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संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 11 के द्वारा (3-1-1977 से) मूल कर्तव्यों को संविधान में अंत:स्थापित किया गया है। संविधान निर्माताओं को इन कर्तव्यों को संविधान में शामिल करने की आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती थी। इसलिए मूल कर्तव्यों को संविधान निर्माण के समय शामिल नही किया गया था। परन्तु जब समता के अधिकार और पंथनिरपेक्ष जैसे लक्ष्यों को साधना मुश्किल होने लगा। तब हम भारतीयों द्वारा इन लक्ष्यों को साधने के लिए मूल कर्तव्यों की आवश्यकता पड़ी। ये मूल कर्तव्य संविधान में वर्णित हमारी आकाँक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करने में हमारी सहायता करते हैं। जिन्हे भारत का नागरिक होने के नाते और मूल अधिकार प्राप्त करने के बदले में हम भारतीयों को ये कार्य अवश्य करने चाहिए।
भारतीय संविधान के भाग - "4 क" के अनुच्छेद - "51 क" में वर्णित मूल कर्तव्यों में से एक (51 क का ज) "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें" आज के लेख का मुख्य विषय है।
भारतीय संविधान ने हम भारतीयों को "रीति-रिवाज, परम्परा और अपने-अपने धर्म को बनाए रखने की स्वतंत्रता दे रखी है।" परन्तु रीति-रिवाज, परम्परा और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा देना समाज और देश के लिए हानिकारक होता है। इसलिए हम भारतीयों का भारत का नागरिक होने के नाते अंधविश्वास को समाज से निकाल फैंकना हमारा मूल कर्तव्य है। परन्तु यह अंधविश्वास क्या होता है ? यह समाज में अपनी जगह कैसे बना लेता है ?

कहा भी जाता है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।"
जहाँ देखकर सीखने का मतलब अपनी समझ विकसित करने के लिए अवलोकन करना है। वहीं देखा-सीखी करने का मतलब आकर्षित होकर, बिना आवश्यकता के या लालच में आकर आवश्यक परिणाम प्राप्त करने के लिए बिना सोचे समझे दूसरों के कार्यों का दोहराव करना है। फलस्वरूप देखकर सीखना एक सर्वोत्तम वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि देखा-सीखी करना अंधविश्वास की पहचान है। क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो यह जरुरी नहीं है। इसलिए लोगों को देखकर सीखने की आवश्यकता है न कि देखा-सीखी करने की आवश्यकता है।
एक उदाहरण के तौर पर अधिक भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। खाली पेट में भी दर्द होता है। ख़राब भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। और कमर कसी होने पर भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। अब आप स्वयं सोचें, किसी और की पेट दर्द की दवा यदि आप खाएंगे, तो क्या आपका पेट दर्द मिट जाएगा ? संभव है, यदि दोनों के पेट दर्द का कारण एक ही हो। अन्यथा स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
अंधविश्वास उस अंधकार के समान है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रूपी प्रकाश की उपस्थिति में अपना अस्तित्व खो देता है। अंधविश्वास और अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधविश्वास और अंधकार दोनों व्यक्ति, समाज और देश में अपना नकारात्मक प्रभाव दर्शाते हैं।
अंधविश्वास न सिर्फ विकास के कार्य करने में बाधा उत्पन्न करता है बल्कि वह मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बनाता है। हमारी सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट करता है और सहजता के प्रति हमें कट्टर बनाता है। अंधविश्वास उस नशे के समान है जिसके बुरे प्रभाव को सभी जानते हैं। परन्तु उसकी लत लग जाने के बाद उसके बारे में बात करना या उबरने का प्रयास करना भी लोगों को चिड़चिड़ा बना देता है। फलस्वरूप लोग अपने कार्यों के प्रति कट्टर होने लगते हैं।
अधिकतर देखने को मिलता है कि "पढ़े-लिखे और तकनीकी ज्ञान रखने वाले लोग भी अंधविश्वासी होते हैं ?" लोगों का प्रश्न होता है कि ऐसा कैसे संभव है ? वास्तव में विज्ञान का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता है और न ही तकनीकी ज्ञान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई संबंध होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है। इसलिए विज्ञान और तकनीकी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंधविश्वासी होता है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी होती है। फिर भले ही वह कितनी भी पुस्तकें क्यों न पढ़ ले। मोबाइल, कंप्यूटर और वाई-फाई जैसी सुविधाओं का क्यों न उपयोग करता हो। परन्तु ऐसे लोग समाज और देश की उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। अंधविश्वासी होते हैं। इसलिए विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है।

चित्रकार : Rob Gonsalves
अंधविश्वास का सीधा सा अर्थ है बिना जांचे-परखे स्वीकारना और उस पर विश्वास करना। यदि आप रीति-रिवाज, परम्परा, संस्कृति और धर्म के नाम पर ऐसे कार्य करते हैं जिनको करने का कारण आपको नहीं पता है तो ऐसे कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं। कारण जानते हुए भी यदि वे कार्य आवश्यक परिणाम नहीं देते हैं फिर भी उन कार्यों को करते रहना, अंधविश्वास है।

इस आधार पर अंधविश्वास दो प्रकार के होते हैं। पहला वह अंधविश्वास जो विकास के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। और दूसरा वह अंधविश्वास जो दूसरों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने की चेष्टा करता है। अर्थात् यदि आप दूसरों के रीति-रिवाज, परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक कार्यों को अंधविश्वास कहकर बाधा पहुँचाने की चेष्टा करते हैं और उन कार्यों को करने या उनको अंधविश्वास कहने का कारण आपको नहीं पता है ? तो आप स्वयं अंधविश्वासी है। क्योंकि बिना सोचे समझे दूसरों का समर्थन करना भी अंधविश्वास कहलाता है। भले ही आप अच्छाई के पक्ष में क्यों न हों ! परन्तु आने वाला समय आपके इस अंधविश्वास के कारण समाज के लिए घातक होता है। इसी कारण के चलते बहुत सी परम्पराएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आने लगी हैं। पहला वाला अंधविश्वास वर्तमान की बुराई कहलाता है। जबकि दूसरा वाला अंधविश्वास भविष्य की बुराई के लिए साधन बनता है।

अभी कुछ दिन पूर्व "राष्ट्रीय विज्ञान दिवस" के दिन मित्रों और पाठकों के साथ अंधविश्वास को लेकर बहुत लंबी चर्चा हुई। जिनमें से कुछ मित्रों का मानना था कि कभी-कभी परिवार में अंधविश्वास को लेकर मनमुटाव हो जाता है। हमने पूछा कि "आप तो उसी परिवार के सदस्य हो फिर आपको यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ कि आपके परिवार के लोग अंधविश्वासी है ? और आप अंधविश्वासी नहीं हो ?" इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं था। हालाँकि उन्होंने शिक्षा को कारण बताया था। परन्तु फिर अपनी ही बात से पलट गए कि "शिक्षित लोग भी तो अंधविश्वासी होते हैं।" चर्चा के दौरान एक और कारण सामने आया था "हमें तुलना करने पर समझ में आने लगता है कि हम जो परिणाम चाह रहे हैं वो हमें हासिल नहीं हो रहा है।" अर्थात हम गलत रास्ते पर हैं। इसी कारण से हमें लगता है कि परिवार वाले अंधविश्वासी हैं।
हमारा दूसरा प्रश्न था कि क्या उनकी सोच में परिवर्तन संभव है ? क्या आपने इस दिशा में प्रयास किया है ? उनका उत्तर था कि हाँ, हमने प्रयास किया है। परन्तु हमें नहीं लगता है कि उनकी सोच में परिवर्तन करना संभव है।
आज हम नौजवान यदि अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज भी उठाते हैं तो जरुरी है कि हम बड़े-बुजुर्गों के सामने ससम्मान तर्क रखें। जो अकाट्य होने चाहिए। जो स्पष्ट होने चाहिए। जिनके द्वारा अंधविश्वास दूर होना चाहिए। विषय के विस्तार के लिए हमारे पास उदाहरण होने चाहिए। सम्बंधित घटना के बारे में स्वयं का कुछ अनुभव होना चाहिए। यदि हम सामने वाले के अंधविश्वास को दूर करने में समर्थ नहीं हैं, तो हम स्वयं अंधविश्वासी हैं। आप अपनी बात सामने वाले को नहीं समझा पा रहे हो तो आप समझदार नहीं हो, नसमझ हो। यदि आप सामने वाले को भ्रमित कहते हो तो उसके भ्रम को दूर करना हमारा कर्तव्य है। उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रेरित सीख देने की आवश्यकता है। ठीक उसी प्रकार से समझाने की आवश्यकता है। जिस कारण के रहते आपको यह आभास हुआ था कि आपके परिवार के लोग भ्रमित है या अंधविश्वासी है। यदि आप उसी तरह से समझाएंगे तो निश्चित ही वे समझेंगे। परन्तु यदि आप उनको नहीं समझा पा रहे हैं, तो सम्भव है कि आप ही अंधविश्वासी हैं।

अंधविश्वास का एक कारण भय माना जाता है। परन्तु यह भय अंधविश्वास और प्रयोग दोनों की निशानी है। यदि भय या किसी आशंका के रहते आपको कार्य करने में बाधा होती है। तो यह अंधविश्वास है। परन्तु यदि भय या आशंका के रहते आप कार्य करते हैं। तो आपका कार्य प्रयोग कहलाता है। इन्ही कार्यों के चलते हम मनुष्यों ने वर्तमान विकास को प्राप्त किया है। अपनी समझ को विकसित किया है। एक खोजी और विवेकपूर्ण (सजग) व्यक्ति को दो तरह के भय से जीतना होता है। पहला प्रयोग के परिणाम क्या होंगे, उसकी आशंका को लेकर और दूसरा समाज पर ऊँगली उठाने के कारण समाज की प्रतिक्रिया को लेकर भय रहता है। परन्तु हमें इस भय का सामना करना ही पड़ता है।

इस भय का एक उदाहरण यह भी है कि जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की अच्छाई बताता है। तब हम उसकी बात पर भरोसा नहीं करते हैं। दूसरे की अच्छाई को हमेशा संदेह की नज़रों से देखते हैं और वहीं जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की बुराई बताता है। तब तो हम उसकी बात पर फ़ौरन यकीन कर लेते हैं। क्योंकि हम बुराई को परखना भी नहीं चाहते हैं। कहीं उस बुराई ने हमें घेर लिया तो ! परखते समय हमारा कोई नुकसान हो गया तो ! जबकि अच्छाई से हमें कोई डर नहीं लगता है, हम अपना काम निकालने की सीमा को जानने के लिए उस अच्छे व्यक्ति को परखना चाहते हैं। इस तरह का भेदभाव भी अंधविश्वास कहलाता है। यह भेदभाव करना हमें किसी ने नहीं सिखाया है। बल्कि हम इसी तरह से सीखते आए हैं। अपनी सोच-समझ विकसित करते आए हैं। फिर भी यह एक अंधविश्वास है।

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आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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