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डर स्वाभाविक है, लेकिन डर के रहते हुए भी कार्य को नहीं रोकना साहस है। जिसने यह साहस दिखाया है उसने हम मानवों का मार्गदर्शन किया है और हम मानवों ने उस साहसी व्यक्ति को अपना नेता बनाया है।
यह सम्पूर्ण स्थूल जगत प्रकृति है और मानव की सूक्ष्म चेतना पुरुष है। सृष्टि की सार्थकता प्रकृति और पुरुष के एकीकरण में हैं। लेकिन प्रकृति का स्वाभाव आत्मसमर्पण नहीं है प्रकृति का स्वाभाव तो विजय पाना है। दूसरे शब्दों में प्रकृति कभी भी पुरुष के नियंत्रण को स्वीकार नहीं करती है, जब तक पुरुष अपने पौरुष से उसे जीत नहीं लेता। इस अभियान में मनुष्य ने समय-समय पर अनेकों गलतियाँ की हैं। जिसका खामियाजा उसने अपनी पूर्वावस्था को पुनः पाकर (पिछड़ कर) चुकाया है।
जो डरा नहीं, मैं उसके बारे में निसंकोच कह सकता हूँ कि उसने कुछ नया किया ही नही।

डर तो लगेगा, डर लगना स्वाभाविक है क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि आप कुछ नया करने जा रहे हैं, नया कहने जा रहे हैं।

वाबजूद, आप उस काम को करते हैं तो यह आपका पौरुष (पुरुष तत्व) है। जो समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। फिर चाहे आप उस काम को करने में सफल रहते हों या असफल हो जाते हों। निष्कर्ष सदैव फलदायी होता है। इसलिए नए काम को करने से मत डरिये बल्कि उन्हें करिये। एेसे कार्यों का सर्जन कीजिए, जिनकी शुरूआत करने में डर लगता है। 

डरवश किसी कार्य को नही करना, अंधविश्वास कहलाता है। जबकि डर का सामना करते हुए उस काम को करना, पुरुषार्थ या प्रयोग कहलाता है। किसी कार्य को करने में भय या आशंका की दो वजह होती हैं।
1. उस कार्य की शुरुआत को लेकर
2. उस कार्य के परिणाम को लेकर


प्रत्येक कार्य की शुरुआत में डर लगना स्वाभाविक है। कार्य की शुरुआत को लेकर लगने वाला डर शुरुआत हो जाने के बाद स्वतः मिट जाता है। इस प्रकार का डर मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने की वजह से निर्मित होता है। यह इस बात का डर होता है कि "लोग क्या कहेंगे ?" परन्तु इन कार्यों के परिणाम को लेकर जो आशंका हमारे मन में निर्मित होती है। वह कार्य के अंत तक बनी रहती है। यह आशंका ही तो प्रयोग का मूल है। जो इस बात का संकेत है कि प्रयोग करने वाला व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्ति नहीं है। वह प्रयोग के दौरान निष्पक्ष जाँच/अवलोकन कर रहा है। भले ही वह अनजाने परिणाम से भयभीत है। न जाने फलां-फलां काम को करने से क्या होता है ? परन्तु ऐसा करना मानव जाति के हित में होता है। फिर चाहे परिणाम कुछ भी हो। निष्कर्ष सदैव फलदायी होता है। क्योंकि ऐसे प्रयोग मानव जाति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आज हम यह जो विकास देख रहे हैं। वह इन्ही कार्यों (प्रयोग) की देन है। आग की खोज से लेकर मंगल ग्रह में यान भेजने तक यह जो विकास दिख रहा है। वह आशंका (परिणाम को लेकर लगने वाला डर) के बने रहते हुए भी फलित हुआ है। इस डर के रहते हुए, हम मनुष्यों में सोचने और समझने की क्षमता विकसित हुई है। जिसका उपयोग आज हम प्रेक्षण और प्रयोग के दौरान करते हैं कि हमसे कोई भूल/चूक न हो जाए। जरुरी नहीं है कि प्रयोग एक बार में ही सफल हो जाए। परन्तु असफलता की आशंका के रहते हुए हम प्रयोग ही न करें। यह अंधविश्वास है। ऐसे कदम समाज के लिए अहितकारी होते है। यह सर्वथा गलत है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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