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कविता : आओ, विज्ञान से दोस्ती करें

आओ विज्ञान से दोस्ती करें
इस समाज को बेहतर बनाएं
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं

जो प्रयोग किया न कभी
उसको करके देखें और दिखाएँ
एक नही कईयों बार करें
अनेकों विधियों को अपनाएं
आओ विज्ञान से दोस्ती करें
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं

जो हमारी परम्पराएं है।
उनको भी परखें
तब उनका चलन अपनाएं
जो परखने में जंचती नही
निसंकोच उनका त्याग करें
आओ विज्ञान से दोस्ती करें
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं













पहले कारण को जानें
तब परम्पराओं को भ्रम कहें
बिना कारण निर्णय न लेवें
वरदान अपनाएं अभिशाप नहीं
आओ विज्ञान से दोस्ती करें
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं
इस समाज को बेहतर बनाएं

शिक्षित होकर शिक्षित करें
नए अवसरों की रचना करें
जीवन को खुशहाली देवे
ऐसा ध्यान धरा का रखें
सब मिलकर यह संकल्प करें
आओ विज्ञान से दोस्ती करें

वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं
इस समाज को बेहतर बनाएं

वैज्ञानिक दृष्टिकोण : अधिकारों की मांग के लिए कर्तव्य पालन जरुरी

26 नवंबर 1950 को संविधान की प्रस्तावना के माध्यम से हम सभी भारत वासियों ने जिन सिद्धांतों को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है। उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने की बात स्पष्ट रूप से वर्णित है। इसके अलावा संविधान ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी है। क्योंकि भारत न केवल वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन इत्यादि को लेकर विविधताओं वाला देश है। बल्कि देश में कभी-कभी क्षेत्रीय सोच भी हावी होती हुई प्रतीत होती है। इसलिए आज का लेख इसी बात पर आधारित है।

मैं इस दुनिया में यदि किसी कार्य को सबसे सरल मानता हूँ तो वह कार्य "सामने वाले को गलत ठहराना" है। परन्तु सामने वाले को गलत सिद्ध करना उतना ही कठिन कार्य है। क्योंकि जब आप सामने वाले को गलत कहते हो तो न चाहकर भी उसके साथ कुछ जिम्मेदारियाँ जुड़ जाती हैं।

परन्तु आप तो ठहरे सिर्फ अधिकारों की बात करने वाले आप क्या जानोगे कि ये कर्तव्य क्या होते है ?
कर्तव्य : आप जो भी (मानव, परिवार के सदस्य, नागरिक, शिक्षक, अधिकारी इत्यादि) हों, उस नाते आपको जिन कार्यों को करना चाहिए। ऐसे कार्य कर्तव्य कहलाते हैं। वास्तव में कर्तव्य का सीधा संबंध अधिकार से है। ये अधिकार के बदले में किये जाने वाले कार्य होते हैं। ताकि दूसरों के अधिकारों का हनन न हो और अव्यवस्था न फैले। अर्थात कर्तव्य कभी भी सौंपें नहीं जाते हैं। ये स्वयं की प्रेरणा से करने वाले कार्य होते हैं। जिनको हमें करना चाहिए।
सामने वाले को आप दो कारणों से गलत कह सकते हो।
1. जब सामने वाले की कही गई बात गलत हो। अर्थात उसके कथन गलत हैं।
2. जब सामने वाले का उद्देश्य निश्चित हो। परन्तु वह गलत दिशा (मार्ग) का अनुसरण कर रहा है। अर्थात उसका मार्ग गलत है।


अब आप पढ़िए, जब आप सामने वाले को गलत कहते हो। तब आपकी क्या-क्या जिम्मेदारी बनती है। यदि आप इन जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में स्वयं को सक्षम नहीं पाते हैं। तो आप सामने वाले को गलत कहना छोड़ दीजिये। क्योंकि तब आपके पास सामने वाले को गलत कहने का कोई अधिकार नहीं है। ये जिम्मेदारियाँ निम्न हैं।
1. यदि आप सामने वाले के कथन को गलत कहते हैं तो आपको कथन के गलत होने का कारण ज्ञात होना चाहिए।
2. यदि आप सामने वाले के मार्ग को गलत कहते हैं तो आपको सही मार्ग ज्ञात होना चाहिए।
और तब आपको कथन के गलत होने का कारण अथवा सही मार्ग सामने वाले को बताना चाहिए।

इन जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में आने वाली समस्याएँ निम्न हैं।
1. कथन के गलत होने का कारण जानकारियों का आभाव या कथन का कोई अर्थ न होना होता है। इस समस्या का निदान सम्बंधित विषय की जानकारी देकर या कथन में शब्दों और वाक्यों के महत्व को बताकर खोजा जाता है। क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि लोग विषय से हटकर, उद्देश्यहीन विषय पर, कुतर्क देकर या वाक्यों में ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं जिससे कि वाक्यों का कोई सार्थक अर्थ नही निकलता है।
2. आप कभी भी सामने वाले के मार्ग को तब तक गलत नहीं कह सकते हैं। जब तक आपको सामने वाले का स्पष्ट उद्देश्य ज्ञात न हो। क्योंकि तब आप बिना उद्देश्य जाने सामने वाले को सही मार्ग नही बतला सकते हैं।

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