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कारण को जानना मूल रूप से दर्शन है। विज्ञान में कारण को जानने का कार्य प्रयोग विधि द्वारा किया जाता है। ताकि लक्षणों की पहचान की जा सके, समस्याओं का समाधान ढूंढा जा सके, वस्तुओं और तत्वों की उपयोगिता परखी जा सके तथा सिद्धांतों और नियमों द्वारा प्रकृति की यथार्थता को सिद्ध किया जा सके। सरल शब्दों में कारण को जानने का कार्य प्रमाण उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। इस प्रकार दर्शन विज्ञान के लिए उपयोगी होता है। आज के इस लेख में हम केवल विज्ञान से संबंधित कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों के विषय में चर्चा करेंगे।

कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच कैसा संबंध होता है ? इसको जानने के लिए हम एक उदाहरण देते हैं। मैंने एक विद्यार्थी से पूछा : आप पढ़ाई क्यों करते हो ? उसने जबाब दिया : ताकि मैं अच्छे अंकों से पास हो सकूँ। प्रश्न यह उठता है कि क्या पढाई करने का "कारण" अच्छे अंक प्राप्त करना है ? क्या घटना कभी कारण के पहले घटित हो सकती है ? या फिर प्रत्येक घटना "उसके कारण" के बाद ही घटित होती है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि किसी कारणवश (उद्देश्य प्राप्ति हेतु) कोई घटना घटित हो !

यदि घटना सदैव कारण के बाद घटित होती है तो समझने के लिए एक उदाहरण और लेते हैं। क्या ग्रहण, ध्रुवीय ज्योति, तारों का अंत, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा, परमाणु और हम सभी के अस्तित्व का कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति है ? अर्थात यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ही नहीं होती तो न ही सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा और परमाणु होते और न ही ये घटनाएं घटित होती, क्या यह कथन सही है ? क्या हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को सभी वस्तु, पिंड और घटना के अस्तित्व का कारण मान सकते हैं ? आइये अब हम कारण, घटना और उनके प्रभाव के अंतर्संबंधों के विषय में चर्चा करते हैं। सर्वप्रथम हमको यह क्रम जानना जरूरी है।

कारण >> घटना >> उनके प्रभाव


याद रहे घटना सदैव कारण के बाद ही घटित होती है। कारण महज एक संयोग होता है। जो घटना की शुरुआत को परिभाषित करता है। यह क्षणिक होता है। कारण और घटना के संबंध में विकल्प का पूर्णतः अभाव होता है। अर्थात किसी भी घटना के घटित होने का कारण सदैव वह होता है जब किसी दूसरी घटना का कोई विकल्प मौजूद नहीं होता है। यदि विकल्प मौजूद है तब तो न ही कोई कारण और न ही कोई घटना घटित होगी। (क्रिया, कार्य और घटना में भेद फिर कभी) अर्थात ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को सभी वस्तु, पिंड और घटना के अस्तित्व का कारण नहीं माना जा सकता है। उद्देश्य प्राप्ति के लिए हम जो भी कार्य करते हैं। वह उद्देश्य कभी भी कारण नहीं कहलाता है। वह कार्य का परिणाम अर्थात प्रभाव कहलाता है। जिसे हमने अंतर्संबंधों के क्रम में दर्शाया हुआ है।
कारणाभावात् कार्याभावः ।
न तु कार्याभावात् कारणाभावः । वैशेषिकसूत्रम् -१,२
अर्थात कारण के बिना प्रभाव उत्पन्न नहीं होता है। प्रभाव की अनुपस्थिति में जरुरी नहीं है कि कारण की अनुपस्थिति हो। (क्योंकि)
कारण, दिक्काल में होने वाला एक संयोग है। जो एक निश्चित सीमा में घटना के लिए जिम्मेदार होता है। इसे ही घटना का क्षेत्र कहते हैं। जिसके प्रभाव स्वरुप उस क्षेत्र की भौतिकता में परिवर्तन, उत्पत्ति या अंत होता है। यह एक विशेष स्थिति के रूप में भी परिभाषित होता है। जो किसी पिंड या निकाय की उत्पत्ति या उसके अंत को दर्शाता है। अर्थात जिस किसी उद्देश्य के लिए हम कार्य करते हैं। उस कार्य का परिणाम सदैव भौतिकता (परिवर्तन, उत्पत्ति या अंत) के रूप में प्राप्त होता है और ये जो सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा और परमाणु का अस्तित्व है वह ब्रह्माण्ड की प्रमुख घटनाओं का प्रभाव है। जो भौतिकता के रूपों में हमें दिखाई देता है।

ऊपर लिखे वैशेषिक दर्शन के श्लोक की पहली पंक्ति से विज्ञान की पहली अभिधारणा सामने आती है कि "बिना अस्तित्व के कुछ भी नहीं पनप सकता है।" अर्थात ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति भी बिना कारण (अस्तित्व और संयोग) के असंभव है। फिर भले ही वह (ब्रह्माण्ड) किसी भी रूप में क्यों न अस्तित्व रखता हो ! एक संयोग जो महाविस्फोट घटना का कारण बना। तत्पश्चात स्वतः भौतिकी के नियमों द्वारा ब्रह्माण्ड का विकास हुआ। ब्रह्माण्ड का वर्तमान स्वरुप जो अनेक तारों, आकाशगंगाओं, निकायों, ग्रह-उपग्रह से निर्मित है। वह उसी महाविस्फोट घटनाक्रम का प्रभाव है। जो भौतिकी के नियमों द्वारा व्यवस्थित रूप से संचालित होता है।

विज्ञान की अन्य दूसरी अभिधारणा भी पहली अभिधारणा का विस्तृत रूप है। जिसके अनुसार संयोग होने पर नियत परिणाम प्राप्त होने की बात कही जाती है। अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" इन्ही दो अभिधारणाओं के चलते दर्शन विज्ञान के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। जिसके अनुसार प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग करना संगत है। इन प्रयोगों का दोहराव करना विज्ञान में युक्तिसंगत होता है। क्योंकि एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं। इसी अभिधारणा के रहते हम सिद्धांतों और नियमों द्वारा प्रकृति की यथार्थता को सिद्ध करते हैं। इसे कोई भी व्यक्ति कभी भी प्रमाणित कर सकता है। क्योंकि प्रकृति भेदभाव नहीं करती है।

विशेष बिंदु : "होना" कारण हो सकता है। "न होना" कभी भी कारण नहीं होता है। यह कारण होने की प्रमुख शर्त है। साथ ही विज्ञान के एक सिद्धांत का सम्बन्ध विशेष रूप से इसी शर्त से होता है। जिसके अनुसार "किसी भी नियम या सिद्धांत को सहमति और अवलोकन के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। परन्तु अवलोकन के आधार पर बनी असहमति के द्वारा अमान्य घोषित जरुर किया जा सकता है।"

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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