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समय का संक्षिप्त इतिहास

विज्ञान की सबसे बड़ी विशेषता उसकी अपनी विषय के प्रति स्पष्टता है जो उसे अन्य विषयों से पृथक करती है। अर्थात विज्ञान में अपरिभाषित शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं है। और जिन शब्दों को हम परिभाषित नहीं कर सकते हैं विज्ञान में विश्लेषण के लिए हम उन शब्दों का उपयोग नहीं करते हैं। तो क्या वास्तव में हम समय को परिभाषित कर सकते हैं ? क्या हम समय को भली-भांति जानते/पहचानते है ? जी हाँ, बिल्कुल हम समय को भली-भांति जानते/पहचानते और उसे परिभाषित करने के साथ-साथ मापते भी हैं। समय के बारे में इतना जोर देकर प्रश्न करने का एक मात्र कारण यह है कि चूँकि समय अमूर्त है। तो हम समय के परिप्रेक्ष्य भौतिक राशियों की माप कैसे सकते हैं ? अर्थात यह तो सिद्धांतों के खिलाफ होगा ! कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम समय के रूप में किसी और की पहचान करते हैं ? और दावा करते हैं कि हम समय को जानते हैं। अर्थात कहीं हमारे मस्तिष्क में समय के बारे में गलत पहचान तो अंकित नहीं है न ! नहीं, ऐसा नहीं है। बेशक समय भ्रम पैदा करता है। परन्तु हम समय की सही अर्थात मूर्त रूप में ही पहचान करते हैं। यह कैसे संभव हो पाता है। आइये इस पर हम विचार करते हैं।

समय, परिवर्तन की माप का गणितीय आधार है। जिसके परिप्रेक्ष्य हम अन्य भौतिक राशियों की माप करते हैं। ताकि मानव जाति सर्वसम्मति से बने मानकों द्वारा अन्य भौतिक राशियों की सही-सही माप ले सके। विज्ञान में हम मुख्य रूप से तीन भौतिक राशियों (लम्बाई, द्रव्यमान और समय) को पढ़ते हैं। जिनके मात्रकों के द्वारा हम व्युत्पन्न मात्रकों को व्यक्त करते हैं। या यूँ कहें कि हम इन तीनों मूल राशियों के द्वारा व्युत्पन्न राशियों को परिभाषित कर सकते हैं। इन मूल राशियों में लम्बाई और द्रव्यमान का अपना मूर्त रूप होने के कारण इन मूल राशियों को परिभाषित करना आसान होता है। जबकि समय के अमूर्त (प्यार, सुंदरता, घृणा इत्यादि को भी) होने की वजह से उसे परिभाषित करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है। फलस्वरूप समय को हम पदार्थ के मूलभूत गुणधर्म "गति" द्वारा परिभाषित करते हैं। सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने विशेष सापेक्षता के सिद्धांत में पदार्थ के मूलभूत गुणधर्म "गति" का संबंध इन्ही तीन मूल राशियों (लम्बाई, द्रव्यमान और समय) के साथ बतलाया था।

लम्बाई को नापा जाता है। मात्रा को मापा जाता है। क्योंकि लम्बाई का संबंध अंतरिक्ष (स्पेस) से और मात्रा का संबंध द्रव्यमान से होता है। परन्तु समय के अमूर्त होने के बाबजूद हम उसे कैसे माप सकते हैं ? क्या वाकई में समय को मापा जाता है ? क्या समय अगणनीय है ? तब तो काल-गणना कहना गलत होगा ? अंताक्षरी खेलते समय टिक-टिक वन, टिक-टिक टू इस तरह गिनती गिनने का क्या अर्थ है ? मुख्य रूप से हम अंग्रेजी व्याकरण में संज्ञा के रूप में समय और धन को अगणनीय ही मानते हैं। क्योंकि धन और समय को व्यक्त करने के लिए मात्रकों की आवश्यकता होती है। इसके बाबजूद अंग्रेजी व्याकरण में समय का कई रूपों में गणनीय उपयोग भी किया जाता है। उदाहरण के लिए 5 बार (5 Times) और किसी यथार्थ समय (5 O'Clock) को बताने के लिए आदि। ठीक उसी प्रकार हिंदी व्याकरण में समय को गणनीय माना गया है। क्योंकि समय को संज्ञा (स्त्रीलिंग और पुल्लिंग) के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। परन्तु विज्ञान में मात्रकों को लिखते समय जिन सावधानियों को ध्यान में रखा जाता है। उसके अनुसार समय अगणनीय होता है। क्योंकि मात्रकों का बहुवचन नहीं बनाया जाता है। समय के बारे में भ्रम की शुरुआत यहीं से होती है। और इन्हीं पराभौतिकी समस्याओं का हल न खोज पाने के कारण हम कई तरह के भ्रमों में उलझ जाते हैं। समय की माप और उसे मूर्त रूप देने के पीछे कौन सा भौतिकीय अर्थ है, इसे समझने का हम प्रयास करते हैं।

सर्वप्रथम हमें यह समझना चाहिए कि समय की संकल्पना की आवश्यकता क्यों पड़ी ? इसके दो कारण समझ में आते हैं। पहला कि घटनाओं की पुनरावृत्ति ने प्रकृति के नियमित और व्यवस्थित होने के बारे में जानकारी दी होगी। फलस्वरूप मनुष्य का ध्यान घटनाओं की अवधि और उनकी पुनरावृत्ति होने के अंतराल दोनों पर गया होगा। और दूसरा उन घटनाओं में आपसी भेद करने के लिए कि कौन सी घटना पहले घटित हुई है और कौन सी घटना बाद में घटित हुई है ? फलस्वरूप मनुष्य का ध्यान नियमित और अनियमित घटनाओं और उनकी तुलनात्मक अवधि के अंतराल पर गया होगा। जिससे कि समय के मापन की शुरुआत हुई होगी।

समय की धारणा परिवर्तन की देन है। अर्थात समय की पहचान परिवर्तन के रूप में की जाती है। चूँकि परिवर्तन मूर्त है और समय अमूर्त है। फलस्वरूप समय का मापन मूर्त रूप में परिवर्तन को मापकर किया जाता है। क्योंकि परिवर्तन को हम गति, बल, दिशा, स्थिति और आकार आदि के रूप व्यक्त कर सकते हैं। इसलिए हम ने गति, बल, दिशा, स्थिति और आकार आदि के परिवर्तन को मापा। और इन नियमित परिवर्तनों की माप के आधार पर समय को परिभाषित किया। परन्तु हमने तो समय की परिभाषा में "समय को परिवर्तन की माप का आधार" बताया था। तो फिर यह कैसे संभव है कि परिवर्तन की माप के आधार पर समय को परिभाषित किया जाता है ? इसके लिए हमने नियमित घटनाओं का सहारा लिया। कहने का अर्थ है कि हमने मानक निर्धारण और समय को परिभाषित करने के लिए नियमित घटनाओं का सहारा लिया। जबकि इन्ही मानकों के द्वारा नियमित और अनियमित घटनाओं और परिवर्तन को मापा। स्पष्ट है कि हम समय को अन्य राशि के रूप में मापते हैं। न की समय को मापा जाता है।

न केवल गति बल्कि समय भी सापेक्ष है :
जब देखा गया कि अलग-अलग मनुष्यों की मनोस्थिति ने एक ही समय पर, एक ही परिस्थिति में एक साथ गुजारे हुए समय को एक दूसरे से भिन्न-भिन्न बताया है। जिसे हम अक्सर महसूस भी करते हैं कि जब हम ऊब जाते हैं तो समय लंबा प्रतीत होता है। जब हम खुश रहते हैं तो समय छोटा प्रतीत होता है। जब हम जल्दी में होते हैं तब समय तीव्र प्रतीत होता है। जब हम किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं तब समय धीमा प्रतीत होता है। जब हम दुखी होते हैं तो समय मरा प्रतीत होता है। जब हम दर्द में होते हैं तो समय का अंत मालूम होता है। इस तरह से तो विश्व में असामंजस्य फ़ैल जाता। न केवल समय को लेकर बल्कि समय के परिप्रेक्ष्य की जाने वाली राशियों के मापन को लेकर भी। इस तरह समय प्रेक्षक विशेष के लिए भिन्न-भिन्न हो जाता। हालाँकि समय प्रेक्षक विशेष के आधार पर ही मापा जाता है। क्योंकि समय का सापेक्ष मापन किया जाता हैं। कहने का अर्थ है कि समय की माप का परिमाण भिन्न-भिन्न होता है। परन्तु उन सबका निष्कर्ष एक ही होता है। ठीक वैसे ही जैसे राम की गति मेरे सापेक्ष 5 कि.मी./घंटा है। जबकि आपके सापेक्ष 2 कि.मी./घंटा है। परन्तु किसी भी क्षण हम दोनों के द्वारा बतलाई गई राम की स्थिति एक समान और यथार्थ होती है। इस तरह से गति और समय दोनों सापेक्ष माने गए हैं। और समय को मापने के लिए सापेक्षीय पैमाने (मानक) का उपयोग किया जाता है।

आपने हमारे पिछले लेख समय, उसकी पहचान और उसके प्रकार में समय को तीनों रूपों में विभक्त किया हुआ पाया था। ये तीनों रूप समय को न केवल अलग-अलग तरह से परिभाषित करते हैं बल्कि इन्ही रूपों की वजह से व्यक्ति समय को लेकर भ्रमित हो जाता है। उसे समझ में नहीं आता है कि कहे गए सभी कथन सही मालूम होते हैं। परन्तु निष्कर्ष असंगत प्रतीत होता है। क्योंकि हम समय और समयांतराल दोनों को मापने के लिए घड़ियों का उपयोग करते हैं। परन्तु समय और समयांतराल एक ही नहीं हैं ? तब वह गति के स्थान पर समय शब्द का उपयोग करने लगता है। वह समय की गति होने के निष्कर्ष को स्वीकार लेता है। समय को व्यक्त करने के लिए हम एक से अधिक शब्दों का उपयोग करते हैं। वास्तव में समय की सही पहचान न कर पाने का कारण समय का पराभौतिकी से जुड़ा हुआ होना है। और इस समस्या को दूर करने का सबसे बड़ा उपाय ''सम्बंधित शब्दों को उसके मूल अर्थ के साथ प्रयोग करना चाहिए।'' न कि उनके स्थान पर समय शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए। इसलिये हम समय से सम्बंधित कुछ शब्दों के मूल अर्थ को नीचे लिख रहे हैं। जिससे कि हमें भ्रम को दूर करने में सहायता मिलेगी।
पराभौतिकी की लगभग सभी समस्याएँ वास्‍तव में भाषा से संबंधित समस्याएँ हैं। अगर हम भाषा का उपयोग बेहतर तरीके से करें और उसके पीछे छुपे हुए तर्क को समझने लगें। तब अनेकों समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा।                                     - लुडविग विट्गेंश्टाइन
क्षण : समय के इस रूप के द्वारा समय के परिप्रेक्ष्य वस्तु या पिंड की गति या स्थिति और अन्य भौतिक राशियों की माप की जाती है। यह इस बात का संकेत है कि प्रकृति में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। और प्रत्येक भौतिक राशि की माप किसी क्षण विशेष के लिए होती है न की हमेशा के लिए। फलस्वरूप समय चौथे आयाम के रूप में परिभाषित हुआ। परन्तु समय का आयाम लंबाई, चौड़ाई और ऊंचाई आयाम से भिन्न होता है।

अवधि : किसी कार्य को करने में लगा समय अवधि के रूप में परिभाषित होता है। समय के इसी रूप के कारण समय को मापने की आवश्यकता पड़ी होगी। क्योंकि समय का तुलनात्मक रूप अवधि है। किसी कार्य को करने में व्यक्तियों को प्रथम, द्वितीय स्थान देने का अर्थ उस कार्य को करने में लगने वाले समय की तुलनात्मक भिन्नता को दर्शना है। जबकि दोनों की शुरुआत एक ही क्षण से हुई है।

उम्र/आयु : यह क्षण और अवधि दोनों का मिला जुला रूप है। जहाँ उम्र का संबंध जन्म से अब तक किये गए कार्यों और उन कार्यों के अंतराल की अवधि को कैलेंडर द्वारा मापने से है। वहीं आयु का संबंध बिना कैलेंडर के तुलनात्मक उम्र जानने से है। अर्थात उन व्यक्तियों का जन्म दिवस भले ही एक ही दिन न हो। तब भी हम अपनी गणना कर सकते हैं। तुलना करने पर कौन पहले/बाद का (क्षण का संज्ञान) है ? और दोनों के मध्य कितना अंतराल है ? ज्ञात किया जा सकता है। उम्र का संबंध कैलेंडर में जन्म की निश्चितता से है जबकि आयु का संबंध जन्म से लेकर किसी क्षण विशेष तक की अवधि निर्धारण से है। इसलिए अंग्रेजी में निश्चित समय (2 बजे से सुबह से, पिछले बुधवार से, अगले महीने से इत्यादि) के लिए "Since" और अवधि (5 घंटे, 2 महीने, 6 वर्ष इत्यादि) निर्धारण के लिए "For" का उपयोग किया जाता है।


समय और समयांतराल : समय (Period) और समयांतराल (Duration) दो भिन्न-भिन्न चीजें हैं। जहां समय का आशय किये गए कार्य में लगने वाली अवधि से है। वहीँ समयांतराल का आशय पहले कार्य के अंतिम क्षणों और दूसरे कार्य के प्रारंभिक क्षणों के अंतराल से है। इसलिए समय का संबंध पदार्थ है तो समयांतराल का संबंध अंतरिक्ष है। समय का केवल और केवल एक ही अर्थ निकलता है। किसी कार्य को करने में लगने वाले समय अथवा घटना की समयावधि। जबकि समयांतराल के दो अर्थ निकलते हैं।
  • किसी काल की दो भिन्न घटनाओं के मध्य का समय अंतर (पहली घटना का अंतिम क्षण और दूसरी घटना का प्रारंभिक क्षण के मध्य का अंतर जिसे समयावधि के रूप में ही मापा जाता है।)
  • किन्ही दो भिन्न काल के मध्य का अंतराल (किसी काल में घटित घटना का दूसरे काल को प्रभावित करने में लगने वाला समय) दूसरे शब्दों में दो काल के मध्य की दूरी जो सूचना संचरण (माध्यम और मार्ग दोनों) पर निर्भर करती है। इसलिए कहा गया कि सूर्य के तत्काल विलुप्त हो जाने के बाद भी इस बात की जानकरी और पृथ्वी की परिक्रमण गति में तत्काल प्रतिक्रिया फलस्वरूप परिवर्तन नहीं होगा। 
बारंबार : परिवर्तन और घटना के दोहराव ने ही मनुष्य को समय के अस्तित्व का संज्ञान कराया होगा। तभी आम लोगों के बीच एक कहावत है कि "समय अपने आप को दोहराता है।" और यह दोहराव नियमित, न्यूनतम समयांतराल और बाह्य घटकों से न्यूनतम प्रभावित होने वाला होना चाहिए। तब तो हम समय की परिशुद्ध माप ले सकते हैं। समय का इस बात से कोई संबंध नहीं होता है कि परिवर्तन छोटा है या बड़ा !! परन्तु समय की माप का इस बात से संबंध है कि परिवर्तन छोटा है या बड़ा !! क्योंकि समय की माप एक गणितीय अवधारणा है।

दर : घटना के दोहराव होने पर जितनी कम से कम परिवर्तन (मात्रा में) होने की संभावना होगी। समय की माप उतनी ही परिशुद्ध ज्ञात की जा सकेगी। वास्तव में समय का भौतिकी अर्थ इन्ही दो गुणों (बारंबार और दर) की देन है। घटनाओं के दोहराव में लगने वाला समयांतराल "समय की गति" का भ्रम उत्पन्न करता है। जबकि समय की अपनी कोई गति नहीं है। निरंतर परिवर्तन की मात्रा का प्रवाह दर द्वारा परिभाषित होता है। जिसे कुछ लोग समय की गति मान लेते हैं। समय कभी भी पदार्थ को नियंत्रित नहीं करता है। बल्कि अंतराल यानि अंतरिक्ष कम या अधिक होने से घटना के दोहराव होने का समयांतराल प्रभावित होती है। जो महज एक संयोग होता है को हम यह नहीं कह सकते हैं कि समय पदार्थ को नियंत्रित करता है। बल्कि यह जरूर कहा जा सकता है कि अंतरिक्ष पदार्थ को निर्देशित करता है।
पदार्थ आकाश को बताता है कि कैसे मुड़ना है जबकि आकाश पदार्थ को बताता है कि कैसे चलना है।                                                                                         - सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत
कारक (संयोग) : किसी भी घटना की शुरुआत महज एक संयोग जिसे क्षण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है से मानी जाती है। अर्थात घटनाओं को उस क्षण के लिए घटनाक्रम (टाइमलाइन) में दर्शा सकते हैं। समय कारक के रूप में तब परिभाषित हो सकता है जबकि घटनाएं नियमित और दोहराव करती है। इस स्थिति में घटनाओं को घटनाक्रम (टाइमलाइन) में न दर्शा कर घटना चक्र में दर्शाया जाता है।

घटक (चरण) : पदार्थ की भौतिक राशियों में एक सीमा तक ही परिवर्तन करना संभव होता है। उस सीमा के बाद पदार्थ का रूप बदल जाता है। पदार्थ की अवस्था परिवर्तन की सीमा समय के रूप में घटक कहलाती है। फलस्वरूप पदार्थ कई रूपों/चरणों में परिभाषित होता है। पदार्थ चरण की अवधि के रूप में परिभाषित होता है।

नियतांक (नियति) : समय नियतांक के रूप में इस तरह कार्य करता है कि यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति लगभग 6 अरब वर्ष पहले हुई है तो ब्रह्माण्ड का अंत लगभग 18 अरब वर्ष बाद होगा। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं होता है कि ब्रह्माण्ड की एक निश्चित आयु है। यदि 2 अरब वर्ष बीत गए हैं तो अब 22 अरब वर्ष बचे हैं। बल्कि नियतांक का यह अर्थ है कि उत्पत्ति से वर्तमान अवस्था तक आने में कितना समय लगा ? अर्थात परिवर्तन की दर कितनी है ? जो अंत की अवस्था तक पहुँचने में कितना समय लेगी ? जैसा कि हमने पहले भी लिखा है कि समय का भौतिक अर्थ दर और बारंबार दोनों गुणों से परिभाषित होता है।

काल : साधारतः इस शब्द का उपयोग समय के लिए होता है। परन्तु काल एक निश्चित अंतराल/अंतरिक्ष को दर्शाता है। जहाँ पर क्रियाएँ, कार्य और घटनाएं क्रियान्वित होती है। अर्थात काल हमें एक छद्म धरातल प्रदान करता है। जिसके सापेक्ष हम भौतिक राशियों की माप ज्ञात कर सकते है। फलस्वरूप हमें समय के निरपेक्ष होने का भ्रम होता है। काल उस देश के समान है जिसे एक व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। व्यवस्था के किसी एक भाग का बदलाव सारी व्यवस्था में देखने को मिलता है। काल अर्थात देश में बाह्य बल की उपेक्षा कर दी जाती है। समय, काल अर्थात देश का एक प्रभाग है। जो देश की वर्तमान अवस्था के लिए जिम्मेदार होता है।

तात्क्षणिक/समकालीन/तत्कालीन : विज्ञान में इस शब्दावली का कोई अर्थ नही है। क्योंकि गति पदार्थ का मूलभूत गुणधर्म है। और दूसरा कारण संचार संचरण में समय लगता है। जो संचार संचरण के माध्यम और साधन पर निर्भर करता है। फलस्वरूप हम यह निश्चित तौर पर नहीं कह सकते हैं कि घटना तत्काल घटित हुई है। भले ही समयांतराल नगण्य या हम उसे मापने में अक्षम ही क्यों न हों। परन्तु पृथ्वी की विशालता ने मानव जाति को एक छद्म धरातल दे दिया है। जिसे मानव के परिप्रेक्ष्य निरपेक्ष माना जा सकता है। फलस्वरूप तात्क्षणिक/समकालीन/तत्कालीन शब्दों का अपना अलग महत्व होता है। क्योंकि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण हम और पृथ्वी एक दूसरे के सापेक्ष स्थिर हैं। अर्थात एक समान त्वरित हो रहे हैं।

आवर्तकाल : जिस प्रकार परिवर्तन की दर से समय की गति होने का भ्रम उत्पन्न होता है। ठीक उसी प्रकार आवर्तकाल से समय की लम्बाई होने का भ्रम उत्पन्न होता है। वास्तव में समय की न तो कोई लम्बाई होती है और न ही समय की कोई गति होती है। परिवर्तन की दर और आवर्तकाल ऐसे शब्द हैं जिनके द्वारा हम समय के अस्तित्व को स्वीकारते हैं। इन शब्दों के द्वारा हम समय को परिभाषित कर सकते हैं। क्योंकि हम इनके द्वारा समय को मूर्त रूप देते हैं। जहाँ एक ओर परिवर्तन की दर का आशय समय के अस्तित्व होने से हैं। वहीँ दूसरी ओर आवर्तकाल का आशय समय को मापने अर्थात समय के मापदंड के रूप में उपयोग करने से है। गतियों के प्रकार के कारण आवर्तकाल दोलनकाल, घूर्णनकाल और परिक्रमणकाल आदि के रूप में परिभाषित होता है। जिन्हें हम समय के मापदंड के रूप (दिन और वर्ष आदि के रूप) में परिभाषित करते हैं।

असमय : जब कार्यों को करने का एक निश्चित समय निर्धारित हो या हो गया हो। तब उस कार्य अवधि के अलावा शेष समय पर उस कार्य को करने, अनावश्यक किसी स्थान पर पहुँचने या किसी कार्य को करने, विषय से हटकर बात करने का समय (क्षण) असमय कहलाता है। फलस्वरूप जैविक घड़ी की संकल्पना आई।

दौर : जब आज के समान समय को मापने के साधन न होना या समय को मापने के मापदंड उपलब्ध न होना। या प्रेक्षक के रूप में मानव जाति का अस्तित्व ही न होना। उस समय के परिवर्तन को मापने या उसे परिभाषित करने के लिए हम जिस शब्द का उपयोग करते हैं। उसे दौर कहते हैं। यह उस समय की विशेषता के रूप में जाना जाता है। जो क्रांति अथवा किसी बड़े परिवर्तन के रूप में पहचानी जाती है। जिसके प्रभाव को हम मापते हैं।
  
काल-गणना : कैलेंडर और घड़ी
वास्तव में समय की संकल्पना काल-गणना पर आधारित है। समय के साथ-साथ परिशुद्धता मुख्य विषय बन गया। फलस्वरूप समय की संकल्पना मापन पर आधारित हो गई। जिससे की समय को लेकर बहुत सारे भ्रम फैलने लगे। सबसे अधिक भ्रम समय की गति और उसकी दिशा को लेकर हैं। इसके बाद भी सभी मात्रक काल-गणना पर आधारित होते हैं। फिर चाहे हम दिन और वर्ष को क्रमशः घूर्णन और परिक्रमण गति द्वारा परिभाषित करें अथवा सेकेंड को परिभाषित करने के लिए सीजियम परमाणु के कंपनों की गणना करें। हम अन्य भौतिक राशियों को मापते हैं और उनके द्वारा समय को व्यक्त करते हैं। परन्तु समय को कभी भी मापते नहीं हैं। अब चूँकि काल-गणना इकाई की गिनती के रूप में तो होती नहीं है फलस्वरूप हम यह कह सकते हैं कि हम समय को आंकते हैं। दूसरे शब्दों में भौतिकता की अन्य राशियों में होने वाले परिवर्तन को लेकर यह आकलन किया जाता है। और यह आकलन अंकों के रूप में बताया जा सकता है इसलिए यह विज्ञान में मान्य और गणितीय रूप में स्वीकारा जाता है।

मनुष्य ने शुरूआती चार घड़ियों का उपयोग काल गणना के लिए किया। इन घड़ियों के द्वारा समय की परिशुद्ध माप ज्ञात नहीं की जा सकती थी। क्योंकि इन चारों घड़ियों की अपनी कुछ सीमाएं थी। सौर घड़ी का उपयोग सूर्य की उपस्थिति में ही संभव था। तो जल, मोमबत्ती और रेत घड़ियाँ बाह्य कारकों से प्रभावित होती थी। पात्र में पानी पूर्णतः भरे होने के कारण पानी का बहाव तेज रहता था। और बर्तन में पानी का स्तर गिर जाने से पानी का बहाव कम हो जाता था। ईंधन के प्रकार, वातावरण में ऑक्सीज़न की मात्रा मोमबत्ती घड़ी को बहुत अधिक प्रभावित करती थी। रेत घड़ी के रूप में पारे (Mercury) का उपयोग भी किया गया था। परन्तु रेत घड़ी काल गणना के लिए सबसे सुग्राही साबित हुई। इसके अलावा ये चारों घड़ियाँ समय की संकल्पना को झुठलाती थी। क्योंकि माना जाता है कि समय सतत है। परन्तु ये चारों घड़ियाँ एक निश्चित समयावधि को ही मापती थी। उसके बाद इन घड़ियों में मानव हस्तक्षेप की आवश्यकता होती थी। और चूँकि मानव हस्तक्षेप का अंतराल अनिश्चित होता था। इसलिए हम इन घड़ियों से सतत समय की माप नहीं कर सकते थे। इसलिए हम कहते हैं कि काल गणना की जाती है। न की समय को मापा जाता है। फिर चाहे हम समय को घड़ी के रूप में व्यक्त करें या कैलेंडर के रूप में परिभाषित करें। एक वर्ष वह अंतराल होता है जब पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा लगाती है। और एक दिन वह अंतराल होता है जब पृथ्वी स्वयं के अक्ष के परिप्रेक्ष्य एक चक्कर लगाती है। अब यह अंतराल कितना भी लंबा हो या छोटा हो। वर्ष और दिन इसी तरह परिभाषित होते हैं। और इनकी गणना की जाती है न की मापन।

चूँकि समय को सतत माना जाता है ! पृथ्वी भी निरंतर घूर्णन और परिक्रमण गति करती है। तो काल गणना की शुरुआत कहाँ से की जाए ? उत्तर स्वरुप हम जहाँ से गिनना शुरू कर दें। हम लोगों ने अपनी यादों में उन सभी यादों को यादगार बनाया है। जब भी पृथ्वी में बड़े क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। किसी समुदाय ने किसी घटना को संजोकर रखा तो किसी ने दूसरी घटनाओं को संजोया है। इसलिए मानव इतिहास में एक नहीं कईयों कैलेंडर मिलते हैं। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध इत्यादि सभी धर्मों के अपने अलग-अलग कैलेंडर हैं। परन्तु सभी कैलेंडरों की शुरुआत एक ही समय नहीं हुई है। इन सब में बायजेंटाइन का कैलेंडर 7523-24 साल पुराना है। सभी कैलेंडरों में एक वर्ष की अवधि उतनी ही लम्बी है जितने समय में पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा करती है। परन्तु इन कैलेंडरों द्वारा समय मापन की पद्धति भिन्न-भिन्न होती है। क्योंकि कुछ कैलेंडर सूर्य आधारित गणना करते हैं तो कुछ चन्द्रमा आधारित गणना करते हैं। कुछ कैलेंडर सूर्य और चन्द्रमा के संयोजित रूप से समय की गणना करते हैं।

हमारी यादों में कैलेंडर के द्वारा मानव इतिहास क्रमशः बायजेंटाइन कैलेंडर (7523-24), असीरियन कैलेंडर (6765), हिब्रू / यहूदी कैलेंडर (5775-76), चीनी कैलेंडर (4651-52), कोरियन कैलेंडर (4348-49), थाई सोलर / बुद्धिस्ट कैलेंडर (2559), विक्रम संवत् कैलेंडर / हिंदू (2071-72), ग्रेगोरियन कैलेंडर (2015), जूलियन (13 दिन कम), इथियोपियन (2007-08), शालीवाहन शक कैलेंडर / हिंदू (1937-38), हिजरी / इस्लामिक कैलेंडर (1437), बंगाली कैलेंडर (1422) वर्ष पुराना है। प्रत्येक समुदाय या धर्म ने उन्ही घटनाओं को याद रखा। जिसने उन्हें और उनके समुदाय को प्रभावित किया था। परन्तु आज हम वैश्विक धरातल पर जूलियन कैलेंडर को सर्वसम्मति से स्वीकारते हैं। इस कैलेंडर के वर्तमान स्वरुप में आने की अपनी अलग कहानी है। जिसमें सल्तनत है। लोगों में अहम की भावना है। अपने देवताओं को महान बताने की शक्ति है। साम्राज्यवाद है। परन्तु सबसे बड़ी बात इसमें विज्ञान है। जिसके कारण आज यह कैलेंडर समायोजित है। कैलेंडर में कुछ कमियां हैं। परन्तु वे कमियां हम जैसों के लिए नगण्य हैं।

समय को इकाईयों के रूप में दर्शाने की प्रथा हजारों साल पुरानी है। मेसोपोटामिया की सभ्यता में सुमेर वासियों ने 1 वर्ष को 12 महीनों में, 1 तिथि (दिन) को 24 घंटे में, 1 घंटे को 60 मिनिट में तथा 1 मिनिट को 60 सेकंड में बांटा गया था। उन्होंने समय मापन को एक गणितीय संकल्पना दी थी। क्योंकि उनकी संकल्पना में सभी घंटे, मिनिट और सेकंड एक समान होते थे। भले ही वे अंतराल आज के समान परिशुद्ध नहीं मापे जाते थे। क्योंकि उनको परिभाषित करने का कोई प्राकृतिक आधार नहीं था। जैसा कि वर्ष, महीने और दिन को परिभाषित करने के लिए होता है। इसलिए हमें सेकंड को मापने के लिए ऐसे छोटे अंतराल की आवश्यकता पड़ी। जो प्राकृतिक, नियमित, बाह्य कारकों से प्रभावित होने की संभावना कम रखने वाला और एक निश्चित अंतराल को परिभाषित करने वाला हो। वर्तमान में हम सीजियम परमाणु के 9,19,26,31,770 कंपन करने में लगी अवधि को एक सेकंड कहते हैं। परन्तु ये परिभाषा कुछ लोगों को तार्किक और वास्तविक नहीं लगती है। क्योंकि 1 सेकंड में हम अधिकतम दस तक गिनती गिन सकते हैं। तो फिर वैज्ञानिकों ने 1 सेकंड में उन कम्पनों को कैसे गिना होगा ? कहीं वैज्ञानिक हमें बुद्धू तो नहीं बना रहे हैं न ? नहीं, वैज्ञानिक हमें गलत नहीं बता रहे हैं। क्योंकि हम जिस आवृत्ति की रेडियो तरंगों का उपयोग सीजियम परमाणु को आयनित करने के लिए करते हैं। उतनी ही आवृत्ति अर्थात कपंन सीजियम परमाणु में देखने को मिलते हैं। अर्थात यह कंपन दो निम्न ऊर्जा स्तर के मध्य सीजियम परमाणु के कपंन होते है। और यहाँ दो निम्न ऊर्जा स्तर का अभिप्राय सीजियम परमाणु के आयनित और बिना आयनित अवस्था के मध्य के अंतर से है।

समय और उसकी विशेषता :
समय विज्ञान में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है। क्योंकि वह निर्णायक होता है। इस बात का कि कौन सही था और गलत ? समय को लेकर विज्ञान में दो तरह से भविष्यवाणियाँ की जाती हैं। जिसके बारे में आने वाले लेखों में हम विस्तार से चर्चा करेंगे। जिसमें से एक तरह की भविष्यवाणियों में नियमों का बहुत बड़ा योगदान होता है। जिसके (नियमों के) आधार पर हम आने वाले समय को निर्धारित करते हैं। ठीक उसी तरह से जिस प्रकार सर स्टीफेन हाकिंग ने नियमों के महत्व को समझते हुए, इस बात के लिए दावा किया है कि यदि ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड को बनाया है। तो उस ईश्वर के पास इस ब्रह्माण्ड को बनाने के लिए समय को लेकर सिर्फ दो ही विकल्प थे। अर्थात ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड की रचना या तो महानाद (बिग बैंग) के समय अथवा महानाद (बिग बैंग) के बाद की होगी। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है जैसा कि नियम जो वर्तमान में लागू होते हैं, को जानकार हम भविष्य तय कर सकते हैं। तो जब विलक्षणता के समय किसी भी प्रकार से भौतिकी के नियम लागू नहीं थे। तब ब्रह्माण्ड का स्वरुप क्या होगा ? इस बात को तय करना असंभव हो जाता है। अर्थात यदि ईश्वर ने विलक्षणता की स्थिति के पूर्व ब्रह्माण्ड की रचना की होती तो विलक्षणता की स्थिति आते ही उस ईश्वर के द्वारा रचित ब्रह्माण्ड का अंत उसी समय हो गया होता। तो इस स्थिति में हम इस ब्रह्माण्ड की रचना का श्रेय उस ईश्वर कैसे दे सकते हैं ? अर्थात ईश्वर ने ब्रह्माण्ड की रचना या तो महानाद के समय या फिर महानाद के बाद की होगी। इस प्रकार नियमित परिवर्तन के रूप में समय को परिभाषित करना या समय के रूप में नियम के महत्व को समझना एक ही बात है।

दौड़ में पहला स्थान किसका था ? इस बात को लेकर जब लोगों में विवाद हो जाता है। तब समय की सबसे छोटी इकाई का महत्व समझ में आता है ? सीधी सी बात है समय की सबसे छोटी इकाई का संबंध सबसे छोटे परिवर्तन के साथ होगा। क्योंकि समय की इकाई का मतलब समय की माप से है और यह मूर्त रूप में किसी न किसी अन्य भौतिक राशि में परिवर्तन द्वारा परिभाषित होनी चाहिए। और जैसा कि हमने ऊपर लिखा है मूल राशियों में लंबाई का संबंध अंतरिक्ष/अंतराल से है जबकि पदार्थ की मात्रा का संबंध द्रव्यमान से है। और इस प्रकार एक बात समझ में आ जाती है कि समय की सबसे छोटी इकाई का संबंध अंतरिक्ष/अंतराल या द्रव्यमान की सबसे छोटी इकाई या उस इकाई परिवर्तन से होना चाहिए। इसलिए हमने समय की सबसे छोटी इकाई को सैद्धांतिक रूप से लम्बाई की सबसे छोटी इकाई 1.616199(97)×10−35 मीटर (प्लांक लम्बाई) को तय करने में प्रकाश जो सैद्धांतिक रूप से सबसे तेज गति करता है जितना समय लेता है। उसे ही समय की सबसे छोटी इकाई 5.39 x 10−44 सेकंड कहा गया। इस प्रकार समय परिवर्तन में भेद उत्पन्न करता है। अर्थात शून्य समय का कोई अर्थ नहीं होता है। जैसा कि हमने तत्काल शब्द को परिभाषित करते समय भी कहा था। इसके अलावा कुछ ऐसी स्थिति भी बनती हैं जब समय का उस पिंड, कण, वस्तु या व्यक्ति के लिए कोई महत्व नहीं रह जाता है। हालाँकि नीची लिखी गईं ये दोनों स्थितियां काल्पनिक ही हैं। इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है। परन्तु लेख में इनको शामिल करने का उदेश्य समय की सीमाओं से आपको परिचित करवाना है।
  1. किसी भी कार्य को करने के लिए जब व्यक्ति/मशीन के पास आवश्यक शक्ति उपलब्ध हो।
  2. जब परिणामी बाह्य बल का मान शून्य हो अर्थात पिंड स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष में गतिमान हो।
समय मापने के यंत्र
विवरण
सौर घड़ी (3500 ई.पू.) : सूर्य से बनने वाली परछाई का आकलन करने के लिए इस घड़ी का उपयोग किया जाता था। इस घड़ी को मानक रूप देने के लिए बड़े और स्थिर पत्थरों का उपयोग सूर्य के परिप्रेक्ष्य स्थिति निर्धारण में किया जाता था।
मानव जाति ने काल-गणना की शुरुआत सौर घड़ी से की है सौर घड़ी का प्रचलन मिश्र की सभ्यता से माना जाता है। परन्तु इस घड़ी को उपयोग में लाने के प्रमाण 742 ई.पू. से प्राप्त होते हैं। नक्षत्रों की स्थिति निर्धारण में इसका उपयोग होता था।
जल घड़ी (2000 ई.पू.) : यह घड़ी एक बर्तन से दूसरे बर्तन में पानी के बहाव की गति (ताप-दाब और श्यानता) पर निर्भर करती थीइस घड़ी के द्वारा सर्वप्रथम समय की दो इकाइयों के बीच संबंध स्थापित किया गया था
इस घड़ी का प्रचलन 328 ई.पू. (पश्चिमी एशिया) से माना जाता है। यह घड़ी लगभग सभी छोटी-बड़ी सभ्यताओं में उपयोग में लायी जाती थी। इस घड़ी में समय की दो इकाइयों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए बर्तनों की संख्या बढ़ानी होती थी
मोमबत्ती घड़ी (1400 ई.पू.) : प्रत्यक्ष रूप किसी एक राशि के द्वारा समय को मापने की शुरुआत इसी घड़ी के द्वारा हुई थी। अर्थात जली हुई मोमबत्ती की लम्बाई का आशय गुजरे हुए समय से था। यह परिशुद्ध परिणाम देने में असमर्थ थी।
इस घड़ी की खोज काश्रेय चीन को जाता है। परन्तु 9 वी. सदी के अंतिम दशकों में इस घड़ी का सबसे अधिक उपयोग इंग्लैंड में किया जा रहा था। इस घड़ी का आशय सिर्फ मोमबत्ती से नहीं है, बल्कि विभिन्न प्रकार के तेल, मशाल इत्यादि से भी है। 
रेत घड़ी (300 ई.) : काल गणना में प्रयुक्त होने वाली घड़ियों में से यह सबसे अधिक परिशुद्ध परिणाम देने वाली घड़ी है। सर्वप्रथम समय की इकाई इसी घड़ी से परिभाषित हुई थी।
मुख्य रूप से इन घड़ियों का उपयोग जहाजों की गति को मापने के लिए होता थाइस घड़ी का आविष्कार सन 1338 में फ़्रांस से माना जाता है। कुछ लोग इसका श्रेय सन्यासियों / पीर को देते हैं।
टावर घड़ी (1094 ई.) : यह पहली यांत्रिक घड़ी है जिसमें पानी का उपयोग शक्ति के रूप में किया जाता था। जो टावर के समान ऊँची थी। जिसमें गुरुत्वीय बल का उपयोग किया जाता था। इसके पहले की चारों घड़ियाँ काल गणना पर परन्तु यह ऐसी पहली घड़ी थी, जो समय मापन पर आधारित थी। क्योंकि इस घड़ी में समयांतराल को दांतेदार पहियों के द्वारा हटा दिया गया था। यानि समय मापन का कार्य निरंतर होता था न कि जरुरत पड़ने पर होता था। जबकि पूर्ववर्ती घड़ियों का उपयोग जरुरत पड़ने पर होता था। घड़ी की कमियों को घिर्रियों (Gears) को व्यवस्थित करके दूर किया गया।
सर्वप्रथम 100 ई.पू. में खगोलविद एन्ड्रोनिकोस ने घड़ियों को टावर का रूप दिया था। परन्तु उस टावर में जल और सौर घड़ियों का उपयोग किया जाता था। टावर के रूप में पहली यांत्रिक घड़ी का निर्माण सु-सोंग ने छः वर्ष की अवधि में 1094 ई. में चीन में कराया था। यह लगभग 10 मी. ऊँची थी। घड़ी में प्रत्येक घंटे में घंटी बजती थी। इसी की प्रेरणा से 1285 ई. में इटली में भी इसी घड़ी का निर्माण कराया गया। इस घड़ी की कमियों को पानी के स्थान पर कमानी के द्वारा दूर किया गया था। जिसे परिशुद्ध (1368 ई) परिणाम देने के लिए इंग्लैंड में स्थापित किया गया था।
टेबल घड़ी (1510 ई.) : यह पहली छोटी यांत्रिक घड़ी है जिसमें स्प्रिंग का उपयोग शक्ति के रूप में गियर को घुमाने के लिए किया जाता था। यह परिशुद्ध परिणाम देने वाली पहली सुलभ घड़ी थी।
पीटर हेंलेन (जर्मन अभियंता) ने सन 1510 ई. में इस घड़ी का अविष्कार किया था। 1540 ई. में टेबल घड़ी पहली हाथ घड़ी बन गई। 1577 ई. में जोस्ट बर्गी ने मिनट को इस घड़ी में शामिल किया
पेंडुलम घड़ी (1656 ई.) : यह दोलन गति पर आधारित घड़ी है। इस घड़ी की स्प्रिंग, उसकी धातु और घड़ी की आकृति को लेकर विलियम क्लेमेंट (1671 ई.), जॉर्ज ग्राह्म (1720 ई.) और जॉन हैरिसन (1725 ई.) ने आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये थे।
दोलन गति की गणितीय व्याख्या गैलालियो गैलिली ने सन 1583 में की थी। परन्तु दोलनकाल का उपयोग घड़ी के रूप में करने का विचार सर्वप्रथम उनके बेटे विसेजियो गैलिली ने दिया था। और उसे साकार रूप में लाने का श्रेय डच वैज्ञानिक क्रिश्चियन हुय्गेंस को जाता है।
इलेक्ट्रिक घड़ी (1840 ई.) : घड़ियों की निरंतरता के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है। क्योंकि पेंडुलम घड़ी में एक समय के बाद दोलन रुक जाते हैं। इसलिए इलेक्ट्रिक घड़ी का अविष्कार हुआ। एक समय बाद लिपटी स्प्रिंग जिसका उपयोग पेंडुलम घड़ी में मुख्य रूप से होता था। उसके स्थान पर पूर्ण रूप से प्रत्यावर्ती धारा का उपयोग होने लगा। क्योंकि मनुष्य एक बराबर धक्का देने में त्रुटि कर सकता है।
सर्वप्रथम अलेक्जेंडर बैन ने पेंडुलम घड़ी में इलेक्टिक आवेग देने का कार्य किया। क्योंकि पेंडुलम घड़ी समय के साथ रुक जाती थी। इलेक्टिक आवेग यानि इलेक्ट्रिक धक्का जो नियमित और प्राकृतिक होता हैं। हर 30 मिनिट के अंतराल से दिए जाते थे। जो घड़ी के दोलन को बनाए रखने के लिए जरुरी थे। घड़ी हर 30 मिनिट की समाप्ति पर दोलन के लिए संकेत भेजती थी। इसलिए घड़ी को मनुष्य की जरुरत नहीं थी। और बाद में घड़ी पूर्णतः इलेक्ट्रिक हो गई।
वैश्विक घड़ी (1884 ई.) : समय मापन का कार्य चाहे वह दिन या वर्ष के रूप में हो। शुरुआत कहाँ से की जानी चाहिए ? बड़ा सवाल खड़ा करती थी। अर्थात दिन की शुरुआत का क्या अर्थ है ? वर्ष की शुरुआत कहाँ से होती है ? प्रश्नों का जबाब इस घड़ी से प्राप्त होता है। यह घड़ी दो स्थानीय समयों के बीच का अंतर बताती है। स्थानीय समय का निर्धारण मानक मध्यान रेखा से होता है। जबकि नए दिन की शुरुआत मानक तिथि रेखा से होती है। दोनों ही रेखाएं देशान्तर रेखाएं हैं। जो दो देशों के स्थानीय समय का अंतर बतलाती हैं। परन्तु ये रेखाएं गोलार्द्धों पर मिल जाती हैं।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा जितनी अवधि में लगाती है। उसे एक वर्ष कहते हैं। तथा स्वयं के अक्ष का चक्कर जितनी अवधि में लगाती है उसे एक दिन कहते हैं। परन्तु पृथ्वी पर मेरी स्थिति के अनुसार यह चक्कर अमेरिका में बैठे व्यक्ति के अनुसार 12 घंटे के अंतराल से प्रारम्भ होता है। अर्थात हमारे स्थानीय समय में अंतर है। इसलिए हमारी घड़ियाँ एक सा समय नहीं बताती है। बेशक हम घड़ियों को आगे/पीछे कर सकते हैं। परन्तु इससे हमारी दिनचर्या अव्यवस्थित हो जाएगी। इसके लिए हमने सर्वसम्मति से पृथ्वी को कई काल-खण्डों में विभक्त कर दिया। जिसे हम अक्षांश और देशान्तर रेखा के रूप में जानते हैं।
क्वार्टज़ घड़ी (1929 ई.) : इस घड़ी में भी इलेक्ट्रिक ऊर्जा का उपयोग किया जाता था। परन्तु क्वार्टज़ का उपयोग परिपथ को पूरा करने में किया जाता था। ताकि इलेक्ट्रिक ऊर्जा देने के बाद क्वार्टज़ के कम्पन्नों की गणना का उपयोग घड़ी बनाने में हो सके।
इस घड़ी का अविष्कार डब्लू ए मॉरिसन और जे डब्लू हॉटसन ने मिलकर किया था। इस घड़ी में त्रुटि की संभावना सबसे कम थी। क्योंकि इस घड़ी में कोई घिर्री नहीं थी। और यह घड़ी बाह्य कारकों से बहुत ही कम प्रभावित होने की संभावना रखती थी। क्योंकि इस घड़ी में सिर्फ इलेक्ट्रिक संकेतो का काम था।
परमाणु घड़ी (1949 ई.) : परमाणु घड़ी पूर्ण रूप से आवृत्ति की गणना करने वाली घड़ी है। जिसके द्वारा हमने एक सेकंड को परिभाषित किया है। इसमें विद्युतचुंबकीय तरंगों का उपयोग रेडियो तरंगों के रूप में किया जाता है।
परमाणु घड़ी का अविष्कार राष्ट्रीय मानक ब्यूरो ने अमोनिया के उपयोग से किया। परन्तु परमाणु घड़ी के निर्माण का सुझाव 1945 ई. में ही दे दिया गया था। वर्तमान में सीजियम परमाणु का उपयोग भी इसी घड़ी के रूप में होता है।

सौर घड़ी का एक छोटा रूप, साभार - Beth Waltz 
समय भ्रम के रूप में :
  1. समय निरपेक्ष है या सापेक्ष है ?
  2. समय अनंत है या इसकी उत्पत्ति हुई है ?
  3. समय सतत है या असतत है ? अर्थात उसका संबंध पदार्थ से है या अंतराल से है ? समय की दिशा का क्या अर्थ है ?
  4. क्या समय यात्रा करना संभव है ? समय यात्रा का भौतिकीय अर्थ क्या है ?
  5. समय की गणना की जाती है या समय को मापा जाता है ?
  6. क्या समय गति करता है ? समय की गति का क्या आशय है ? समय का लम्बाई से क्या तात्पर्य है ?
  7. समय बदलता है तो लोग बदल (पदार्थ की राशियाँ परिवर्तित होती) जाते हैं ? या लोग बदल (पदार्थ की राशियाँ परिवर्तित होती हैं) गए इसलिए हम कहते हैं कि समय बदल गया ?
  8. ब्रह्माण्ड परिवर्तन को मापने के लिए क्या एक समय घड़ी है ? अर्थात क्या ऐसी कोई एक ब्रह्माण्ड घड़ी है जो निरंतर टिक-टिक चलती रहती है ?
हम अपने अगले लेख (समय और समय के बारे में भ्रम को लेकर) में इन्ही बिन्दुओं को लेकर विस्तार से चर्चा करेंगे। जिसमें न केवल इन प्रश्नों का उत्तर दिया जाएगा। बल्कि इन प्रश्नों के उत्तर के कारण के बारे में भी विस्तार से लिखा जाएगा।

कविता : समय ही द्रव्यमान है

"समय" पर मेरी द्वारा लिखी गई कविता

मैं गरीब हूँ।
तू अमीर है।
मेरा यह आलाप है।
बस समय का आभाव है।
समय की अपनी मांग है।
समय ही द्रव्यमान है।

सबका अपना रोना है।
सबकी अपनी चाल है।
सबकी अपनी नियति
जो बल लगाए बदल जाती।
समय ही बलवान है।
समय ही द्रव्यमान है।

तेरा दावा है
कि तू विराम है।
यह भ्रम है।
सब गतिमान हैं।
समय की अपनी मांग है।
समय ही द्रव्यमान है।

न निरपेक्ष गति है।
न निरपेक्ष धरातल है।
प्रकाश की अपनी सीमित गति
निरपेक्ष ही बेईमान है।
समय की अपनी मांग है।
समय ही द्रव्यमान है।


न भूतकाल होता है।
न भविष्यकाल होता है।
यह पहले ऐसा था।
संभवतः यह अब ऐसा होगा।
समय की न कोई चाल है।
समय ही द्रव्यमान है।

तीन रूप होते समय के
तीन अवस्थाएँ होती हैं।
क्षण, अवधि, आयु परिभाषित
भूत, भविष्य सब भ्रम है।
समय की यह पहचान है।
समय ही द्रव्यमान है।

समय कारण भी है।
समय घटक भी है।
समय नियतांक भी है।
समय ही काल का प्रभाग है।
समय की अपनी मांग है।
समय ही द्रव्यमान है।

किसी क्षण संयोग होता।
घटना की अपनी अवधि होती।
पदार्थ कई रूपों में अस्तित्व रखता।
प्रेक्षक बदलते परिणाम बदलता।
अंतराल का मायाजाल है।
समय ही द्रव्यमान है।

समय नियमित है।
बारंबार समयांतराल
समय से पदार्थ है।
अंतरिक्ष से अंतराल
ऊर्जा से आवर्तकाल है।
समय ही द्रव्यमान है।

समय की अपनी मांग है।
समय ही द्रव्यमान है।                                                                                                            - अज़ीज़ राय

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