए एक आकाशगंगा में एक से अधिक मंदाकिनी पुंज होते हैं। और प्रत्येक मंदाकिनी पुंज तारामंडल और सौरमंडल जैसे तंत्रों सहित गैस और धूल के कणों से निर्मित होती हैं। दो कारणों के रहते, हमको मंदाकिनी पुंज को जानने-समझने की आवश्यकता हुई। पहला सबसे महत्वपूर्ण कारण कि मंदाकिनी की घूर्णन गति उसके पुंज की परिक्रमण गति से भिन्न होती है। इसलिए मंदाकिनी एक तंत्र है। न की एक इकाई रूप (Uniform) है। और दूसरा कारण कि हम स्वयं की आकाशगंगा (दुग्धमेखला) को एक ही दृश्य में नहीं देख सकते हैं। क्योंकि हम उस दुग्धमेखला आकाशगंगा के ही एक अंग है। इसलिए एक हम एक ही प्रयास में एक संपूर्ण मंदाकिनी का अवलोकन नहीं कर सकते। फलस्वरूप हमने मंदाकिनी के अध्ययन को मंदाकिनी पुंज में बाँट दिया है। हमारी आकाशगंगा के 4 पुंज है।
  3. तारामंडल / नक्षत्र : तारों का ऐसा समूह जिनके बीच की आपसी दूरी लगभग-लगभग स्थिर रहती है। ऐसा समूह तारामंडल या नक्षत्र कहलाता है। अथवा आकाश के किसी एक निश्चित क्षेत्र में स्थिर तारों का ऐसा समूह जो एक साथ गतिमान होता है। तारामंडल कहलाता है। तारामंडल की पहचान कर पाना उस तारामंडल की गति के कारण संभव होता है। उदाहरण : सप्त ऋषि तारामंडल, ओरियन्स, राशियों के तारामंडल आदि, पृथ्वी अपनी परिक्रमा के दौरान जिन तारामंडल के नजदीक से गुजरती है। उन तारामंडल की स्थिति को जिस परिक्रमा की कक्षा द्वारा ज्ञात किया है। उस कक्षा को राशि चक्र (Zodiac) कहते हैं। इसे बारह भागों में बांटा जाता है। परन्तु इसका ये अर्थ नहीं है कि ब्रह्माण्ड में सिर्फ बारह ही नक्षत्र होते हैं। इन तारा नक्षत्रों की पहचान उन तारों को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा अर्थात उस तारामंडल की आकृति द्वारा की जाती है।
  4. ध्यान से देखिये : दोनों तारों की वृत्तीय कक्षा भिन्न-भिन्न है
  5. द्वितारा / द्विसंगी तारा / युग्म तारा : गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के कारण जब दो तारे परस्पर आपस में बंधे हुए होते हैं। तब ऐसे तारे के जोड़े को युग्म तारे कहते हैं। उदाहरण : साइरस-1, युग्म तारे की पहचान तारे की गति को पहचानने के बाद संभव हो पाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पांच प्रकार के ऐसे संयोग बनते हैं। जिससे कि दो तारे युग्म तारे कहलाते हैं। वास्तव में तारे का ऐसा युग्म अपने गुरुत्वीय केंद्र की परिक्रमा करता है। युग्म तारे के द्वारा ऐसी सम्भावना जताई जाती है कि भविष्य के ये दोनों तारे आपस में मिलकर एक बृहद तारे का निर्माण करेंगे।
  6. दोहरा तारा : दोहरा तारा तारों के ऐसे युग्म को कहते हैं या तो जिन तारों की आपसी गति कक्षीय गति का एक हिस्सा होती है या उन दोनों तारों की आपसी गति प्रेक्षक की स्थिति के आधार पर विपरीत होती है। या फिर उन दोनों तारों की गति का अंतर तारों की गति की तुलना में बहुत कम होता है। तारों का ऐसा युग्म दोहरा तारा कहलाता है। वास्तव में दोहरा तारा युग्म तारे की एक विशेष स्थिति है। जो पर्यवेक्षक की स्थिति पर निर्भर करती है। युग्म तारे को दोहरा तारा समझने का कारण कम समय तक युग्म तारे का अवलोकन करना है।
  7. सौर मंडल : आकाशीय पिंडों का ऐसा समूह या तंत्र जिसका मुखिया एक तारा होता है। तारे का परिवार कहलाता है। तारे के परिवार के सभी सदस्य ग्रह, उनके उपग्रह और अन्य सभी आकाशीय पिंड (अवांतर ग्रह) उस तारे की परिक्रमा करते हैं। और इसके साथ ही पूरा परिवार उस तारे के साथ आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा भी करता है। चूँकि हम पृथ्वी के परिवार के मुखिया को सूर्य (तारा) कहते हैं। इसलिए हम पृथ्वी के परिवार का नाम सौर मंडल कहते हैं।
  8. वासयोग्य क्षेत्र : तारों के पास का ऐसा क्षेत्र जहाँ पर जीवन की संभावना व्यक्त की जाती है। उस क्षेत्र को वासयोग्य क्षेत्र कहते हैं। वैसे तो वासयोग्य क्षेत्र कई बिन्दुओं पर आधारित होता है। परन्तु वासयोग्य क्षेत्र प्रमुख रूप से तारे की अवस्था और उस तारे के परिवार में ग्रह होने की सम्भावना को लेकर व्यक्त किया जाता है। कुछ वर्ष पूर्व मित्र तारा (Alpha Centauri) के अपने ग्रह में जीवन की सम्भावना इसी क्षेत्र को ध्यान में रखकर के व्यक्त की गई थी।
  • भौतिकता के रूप : भौतिकता अथवा ब्रह्माण्ड का एक नज़र में अथवा एक बार में परिक्षण कर पाना संभव नहीं है। इसलिए हम ब्रह्माण्ड का परिक्षण कई हिस्सों में करते हैं। और भौतिकता अथवा ब्रह्माण्ड का परिक्षण जिन भौतिक हिस्सों के माध्यम से किया जाता है। ब्रह्माण्ड के उस भौतिक हिस्से को ही "भौतिक के रूप" कहते हैं। वर्तमान में भौतिकता के पांच ज्ञात रूप हैं। जिसे अवयव, कण, पिंड, निकाय (बंद या खुला) और निर्देशित तंत्र (जड़त्वीय या अजड़त्वीय) कहते हैं। भौतिकता के सभी रूप इकाई या इकाई रूप में होते हैं। याद रहे भौतिकता के सभी रूप भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित होते हैं। इन सभी को एक मान लेना हमारी सबसे भूल होती है। आइये इनकी आपसी भिन्नता को समझने का प्रयास करते हैं।
  1. श्याम विवर : श्याम विवर एक ऐसा पिंड होता है। जिसे उसके आयतन के लिए नहीं बल्कि उसे उसके घनत्व के लिए जाना जाता है। इसलिए एक निश्चित आयतन में श्याम विवर के पदार्थ की मात्रा अपेक्षाकृत बहुत अधिक होती है। फलस्वरूप श्याम विवर में गुरुत्वाकर्षण बल का मान बहुत अधिक होता है। श्याम विवर को उसके क्षेत्र और उसके पदार्थ के अनुरूप अलग-अलग रूपों में देखा जाता है। श्याम विवर के क्षेत्र के अनुरूप श्याम विवर को एक नए ब्रह्माण्ड के जन्म के रूप में जाना जाता है। जबकि उसके पदार्थ के अनुरूप श्याम विवर को एक दानवकार पिंड माना जाता है। जिसके क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद प्रकाश भी लौटकर नहीं आ सकता। माना जाता है कि श्याम विवर भी गति करते हैं। श्याम विवर के अस्तित्व की जानकारी हमें उसके अधिक घनत्व के कारण उत्पन्न प्रभाव से प्राप्त होती है। अर्थात अंतरिक्ष में जब अधिक घनत्व के कारण कोई गोलीय रिक्तता दिखाई देती है। तब हम वहां श्याम विवर के होने की संभावना जताते हैं। श्याम विवर को तारे की अवस्था के रूप में भी जाना जाता है। इसके अनुसार श्याम विवर (कृष्ण क्षेत्र) एक क्षेत्र है न कि पदार्थ से बना हुआ एक पिंड है।
  2. नीहारिका : तारों के मध्य के अंतरिक्ष (अंतरतारकीय माध्यम) में स्थित ऐसे बादल जो धूल, हाइड्रोजन, हीलियम और अन्य आयनीकृत प्लाज़्मा गैस से बने होते हैं। ऐसे बादल नीहारिका कहलाते हैं। एक समय सभी खगोलीय विस्तृत संरचनाओं को नीहारिका कहा जाता था। यहाँ तक की आकाशगंगाओं को भी नीहारिका कहा जाता था। एडविन हबल दूरबीन के सहयोग से ही हमें ज्ञात हुआ कि आकाशगंगा और नीहारिका दोनों भिन्न-भिन्न खगोलीय तंत्र और पिंड हैं। उदाहरण के लिए देवयानी आकाशगंगा को पहले देवयानी नीहारिका के नाम से जाना जाता था। नीहारिकाओं के माध्यम से ही तारे और सौरमण्डलीय तंत्रों का निर्माण होता है। चील नीहारिका इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
  3. तारा : तारा एक ऐसा खगोलीय पिंड है। जो स्वयं के प्रकाश से दीप्तिमान होता है। तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। फलस्वरूप तारे का अपना प्रकाश होता है। तारे मुख्य रूप से हाइड्रोजन और हीलियम गैस से बने होते हैं। एक समय के बाद तारे में संलयन और विखंडन की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है। क्योंकि तारे की सम्पूर्ण हाइड्रोजन गैस हीलियम में परिवर्तित हो जाती है। तारे का अपना एक जीवन होता है। तारे की अवस्थाओं को उनका चरण कहा जाता है। क्योंकि तारे की अवस्थाओं का एक निश्चित क्रम तो होता है। परन्तु प्रत्येक तारा इन सभी चरणों का पालन करे यह जरुरी नहीं होता है। अर्थात किसी तारे का जीवन तीन चरण में पूरा हो जाता है। तो किसी तारे का जीवन पांच चरण में पूरा होता है। परन्तु उन चरणों का क्रम कभी नहीं बदलता। वैज्ञानिकों के अनुसार सात प्रकार के संभावित जीवन है। जिनमें से तारा किसी एक प्रकार के चरण आधारित जीवन को पूरा करता है। रात के समय साफ़ आसमान में दिखाई देने वाले तारे वास्तव में गोलाकार होते हैं। न कि अक्सर हम जिस तरह से कागज में तारे को बनाते हैं। उस तरह से पांच-छः नुकीले त्रिभुज से निर्मित होने वाली संरचना के समान तारे नहीं होते।
  4. स्पंदन तारा : जब अधिनव तारे (Supernova Star) का निर्माण कम द्रव्यमान के रूप में होता है। तो वह तारा पूर्ण रूप से विखंडित (विस्फोटित) न होकर जिस तारे का निर्माण करता है। उस तारे को न्यूट्रॉन तारा कहते हैं। ऐसे तारे जब विकिरण का उत्सर्जन अत्याधिक चुंबकीय प्रभाव में रहते हुए तेजी से घूर्णन करते हैं। तब ऐसे न्यूट्रॉन तारों को हम स्पंदन तारे कहते हैं। इन तारों की उपस्थिति का ज्ञान हमको उनसे आने वाले विकिरण से प्राप्त होता है। अवलोकन से प्राप्त जानकारी के अनुसार वास्तव में इन तारों के विकिरण की दिशा परिवर्तित होती रहती है। जो एक क्षण के लिए पृथ्वी की ओर होती है। और एक निश्चित समय के बाद विकिरण की दिशा पुनः एक क्षण के लिए पृथ्वी की ओर हो जाती है। फलस्वरूप नग्न आँखों से ये तारे फैलते और सिकुड़ते (दिल के धड़कने के समान) दिखाई देते हैं। जो महज एक भ्रम के सिवाय कुछ भी नहीं है।
    स्पंदन तारा : न्यूट्रॉन तारे का निर्माण और उसकी वास्तविकता
  5. चर कांति तारा / परिवर्ती तारा : ऐसे तारे जिनकी चमक समय के साथ बदलती रहती है। उन तारों को चर कांति तारा अथवा परिवर्ती तारा कहा जाता है। चूँकि इन तारों की चमक में कोई एक निश्चित प्रतिमान (Pattern) देखने को नहीं मिलता है। इसलिए इन तारों को स्पंदन तारे से अलग माना जाता है। इन तारों की चमक परिवर्तन के कारणों को दो भागों में विभक्त किया जाता है। पहले भाग में ऐसे कारणों का अध्ययन किया जाता हैं। जो उस तारे की अवस्था परिवर्तन (फैलना और सिकुड़ना) के लिए जिम्मेदार होते हैं। जबकि दूसरे भाग में ऐसे कारणों का अध्ययन किया जाता है। जिसके अनुसार उस तारे का प्रकाश हमारे पास तक क्यों नहीं पहुंचता रहा है ? अथवा उस प्रकाश की तीव्रता की कमी के क्या-क्या कारण हो सकते हैं ?
  6. विशिष्ट तारा : ऐसे तारे जिनका अध्ययन उसके रासायनिक पदार्थों को जानने के लिए किया जाता है। विशिष्ट तारे कहलाते हैं। इन तारों की ऊपरी सतह में ही असामान्य धातुओं की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। चूँकि हम एक बार में ही इन तारों के उस असामान्य पदार्थ को ज्ञात नहीं कर सकते हैं। जिसको जानने के लिए हम अध्ययन करते हैं। इसलिए ऐसे तारे विशिष्ट तारे कहलाते हैं। हो सकता है कि हम जिस तारे का अध्ययन उसके असामान्य पदार्थ को जानने के लिए कर रहे हैं। उस पदार्थ को हम पहले से जानते हों। वास्तव में हम इन तारों का अध्ययन परिसीमन के कार्य के लिए करते है। जिससे की जिस ताप को हम पृथ्वी पर प्रयोग के लिए निर्मित नहीं कर सकते। उस ताप पर रासायनिक पदार्थों की प्रक्रिया का अध्ययन हम इन तारों के अध्ययन द्वारा कर पाते हैं।
  7. ग्रह : ग्रह ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं। जिनका स्वयं का प्रकाश नहीं होता है। जिनकी स्वयं की एक निश्चित कक्षा होती है। ये सभी पिंड किसी न किसी तारे की परिक्रमा करते हैं। और तारों के प्रकाश को परावर्तित करके स्वयं की उपस्थिति का बोध कराते हैं। ग्रह कहलाते हैं। माना जाता है कि ग्रहों का निर्माण नीहारिकाओं के आदिग्रह चक्र से होता है। अर्थात जब नीहारिकाओं से आदिग्रह चक्र का निर्माण होता हैं। तब आदिग्रह चक्र की घूर्णन गति ग्रहों के निर्माण के लिए सहयोगी सिद्ध होती है।
    सौरमंडल (तारा), ग्रह, उपग्रह, क्षुद्रग्रह, धूमकेतु और वलय
  8. उपग्रह : उपग्रह ऐसे आकाशीय पिंड होते हैं जो अपने ग्रहों के साथ-साथ किसी तारे की भी परिक्रमा करते हैं। इन पिंडों का भी अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। ये पिंड भी अपने ग्रहों की भांति प्रकाश को परावर्तित कर अपनी उपस्थिति का बोध कराते हैं। इन पिंडों का निर्माण भी आदिग्रह चक्र के घूर्णन से होता है। उपग्रह की उत्पत्ति का एक और कारण ग्रहों से उल्कापिंडों का टकराना माना जाता है। जिस तरह से किसी तारे के परिवार में एक से अधिक ग्रह हो सकते हैं। ठीक उसी तरह से किसी ग्रह के एक से अधिक उपग्रह भी हो सकते हैं। हो सकता है किसी ग्रह के एक भी उपग्रह न हों। इसका सबसे अच्छा उदाहरण बुध और शुक्र ग्रह हैं।
  9. क्षुद्रग्रह / अवांतर ग्रह : जब किसी परिक्रमण कक्षा में एक से अधिक छोटे-छोटे आकाशीय पिंड गति करते हैं। तब उन छोटे-छोटे आकाशीय पिंडों को क्षुद्रग्रह अथवा अवांतर ग्रह कहते हैं। ये सभी आकाशीय पिंड एक ही दिशा में एक दूसरे से एक निश्चित अंतराल बनाकर गति करते हैं। ऐसा माना जाता है कि अवांतर ग्रह की उत्पत्ति का कारण उल्कापिंड है। जब कभी एक ग्रह में एक बड़ा सा उल्कापिंड टकराया होगा। तो उसी ग्रह की परिक्रमण गति की दिशा में उसी ग्रह के टुकड़े गति करने लगे होंगे। फलस्वरूप इस तरह से अवांतर ग्रह की उत्पत्ति हुई होगी। और ये भी हो सकता है कि अवांतर ग्रह वे आकाशीय पिंड हैं जो कभी किसी ग्रह के हिस्सा ही नहीं रहे हों। बल्कि आदिग्रह चक्र का यह हिस्सा कभी ग्रह के रूप में विकसित ही न हो पाया हो। वर्तमान में हमारे सौरमंडल में इन अवांतर ग्रह की स्थिति मंगल और बृहस्पति ग्रह के मध्य में है। एक क्षुद्रग्रह का नाम कल्पना चावला जी के नाम पर भी रखा गया है।
  10. धूमकेतु / पुच्छल तारा : ऐसे आकाशीय पिंड जो एक सौरमंडल से दूसरे सौरमंडल का अथवा एक सौरमंडल से अंतरतारकीय माध्यम (किन्ही दो या दो से अधिक तारों के परिवार के मध्य का अंतरिक्ष) तक की परिक्रमा करते हैं। धूमकेतु अथवा पुच्छल तारा कहलाते है। वास्तव में इस पिंड की न ही कोई पूंछ होती है। और न ही यह एक तारा है। वास्तव में यह पिंड बर्फ, गैस और धूल के कणों से बना होता है। फलस्वरूप जब यह पिंड सूर्य के नजदीक से गुजरता है। तो सूर्य की ऊष्मा के कारण पिघलती हुई बर्फ चमकने लगती है। जिसके कारण हमें एक भ्रम होता है कि यह उसी पिंड का प्रकाश है। इसलिए हम उस पिंड को तारे की संज्ञा देते हैं। उस पिंड की गति के कारण पिघलते बर्फ की पूंछ बन जाती है। इसलिए हम धूमकेतु को पुच्छल तारा भी कहते हैं। चूँकि इन पिंडों की कक्षा अन्य ग्रहों की कक्षा को काटती है। इसलिए हम इन पिंडों को ग्रह की संज्ञा नहीं देते हैं। भले ही इनकी एक निश्चित कक्षा और एक निश्चित परिक्रमण का ही क्यों न हो ! उदाहरण : हेली का धूमकेतु (परिक्रमण काल = 76.8 वर्ष)
  11. उल्कापिंड : बाहरी अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमण्डल में प्रवेश करने वाले धूलकण अथवा पत्थर के ऐसे टुकड़े जो अत्याधिक घर्षण के कारण गर्म हो जाते हैं। और जिनका क्षरण (भस्म) होने लगता है। पृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले शेष भाग को उल्कापिंड कहते हैं। इनकी अपनी कोई निश्चित दिशा नहीं होती है। और न ही ये पिंड अंतरिक्ष में सूर्य की परिक्रमा करते है। जब घर्षण के कारण यही गर्म पिंड पृथ्वी की ओर गिरते दिखाई देते हैं। तो इन्ही को टूटता हुआ तारा कहा जाता है। वास्तव में ये पिंड भी तारे नहीं होते हैं। और न ही इनका अपना कोई प्रकाश होता है। यह चमक केवल घर्षण के कारण उत्पन्न होती है।
  12. वलय / छल्ला : धूल, बर्फ, पत्थर और अन्य पदार्थों से निर्मित ऐसे पिंड जो वृत्तीय गति करते हुए किसी अन्य बड़े पिंड (ग्रह अथवा उपग्रह) की परिक्रमा करते हैं। तब ऐसी संरचना को वलय अथवा छल्ला कहते हैं। हमारे सौर परिवार में चार ग्रहों बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण के पास अपने-अपने वलय हैं। इसलिए इन्हे उपग्रही छल्ला भी कहते है। हमारे सौरमंडल में शनि का वलय सबसे बड़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन वलय के निर्माण का कारण भी क्षुद्रग्रह के निर्माण के समान ही है। परन्तु इन वलयों (उपग्रही छल्ला) का आकार क्षुद्रग्रह की कक्षा से अपेक्षाकृत काफी छोटा होता है।
घटनाएँ : ब्रह्माण्ड के अवयव और घटकों के आपसी संयोग को घटना कहते हैं। इन घटनाओं का परिणाम सदैव मापने और गणना करने योग्य होता है। ब्रह्माण्ड में भौतिक और रासायनिक दो प्रकार के संयोग बनते हैं। फलस्वरूप उन क्रियाओं के अनुसार ही परिणाम प्राप्त होते हैं। हम लेख में सिर्फ भौतिक क्रियाओं के बारे में लिखेंगे। जो निम्न हैं।
  1. तारकीय आंधी : जब किसी तारे से अंतरिक्ष में प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन और भारी धातुओं के परमाणुओं का प्रवाह होता है। तो ऐसे शक्तिशाली पदार्थ के प्रवाह को तारकीय आंधी कहते हैं। इस आंधी का प्रवाह 20 से 2000 कि. मी. प्रति सेकंड तक होता है। हमारे सौरमंडल के मुखिया सूर्य से भी तारकीय आंधी उत्पन्न होती है। जिसकी गति लगभग 200 से 700 कि. मी. प्रति सेकंड तक होती है। तारकीय आंधी से कृत्रिम उपग्रह में काफी नुकसान होता है। तारकीय आंधी में अत्याधिक गति होने के कारण ये तूफ़ान काफी शक्तिशाली होते हैं।
  2. ध्रुवीय ज्योति : आसमान में ध्रुवों की ओर आयन मंडल में जो रंग-बिरंगी प्रभा दिखाई देती है। उसे ध्रुवीय ज्योति कहते हैं। ध्रुवीय ज्योति का यह सुन्दर दृश्य सूर्य की विकिरण द्वारा आयनित गैस के कारण दिखलाई देता है। वास्तव में ध्रुवीय ज्योति की घटना में न सिर्फ दृश्य प्रकाश दिखलाई देता है। बल्कि इस घटना में पराबैगनी और अवरक्त प्रकाश की भी उत्पत्ति होती है।
    दक्षिणी ध्रुव में ध्रुवीय ज्योति की घटना सन-2011
  3. ग्रहण : जब किसी पिंड के परिप्रेक्ष्य (प्रेक्षक) किसी दूसरे पिंड के अवलोकन (देखने पर) में किसी अन्य तीसरे पिंड के कारण बाधा उत्पन्न होती है। तो उस परिप्रेक्ष्य पिंड के सापेक्ष ऐसी घटना को ग्रहण होना कहते हैं। ग्रहण की घटना के लिए सबसे आवश्यक शर्त यह है कि हम जिस पिंड का अवलोकन करना चाहते हैं या तो वह पिंड अथवा अवलोकन में बाधा उत्पन्न करने वाला पिंड एक तारा अर्थात स्वयं के प्रकाश से प्रकाशित होने वाला पिंड होना चाहिए। चूँकि हम पृथ्वी से अन्य ग्रहों का अवलोकन करते हैं। फलस्वरूप चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। वास्तव में ग्रहण आकाशीय पिंडों की स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले विशेष संयोग है। इसलिए चंद्रग्रहण हमेशा रात के समय में पूर्णिमा के दिन होता है। और वहीं सूर्यग्रहण हमेशा दिन के समय अमावस्या के दिन होता है।
इतना सब जान लेने के बाद भी चूँकि हम ब्रह्माण्ड की संरचना को निर्धारित नहीं कर सकते हैं। इसलिए विज्ञान में तथ्यों पर आधारित कई अवधारणाओं का जन्म होता है। उन तथ्यों के द्वारा ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्य से जुड़ी भविष्यवाणियाँ की जाती है। यदि वे तथ्य अवलोकन के आधार पर गलत पाए जाते हैं। तो उन भविष्यवाणियों से जुड़ी अवधारणाओं को भी गलत मान लिया जाता है। और इस तरह से हम ब्रह्माण्ड को गतिशील ब्रह्माण्ड के रूप में प्रमाणित करते आ रहे हैं।

शिक्षा किसे कहते हैं ?

शिक्षा किसे कहते हैं ? इसको जानने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप आठ-दस लोगों के समूह में यह निश्चित करने का प्रयास करें कि बच्चों की शिक्षा का स्वरुप क्या होना चाहिए ? बच्चों को किस विषय के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए ? आप पाएंगे कि आपको एक मत होने में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा क्यों ? क्योंकि आप में से ही कोई आदर्शों को शिक्षा में शामिल करने की पैरवी कर रहा है। तो कोई विज्ञान को शामिल करने की पैरवी कर रहा है। कोई संस्कारों की बात कर रहा है। तो कोई कला और साहित्य को शामिल करने की पैरवी कर रहा है। इन सबके अलावा विषयों के सम्मलित पाठ्यक्रम पर भी एक मत होना बहुत मुश्किल होता है। दरअसल हमारा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि बच्चों की शिक्षा का स्वरुप कैसा हो ? बच्चों को किस विषय के लिए शिक्षित किया जाना चाहिए ? बल्कि हमारा प्रश्न इस बात को जानने के लिए होना चाहिए कि आखिर हम बाल-बच्चों को क्यों शिक्षित करना चाहते हैं ? शिक्षा का क्या उद्देश्य है ? और जिन विषयों को हम बच्चों की शिक्षा में शामिल करना चाहते हैं, क्या वाकई में हम उन विषयों के द्वारा शिक्षा का उद्देश्य पूरा कर रहे हैं ?

जैसा कि हमने अपने पिछले लेख में लिखा था कि साक्षरता का मतलब यह नहीं होता कि आपसे लोगों की भाषा (शब्दों और उनके अर्थों का ज्ञान) को समझना आता है अथवा नहीं ! साक्षरता का मतलब यह है कि आप उचित शब्दों के प्रयोग से अपनी बात को औरों तक पहुंचा सकते हो अथवा नहीं ? यदि आप ऐसा कर सकते हैं तो आप साक्षर हैं। अब यदि मैं पूंछूं कि शिक्षित कौन है ? तब आप कहेंगे कि जो लोगों को शिक्षित कर सके। यानि कि वह व्यक्ति कदापि शिक्षित नहीं कहलाता है जो सिर्फ पास हुआ हो अथवा जिसने केवल ज्ञान को अर्जित किया हो। शिक्षा वह साधन है जिसको ग्रहण करने वाला व्यक्ति शिक्षा के महत्व को समझने लगता है। और वह लोगों को शिक्षित होने की सलाह अथवा शिक्षित करने लगता है। और तीसरा प्रश्न यह होना चाहिए कि आखिर हम बच्चों को क्यों शिक्षित करना चाहते हैं ? ताकि शिक्षा का उद्देश्य ज्ञात हो सके। क्योंकि शिक्षा का सही महत्व वही व्यक्ति जानता है, जो वास्तव में शिक्षित होता है।


"शिक्षा वह साधन है जिसके माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने भविष्य को निर्धारित करता है। बल्कि बाह्य कारकों के प्रभाव से व्यक्ति के भविष्य को सुरक्षित भी करता है।" शिक्षा के निम्न उद्देश्य हैं। जिनको पढ़कर के आपको ऐसा लगेगा। मानो इसे ही शिक्षा या सीख कहते हैं। वास्तव में इन बिन्दुओं को ध्यान में रखकर के शिक्षा का स्वरुप निर्धारित करना चाहिए। और प्रत्येक विषय की सहभागिता इन्ही उद्देश्यों की पूर्ति को ध्यान में रख कर के सुनिश्चित करनी चाहिए। क्योंकि ये वही कारण हैं जिसके महत्व को जानकर के एक शिक्षित व्यक्ति लोगों को शिक्षित करने का प्रयत्न करता है। न सिर्फ समाज की भलाई के लिए बल्कि वह शिक्षित व्यक्ति स्वयं की भलाई के लिए भी ऐसा करता है।

  1. सर्वप्रथम सबसे पहले हमें अपने सेहत के प्रति सजग रहना चाहिए।
  2. न केवल मनुष्यों बल्कि मशीनों के प्रति भी हमें अपनी निर्भरता को हमेशा कम करने का प्रयत्न करना चाहिए।
  3. किसी भी कार्य के लिए हमें किसी एक युक्ति पर निर्भर नहीं होना चाहिए। अर्थात वैकल्पिक साधनों की खोज हमेशा करते रहना चाहिए। और किसी भी नई वैकल्पिक युक्ति के प्रयोग से नहीं झिझकना चाहिए।
  4. हमें उस भाषा के प्रति अपनी समझ विकसित करनी चाहिए। जिससे कि मनुष्य अपनी आपसी समझ को विकसित कर सके। एक-दूसरे के कहने के अर्थ को समझ सके। यहाँ भाषा का तात्पर्य हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू या बंगाली आदि भाषाओँ से नहीं है। बल्कि अभिव्यक्त करने उस तरीके से है। जिसमें व्यावहारिकता सबसे अधिक होती है।
  5. शिक्षा कभी भी इस बात के लिए नहीं दी जाती है कि फलां चीज सत्य है और फलां चीज असत्य, फलां चीज अच्छाई है और फलां चीज बुराई है। बल्कि शिक्षा तो इस बात के लिए दी जाती है कि हम सत्य-असत्य, अच्छाई-बुराई को पहचान सकें ? उसके प्रभावों को जान सकें। और फिर स्वयं निर्णय ले सकें कि हमारे लिए क्या अच्छाई है और क्या बुराई है ? क्या सत्य है और क्या असत्य है ? साधारण शब्दों में शिक्षा परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। हम्में मानवता का बोध कराती है। इस प्रकार शिक्षा समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।
आपको यह लग सकता है कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना भी तो है। वास्तव में प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना होता है। न की शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा करना होता है। हाँ, इतना जरूर है कि यदि हम शिक्षा के माध्यम से मनुष्य को उसके पैरों पर खड़ा कर पाए। तो यह शिक्षा की सबसे अच्छी प्रणाली कहलाएगी। याद रहे शिक्षा के इन चारों उद्देश्यों की पूर्ति करके भी हम व्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रख सकते हैं। परन्तु मनुष्य की आजीविका के साधन (प्रशिक्षण के माध्यम से) निर्धारित करके हम एक तरह से उनकी स्वतंत्रता को छीनते हैं।

गति, उसकी पहचान और उसके प्रकार

किसी भी विषय-वस्तु की पहचान करना आसान होता है। जबकि उसी विषय-वस्तु को परिभाषित करना अपेक्षाकृत कठिन होता है। क्योंकि किसी भी विषय-वस्तु की पहचान तभी संभव हो पाती है। जब हम पहले से उस विषय-वस्तु से परिचित होते हैं। अन्यथा पहचान करना संभव नहीं है। जबकि परिभाषित करने के लिए जरुरी है कि आप उस विषय-वस्तु को निर्मित करने वाले घटकों को जानते हों। तभी आप उसे परिभाषित कर पाएंगे। अन्यथा घटकों की पहचान किये बिना विषय-वस्तु को परिभाषित करने पर हो सकता है कि आप जाने-अनजाने में किसी और को भी परिभाषित कर रहे हों ! उदाहरण के लिए आप कार्य होता देख, ये तो कह सकते हैं कि यहाँ कार्य हो रहा है। और फलां-फलां व्यक्ति या जीव उस कार्य को कर रहा है। परन्तु आप उस कार्य की परिभाषा आसानी से नहीं दे सकते। आप सरल रेखा तो खींच सकते हैं। किसी दूसरे के द्वारा बनाई गई सरल रेखा की पहचान भी कर सकते हैं। परन्तु सरल रेखा की परिभाषा देना आसान नही है। इसी प्रकार आप व्यक्ति या पिंड को गति करते देख, पहचान सकते हो कि वह व्यक्ति या पिंड गति कर रहा है। परन्तु गति को आप कैसे परिभाषित करोगे ? घटकों की पहचान किये बिना आप पास स्थित पिंड की गति एक घड़ी पहचान भी लोगे, परन्तु दूर स्थित पिंड की गति को कैसे पहचानोगे ? चलो एक घड़ी पृथ्वी के धरातल में होने वाली गतियों को भी पहचान लोगे। परन्तु साफ आसमान या अंतरिक्ष में होने वाली गतियों को कैसे पहचानोगे ? आखिर गति के कौन-कौन से घटक और कारक हैं ? जो गति को निर्मित करते हैं। गति किसे कहते हैं ? गति क्या है ? गति के कितने प्रकार हैं ? आइये इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानते हैं।

गति किसे कहते हैं ?
स्थिति परिवर्तन की माप गति कहलाती है। या पृथ्वी के संदर्भ में स्थान परिवर्तन की माप गति कहलाती है। दोनों परिभाषाओं में सिर्फ इतना सा अंतर है कि दूसरी परिभाषा में धरातल का आभाव नहीं है। जबकि पहली परिभाषा धरातल के आभाव में गति को परिभाषित करती है। अब दूसरा प्रश्न यह है कि गति क्या है ? तो हम बताना चाहते हैं कि गति एक क्रिया है। अर्थात गति के लिए यह जरुरी नहीं है कि जीवित प्राणी ही गति कर सकते हैं। गति तो भौतिकता का गुणधर्म है। अर्थात जिसका भी अस्तित्व है। वे सभी या तो गतिमान हैं या फिर उनमें (अवयवी कणों में) गति हो रही है। क्योंकि किसी कार्य का होना या करना क्रिया कहलाता है। इसलिए सजीव स्वयं की इच्छा से भी गति करते हैं। जबकि निर्जीव कणों अथवा पिंडों में (अवयवी कणों में) निरंतर गति होती है। इसलिए गति की पहचान क्रिया के रूप में की जाती है। हम में से ही कुछ लोगों को लगता है कि जो वस्तु कुछ देर पहले हमारे पास थी। और अब हमसे दूर हो रही है। इसे ही गति कहते हैं। बेशक वह वस्तु गति कर रही है। परन्तु प्रत्येक गतिशील वस्तु हमसे दूर जाए। यह जरुरी नहीं है। अर्थात हमारे पास की वस्तु का हमसे दूर होना। एक विशेष प्रकार की गति का परिणाम है। अब प्रश्न ये उठता है कि गति को निर्मित करने वाले घटक कौन-कौन से हैं ? ये घटक किस पर निर्भर करते हैं ? और अंत में किन आधारों पर गति के प्रकारों का वर्णन किया जाता है ?

गति के घटक :
गति के तीन घटक होते हैं। बल, दिशा और स्थिति तीनों गति के घटक हैं। अर्थात गति इन तीनों घटकों के द्वारा निर्मित होती है। परन्तु गति का प्रदर्शन केवल बल द्वारा ही संभव है। अर्थात बल कारक के रूप में भी कार्य करता है। आइये जड़त्व के नियम द्वारा जानने का प्रयास करते हैं कि कैसे बल द्वारा गति का प्रदर्शन संभव होता है। "यदि कोई वस्तु स्थिर है तो वह स्थिर ही रहेगी और यदि कोई वस्तु गतिमान है तो नियत वेग से गतिशील ही रहेगी। जब तक उस पर कोई परिणामी बाह्य बल न लगाया जाय।" इसे ही गति का प्रथम नियम अथवा जड़त्व का नियम कहते हैं। पहला घटक (बल) गति की दिशा को निर्धारित करता है। अर्थात बल की दिशा ही वस्तु या पिंड की गति की दिशा होती है। और तीसरा घटक (स्थिति) गति की पूरी व्याख्या करता है। यही एक मात्र ऐसा घटक है। जो किन्ही दो वस्तुओं की गति में भेद करता है। परन्तु किन्ही भी दो वस्तुओं की गति में भेद करने से पहले जरुरी है कि हम स्थिति की व्याख्या और पहचान करना सीखें। चूँकि पृथ्वी का धरातल होने के कारण स्थिति निर्धारित करने में कोई समस्या नहीं होती है। इसलिए हम पृथ्वी के धरातल में होने वाली दो गतियों के बीच में भेद कर पाते हैं। परन्तु अंतरिक्ष में निरपेक्ष धरातल के आभाव के कारण होने वाली गतियों के बीच में भेद करना मुश्किल होता है। इसलिए हम अंतरिक्ष में सापेक्ष गति मापते हैं। वास्तव में गति सापेक्षीय होती है। निरपेक्षीय गति का अस्तित्व ही नही है। परन्तु मानव हजारों सालों से गति को निरपेक्षीय मानते आया है। उसके भ्रम का कारण पृथ्वी द्वारा धरातल उपलब्ध होना है। किसी दूसरे पिंड के सापेक्ष गति ज्ञात करने की शर्त सर्वप्रथम सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने मानव जाति को बताई। और ये शर्त इस तथ्य का खंडन करती है कि ब्रह्माण्ड पृथ्वी के समतुल्य नहीं है। बल्कि यह ब्रह्माण्ड विशाल है। जिसमें पृथ्वी से लाखों गुना बड़े पिंड अस्तित्व रखते हैं। और इन बड़े-बड़े आकाशीय पिंडों में बीच में अंतरिक्ष विधमान है। "यदि ब्रह्माण्ड के संदर्भ में यह तथ्य प्रमाणित हो जाता है कि ब्रह्माण्ड ससीम और अपरिवर्तित है। तब हम पुनः गति के निरपेक्षीय होने को एक तथ्य मानने लगेंगे। क्योंकि तब हमारे पास गति को ज्ञात करने के लिए एक निरपेक्षीय आधार (स्थित निर्धारण के लिए अदृश्य धरातल) उपलब्ध हो जाएगा।"

गति के तीन घटक : बल, दिशा और स्थिति
किसी भी वस्तु या पिंड की स्थिति परिवर्तन की माप दो रूपों में ज्ञात होती है। इसलिए स्वाभविक है कि गति के दो रूप होते हैं। गति का पहला रूप वेग (Velocity) है। तथा दूसरा रूप चाल (Speed) है। जहाँ एक तरफ वेग वस्तु या पिंड की क्षणिक गति है। वहीं चाल उन क्षणिक गति का औसतन मान है। इसलिए वेग विस्थापन (Displacement) पर और चाल वस्तु या पिंड द्वारा चली गई दूरी (Distance) पर निर्भर करती है। फलस्वरूप वेग एक सदिश (Vector) और चाल एक अदिश (Scalar) राशि है। याद रहे विस्थापन किन्ही दो बिन्दुओं अथवा स्थानों के बीच की न्यूनतम दूरी को कहते हैं। जबकि किन्ही दो स्थानों के बीच की दूरी माध्यम और उसको तय करने वाले साधनों पर निर्भर करती है। अर्थात मुंबई से चैन्नई के बीच की दूरी जलमार्ग, वायुमार्ग और सड़कमार्ग पर निर्भर करेगी। जबकि मुंबई से चैन्नई की न्यूनतम दूरी (विस्थापन) सदैव जलमार्ग, वायुमार्ग और सड़कमार्ग से तय की गई दूरियों से कम होती है।

घटकों के आधार पर गतियों का वर्गीकरण
  1. बल के आधार पर : नाभिकीय क्षीण बल, नाभिकीय तीव्र बल, विद्युत-चुंबकीय बल और गुरुत्वीय बल द्वारा निर्मित गतियाँ बल आधारित गतियाँ हैं। शायद आपको लगता हो कि इनके अलावा और कौन सी गतियाँ हैं जिनमें ये चारों बल नहीं लगते हैं ? अरे ये सभी प्राकृतिक बल हैं। जिनके माध्यम से प्रकृति संचालित होती है / कार्य करती है। परन्तु हम भी तो कार्य करते हैं। हम किसी को धक्का देकर बल ही तो लगा रहे हैं। प्राकृतिक और कृत्रिम बल के परिणामी बल से भी कई प्रकार की गतियाँ निर्मित होती हैं।
  2. दिशा के आधार पर : एक विमीय गति, दो विमीय गति और तीन विमीय गति दिशा आधारित गतियाँ हैं। एक विमीय गति का उदाहरण राकेट का ऊपर उठना अर्थात किसी एक दिशा में गति करना। दो विमीय गति का उदाहरण पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर घूमना अर्थात किसी एक तल पर गति करना। जबकि तीन विमीय गति का उदाहरण स्वतंत्र आकाश में पक्षी का उड़ना अर्थात दिशाओं की बिना पाबंदी के गति करना।
  3. स्थिति के आधार पर : सरल रेखीय गति, वृत्तीय गति, आवर्ती गति, घूर्णन गति, वक्रीय गति, ब्राउनी गति आदि सभी स्थिति आधारित गतियाँ हैं। स्थिति आधारित गतियों में इस बात का ध्यान रखता है कि पिंड गति कर रहा है ? या उसका कोई एक तल घूम रहा है ? या फिर अवयवी कण गति के माध्यम से किसी तंत्र को बनाए रखने में सहायक हैं ?
इस ब्रह्माण्ड में एक समान वेग से स्वतः गतिशील पिंड का अस्तित्व अवश्य होगा। - अरस्तु (गति और समय का संबंध)
गति के प्रमुख प्रकार :
दो बिंदुओं के मध्य कण की गति
  1. स्पंदन : जब कोई कण किन्हीं दो बिंदुओं के मध्य सरल रेखीय गति करता है। तब उस गति को स्पंदन कहते हैं। अर्थात जब कोई कण सरल रेखा में गति करते हुए किसी एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक और उसी दूसरे बिंदु से पहले बिंदु तक गति करता है। तब इस गति को स्पंदन कहते हैं। इस गति में कण दो बिन्दुओं के मध्य सीमित होता है। यही उस कण की स्थिति है।
  2. कंपन : जब कोई वस्तु या पिंड अपने किसी अक्ष के परिप्रेक्ष्य पूर्ण चक्कर (360 अंश) से कम घूमती
    है। और इसी क्रिया के विपरीत दिशा में पुनः उसी घुमाव के बराबर चक्कर का दोहराव करती है। तब इस गति को वस्तु का कंपन करना कहते हैं। इस गति के दौरान वस्तु के स्थान (स्थिति) में कोई बदलाव नही आता है। बल्कि वस्तु का कोई एक तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कण गति करते हुए दिखाई देते हैं। इस गति के दौरान वस्तु अपनी दो अवस्थाओं के मध्य गतिशील रहती है। अर्थात वस्तु अपने तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कणों की गति द्वारा अवस्था में परिवर्तन लाती है। और पुनः उसी अवस्था की प्राप्ति हेतु वस्तु के वही तल, पृष्ठ अथवा अवयवी कण पुनः गति करते हैं।
  3. दोलन गति : यह गुरुत्वीय बल से निर्मित गति है। इस गति के दौरान वस्तु अपनी स्थिति (स्थान) परिवर्तित करती है। परन्तु गति के दौरान वस्तु की स्थिति सदैव एक पाथ में सीमित होती है। अर्थात गति के दौरान किसी भी समय वस्तु की स्थिति सदैव एक निश्चित पाथ में 
    होती है। जब किसी वस्तु को किसी धागे से बांधकर या किसी छड़ को उसके किसी एक किनारे के सहारे लटका कर हिलाया जाता है। और यदि वह वस्तु किसी तल (दो विमीय) के परिप्रेक्ष्य गति करती है। तो उस गति को दोलन गति कहते हैं। इस गति की यह विशेषता हैं कि यह गति एक समय के बाद रुक सी जाती है। दोलन गति ही वह गति है, जिसको देखकर के गैलिलियो के मन में समय को मापने का विचार आया था। क्योंकि जैसे-जैसे दोलन छोटे होते जाते हैं। उस वस्तु की क्षणिक गति (वेग) कम होती जाती है। अर्थात दोलन करती हुई प्रत्येक वस्तु का दोलनकाल निश्चित होता है। बिना गुरुत्वीय बल के यह गति संभव नही है।
  4. घूर्णन गति : घूर्णन गति और कम्पन गति एक समान ही हैं। क्योंकि दोनों गतियों में 
    वस्तु या पिंड अपने किसी अक्ष के परिप्रेक्ष्य गति करते हैं। परन्तु घूर्णन गति में पिंड पूरा चक्कर (360 अंश) लगाता है। जबकि कंपन गति में वस्तु पूरा चक्कर नहीं लगाती है। और साथ ही घूर्णन गति में विपरीत चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं होती है। दिन-रात का होना पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण संभव हुआ है। सभी आकाशीय पिंड घूर्णन गति करते हैं। यहाँ तक की श्याम विवर भी घूर्णन गति करता हैं। और पृथ्वी लगभग 23.56 घंटे में अपनी घूर्णन गति समाप्त करती है। प्रदर्शित घूर्णन गति विषुवतीय तल के लंबवत है।
  5. अयन गति : इस गति के दौरान वस्तु के केंद्र के परिप्रेक्ष्य वस्तु डोलती है। ठीक वैसे ही जैसे लट्टू डोलता है। परन्तु लट्टू स्वयं के केंद्र के परिप्रेक्ष्य नहीं डोलता है। जबकि अयन गति में सारा पिंड अपने केंद्र के परिप्रेक्ष्य 
    डोलता है। फलस्वरूप उस पिंड में दो ध्रुव अलग ही नज़र आते हैं। आपको ये जानकार ख़ुशी होगी कि पृथ्वी तीन प्रकार की गतियाँ करती है। न की पृथ्वी सिर्फ दो प्रकार की गतियाँ करती है। अर्थात पृथ्वी अयन गति (Axial Precession) भी करती है। परन्तु इसका आवर्तकाल लगभग 26,000 वर्ष का होता है। जो बहुत धीमा है। इसलिए इस गति के प्रभाव को मनुष्य आसानी से नहीं समझ पाता। पृथ्वी का साढ़े 23 अंश झुका हुआ होना। और इसी झुकाव का पृथ्वी के केंद्र के परिप्रेक्ष्य डोलना अथवा अपने अपेक्षित अक्ष के द्वारा वृत्तीय गति करना, अयन गति (Axial Precession) करना कहलाता है। अर्थात पृथ्वी का यह झुकाव समय के साथ किसी एक तारे को इंगित (की ओर इशारा) करता है। वर्तमान में उत्तरी ध्रुव का यह झुकाव यामा तारा की ओर संकेत करता है। भविष्य में यह झुकाव अल्फा तारे की ओर होगा। याद रहे पृथ्वी का झुकाव उसके उत्तरी ध्रुव द्वारा मापा जाता है।
  6. परिक्रमण गति : जब कोई पिंड या वस्तु किसी तल के परिप्रेक्ष्य वृत्तीय गति करती है। तो इस गति को परिक्रमण गति कहते हैं। व्यवहारिक रूप से परिक्रमण गति किसी न किसी पिंड या वस्तु की लगाई जाती है। इस गति के दौरान पिंड या वस्तु अपनी स्थिति परिवर्तित करती है। परन्तु यह स्थिति 
    हमेशा एक वृत्त की परिधि में निश्चित होती है। हमारी पृथ्वी (ग्रह) भी सूर्य की परिक्रमा करती है। फलस्वरूप ऋतुओं में परिवर्तन होता है। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में लगभग 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं। याद रहे "मौसम (Weather) परिवर्तन का कारण क्षेत्रीय हवाएं, ऋतू (Season) परिवर्तन का कारण पृथ्वी पर पड़ने वाली सूर्य की ऊर्ध्वाधर प्रकाश की स्थिति और जलवायु (Climate) परिवर्तन का कारण उस स्थान की पृथ्वी पर स्थिति होती है।" ये तीनों परिवर्तन प्राकृतिक रूप से हमारे चारों ओर के वातावरण में देखने को मिलते हैं। परन्तु इनका समय अंतराल एक दूसरे से क्रमशः व्यापक होता जाता है। क्योंकि क्षेत्रीय हवाएँ घूर्णन गति पर, सूर्य का ऊर्ध्वाधर प्रकाश परिक्रमण गति पर और उस स्थान की अवस्थिति चक्रण गति पर निर्भर करती है।
  7. अवस्था परिवर्तन : जब किसी वस्तु में विस्तार या संकुचन होता है। तब उसके अवयवी कणों अथवा हिस्से की गति को उस वस्तु की अवस्था परिवर्तन कहते हैं। अर्थात इस क्रिया से वस्तु या पिंड के अवयवी कणों अथवा हिस्से की गति के कारण वस्तु के आयतन में कमी या वृद्धि होती है। इसलिए आपने ब्रह्माण्ड के गतिशील होने के बारे में सुना होना। वास्तव में होना तो ये चाहिए था कि जब ब्रह्माण्ड अपनी स्थिति एक स्थान से दूसरे स्थान पर दर्शाता। तब हम उसे गतिशील ब्रह्माण्ड कहते। परन्तु गतिशील ब्रह्माण्ड का अर्थ उसके अवयवी कणों, पिंडों और तंत्रों द्वारा ब्रह्माण्ड का विस्तार करना है। इस प्रकार की गति अवस्था परिवर्तन कहलाती है। ब्रह्माण्ड की अवस्था परिवर्तन का कारण गुरुत्वाकर्षण बल का कमजोर पड़ना अथवा ब्रह्माण्ड में श्याम ऊर्जा की मात्रा का बढ़ना बताया जाता है। अवस्था परिवर्तन को आयु के रूप में मापा जाता है।
  8. दर : इतनी देर से लेख में आपको जो कमी महसूस हो रही थी। वह इस गति द्वारा पूरी होगी। वास्तव में मुझे नहीं लगता है कि लेख में ऊपर कहीं भी समय के बारे में लिखना जरुरी था। क्योंकि समय एक भ्रम मात्र है। चूँकि गति का सीधा संबंध समय से है और हम सभी इसी समय के परिप्रेक्ष्य मापन और गणना करते हैं। फलस्वरूप लेख में समय की गति पर चर्चा करना जरूरी था। हम में से ही कुछ लोगों का मानना है कि समय गति करता है। क्योंकि लोग जब खुश रहते हैं तो उन्हें दिन जल्दी बीतता हुआ महसूस होता है। और जबकि दुखी रहने पर दिन बड़ी मुश्किल से गुजरता हुआ महसूस होता है। यानि समय भी धीमा और जल्दी चलता है ? अर्थात समय गति करता है ? वास्तव में समय जैसी कोई चीज नहीं है। तो फिर वह गति कैसे कर सकता है ! समय महज एक भ्रम है। और इसकी उत्पत्ति का कारण गति का विस्थापन और दूरी पर आधारित होना है। एक समय इस भ्रम को पुख्ता करने का काम परिवहन के सीमित साधनों ने किया था। क्योंकि जब एक व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान के बीच की दूरी पूंछता था। तो सामने वाला व्यक्ति परिवहन के सीमित साधन के अनुरूप उसे कहता था कि तुम दूसरे पहर तक वहाँ पहुँच जाओगे। आज के परिप्रेक्ष्य में यही बात कहूँ, तो चार घंटे में पहुँच जाओगे। वास्तव में दर समय की एक काल्पनिक गति है। जिसे हम नियत (मान) मानकर अन्य दूसरी गतियों की माप में अथवा परिवर्तन की माप में उपयोग करते हैं। समय की इस गति के बारे में अन्य दूसरे लेख पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
गति में परिवर्तन : गति परिवर्तन का मुख्य कारण बल होता है। चाहे वह परिवर्तन गुरुत्वीय बल के कारण हो अथवा घर्षण बल के कारण हो। जब गति बढ़ जाती है, तो उसे त्वरण कहते हैं। और जब गति कम हो जाती है, तो उसे मंदन कहते हैं। अर्थात जिस दर से गति में वृद्धि होती है। उसे त्वरण कहते हैं। और जिस दर से गति में कमी आती है। उसे मंदन कहते हैं। फलस्वरूप त्वरण और मंदन में समय दो रूपों में कार्य करता है। इसलिए तो त्वरण और मंदन का मात्रक मीटर प्रति सेकेण्ड2 होता है। त्वरण और मंदन को समझना इसलिए जरुरी होता है। क्योंकि इसके (त्वरण और मंदन) और गति के आधार पर हम किसी भी वस्तु की क्षणिक स्थिति का वर्णन यथार्थता के साथ कर सकते हैं। गति के इसी परिवर्तन के कारण विस्थापन और दूरी में भेद करना संभव हो पाया है। क्योंकि जब किसी वस्तु में बल आरोपित होता है। तब न सिर्फ उस वस्तु की गति परिवर्तित होती है। बल्कि उस वस्तु की दिशा परिवर्तन की संभावना बनती है। फलस्वरूप वस्तु को अधिक दूरी तय करनी पड़ेगी। और इस स्थिति में वस्तु अपनी निश्चित विस्थापन से अधिक दूरी तय करती है।

संभावना और प्रायिकता के अनुप्रयोग

संभावना (Possibility) और प्रायिकता (Probability) एक ही चीज नहीं है। इतना तो आप हमारे पिछले लेख को पढ़कर के जान गए होंगे। परन्तु अभी भी कुछ लोगों के लिए संभावना और प्रायिकता की भिन्नता को समझ पाना कठिनाई वाला कार्य है। इसलिए इस लेख में हम संभावना और प्रायिकता के अनुप्रयोगों पर चर्चा करेंगे। ताकि उदाहरणों के द्वारा संभावना और प्रायिकता के उपयोग से आपसी भिन्नता को स्पष्ट किया जा सके। इसके साथ ही साथ हम संभावना और प्रायिकता की भिन्नता के प्रमुख बिन्दुओं को भी समझने का प्रयास करेंगे। और अंत में संभावना और प्रायिकता की उपयोगिता पर चर्चा करेंगे। ताकि संभावना और प्रायिकता के महत्व को समझा जा सके।

उदाहरण न. 1 : सबसे पहले हम इस गणितीय समस्या का हल खोजते हैं। ताकि प्रायिकता के बारे में हमें कुछ जानकारी प्राप्त हो सके। समस्या : "चार दरवाजे में से किसी एक दरवाजे के पीछे एक बिल्ली छुपकर बैठी है। दाईं ओर से पहले दरवाजे को खोला जा चुका है। शेष तीन दरवाजे में से बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली होने की प्रायिकता क्या होगी ? जबकि दाईं ओर से जिस पहले दरवाजे को खोला गया था। उसके पीछे बिल्ली थी या नहीं थी। इसके बारे में हमें जानकारी नहीं है।" सबसे पहले तो हम यह बताना चाहते हैं कि यह एक मनगढ़त समस्या है। जिसे इस बात को समझाने के लिए समस्या के रूप में सामने लाया गया है कि यह प्रायिकता की सीमा से बाहर का प्रश्न है। गणित में इस समस्या का समाधान अभी तक नहीं खोजा गया है। क्योंकि जब तक हमें दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे की स्थिति स्पष्ट नहीं हो जाती। तब तक हम बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता ज्ञात नहीं कर सकते। वास्तव में इस समस्या का समाधान न होने का मूल कारण प्रश्न का व्यवहारिक होना है। क्योंकि यदि हम यह मानकर चलते हैं कि दाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली पाई गई है। तो बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता शून्य होगी। और यदि हम यह मानकर चलते हैं कि दाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली नहीं पाई गई है। तो बाईं ओर के दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की प्रायिकता 1/3 (33.33%) होगी। जो लोग इस प्रश्न को एक चुनौती मानकर के हल करते हैं। तो उनमें से कुछ लोगों का उत्तर 1/4 (25%) भी होता है। क्योंकि इस उत्तर के पीछे उनका तर्क यह होता है कि बिल्ली जरूर से इन्ही चार दरवाजों में से किसी एक दरवाजे के पीछे छुपी होगी। जैसा की प्रश्न में कहा भी गया है। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर 1/4 (25%) होना चाहिए।

स्पष्टीकरण : बेशक कहने को यह एक मनगढ़त समस्या है। परन्तु इस प्रश्न की एक परिस्थिति ने इस प्रश्न को व्यवहारिक बना दिया है। और वह परिस्थिति दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे बिल्ली की वास्तविक स्थिति का पता न होना है। इस तरह से यह समस्या एक व्यवहारिक समस्या बन जाती है। और व्यवहारिक रूप से किसी भी विशेष घटना के घटित होने की प्रायिकता कभी भी शून्य नहीं होती। अर्थात यदि आप किसी भी घटना के घटित होने या न होने की प्रायिकता शून्य कहना चाहते हैं। तो आपको मनगढ़त शर्तों और परिस्थितियों का सहयोग लेना पड़ेगा (प्रायिकता का महत्वपूर्ण तथ्य न. 3 पढ़ें)। इसके अलावा यह समस्या पूर्ववर्ती घटना अर्थात दाईं ओर के पहले दरवाजे के पीछे बिल्ली के छुपे होने की स्थिति पर निर्भर करती है। इसलिए यह एक भौतिकीय अवधारणा है। न की एक गणितीय अवधारणा है। इसलिए इस समस्या का हल प्रायिकता द्वारा नहीं निकाला जा सकता। यह घटना पूर्णतः संभावना पर टिकी है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 5, 6 और 7 पढ़ें)

उदाहरण न. 2 : जब एक लालची व्यक्ति जो पैसा कमाना चाहता है, को इस बात का पता चलता है कि किसी पांसे को ऊपर उछालने पर एक (1) आने की संभावना छः बार में एक होती है। वह हर बार एक अंक आने के लिए दाव लगाता है। वह जैसे-तैसे चालाकी से पांच बार पांसा उछालने पर कम पैसे का दाव खेलता है। अब आपसे एक प्रश्न है कि क्या छटवी बार में उस पांसे पर एक (1) अंक आएगा ? जबकि उस लालची इंसान ने इस बार सारे पैसे दाव में लगा दिए हैं !

स्पष्टीकरण : बेशक इस बार भी एक आने की प्रायिकता छः में से एक (1/6 या 16.66%) ही है। उस लालची इंसान ने प्रायिकता को संभावना समझकर पूरे पैसे दाव में लगा दिए। इसीलिए हमने उस लालची इंसान की सोच के मुताबिक पहले गद्यांश में प्रायिकता के स्थान पर संभावना शब्द का उपयोग किया है। जबकि वहां प्रायिकता शब्द होना चाहिए था। और इस छटवी बार में पांसे को उछालने पर क्या परिणाम प्राप्त होगा ? यह हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते। इसके अलावा यह भी निश्चित तौर से नहीं कहा जा सकता है कि जिस 1 अंक आने की प्रायिकता 6 में से 1 बार है। वह पहली चाल में आएगा ? या दूसरी चाल में आएगा ? या आखिरी चाल में आएगा ? और हो भी सकता है कि 6 चाल हो जाने के बाद भी 1 अंक न आए ! (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 8 पढ़ें)

पांसा, सिक्का, तांस की पत्ती अर्थात ऐसी सभी प्रणालियाँ जिनमें घटना के घटित होने की "सभी संभावनाओं" को हम जान सकते हैं या जानते हैं। ऐसी प्रणालियों में प्रायिकता कार्यरत होती है। शेष प्रणालियों में संभावना कार्यरत होती है। अर्थात जिन प्रणालियों अथवा तंत्रों में संभावनाओं की गणना की जाती है। वहाँ प्रायिकता कार्यरत होती है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 4 पढ़ें)

उदाहरण न. 3 को लिखने से पहले हम आपको कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं के बारे में बताना चाहते हैं। ताकि आपको उदाहरण न. 3 को समझने में आसानी हो। "किसी क्रिया के परिणाम स्वरूप विशेष प्रतिक्रिया की अपेक्षा रखना संभावना व्यक्त करना कहलाता है। जबकि किसी क्रिया के परिणाम स्वरूप संभावित अथवा निश्चित प्रक्रियाओं में से किसी एक के घटित होने की संभावना व्यक्त करना प्रायिकता कहलाता है।" इसीलिए संभावना का घटित होना आवश्यक नहीं होता है। क्योंकि यह किसी एक विशेष प्रतिक्रिया को लेकर के व्यक्त की जाती है। जबकि प्रायिकता में घटना का घटित होना जरुरी होता है। ताकि परिणाम स्वरूप किसी एक संभावित या निश्चित प्रतिक्रिया के परिणाम प्राप्त किये जा सकें। अर्थात संभावना किसी विशेष (एक) परिणाम को लेकर के व्यक्त की जाती है। जबकि प्रायिकता उसी परिणाम के विभिन्न रूपों में से एक के घटित होने को लेकर के व्यक्त की जाती है।

संभावना हमेशा तर्क के साथ व्यक्त की जाती है। उस विशेष घटना के घटित होने को लेकर के जितनी अधिक मजबूती के साथ तर्क दिए जाएंगे। उस घटना के घटित होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। और ये तर्क संयोग पर आधारित होते हैं। जब कभी किसी विशेष घटना के घटित होने का संयोग बनता है। तो निश्चित तौर पर वह विशेष घटना घटित होती है। प्रत्येक संयोग के पीछे एक कारण होता है। जो पूर्ववर्ती घटना से निर्मित होता है। अर्थात हम किसी भी विशेष घटना के घटित होने अथवा विशेष परिणाम की संभावना को उस संयोग की परिस्थितियों का अध्ययन करके व्यक्त करते हैं। जबकि प्रायिकता में हम केवल घटकों का अध्ययन करते हैं। ताकि उन घटकों से निर्मित होने वाले प्रत्येक संयोग और उन संयोग से निर्मित होने वाले एक समान परिणामों की गिनती की जा सके। एक समान परिणाम वाली जितनी अधिक घटनाओं के घटित होने की संभावना व्यक्त होगी। प्रायिकता का मान उतना ही कम होते जाएगा। इसलिए प्रायिकता में तर्क नहीं किये जाते। क्योंकि प्रायिकता हमेशा "निश्चित मान" को लेकर के व्यक्त की जाती है। भले ही उस मान की सार्थकता सिद्ध हो चाहे न हो ! अर्थात जिस घटना के घटित होने को लेकर के प्रायिकता का मान निश्चित किया गया है। जरुरी नहीं है कि वह घटना घटित हो ! वो कैसे ? उसके लिए उदाहरण न. 3 देखते हैं। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 1, 2, 3, 4 और 5 पढ़ें)

उदाहरण न. 3 : संभावना और प्रायिकता की भिन्नता को उजागर करती एक कहानी
एक दिन जब मैं और मेरे दोस्त के पास करने के लिए कुछ भी नहीं था। तब हम दोनों ने एक सिक्के के साथ खेलना शुरू किया। चूँकि सिक्के को उछालने वाला यह खेल शर्तिया तौर पर खेला जाता है। इसलिए हम दोनों को इस खेल को खेलने में खूब मज़ा आ रहा था। परन्तु कुछ लोगों के लिए यह खेल अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अच्छा साधन उपलब्ध कराता है। इसलिए वे लोग इस खेल में पैसे लगाते हैं। सिक्के को उछालने का काम मैं स्वयं कर रहा था। और अपनी किस्मत को आजमाने का काम मेरा दोस्त कर रहा था। मैं लगातार एक-एक करके पांच चाल हार चुका था। मेरा दोस्त हर बार चित आने की संभावना को लेकर शर्त लगाता। और वह जीत जाता। अब मेरे दोस्त को लगने लगा कि आज उसकी किस्मत जोरों पर है। तो फिर क्या था। इस बार उसने अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अपना दाव चित के स्थान पर पट पर लगाया। सोचिये और बताइये, क्या वाकई में मेरे दोस्त की किस्मत जोरों पर थी ? और जब हम दूसरे दिन भी इसी खेल को खेलते हैं। तब क्या फिर से मेरे दोस्त की किस्मत उसको जिताएगी ? जबकि इस बार भी मैं स्वयं सिक्के को उछालने का और मेरा दोस्त दाव लगाने का कार्य कर रहे हैं।

स्पष्टीकरण : जैसा की हमने पहले ही लिख दिया है कि मैं लगातार चित आने के कारण अपने दोस्त से पांच बार हार चुका हूँ। तो इस बार चित आने की संभावना चौथी और पांचवी बार की अपेक्षा कहीं अधिक हो जाती है। इसका सीधा सा मतलब है कि इस बार मेरे दोस्त के हारने की संभावना 100% है। क्योंकि इस बार मेरे दोस्त ने अपनी किस्मत को आजमाने के लिए अपना दाव पट आने पर लगाया है। वहीं इस बार भी चित या पट आने की प्रायिकता 1/2 यानि 50% ही है। अर्थात यह जरुरी नहीं है कि हज़ार बार सिक्का उछालने पर 500 बार चित आएगा। हो सकता है कि 5 बार भी चित न आए।

मेरे दोस्त की किस्मत सिर्फ इस बात पर जोरों पर थी कि परिस्थितियों के अनुसार सिक्के को उछालने पर चित आने को था। और मेरा दोस्त चित ही बोल रहा था। भाई गज़ब का संयोग था। वो भी पांच बार..

दूसरे दिन भी इसी खेल को खेलते समय चित या पट आने की प्रायिकता 1/2 यानि 50% ही रहती है। जबकि संभावना पुनः संयोग पर निर्भर करती है। और यह संयोग घटकों के कारक बनने पर निर्भर करता है। अर्थात दूसरे दिन भी दूसरी बार में चित या पट आने की संभावना पहली बार में चित या पट आने पर निर्भर करेगी। जितने अधिक बार चित या पट आएगा उसके आने की संभावना उन्हीं परिस्थितयों के लिए उतनी ही अधिक हो जाएगी। अर्थात संभावना का मान परिस्थितियों के आधार पर चर और प्रायिकता का मान विशेष शर्तों अथवा संयोग के आधार पर अचर होता है। (संभावना और प्रायिकता में भिन्नता लेख का बिंदु न. 5, 6, 7 और 8 पढ़ें)

प्रायिकता के नियम : हमने आलेख में ऊपर कइयों बार संभावनाओं को गिनने या एक समान परिणामों की गणना करने की बात कही है। और साथ में लिखा है कि प्रायिकता का मान निर्मित होने वाले संयोग, एक समान परिणामों अथवा संभावनाओं की गणना करके ज्ञात किया जाता है। इसलिए प्रायिकता को संभाविता भी कहा जाता है। परन्तु प्रायिकता में संभावनाओं की गणना कैसे की जाती है ? क्या प्रायिकता के भी गणना करने के कुछ नियम है ? जी हाँ, संभावनाओं की गणना दो नियमों के द्वारा की जाती है। पहला नियम "संभाविताओं के गुणन" का नियम है। और दूसरा नियम "संभाविताओं के योग" का नियम है। प्रायिकता में संभावित संयोगों की गणना की जाती है। इस तथ्य से हम इसलिए अनजान रहते हैं। क्योंकि प्रायिकता का मान प्रतिशत (%) या दशमलव (0 से 1 के बीच) में लिखा जाता है। और हम सोचते हैं कि गणना तो पूर्णांक अंकों में की जाती है। परन्तु हमें याद रखना चाहिए कि प्रायिकता संयोग, एक समान परिणाम वाली घटनाओं अथवा संभावनाओं की गणना को लेकर है। आज हम इन दोनों नियमों के उपयोग से प्रायिकता को हल करने के लिए उदाहरण प्रस्तुत करेगें। ताकि आपको प्रायिकता हल करते भी आने लगे और आप प्रायिकता की उपयोगिता भी समझ लें।

संभाविताओं के गुणन का नियम : जब आप एक से अधिक भिन्न घटनाओं के संयुक्त परिणाम से कोई विशेष परिणाम की अपेक्षा रखते हैं। तब आपको इस नियम का उपयोग करना होता है। अर्थात जब आप किसी विशेष परिणाम की प्राप्ति हेतु दो या दो से अधिक क्रियाओं का क्रम निश्चित करते हैं। तब उन दो या दो से अधिक क्रियाओं के संयुक्त परिणाम के विशेष होने की प्रायिकता प्रत्येक क्रिया की अपेक्षित प्रतिक्रिया की प्रायिकता के गुणनफल के बराबर होती है।

उदाहरण : चार बार सिक्का उछालने पर चारों बार चित आने की प्रायिकता = पहली बार में चित आने की प्रायिकता × दूसरी बार में चित आने की प्रायिकता × तीसरी बार में चित आने की प्रायिकता × चौथी बार में चित आने की प्रायिकता

अर्थात चारों बार चित आने की प्रायिकता = 1/2 × 1/2 × 1/2 × 1/2 = 1/8

इसका सीधा सा मतलब है कि हम विशेष परिणाम की प्राप्ति के लिए जितनी अधिक शर्त्तें रखते हैं। उस परिणाम के प्राप्त होने की प्रायिकता उतनी ही कम होती है। क्योंकि हम विशेष परिणाम की प्रायिकता के लिए प्रत्येक शर्त के पूर्ण होने की स्वतंत्र प्रायिकता का आपस में गुणनफल ज्ञात करते हैं। इसलिए विशेष परिणाम की प्रायिकता अपेक्षाकृत कम हो जाती है। तास की पत्तियों द्वारा खेला जाने वाला तीन पत्ती का खेल भी प्रायिकता और संभावना दोनों पर आधारित होता है। तीन पत्ती के इस खेल में जिस संयोग की प्रायिकता सबसे कम होती है। वह संयोग जिस किसी व्यक्ति के पास बनता है। उसकी जीत होती है। यह खेल संभावना पर आधारित इसलिए होता है। क्योंकि इस खेल में सभी खिलाड़ियों को एक-एक करके तीन बार पत्ती बांटी जाती है। दूसरा खिलाड़ियों की संख्या निश्चित नहीं होती है। और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि सबसे बड़ी पत्ती एक्का को माना जाता है। परिणाम स्वरुप बादशाह, एक्का और दुप्पी के संयोग को रन नहीं गिना जाता। यदि यह खेल में संभावना कार्यरत नहीं होती। तो लगभग 60 प्रतिशत खेल के परिणाम प्राप्त नहीं होते। खेल में किसी की जीत नहीं होती। वो कैसें ? आइये हम इस खेल में बनने वाले प्रत्येक संयोग की प्रायिकता को ज्ञात करते हैं। नीचे लिखे गए प्रत्येक संयोग में एक ही व्यक्ति को एक-एक करके तीन पत्ती बांटी गई हैं। और विशेष परिणाम आने की प्रायिकता ज्ञात की गई है।

1. त्रिल आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती एक ही अंक की हों = 3/51 × 2/50 = 6/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। त्रिल आने के लिए दूसरी पत्ती भी उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 3 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 3/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 2 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 2/50.
2. फ़्लैश आने की प्रायिकता : अर्थात एक ही रंग की तीनों पत्ती के अंक क्रमशः हों = 1/51 × 1/50 = 1/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। फ़्लैश आने के लिए दूसरी पत्ती उसी रंग की अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से 1 (उसी रंग की अगले अंक की) पत्ती के आने की प्रायिकता 1/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी रंग की अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में 1 (उसी रंग की अगले अंक की) पत्ती के आने की प्रायिकता 1/50.
3. रन आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती क्रमशः हों = 4/51 × 4/50 = 16/ 2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। रन आने के लिए दूसरी पत्ती अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 4 (अगले अंक की किसी भी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 4/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी अगले अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 4 (अगले अंक की किसी भी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 4/50.
4. कलर आने की प्रायिकता : अर्थात तीनों पत्ती एक ही रंग की हों = 12/51 × 11/50 = 132/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी और तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। कलर आने के लिए दूसरी पत्ती भी उसी रंग की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 12 (किसी भी अंक की उसी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 12/51. उसी तरह तीसरी पत्ती भी उसी रंग की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 11 (किसी भी अंक की उसी रंग की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 11/50.
5. डबल आने की प्रायिकता : अर्थात तीन में से दो पत्ती एक ही अंक की हों = 3/51 × 48/50 = 144/2550
स्पष्टीकरण : पहली पत्ती कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि हमारी शर्त पहली पत्ती के साथ दूसरी या तीसरी पत्ती से बनने वाले विशेष संयोग को लेकर है। डबल आने के लिए दूसरी पत्ती उसी अंक की होनी चाहिए। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 51 पत्तियों में से कोई भी 3 (उसी अंक की) पत्तियों के आने की प्रायिकता 3/51. और तीसरी पत्ती उसी अंक के सिवाय कोई भी चलेगी। अर्थात विशेष परिणाम के लिए शेष 50 पत्तियों में से कोई भी 48 (उसी अंक को छोड़कर के) पत्तियों के आने की प्रायिकता 48/50.

तीन पत्ती के खेल में पांच विशेष संयोग और एक सामान्य संयोग बनता है। कुल 6 संयोगों में सामान्य संयोग बनने की संभावना सबसे अधिक होती है। खिलाड़ियों की संख्या बढ़ने के साथ विशेष संयोग बनने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसलिए लगभग 60% खेलों में सभी के पास सामान्य संयोग बनने से खेल में जीत-हार का फैसला नहीं हो पाता। इसके निवारण के लिए पत्तियों को क्रमशः एक दूसरे से बड़ा माना गया है। और साथ में एक ही खिलाड़ी को एक-एक करके तीनों पत्ती एक साथ नहीं दी जाती। और इस तरह से तीन पत्ती का खेल संभावना और प्रायिकता दोनों पर आधारित होता है।

संभाविताओं के योग का नियम : जब आपको घटना के किसी भी परिणाम से आपत्ति नहीं होती है। अर्थात संभावित परिणामों में से कोई भी एक परिणाम आए। या आपके द्वारा अपेक्षित शर्तों में से कोई भी एक परिणाम आने की प्रायिकता को इस नियम द्वारा ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए पांसा में सम संख्या आने की प्रायिकता को हम शर्तों में इस तरह लिखते हैं। या तो 2 आ जाए या तो 4 आ जाए या 6 आ जाए। अर्थात प्रायिकता = 2 आने की प्रायिकता + 4 आने की प्रायिकता + 6 आने की प्रायिकता

अर्थात पांसा में सम संख्या आने की प्रायिकता = 1/6 + 1/6 + 1/6 = 3/6 या 1/2

संभाविता की गणना का एक और रोचक उदाहरण : जैसा की हम सभी जानते हैं कि वर्ष में 365 दिन होते हैं। तो किसी एक दिन आपके दो मित्रों के एक साथ जन्मदिन आने की प्रायिकता क्या होगी ? भाई, गणित तो यही कहता है कि आप यादृच्छिक तरीके से सिर्फ 24 मित्रों की सूची बनाइये। और उन 24 मित्रों में से एक साथ जन्मदिन आने वाली एक जोड़ी होने की प्रायिकता न होने की प्रायिकता से कहीं अधिक होती है। यानि की सीधा सा मतलब है कि उन 24 मित्रों में एक जोड़ी ऐसी अवश्य होगी। जिनका जन्मदिन एक साथ आता है। आइये इस प्रायिकता की भी गणना कर ही लेते हैं। सबसे पहले हम इस बात की गणना करते हैं कि 24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आए। अर्थात पहले मित्र का जन्मदिन किसी भी दिन हो चलेगा। मतलब की प्रायिकता 365/365. दूसरे मित्र का जन्मदिन शेष 364 दिनों में से कोई भी एक दिन। तीसरे मित्र का जन्मदिन 363 दिनों में से कोई भी एक दिन। इसी प्रकार 24 वे. मित्र का जन्मदिन 365-23 = 342 शेष दिनों में से कोई भी एक चलेगा।


24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आने की प्रायिकता = 365/365 × 364/365 × 363/365 × ........ 342/365 (विशेष परिणाम के लिए एक से अधिक शर्तें रखी गईं हैं अर्थात प्रत्येक प्रायिकता का आपस में गुणा होगा।)

इस प्रकार 24 मित्रों में से किसी का भी जन्मदिन एक साथ न आने की प्रायिकता 0.46 अर्थात 46% होती है। जबकि 24 मित्रों में से किसी एक जोड़ी के एक साथ जन्मदिन आने की प्रायिकता 1 - 0.46 = 0.54 अर्थात 54% होती है। इस उदाहरण द्वारा आप समझ ही गए होंगे कि कैसे जटिल घटनाओं की प्रायिकता के मामले में सहज-बुद्धि से आँका गया परिणाम बिलकुल गलत सिद्ध होता है। इसके बाद भी हम इस बात को दोहराना चाहते हैं कि विभिन्न घटनाओं के संभावित परिणामों में से सर्वाधिक प्रायिकता वाले परिणाम का दोहराव होना जरुरी नहीं है।

तो अब प्रश्न ये उठता है कि तो फिर प्रायिकता का क्या मतलब है ? क्योंकि जिसका होना ही निश्चित न हो। तो उसकी विज्ञान में क्या उपयोगिता है ? जबकि संभावना अपेक्षाकृत अधिक सटीक बैठती है। तो अब हम प्रायिकता की उपयोगिता के बारे में बात करते हैं। प्रायिकता का उपयोग प्रकृति और भौतिकता के विकास को समझने में और संभावित ब्रह्माण्ड अर्थात समान्तर ब्रह्माण्ड की जानकरी एकत्रित करने में किया जाता है। यानि की प्रायिकता का उपयोग क्वांटम भौतिकी और ब्रह्माण्डिकी को जानने-समझने में किया जाता है। क्वांटम भौतिकी में प्रायिकता का उपयोग क्वांटम जगत अर्थात नए आयामों की खोज में और भौतिकता के निर्माण को समझने में किया जाता है। अर्थात भौतिकता का स्वरुप ऐसा ही क्यों है ? दूसरी तरह से क्यों नहीं है ? जबकि ब्रह्माण्डिकी में प्रायिकता का उपयोग इस ब्रह्माण्ड और समान्तर ब्रह्माण्ड के नियम और नियतांकों की आपसी भिन्नता को समझने में किया जाता है। इसके अलावा प्रायिकता का उपयोग आम जीवन में इस बात को ज्ञात करने में किया जाता है कि हमारे पास इसके अलावा और कितने विकल्प हैं ?

प्रायिकता के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य :
1. प्रायिकता के लिए यादृच्छिक (Random) घटनाओं के परिणामों का एक समष्टि समुच्चय बनाया जाता है।
2. निश्चित घटना की प्रायिकता सदैव 1 अर्थात 100% होती है। अर्थात घटना का परिणाम संभावित परिणामों में से कोई एक होता है।
3. असंभव घटना की प्रायिकता सदैव 0 अर्थात 0% होती है।
4. कोई भी संभावित परिणाम एक निश्चित आवृत्ति में अपने आप को दोहराए यह जरुरी नहीं है। अर्थात प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है। संभावना पर नहीं।
5. दो या दो से अधिक शर्तों के संयुक्त परिणाम की प्रायिकता प्रत्येक शर्त की प्रायिकता के गुणनफल के बराबर होती है। जबकि दो या दो से अधिक शर्तों में से किसी एक शर्त के पूरे होने की प्रायिकता प्रत्येक शर्त की प्रायिकता के योग के बराबर होती है।

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