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समय और समय के बारे में भ्रम

काश !! समय कोई कण, पिंड, घटना या वस्तु होता तो मैं आपको उसे दिखाकर कहता कि देखो यही समय है। ताकि न केवल आपको समय को पहचानने में आसानी होती। बल्कि आप उसके बारे में और अधिक खोज कर पाते। समय के अमूर्त होने के कारण समय को लेकर बहुत से भ्रम हैं। आज हम उन्ही भ्रमों को एक के बाद एक विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

पहला भ्रम : समय निरपेक्ष है या सापेक्ष है ?
जैसा कि आपने हमारे पिछले लेख ''समय का संक्षिप्त इतिहास'' में पढ़ा था। न केवल गति बल्कि समय भी सापेक्ष है कथन को हम विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे। आज के इस लेख में हम गति के सापेक्ष होने को लेकर भी चर्चा करेंगे। क्योंकि गति ब्रह्माण्ड का मूलभूत गुणधर्म है और दूसरी बात गति के सापेक्ष होने से आप सापेक्ष होने के अर्थ को भलीभांति समझ सकेंगे। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि चाहे हम लम्बाई या द्रव्यमान किसी भी भौतिक राशि की बात करें। हम इनका यथार्थ मान बिना मापदंड के एक बार में नहीं बता सकते हैं। और दूसरी बात हम जिस किसी व्यक्ति/वस्तु/जानवर इत्यादि की लम्बाई या द्रव्यमान ज्ञात करना चाहते हैं। उस व्यक्ति, वस्तु या जानवर से दूरी बढ़ने के कारण यथार्थ मान को ज्ञात करना और भी मुश्किल हो जाता है। अर्थात लम्बाई या द्रव्यमान को मापने के लिए क्रमशः मीटर स्केल/फीता या तराजू की आवश्यकता होती है। तो इसमें कौन सी बड़ी बात है कि अन्य राशियों की तरह ही गति और समय सापेक्ष मापे जाते हैं ? क्या इस बात को जानने/समझने में समाज को काफी मुश्किल हुई थी ? क्योंकि आखिर लम्बाई और द्रव्यमान को मापने के लिए मापदंड की आवश्यकता तो होती ही है अर्थात हम मापदंड के सापेक्ष व्यक्ति, वस्तु या जानवर की लम्बाई या द्रव्यमान मापते हैं। तो गति और समय के सापेक्ष होने में कौन सी बड़ी बात है ? क्या गति और समय के सापेक्ष होने का यही एक अर्थ है ?
क्या गति और समय के सापेक्ष होने का यही एक मतलब है कि गति और समय की माप मापदंडों (मानकों) के आधार पर सापेक्षीय ज्ञात की जाती है ? गति और समय को हम मात्रकों द्वारा व्यक्त करते हैं ? यदि ऐसा नहीं है तो गति और समय के सापेक्ष होने का क्या अर्थ है ?
बेशक गति और समय के सापेक्ष होने का यह अर्थ नहीं है। तो फिर क्या अर्थ है ? क्या इसका यह अर्थ है कि गति और समय को मापने के लिए किसी एक मानक की आवश्यकता नहीं होती है। बल्कि गति और समय प्रत्येक वस्तु अथवा पिंड के सापेक्ष भिन्न-भिन्न ज्ञात किये जा सकते हैं ? जी हाँ, गति और समय प्रत्येक वस्तु अथवा पिंड के सापेक्ष भिन्न-भिन्न ज्ञात किये जाते हैं। गति और समय के सापेक्ष होने का यही एक अर्थ है। तो क्या फिर गति और समय के मात्रकों का कोई अर्थ नहीं है ? मानव जाति ने सेकंड, मिनिट, घंटे, दिन और वर्ष को जिस रूप में परिभाषित किया है। तो क्या यह सब व्यर्थ है ? नहीं, ऐसा भी नहीं है। वास्तव में राशियों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि मानव जाति में लेन-देन और संचार को लेकर सामंजस्य बना रहे। अर्थात सम्पूर्ण मानव जाति किसी भी घटना को लेकर एक ही निष्कर्ष पर पहुंचे और उनमें आपसी मतभेद उत्पन्न न हो। इसके लिए मात्रकों की आवश्यकता होती है। क्या विज्ञान यह संभव कर सकता है ? क्या उसने गति और समय की माप को लेकर भी ऐसा ही कर दिखाया है ? बिल्कुल गति और समय की माप को लेकर यही हुआ है। सम्पूर्ण मानव जाति एक मत है अर्थात उनका निष्कर्ष गति और समय के बारे में एक ही होता है।
परन्तु जब हम ऊब जाते हैं तो समय लंबा प्रतीत होता है। जब हम खुश रहते हैं तो समय छोटा प्रतीत होता है। जब हम जल्दी में होते हैं तब समय तीव्र प्रतीत होता है। जब हम किसी का इंतज़ार कर रहे होते हैं तब समय धीमा प्रतीत होता है। जब हम दुखी होते हैं तो समय मरा प्रतीत होता है। जब हम दर्द में होते हैं तो समय का अंत मालूम होता है। फिर यह कैसे संभव है कि विज्ञान ने गति और समय को सापेक्षीय कहकर गति और समय की माप के बारे में सम्पूर्ण मानव जाति को एक मत कर दिया है ? बल्कि विज्ञान को तो गति और समय को निरपेक्षीय ही रहने देना चाहिए था। ताकि सभी के लिए एक ही मानक होता। सभी को एक ही परिणाम प्राप्त होते। फलस्वरूप हम सब एक मत रहते।
वास्तविकता यह है कि गति और समय सापेक्ष हैं। इसलिए व्यक्ति, वस्तु अथवा पिंड के सापेक्ष किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु अथवा पिंड की गति या उसका समय भिन्न-भिन्न प्राप्त होता है। परिणाम भिन्न-भिन्न प्राप्त होते हैं, परन्तु निष्कर्ष सदैव एक समान होता है। अर्थात सभी एक मत रहते हैं। यह कैसे संभव होता है ?आइये इस पर चर्चा करते हैं। उससे पहले हम इन तीन कारणों को बताना चाहते हैं जिससे कि गति और समय के निरपेक्षीय होने का भ्रम उत्पन्न होता है।
  1. ब्रह्माण्ड में निरपेक्षीय धरातल का आभाव है। अर्थात ब्रह्माण्ड गतिशील है।
  2. गति ब्रह्माण्ड का मूलभूत गुणधर्म है। फलस्वरूप प्रत्येक कण, पिंड, मनुष्य इत्यादि सभी गतिशील हैं। अर्थात ब्रह्माण्ड में विरामावस्था का पूर्णतः आभाव है।
  3. मनुष्य के सापेक्ष पृथ्वी का धरातल बहुत बड़ा है और वहीं पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल मनुष्य को बांधे रखता है। जिससे कि पृथ्वी, उसका वातावरण और मनुष्य एक समान वेग से त्वरित्र होते हैं। फलस्वरूप मनुष्य को एक छद्म धरातल का आभास होता है।
और इस तरह इन तीनों तथ्यों के मिलेजुले रूप के कारण समय के निरपेक्षीय होने का भ्रम उत्पन्न होता है। अर्थात यदि कोई व्यक्ति स्टेशन में बैठकर ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है। तो उसकी इस स्थिति को विरामावस्था कहा जाता है क्योंकि तब हम व्यक्ति की वर्तमान स्थिति/स्थान (Location) बता सकते हैं कि वह व्यक्ति स्टेशन पर है। और उस व्यक्ति के सामने से गुजरने वाली मालगाड़ी को गतिशील कहा जाता है। क्योंकि हम इस छद्म धरातल (पृथ्वी) में गति को विरामावस्था के सापेक्ष मापते हैं अर्थात पृथ्वी में स्थान परिवर्तन को गति कहा जाता है। जबकि यदि स्थान में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो उसे विरामावस्था मान लिया जाता है। अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मैं अपने घर के बिस्तर पर लेटा हुआ हूँ। तो क्या मैं स्थिर हूँ ? बेशक नहीं, क्योंकि पृथ्वी गतिशील है। यह भ्रम पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी और मनुष्य के एक समान वेग से त्वरित्र होने के कारण उत्पन्न होता है।

किसी भी राशि के निरपेक्ष होने का यह अर्थ होता है कि उस राशि का मान व्यक्ति विशेष के अनुसार परिवर्तित नहीं होता है। अर्थात मेरे और आपके द्वारा उस राशि को मापने पर एक समान परिणाम प्राप्त होगा। जबकि सापेक्ष होने का यह अर्थ होता है कि उस राशि का मान व्यक्ति विशेष के अनुसार भिन्न-भिन्न प्राप्त हो सकता है। अर्थात मेरे और आपके द्वारा उस राशि को मापने पर एक समान परिणाम प्राप्त न होने की संभावना बनी रहती है। परन्तु विज्ञान में निरपेक्षीय और सापेक्षीय दोनों राशियों के निष्कर्ष एक समान प्राप्त होते हैं। क्योंकि ''गति को मापने का उद्देश्य किसी क्षण के लिए वस्तु या पिंड की स्थिति को निर्धारित करना होता है। जबकि समय को मापने का उद्देश्य किसी विशेष घटना के लिए संयोग की संभावनाओं को सुनिश्चित करना होता है। यह निर्धारण दो घटनाओं के मध्य अथवा बारम्बार होने वाले परिवर्तन को मापकर किया जा सकता है। और यह तभी संभव है जबकि गति और समय सापेक्ष मापे जाएं।'' इसलिए गति का संबंध दो स्थितियों के मध्य के अंतर से, जो संचार के साधनों और माध्यम दोनों पर निर्भर करता है अर्थात अंतरिक्ष से होता है। जबकि समय का संबंध दो घटनाओं के मध्य अथवा बारम्बार होने वाले परिवर्तन की माप से, जो बाह्य कारकों और संयोग के क्षण की अवस्था दोनों पर निर्भर करता है अर्थात पदार्थ की भौतिक राशियों से होता है।

मेरा दोस्त राम मेरे सापेक्ष 5 कि.मी./घंटा की चाल से पूर्व की ओर जा रहा है और जबकि दूसरा दोस्त श्याम मेरे सापेक्ष 3 कि.मी./घंटा की चाल से पश्चिम की ओर जा रहा है। 2 घंटे के बाद जब मैं जिस स्थिति को राम के लिए इंगित करता हूँ। ठीक उसी स्थिति को श्याम भी राम के लिए इंगित करता है। अर्थात मैं और श्याम दोनों एक ही स्थिति को राम की वर्तमान स्थिति बताते हैं। जबकि मेरे सापेक्ष राम की गति 5 कि.मी./घंटा है और श्याम के सापेक्ष राम की गति 8 कि.मी./घंटा है। अर्थात दोनों के द्वारा लिए गए परिणाम (माप) भिन्न-भिन्न हैं परन्तु उनका निष्कर्ष (एक समान) गति को मापने के उद्देश को पूरा करता है। ठीक इसी प्रकार समय की माप भी सापेक्ष ज्ञात की जाती है। अर्थात परिणाम भिन्न-भिन्न और निष्कर्ष एक समान प्राप्त होते हैं। आइये जानते हैं कैसे ?

अवश्य ही कैलेंडर में एक माह का मतलब 30 या 31 दिन होता है। क्योंकि ग्रेग्रेरियन कैलेंडर सूर्य और चंद्रमा दोनों की स्थिति के मिलेजुले रूप का परिणाम है। परन्तु वास्तव में एक माह वह समयावधि होती है जब चन्द्रमा पृथ्वी का एक चक्कर पूर्ण करता है ? अब यह समयावधि प्रत्येक पिंड के लिए भिन्न-भिन्न होती है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पृथ्वी और चन्द्रमा की परिक्रमण गति से निर्मित तंत्र प्रेक्षक पिंड से किस प्रकार संबंध रखता है अर्थात तंत्र के सापेक्ष प्रेक्षक पिंड की क्या स्थिति है ? फलस्वरूप एक माह की समयावधि को विज्ञान में पांच तरह से परिभाषित किया गया है। जब हम पृथ्वी पर रहकर चन्द्रमा के एक परिक्रमा के पूर्ण हो जाने अर्थात एक पूर्णिमा या अमावस्या से दूसरी पूर्णिमा या अमावस्या के मध्य की समयावधि मापते हैं तो यह अवधि 29 दिन 12 घंटे 44 मिनिट 2.8 सेकंड प्राप्त होती है। इसे संयुति माह (synodic month) कहते हैं। और जब हम चन्द्रमा के एक उपभू से दूसरे उपभू अथवा एक अपभू से दूसरे अपभू के बीच की समयावधि ज्ञात करते हैं तो यह समयावधि 27 दिन 13 घंटे 18 मिनिट 33.1 सेकंड प्राप्त होती है। इसे मंद केन्द्र माह (anomalistic month) कहते हैं। इसके अलावा यदि हम चन्द्रमा के परिक्रमण काल को किसी दूरवर्ती तारे से मापते हैं तो यह समयावधि 27 दिन 7 घंटे 43 मिनिट 11.6 सेकंड प्राप्त होती है। क्योंकि दूरवर्ती तारा हमारे सापेक्ष न केवल दूर होता है बल्कि स्थिर भी (एक तरह से विरामावस्था) होता है। फलस्वरूप यह माप यथार्थ मानी जाती है। क्योंकि इस तरह हम दूरवर्ती तारे के सापेक्ष वास्तव में चंद्रमा का परिक्रमण काल ज्ञात करते हैं और परिक्रमण काल में चन्द्रमा की अन्य गतियों (घूर्णन, पृथ्वी के साथ सूर्य की परिक्रमा और सौरमंडल की भंवर गति) के प्रभाव को शामिल नहीं होने देते हैं। अर्थात अन्य गतियों के प्रभाव से चन्द्रमा के परिक्रमण काल का मापन पृथक हो जाता है। इसे नाक्षत्रिक माह (sidereal month) कहा जाता है। इस समयावधि में वह समय शामिल नहीं किया जाता है जितना कि चन्द्रमा के एक परिक्रमा पूर्ण करने की सूचना को उस तारे तक पहुँचने में लगता है। जिसके सापेक्ष परिक्रमण काल ज्ञात किया जा रहा है। इसके बाबजूद नाक्षत्रिक माह की समयावधि सबसे कम होती है।


इस प्रकार भिन्न-भिन्न समयावधि के द्वारा एक माह को परिभाषित किया जाता है। सापेक्षता इस बात का सूचक है कि तंत्र किस प्रकार का है ? उसकी संरचना कैसी है ? और किसके सापेक्ष समय की माप की जा रही है ? जैसा कि चित्र में दिखाया भी गया है। इस प्रकार भिन्न-भिन्न समयावधि के अंतर होने से समय के द्वारा दो घटनाओं अथवा परिवर्तन होने का बोध होता है। यह समय के अमूर्त होने की सुंदरता है। जिसे हम गणितीय रूप में अभिव्यक्त करते हैं। परन्तु हमने लेख की शुरुआत में दूरी बढ़ने के साथ-साथ माप की शुद्धता में त्रुटि होने की संभावना को बताया था और अब हम चन्द्रमा के परिक्रमण काल को दूर स्थित तारे के सापेक्ष माप रहे हैं और उसे यथार्थ भी कह रहे हैं। ऐसा क्यों ? इसके बारे में हम सापेक्षता के सिद्धांत पर चर्चा करते समय लिखेंगे। बस आप इतना जान लीजिये कि चलती ट्रेन से देखने पर पास की चीजें फटाफट पीछे जाती हुई प्रतीत होती है। जबकि दूर स्थित चीजें बहुत कम वेग से पीछे की ओर जाती हुए प्रतीत होती हैं। समय, परिवर्तन में इसी प्रकार भेद उत्पन्न करता है। अब स्पष्ट है कि गति और समय की माप सापेक्ष ज्ञात की जाती है। भले ही मेरी उम्र जानने के लिए आपको किसी दूसरे के सापेक्ष उसकी उम्र न जाननी पड़ती हो। सिर्फ मानक कैलेंडर से काम चल जाता है। इसके बाबजूद समय सापेक्ष है न की निरपेक्ष।

दूसरा भ्रम : समय अनंत है या इसकी उत्पत्ति हुई है ?
बेशक समय की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही हुई है। इसलिए समय के अनंत होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। समय के अनंत होने की अवधारणा एक भ्रम ही है। क्योंकि यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति नहीं हुई है। अर्थात ब्रह्माण्ड का न आदि है और न ही अंत है तब किसी भी घटना के पूर्व का समय (अवधि) स्वाभाविक रूप से अनंत होगा। और यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है तब भी ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से पूर्व का समयांतराल अनंत होगा। इस तरह से आप देखते हैं कि दोनों स्थितियों (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति या उसके आदि-अनंत होने) में समय अनंत प्रतीत होता है। जबकि एक स्थिति तो समय की उत्पत्ति (शुरुआत) दर्शाती है, दोनों ही स्थिति में एक सा अर्थ होने की वजह से समय के अनंत होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। इसलिए समय के अनंत होने को भ्रम कहा गया है। क्योंकि समयांतराल जिसका संबंध अंतरिक्ष से होता है भ्रम उत्पन्न करता है। जबकि समयावधि वास्तविक होती है। इसलिए हमने अपने पिछले लेख में समयावधि और समयांतराल के अंतर को स्पष्ट किया था। यह अवधारणा प्रसिद्द दार्शनिक इमानुएल कांट ने 18 वी. शताब्दी के अंतिम दसकों में स्पष्ट की थी। अब प्रश्न यह उठता है कि अनंत समय का क्या अर्थ है ? इसका उत्तर आप हमारे पिछले लेख ''अनंत को परिभाषित करें !!'' में पढ़ सकते हैं। समय के अनंत होने के निम्न अर्थ निकलते हैं।
1. अनंत काल : सतत परिवर्तन या परिवर्तनशीलता
2. अनंत आवर्तकाल : घड़ी का सुस्त पड़ना अथवा अपरिवर्तन (परिवर्तन की दर का शून्य होना।)

ब्रह्माण्ड के स्वरुप के आधार पर
1. यदि ब्रह्माण्ड का कोई आदि-अंत न हो तो उसके अनुसार ब्रह्माण्ड अपरिवर्तनशील होगा। परन्तु उसमे परिवर्तन संभव है। याद रहे ब्रह्माण्ड के आदि-अनंत होने के दो अर्थ निकलते हैं। पहला ब्रह्माण्ड की सीमा को लेकर जबकि दूसरा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को लेकर।
2. यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति अर्थात महानाद हुआ था तो उसके अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उसका अंत निरंतर होता रहता है अर्थात हम दोलित्र ब्रह्माण्ड में रहते हैं। परन्तु ब्रह्माण्ड का स्वतः अंत उष्मागतिकी के दूसरे नियम का उल्लंघन होगा।

भौतिकता के रूपों के आधार पर
1. बिना बाह्य बल के स्वतंत्र अंतरिक्ष में पिंड की गति पर समय का कोई अर्थ नहीं निकलता है। अर्थात अनंत अंतरिक्ष में पिंड की गति अनंत समय को दर्शाती है। परन्तु यह महज एक भ्रम है। क्योंकि यह निरपेक्षीय स्थिति है।
2. बल आरोपित होने पर ही समय का अर्थ निकलता है अर्थात किसी काल में पिंड की आवर्ती गति अनंत समय को दर्शाती है। यह वास्तविक अनंत काल कहलाता है। क्योंकि इसे कालखण्ड के रूप में सापेक्षीय मापा जाता है।

अब हम समय की उत्पत्ति के बारे में चर्चा करते हैं। यह सच है कि समय की उत्पत्ति महानाद के समय (क्षण में) हुई है। परन्तु इसका क्या अर्थ है ? इसका यह अर्थ है कि हम महानाद की स्थिति अर्थात विलक्षणता के पहले की स्थिति के बारे में कुछ भी नहीं बता सकते हैं। क्योंकि विलक्षणता की स्थिति में भौतिक के नियम कार्य नहीं करते हैं। भले ही विलक्षणता की स्थिति दूसरे ब्रह्माण्ड के अंत का परिणाम रही हो अर्थात उसके (विलक्षणता के) पहले भौतिकी के नियम लागू रहे होंगे। इसके बाद भी हम उस दूसरे ब्रह्माण्ड के बारे में कोई भी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते हैं। क्योंकि विलक्षणता की स्थिति आते-आते उस दूसरे ब्रह्माण्ड की सभी जानकारी उसी समय नष्ट हो गई थी। जब ब्रह्माण्ड ने विलक्षणता की स्थिति को प्राप्त किया था। विलक्षणता के पहले की स्थिति को न बता पाने और समय की उत्पत्ति होने के दो कारण हैं।
1. विलक्षणता की स्थिति में भौतिक के नियम कार्य नहीं करते हैं। और चूँकि नियमों का लागू होना इस बात का संकेत है कि समय गुजर रहा है अर्थात परिवर्तन हो रहा है। क्योंकि नियमों के आधार पर ही भविष्य तय होता है। इसलिए विलक्षणता की स्थिति में समय का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। समय का कोई अर्थ न निकलने की यह तीसरी स्थिति है। बांकी दो स्थितियों को आप ''समय का संक्षिप्त इतिहास'' लेख में पढ़ सकते हैं।
2. समय सापेक्षीय मापा जाता है और विलक्षणता (अनोखा/अकेला) की स्थिति में प्रेक्षक व्यक्ति/तंत्र/पिंड का आभाव होता है इसलिए विलक्षणता की स्थिति में सापेक्षता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। और जब समय ही परिभाषित नहीं होगा। तो हम किसके परिप्रेक्ष्य जानकारियों, परिस्थितियों और आंकड़ों की बात करेंगे। तब इन जानकारियों, परिस्थितियों और आंकड़ों की कोई भी उपयोगिता नहीं होगी।

तीसरा भ्रम : समय सतत है या असतत है ? अर्थात उसका संबंध पदार्थ से है या अंतराल से है ? समय की दिशा का क्या अर्थ है ?
समय के बारे में सबसे बड़ा भ्रम "समय को सतत मानना है।" परन्तु वास्तव में समय सतत न होकर असतत है। माना जाता रहा है कि समय का प्रवाह नदी के समान है। जो निरंतर एक ही दिशा में आगे की ओर बहती है। फलस्वरूप हमने इसी अवधारणा के आधार पर जल और रेत के प्रवाह से समय को मापने के प्रयास में जल और रेत घड़ियों का अविष्कार किया था। समय को सतत मानने के पीछे ब्रह्माण्ड में घटनाओं की निरंतरता, कुछ घटनाओं की निश्चित समयांतराल के बाद पुनरावृत्ति और उनमें से भी कुछ घटनाओं का व्यापकीकरण प्रमुख बातें थी। जिनके रहते हमारी यह अवधारणा बनी रही कि समय का प्रवाह एक ही दिशा में होता है और यह प्रवाह सतत (निरंतर) होता है।

समय की परिभाषा के अनुरूप समय की पहचान परिवर्तन और परिवर्तन की माप के आधार पर ज्ञात की जाती है। अर्थात यदि कोई परिवर्तन नगण्य है तो हम उसे आभास/माप नहीं कर पाते हैं। फलस्वरूप हमें समय के सतत होने का भ्रम उत्पन्न होता है। इसके अलावा वास्तव में समय के सतत होने का भ्रम "परिवर्तनों के कम अंतराल" होने के कारण उत्पन्न होता है। अर्थात दो परिवर्तन के बीच का अंतराल कम से कम हो तो हम उन परिवर्तनों में भेद नहीं कर पाते हैं और तब हम समय को सतत मानने लगते हैं। "समय के बारे में सबसे मजेदार बात यह है कि भले ही समय असतत हो। परन्तु हम समय की इकाई के रूप में मानक उसे ही मानते हैं जिसमें सतत परिवर्तन होता है।" क्योंकि ऐसे मानकों के द्वारा हम समय की परिशुद्ध माप ज्ञात कर सकते हैं। जैसा कि आपने पिछले लेख समय का संक्षिप्त इतिहास में देखा था कि पहली यांत्रिक घड़ी की आवश्यकता इसीलिए हुई थी क्योंकि उसके पहले तक की सभी घड़ियाँ काल-गणना पर आधारित थी। अर्थात वे सभी घड़ियाँ निरंतर (सतत) कार्य नहीं करती थीं। इसके बाद भी यांत्रिक घड़ियों में सुधार की आवश्यकता इसी बिंदु को लेकर हुई थी कि घड़ियों के घिर्रियों (Gears) को इस तरह से व्यवस्थित किया जा सके ताकि दो परिवर्तनों के बीच का अंतराल कम से कम हो। इस शर्त की पूर्ति हेतु यह जरूरी हो गया था कि न केवल दो परिवर्तनों के बीच का अंतराल कम से कम हो बल्कि परिवर्तन का अंतर भी कम से कम हो। इसलिए हम समय की सटीक माप के लिए परमाणु घड़ी का उपयोग करते हैं।

इसके अलावा हमने 5.39 x 10−44 सेकंड को सबसे छोटे समय की इकाई के रूप में मानक मान सकते है। परन्तु यह भी समय के सतत होने का खंडन करता है। क्योंकि यह मान सैद्धांतिक रूप से प्रकाश द्वारा प्लान्क दूरी को तय करने में लगा समय होता है। और चूँकि प्रकाश क्वांटा (बंडल) के रूप में गति करता है। इसलिए हम कह सकते हैं कि समय सतत न होकर असतत होता है। समय का सीधा संबंध पदार्थ और उस पदार्थ में होने वाले परिवर्तन से होता है न कि उनके बीच के अंतराल से होता है। इस प्रकार समय सतत है न कि असतत है। और यही अंतराल भ्रम उत्पन्न करता है। सर्वप्रथम सर लारेंट्स ने इलेक्ट्रान सिद्धांत के माध्यम से द्रव्य और क्षेत्र के बीच की असमानता को स्पष्ट किया था। उसके बाद साधारण सापेक्षता पर सर अल्बर्ट आइंस्टीन पत्रकारों को साक्षात्कार देते हुए कहते हैं कि यदि ब्रह्माण्ड से सारी भौतिक वस्तुएं विलुप्त हो जाएं। तो दिक् और काल दोनों विलुप्त हो जाएंगे। अर्थात समय और निर्देशांकों के रूप में अंतरिक्ष की उपस्थिति का महत्व सिर्फ ब्रह्माण्ड और उसके पदार्थ तक सीमित है। आप पिछले लेख "समय, उसकी पहचान और उसके प्रकार" में समय के तीनों प्रकार के बारे में पढ़ सकते हैं कि ये तीनों प्रकार क्षण और क्षण की व्यवस्थित श्रृंखला का परिणाम है। जिससे की समय परिभाषित होता है।
कालादापः सम्भवन् कालद् ब्रह्म तपो दिशः। कालेनोदेति सूर्यः काले नि विश्ते पुनः।। अथर्ववेद, काल सूत्र - 19:54 अर्थात काल से आप, ज्ञान, तपःशक्ति और दिशाएं उत्पन्न हुई हैं। काल की सामर्थ्य से सूर्य उदय होता है और उसी काल में प्रविष्ट भी हो जाता है। 
कालात् स्रवन्ति भतानि कालादवृद्धिं प्रयान्ति च। काले चास्तं नियच्छन्ति कालो मूर्तिरमूर्तिमान्।। अर्थात काल से प्राणी पैदा होते हैं काल से वृद्धि प्राप्त करते हैं काल में ही अस्त हो जाते हैं। इसलिए काल मूर्त भी है और अमूर्त भी है।
येन मूर्तीनामुपचयापचया लक्ष्यन्ते तं कालमाहुः। तस्यैव हि कयाचित क्रियया युक्तस्याहरिति च, भवति रात्रि रितिच। कया कियया ? आदित्यगत्या। तवै वास कृदावृत्या मास इति भवति संवत्सर इति, च यद्दैव भवति जातस्य मासः परिमाणम्। (महाभाष्य - 2.2.5) अर्थात जिसके योग से मूर्त पदार्थों की वृद्धि या कमी होती दिखाई देती है। उसे ही काल कहते हैं। उसी काल को किसी एक क्रिया से युक्त होने पर आदृत या रात्रि कहते हैं किसी क्रिया से ? आदित्य की गति से। यही क्रिया अर्थात सूर्य की गति बार-बार आवृत्त होती है। तब मासे या संवत्सर आदि बनते हैं। ऐसा है, तभी उस क्रिया के कारण प्रसूत बालक का परिमाण मॉस या वर्ष में गिना जाता है।
भारतीय दर्शन से यह स्पष्ट हो जाता है कि काल और काल वाचक शब्दों का अर्थ आवर्त गतियों पर निर्भर करता है और परिभाषिक अर्थ में भले ही काल का परिमाण न होता हो, परन्तु व्यवहार में काल का परिमाण माना जाता है। इसके अलावा गीता में भी अनेकों बार समय की गणना अर्थात समय क्षण और क्षणों की व्यवस्थित श्रृंखला के रूप में परिभाषित हुआ है। उदाहरण के लिए "कालः कलयतामहम्" (10.30) न्यायमुक्तावली में भी समय के मूर्त रूप की बात की गई है। "जन्यानां जनकः कालः" अर्थात उत्पन्न होने योग्य वस्तुओं का उत्पादक काल है।

A = गणनीय, B = मापन  इस प्रकार समय को मूर्त रूप दिया जाता है

समय के महत्व के आधार पर समय की पहचान
1. सूचना संचरण में समय लगता है। अर्थात समय संचार के साधन, उसकी गति और माध्यम पर निर्भर करता है।
2. कार्य करने में समय लगता है। अर्थात समय ऊर्जा, नियम, गुरुत्वाकर्षण और तंत्र की बनावट पर निर्भर करता है।
3. एक स्थिति से दूसरी स्थिति को प्राप्त करने में समय लगता है। अर्थात समय अंतराल, दिशा और बाह्य बल पर निर्भर करता है। इसके द्वारा समय क्षणों की व्यवस्थित श्रृंखला के रूप में परिभाषित होता है। जिसे हम अवस्था परिवर्तन कहते हैं।

समय की दिशा के अर्थ
1. बौद्धिक रूप से हम किसी भी दिशा में विचरण करें समय गुजरता ही है। हम इसे चाहकर भी रोक नहीं सकते हैं और न ही उस गुजरे वक्त को पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
2. ब्रह्माण्ड की वर्तमान अवस्था जो यह दर्शाती है कि ब्रह्माण्ड प्रसारित हो रहा है या फिर संकुचित हो रहा है।
3. व्यक्ति, वस्तु या पिंड के रूप में कोई भी इकाई रूप एक सीमा के बाद पुनः अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त नहीं कर सकता है। इसे मर्फी का नियम कहते हैं। जो उष्मागतिकी के दूसरे नियम के समान ही है। जो इस बात का संकेत देता है कि ब्रह्माण्ड में अव्यवस्था फ़ैल रही है अर्थात एन्ट्रापी ऊर्जा का मान निरंतर बढ़ रहा है।

समय के सतत और असतत होने को हम इस तरह से भी स्पष्ट कर सकते हैं कि "यदि समय सतत है तो समय अनंत क्षणों से मिलकर बना होगा अन्यथा समय असतत कहलाएगा"। साथ ही हमें यह भी याद रखना चाहिए कि क्षण महज एक संयोग कहलाता है, जो किसी घटना के लिए जिम्मेदार होता है। घटना के द्वारा परिवर्तन का बोध होना आवश्यक होता है। समय के सतत होने को हम मापते हैं। जबकि समय के असतत होने की गणना की जाती है। अर्थात किसी क्षण (घटना) के परिणाम स्वरुप होने वाले परिवर्तन को किसी क्षण विशेष के लिए (समय के द्वारा) मापा जाता है। इसके बाद भी स्ट्रिंग सिद्धांत जो पूर्णतः गणितीय है समय के सतत होने पर बल देता है। जबकि क्वांटम सिद्धांत (गुरुत्वीय क्षेत्र पर भी) द्वारा समय का असतत होना प्रमाणित है।

चौथा भ्रम : क्या समय यात्रा करना संभव है ? समय यात्रा का भौतिकीय अर्थ क्या है ?

आगे (अगला) और पीछे (पिछला) शब्दावली के कारण ही समय को मापने की आवश्यकता पड़ी। यह दो भिन्न-भिन्न वस्तुओं के आपसी चरणों के बीच का अंतर है। जो इस भ्रम को जन्म देता हैं कि समय यात्रा करना संभव है। क्योंकि इन दोनों शब्दों में काल का संबंध दूरी (दिक्) अर्थात अन्तरिक्ष से सम्बद्ध प्रतीत होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि समय का सम्बन्ध पदार्थ से होता है।

वर्तमानकाल : सामान्यतः द्रव्य की तीन अवस्थाएँ होती हैं ठोस, द्रव और गैस (प्लाज्मा भी) अर्थात अवस्थाओं का सम्बन्ध आयतन से होता है। इसके अलावा समय की भी तीन अवस्थाएं होती है वर्तमान, भूतकाल और भविष्यकाल जो समय यात्रा का भ्रम उत्पन्न करती हैं। वास्तव में वर्तमान किसी क्षण में काल की परिस्थिति, उसकी भौतिकी अथवा घटना के प्रभावी क्षेत्र की व्यापकता को परिभाषित करता है। वर्तमान की अवधि उतनी ही लम्बी होती है जब तक काल में परिवर्तन नहीं हो जाता अर्थात उसकी अवस्था परिवर्तित नहीं होती है। याद रहे स्थान अर्थात स्थिति परिवर्तन से काल परिवर्तित हो यह जरुरी नहीं है। क्योंकि यदि कोई नियत बाह्य बल किसी पिंड पर निरंतर आरोपित रहता है और पिंड की राशियों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। तो बाह्य बल के कारण होने वाले स्थिति परिवर्तन को काल परिवर्तन नहीं कहते हैं।

भूतकाल : यह किसी काल की वह अवस्था है जिसे दोबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। ब्रह्माण्ड के परिप्रेक्ष्य भूतकाल का अर्थ उस स्थिति से है जब ब्रह्माण्ड वर्तमान की अपेक्षा का कम व्यापक था। क्योंकि आज हम जानते हैं कि ब्रह्माण्ड में निरंतर विस्तार हो रहा है। अर्थात हम केवल यही जान सकते हैं कि वर्तमान, भूतकाल के किस विकल्प का परिणाम है ? हम यह कदापि नहीं जान सकते हैं कि ब्रह्माण्ड के परिप्रेक्ष्य भूतकाल में कौन-कौन से विकल्प मौजूद थे ?

भविष्यकाल : यह ब्रह्माण्ड की वह अवस्था है जो नियमों के परिणाम स्वरुप प्रभाव दर्शाएगी। क्योंकि आज हम जानते हैं कि वर्तमान में भौतिकी के नियम लागू हैं। इसलिए भविष्य हमारे द्वारा चुने गए विकल्पों का परिणाम होगा। अर्थात वैकल्पिक साधन ही ब्रह्माण्ड की नियति को निर्धारित करते हैं। भले ही चुनाव वर्तमान करता हो। परन्तु ब्रह्माण्ड का भविष्य तय है। भले ही वह किसी भी मार्ग या तरीके का अनुसरण क्यों न करता हो ! और ब्रह्माण्ड की यह नियति उसके अंत को लेकर है।


सच यही है कि समय यात्रा करना असंभव है क्योंकि "समय यात्रा" शब्द का कोई वास्तविक अर्थ नहीं निकलता है। जब मैं कहता हूँ कि मैं पेरिस के लिए यात्रा कर रहा हूँ। यहाँ यह बात समझ में आती है कि व्यक्ति एक समय के बाद पेरिस पहुँच जाएगा। क्योंकि पेरिस का अपना अस्तित्व है और वह एक स्थान भी है। परन्तु यदि मैं समय यात्रा की बात करता हूँ तो प्रश्न यह उठता है कि "क्या भूतकाल और भविष्यकाल अस्तित्व रखते हैं ?" यदि हाँ, तो वे कहाँ पर हैं / उनका तंत्र हमसे किस तरफ कितनी दूरी पर है ? परन्तु इसके बाद भी विज्ञान में समय यात्रा के बारे में चर्चा की जाती है। तो उसका क्या अर्थ होता है ? विज्ञान में समय यात्रा का अर्थ एक तरह से समय को नियंत्रित करने जैसा होता है। अर्थात भूतकाल जो गुजर चुका है, उसे परिवर्तित करके हम अपना वर्तमान तो नहीं बदल सकते हैं। परन्तु रिकॉडिंग के माध्यम से भूतकाल को अवश्य देख/सुन सकते हैं। नियमों के माध्यम से भूतकाल की घटनाओं जान सकते हैं और प्रयोग के माध्यम से एक हद तक उन घटनाओं की पुनरावृत्ति भी करके वर्तमान स्थिति प्राप्त होने के कारणों को जान/समझ सकते है। इसके अलावा प्रकाश, ध्वनि अथवा अन्य साधनों के माध्यम से प्राप्त होने वाली सूचनाओं को भी भूतकाल दर्शन ही कहेंगे। परन्तु हम भूतकाल में जाकर उन घटनाओं को परिवर्तित नहीं कर सकते हैं। जिसके परिणाम स्वरुप वर्तमान की यह स्थिति है। क्योंकि यह उष्मागतिकी के दूसरे नियम का उलंघन होगा। (एक बार पुनः ऊपर लिखे गए समय की दिशा के अर्थों को पढ़िए) आप पाएँगे कि समय की इन तीनों दिशाओं के विपरीत चलना असंभव है।

भले ही दिक् (दिशा/अंतरिक्ष) और काल की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही हुई है। दिक् और काल भले ही आपस में गुथे हुए हों। परन्तु दिक् और काल दोनों भिन्न-भिन्न चीजें हैं। सापेक्षता के आधार पर समय के बारे में यह कहा जाता है कि उसका समय आगे चल रहा है और मेरा समय उसके सापेक्ष पीछे चल रहा है। परन्तु निर्देशांकों के बारे में यह कहा जाता है कि वह मेरे सापेक्ष आगे जा रहा है और मैं उसके सापेक्ष पीछे जा रहा हूँ। अर्थात समय के बारे में दोनों एक ही दिशा में (आगे की ओर) बढ़ते हैं जबकि निर्देशांकों के बारे में प्रत्येक बार दोनों एक दूसरे के विपरीत दिशा में जाते हैं। अपवाद स्वरुप किसी तीसरे प्रेक्षक के सापेक्ष ही दो व्यक्ति/पिंड एक दूसरे के विपरीत न जाकर एक ही दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रतीत हो सकते हैं। स्पष्ट है कि समय की दिशा आगे की ओर ही होती है। अर्थात भूतकाल की यात्रा करना असंभव है। परन्तु भविष्य की यात्रा का यह अर्थ होता है कि एक स्थिति से दूसरी स्थिति तक पहुँचने या उसको पाने में अपेक्षाकृत कम समय लगना। इस प्रकार भविष्य यात्रा करना संभव है और परिस्थितियों को वैकल्पिक रूप से परिवर्तित करना भी संभव है। यह परिवर्तन की दर को परिवर्तित करके अर्थात त्वरण द्वारा अथवा साधन, माध्यम और दिशा परिवर्तन से संभव हो सकता है। क्योंकि समय दो कारकों की उपस्थिति में प्रभावित होता है। इनके आधार पर समय को नियंत्रित भी किया जा सकता है।
  1. विशेष सापेक्षता के सिद्धांत (special theory of relativity) के अनुसार पिंड की गति चरम (प्रकाश की) गति के समीप होती है तो आवर्त गति कम हो जाती है। अर्थात समय धीमा हो जाता है।
  2. साधारण सापेक्षता के सिद्धांत (general theory of relativity) के अनुसार गुरुत्व के प्रभाव में गति प्रभावित होती है। अर्थात दूरी/ऊंचाई बढ़ने के साथ-साथ गुरुत्वाकर्षण बल कमजोर पड़ता है इसलिए पिंड की गति बढ़ जाती है।
भविष्य के लिए समय यात्रा करना कैसे संभव है ? इस विषय पर हम आने वाले लेख में चर्चा करेंगे।

पांचवा भ्रम : समय की गणना की जाती है या समय को मापा जाता है ?

छटवा भ्रम : क्या समय गति करता है ? समय की गति का क्या आशय है ?

सातवा भ्रम : समय बदलता है तो लोग बदल (पदार्थ की राशियाँ परिवर्तित होती) जाते हैं ? या लोग बदल (पदार्थ की राशियाँ परिवर्तित होती हैं) गए इसलिए हम कहते हैं कि समय बदल गया ?

आठवा भ्रम : ब्रह्माण्ड में परिवर्तन को मापने के लिए क्या एक समय घड़ी है ? अर्थात क्या ऐसी कोई एक ब्रह्माण्ड घड़ी है जो निरंतर टिक-टिक चलती रहती है ?






समय का नियम, गति, द्रव्यमान और लंबाई के साथ संबंध


दिक्-काल (निर्देशांक) :
समय बीतते देर नहीं लगती। (अवस्था) : दिशा

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