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समय, उसकी पहचान और उसके प्रकार

विज्ञान में सिद्धांतों का खंडन उसको प्रमाणित करने वाले प्रयोगों में होने वाली गलती को ढूंढकर के, नियमों का खंडन वैकल्पिक नियमों का सुझाव दे करके, तथ्यों का खंडन सम्बंधित भौतिकता की भविष्यवाणी को झुटला करके और जानकारियों का खंडन साक्ष्य को गलत ठहरा करके किया जाता है। अर्थात विज्ञान में ऐसा नहीं होता है कि जो मन में आया कह दिए। कम से कम आपको स्वयं की सोच का कारण ज्ञात होना चाहिए। फिर चाहे आगे चलकर के विषय संबंधित आपकी सोच का कारण गलत सिद्ध क्यों न हो जाए। चलेगा, परन्तु आपको अपनी सोच का आधार (कारण) बताना पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार जब तक हमें वास्तविकता का सही पता नहीं चल जाता। तब तक हम विज्ञान में किसी भी घटना अथवा भौतिकता को भ्रम कह करके संबंधित विषय की चर्चा को नहीं टाल सकते। अर्थात यदि आप किसी घटना अथवा भौतिकता को भ्रम कह रहे हैं, तो जरुरी है कि आपको उस घटना अथवा भौतिकता के पीछे की वास्तविकता ज्ञात होनी चाहिए। अन्यथा विज्ञान की आड़ में किसी भी घटना अथवा भौतिकता को भ्रम कहकर के चर्चा से दूर हटना अनुचित है। क्योंकि विज्ञान की शुरुआत इन्ही भ्रम, आभासी, छद्म और अवधारणाओं जैसे विषय-वस्तु से होती है। विज्ञान में ऐसे कई उदाहरण सुनने को मिलते हैं। जब एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक से बड़ी खोज के बाद भी गलती हो जाती है। गलती करना बड़ी बात नहीं है। परन्तु सही जानकारी प्राप्त हो जाने के बाद भी अपनी गलती पर अड़े रहना। गलत बात है।


जब हम आभासी प्रतिबिम्ब को आभासी कहते हैं तो हमें उसके पीछे की वास्तविकता ज्ञात होती है। जब हम रेगिस्तान की मरीचिका, ठंडे प्रदेशों में तैरते जहाजों का आसमान में उल्टा लटका दिखाई देना और फैटा मोरगाना जैसी घटनाओं को भ्रम कहते हैं। तब भी हमें इन तीनों घटनाओं की वास्तविकता ज्ञात होती है। अर्थात हम वास्तविकता को जाने बिना किसी भी घटना अथवा भौतिकता को भ्रम नहीं कह सकते। इसके बाबजूद सर अल्बर्ट आइंस्टीन के अनुसार "समय एक भ्रम" है। तो विज्ञान के लिए आवश्यक है कि हम समय की वास्तविकता को जाने। उसे समझने का प्रयास करें। क्योंकि यदि समय एक भ्रम है। तो इस भ्रम (समय) के आधार पर भौतिक राशियों का मापन करना, कितना सही कहलायेगा ? इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं। फिर तो समय को मूल राशि (भौतिक) कहना भी गलत होगा ! आइये समय, उसकी पहचान और उसके प्रकार को समझने का प्रयास करते हैं।

समय एक बनाई गई बात है। कहने के लिए "मेरे पास समय नहीं है" का तात्पर्य "मैं नहीं करना चाहता हूँ" से है।                                                                               - लाओ त्सू

समय किसे कहते हैं ?
हम सभी अपने-अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी रूप में समय के बारे में बात करते हैं। कलाकार, दार्शनिक, साहित्यकार, इतिहासकार, अर्थशास्त्री, व्यवसायी, शिक्षक, विद्यार्थी, कृषक और एक वैज्ञानिक सबकी नज़रों में समय के अपने अलग-अलग मतलब होते हैं। कोई समय के मापन की बात करता है। तो कोई समय के आभाव की बात कहता है। कोई समय को अनमोल बतलाता है। तो कोई समय को समझदारी से खर्च करने की बात कहता है। कोई समय को पदार्थ से जुड़ा हुआ मानता है। तो कोई समय को परिवर्तन के रूप में देखता है। और बहुत से लोग तो समय को एक उत्सव मानते हैं और उसका आनंद उठाते हैं। क्योंकि ऐसे लोग समय के प्रबंधन के पक्षधर होते हैं। और ऐसे लोग समय से सबक लेकर जीवन यापन करते हैं। इसके अलावा महापुरुष स्वयं के कार्यों को समय की पूर्ति मानते हैं। अर्थात महापुरुषों के अनुसार "समय एक अवसर है" जिसकी पूर्ति वे अपने कार्यों द्वारा करते हैं।

परिवर्तन की माप
इसके अलावा आपने अक्सर सुना होगा कि हम जिस सेकंड, मिनट, घंटा, महीना और वर्ष की बात करते हैं। वास्तव में वह समय नहीं है। हम जिस घड़ी को देखकर समय बतलाते हैं। वह घड़ी भी समय नहीं है। तो फिर समय किसे कहते हैं ? "भौतिकता में परिवर्तन" की माप को समय कहते हैं। विज्ञान में हम जिस भौतिकता में परिवर्तन की माप करते हैं। उस परिवर्तन के आधार पर सेकंड, मिनट, घंटा, महीना और वर्ष को समय की इकाई के रूप में परिभाषित करते हैं। यहाँ तक की घड़ी उस इकाई समय को मापने का यंत्र है। समय की सबसे छोटी इकाई भौतिकता के सबसे छोटे परिवर्तन को परिभाषित करती है। और यह सबसे छोटा परिवर्तन हमको स्पंदन की क्रिया में देखने को मिलेगा। उसके बाद क्रमशः यह परिवर्तन कंपन और दोलन में देखने को मिलेगा। जैसा की हमने अपने पिछले लेख "वैज्ञानिक पद्धतियों और प्रक्रियाओं की पारिभाषिक शब्दावली" के मापन की पद्धति में लिखा था कि हम विज्ञान में प्रत्येक दो असमान परिमाणों की माप भौतिक राशियों के द्वारा ज्ञात कर सकते हैं। ठीक इसी प्रकार समय भी भौतिकता के दो परिणामों के अंतर का माप है। इसलिए समय की पहचान एक से अधिक रूपों में व्यक्त की जाती है।

परिवर्तन के आधार पर समय की पहचान तीन रूपों में की जाती है। जैसा की आपने हमारे पिछले लेख में "गति, उसकी पहचान और उसके प्रकार" में गति के घटकों के आपसी संबंध को पढ़ा था। तो उस संबंध के अनुसार तीनो आधारों को एक मानना गलत होगा। क्योंकि तीनों आधारों को अलग-अलग समझने पर ही आप समय के प्रकारों को समझ पाएंगे। वास्तव में तीनों आधार भौतिकता के परिवर्तन पर निर्भर करते हैं।

  1. गति के आधार पर : जब हम समय और गति के संबंध पर चर्चा करते हैं। तब हम "पहले और बाद" शब्द का प्रयोग करते हैं। समय और गति का संबंध सभी प्रकार की गतियों से है। उदाहरण के लिए "पहले यह स्थिति थी और बाद में यह स्थिति होगी।" फलस्वरूप समय और गति के इसी सम्बन्ध (अवस्था परिवर्तन) के कारण हम यह प्रश्न पूँछ पाते हैं कि महाविस्फोट से पहले क्या था ? गति के द्वारा समय की यह पहचान समय के आयाम द्वारा निर्धारित होती है।
  2. बल के आधार पर : जब हम समय और बल के संबंध पर चर्चा करते हैं। तब हम "जल्दी (शीघ्र) और देरी (विलम्ब)" शब्द का प्रयोग करते हैं। क्योंकि जड़त्व के नियमानुसार बाह्य बल अवस्था (गत्यावस्था और विरामवस्था) परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होता है। फलस्वरूप बाह्य बल की अनुपस्थिति में उचित स्थान पर उचित समय में पहुंचा जा सकता हैं। यदि आप सही दिशा, दूरी और गति निर्धारित कर सकते हैं तो न ही आप उचित स्थान पर जल्दी पहुंचेंगे। और न ही देरी से पहुंचेंगे। वास्तव में बल के आधार पर ही सही समय (संयोग) में पहुँचने की संभावना व्यक्त की जाती है। फलस्वरूप समय और बल के इसी संबंध के कारण समय के प्रबंधन की बात कही जाती है।
  3. दिशा और स्थिति के आधार पर : और जब हम समय और दिशा के संबंध पर चर्चा करते हैं। तब हम "पास और दूर" शब्द का प्रयोग करते हैं। जब किसी एक स्थिति के सापेक्ष दो स्थितियों में भेद करना होता है। तब हम समय और स्थिति के संबंध का प्रयोग दिशा को निर्धारित करने अथवा एक स्थिति के सापेक्ष दूसरी स्थिति के बीच के अंतर को मापने के लिए करते हैं। और कहते हैं कि वहां चले जाओ। वह पास पड़ेगा। और वह दूर पड़ेगा। फलस्वरूप समय और दिशा के इसी संबंध के कारण हम निश्चित साधनों के उपयोग से आवश्यक परिणाम (वैकल्पिक रूप से) प्राप्त कर पाते हैं।
समय के प्रकार :
समय के प्रकार को सतत और असतत, निरपेक्ष और सापेक्ष अथवा अवस्था और रूप के आधार पर अलग-अलग बांटा जा सकता है। ये आप निर्भर करता है कि आप भौतिकता को महत्व देना चाहते हैं या उसमें होने वाले परिवर्तन को महत्व देना चाहते हैं। अर्थात आपके लिए क्या अहमियत रखता है ? आप उसी के अनुसार समय को परिभाषित करते हैं। फलस्वरूप हम सभी अक्सर समय के भ्रम में फस जाते हैं। इसलिए जरुरी है कि हम समय के प्रकारों को उसके रूप और अवस्था के आधार पर वर्गीकृत करें। और समय के भौतिकीय अर्थ को समझने का प्रयास करें।


असतत / सापेक्ष / रूप : समय के तीन रूप हैं। जिनकी माप हमेशा क्षणिक ज्ञात की जाती है। अर्थात समय के ये तीनों रूप किसी क्षण के लिए भौतिकता की माप करते हैं। फलस्वरूप समय के ये तीनों रूप सापेक्षीय होते हैं। अर्थात समय के ये तीनों रूप एक से अधिक भौतिकता के रूपों की उपस्थिति में ही ज्ञात किये जाते हैं। इन रूपों के अनुसार समय असतत है। अर्थात इन तीनों रूपों के द्वारा समय के प्रवाह का खंडन किया जाता है।

  1. इकाई रूप / संयोग : इस रूप के अनुसार समय कारक के रूप में कार्यरत होता है। अर्थात समय के इस रूप (क्षणिक) द्वारा किन्ही दो पिंडो अथवा भौतिकता के रूपों द्वारा किसी विशेष संयोग (घटना घटित) होने की संभावना जताई जाती है। समय के इस रूप द्वारा हमेशा भूतकाल अथवा भविष्यकाल की घटनाओं की संभावनाओं को व्यक्त किया जाता है। समय के इस रूप द्वारा कभी भी वर्तमान को व्यक्त करना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए आप तीन बजे (क्षणिक) मेरे घर पर मिलना। लगभग 13.4 अरब वर्ष पहले ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई थी। समय के इस रूप द्वारा चरण की शुरुआत, उत्पत्ति अथवा जन्म के समय को व्यक्त किया जाता है।
  2. ज्यामितीय रूप / चरण : इस रूप के अनुसार समय घटक के रूप में कार्यरत होता है। अर्थात भौतिकता की वर्तमान स्थिति का निर्धारण समय के इसी रूप द्वारा संभव होता है। समय के इस रूप द्वारा भूतकाल और भविष्यकाल को निश्चित करना संभव नहीं है। केवल भौतिकता के वर्तमान स्वरुप का निर्धारण करके ठीक पहले और ठीक बाद के चरण, पहर अथवा ऋतु की संभावना को व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए तारों के जीवन चक्र में वर्तमान चरण का निर्धारण करना। मैं वर्तमान में जवान हूँ। फलस्वरूप मेरा अगला चरण बुढ़ापे की ओर होगा। परन्तु यह महज एक संभावना है। वर्तमान चरण का निर्धारण घटकों के द्वारा अर्थात भौतिकता की संरचना को निर्धारित करके किया जाता है। जिसका निर्धारण हमेशा उसी के समान भौतिकता के रूपों से समानता ढूंढकर के निर्धारित किया जाता है। अर्थात एक मनुष्य के वर्तमान चरण का निर्धारण दूसरे मनुष्य के चरणों के अध्ययन के उपरांत ही किया जा सकता है। समय के इसी रूप के द्वारा यह संभावना व्यक्त की जाती है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के करोड़ो वर्ष बाद भी मानव जाति अस्तित्व में नहीं आई थी। क्योंकि तब तक हमारे सौरमंडल का निर्माण नहीं हो पाया था। ब्रह्माण्ड निर्माण का यह क्रम सूक्ष्म धरातल (नाभिक) से विस्तृत धरातल (आकाशगंगा) की ओर हुआ है। फलस्वरूप हम केवल चरणों, पहर अथवा ऋतुओं का क्रम निर्धारित कर सकते हैं। समय के इस रूप द्वारा भौतिकता के निर्माण अथवा अंत की प्रक्रिया को व्यक्त किया जाता है।
  3. आयु रूप : इस रूप के अनुसार समय नियतांक के रूप में कार्यरत होता है। अर्थात भौतिकता में कोई एक ऐसा (भौतिक राशि का) नियत मान होता है। जिसके कारण एक निश्चित समय के बाद उस भौतिकता का अंत हो जाता है। उदाहरण के लिए तारे का जीवनकाल उसके द्रव्यमान पर निर्भर करता है। गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा के अनुसार ब्रह्माण्ड की आयु क्रांतिक घनत्व पर निर्भर करती है। समय का यह रूप निश्चित मान को दर्शाता है परन्तु बाह्य कारक के कारण यह निश्चित मान परिवर्तित हो जाता है। चूँकि समय के इस रूप की समय अवधि सबसे अधिक होती है। इसलिए समय के इस मान में संयोगवश परिवर्तन की संभावना बनती है। फलस्वरूप समय का यह रूप दो क्षणों के मध्य की अवधि दर्शाता है। फिर चाहे इन क्षणों के मध्य एक से अधिक चरणों की उपस्थिति ही क्यों न हो। समय के इस रूप द्वारा भौतिकता के जीवनकाल को व्यक्त किया जाता है। जो भौतिकता की नियति कहलाती है।
सतत / निरपेक्ष / अवस्था : समय की तीन अवस्थाएँ (वर्तमानकाल, भूतकाल और भविष्यकाल) होती हैं। विज्ञान के अनुसार वर्तमान, भूतकाल और भविष्यकाल जैसी कोई चीज नहीं होती है। वास्तव में यह गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा का निरूपण हैं। जो इस बात को दर्शाता है कि वर्तमान में ब्रह्माण्ड संकुचित हो रहा है अथवा ब्रह्माण्ड में विस्तार हो रहा है। दूसरे शब्दों में ब्रह्माण्ड में बाह्य बल अधिक प्रभावी है अथवा आंतरिक बल प्रभावशील है। समय की ये तीनों अवस्थाएँ एक दूसरे के सापेक्ष परिवर्तन का बोध कराती हैं। इन्ही अवस्थाओं के रहते हुए समय को निरपेक्ष माना गया है। जिसके अनुसार समय का निरंतर प्रवाह होता है। इसलिए आप इसे (समय को) संरक्षित नहीं कर सकते हैं। आप इसको केवल समझदारी के साथ खर्च कर सकते हैं। गतिशील ब्रह्माण्ड की अवधारणा के अनुसार जब ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ समय और अंतराल अस्तित्व में आया। तब अर्थात भूतकाल में अब अर्थात वर्तमान की अपेक्षा ब्रह्माण्ड में कम अंतराल उपस्थित था। ठीक इसी तरह से तब अर्थात भविष्य में अब अर्थात वर्तमान की अपेक्षा ब्रह्माण्ड में अधिक अंतराल उपस्थित होगा। अर्थात भूतकाल में ब्रह्माण्ड अपेक्षाकृत संकुचित था। जो भविष्य में अपेक्षाकृत विस्तृत होगा। सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने ब्रह्माण्ड की इन्ही (समय की) अवस्थाओं को भ्रम कहा है। क्योंकि इन अवस्थाओं के रहते हुए, मनुष्य के मन में समय यात्रा की संभावनाओं को लेकर भ्रम पैदा होता है। समय यात्रा तब संभव होगी। जब भूतकाल अथवा भविष्य का अपना कोई धरातल होगा। इन्ही अवस्थाओं के रहते हुए, हमें ब्रह्माण्ड की वास्तविक संरचना को समझने में कठिनाई होती है।


समय को समझने का सबसे अच्छा तरीका आज हमको बतलाते हैं। ये तो आप सभी जानते हैं कि किसी निश्चित क्षण में भौतिकता की स्थिति की माप को समय कहते हैं। तभी तो हम पूँछते हैं कि कितना समय हो गया है ? तो सामने वाला कहता है कि पांच बज गया है। और किसी दूसरे क्षण उसी व्यक्ति से पूंछने पर वह कहता है कि अब छः बज गया है। अर्थात भौतिकता की स्थिति बदलने से समय बदल गया है। वास्तव में हम जिस समय को (मापन यंत्रों द्वारा) मापते हैं। वह समय नहीं समयांतराल होता है। स्थिति नहीं स्थिति के अंतराल को मापते हैं। ये कैसे संभव होता है ? आइये इसको समझने का प्रयास करते हैं। चूँकि ब्रह्माण्ड के कुछ गूढ़ रहस्यों को समझाने के लिए अर्थशास्त्र का उपयोग किया जाता है। इसलिए हम भी समय को समझाने के लिए अर्थशास्त्र का उपयोग करेंगे। सबसे पहले तो आप किसी वस्तु के मूल्य (Value) को उसका समय (Time) मानिये। उस वस्तु के मूल्य और उसकी कीमत (Price) के अंतर को समयांतराल (Duration) मानिये। और समय की इकाइयों (Units) को रुपया (Money) मानिये। क्योंकि वस्तु का मूल्य उसकी लागत पर निर्भर करता है। जबकि वस्तु की कीमत अपेक्षित लाभ पर निर्भर करती है। फलस्वरूप वस्तु की कीमत मूल्य से अधिक और अचर (परिवर्तित) होती है। अब आप समय की अवधारणा को सही तरीके से समझ पाएंगे। क्योंकि किसी भी वस्तु का मूल्य और उसकी कीमत दोनों एक ही इकाईयों (Units) द्वारा ज्ञात की जाती है। अर्थात वस्तु का मूल्य और उसकी कीमत दोनों रुपया (भारत के परिप्रेक्ष्य) में व्यक्त की जाती है। जिस क्षण के लिए हम भौतिकता की वास्तविक स्थिति ज्ञात करना चाहते। ठीक उसी क्षण में भौतिकता की वास्तविक स्थिति नहीं बतला पाते हैं। क्योंकि स्थिति ज्ञात करने में और उसे बताने में भौतिकता की वास्तविकता बदल जाती है। अर्थात समय बदल जाता है। इसके अलावा दो भिन्न भौतिकता की स्थिति के मध्य का अंतर भी मूल्य और उसकी कीमत पर आधारित होता है। क्योंकि इस अंतर को भी रुपया अर्थात समय की इकाई के रूप में व्यक्त किया जा सकता है।

अगला लेख "समय का संक्षिप्त इतिहास" जिसमें हम समय के आयाम, समय के मापन और उससे जुड़ी भविष्यवाणियों के बारे में चर्चा करेंगे।

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