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उद्देशिका के बारे में : विज्ञान उद्देशिका, भारतीय संविधान की उद्देशिका से प्रभावित होकर लिखी गई उद्देशिका है। यह न केवल हमें विज्ञान और तकनीक के सहयोग से प्राप्त होने वाले सामाजिक स्तर के बारे में जानकारी देती है। बल्कि वह हमारे लिए उस सामाजिक स्तर को प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त भी करती है। साधारण शब्दों में विज्ञान उद्देशिका वैज्ञानिकों के कार्य करने के तरीके से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विधियों तथा विज्ञान और तकनीक को परिभाषित करने के बारे में जानकारी देती है।

विज्ञान उद्देशिका और संविधान की उद्देशिका में मुख्य रूप से यह अंतर है कि विज्ञान उद्देशिका हमें उन अंतर्निहित उद्देश्यों के बारे में जानकारी देती है, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला एक व्यक्ति, वैज्ञानिक और आविष्कारक अपने कार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान के लिए हासिल करना चाहता है। इसलिए विज्ञान उद्देशिका को आत्मसात करने वालों की न ही कोई एक स्पष्ट सीमा है और न ही आत्मसात करने की कोई एक निश्चित दिनांक है। जबकि संविधान और उसकी उद्देशिका हम भारतीयों के लिए हम भारतीयों (संविधान सभा) द्वारा 26 नवम्बर 1949 ई. को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित की गई थी।

विज्ञान उद्देशिका को लिखने का मुख्य उद्देश्य समस्त मानव जाति के हित और विकास के लिए, लोगों के मन में एक ऐसे विश्वस्तरीय आदर्श समाज का स्पष्ट चित्रण कराना है। जो न केवल हम मनुष्यों के लक्ष्य, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करता है। बल्कि हम मनुष्यों के द्वारा जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से व्यवहार में हासिल भी किया जा सकता है।


उद्देशिका में सम्मिलित पारिभाषिक शब्दावली
1. विज्ञान : खोज करने की पद्धति को विज्ञान कहते हैं।
2. तकनीक : विज्ञान को उपयोग में लाने की प्रक्रिया को तकनीक कहते हैं।

उद्देशिका द्वारा आदर्श समाज का चित्रण :
1. समस्त मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
2. वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज सदैव करते रहना चाहिए।
3. नए और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
4. शिक्षा और दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।
5. हम मनुष्यों को आपसी समझ विकसित करने के लिए हरदम प्रयास करते रहना चाहिए।

वैज्ञानिक कार्यशैली का वर्णन :
1. समस्या का समाधान ढूँढना समस्या को परिभाषित करते ही सरल हो जाता है।
2. समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है।
3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रमाणित ज्ञान को ही स्वीकार करने की बात कहता है।
4. प्रमाणित ज्ञान, जब एक से अधिक विधियों या एक से अधिक बार के प्रयोगों (आंकड़ों) पर आधारित होता है, तब वह ज्ञान समाज में स्वीकारने योग्य होता है।
5. जब सभी प्रयोग और प्रमाण के लिए उपयोग में लाई गईं सभी विधियाँ एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं, तब उस प्रमाणित ज्ञान की विश्वसनीयता समाज में और अधिक बढ़ जाती है।

विज्ञान के विकास के लिए वर्णित अपेक्षाएं : 
1. ज्ञान के यथार्थ को जानने का प्रयास होते रहना चाहिए।
2. खोजे हुए ज्ञान को आपस में साझा करना चाहिए।
3. प्रायोगिक निष्कर्ष में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं करना चाहिए।

विज्ञान उद्देशिका का विस्तार

"हम, मानव जाति के सदस्य" अर्थात विज्ञान हम मनुष्यों के लिए है। न ही वनस्पति जगत और न ही शेष जंतु जगत विज्ञान का उपयोग करता है।

"विज्ञान को एक विषय के रूप में" अर्थात विज्ञान के बारे में चर्चा की जाती है। असमंजस की स्थिति में उसकी विधियों और खोजों के विषय में प्रश्न उठाए जा सकते हैं। विज्ञान में प्रश्न उठाने को लेकर समय, वर्ग और उम्र की कोई प्रतिबद्धता (सीमा) नहीं है।

"विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग" अर्थात विज्ञान एक (खोज) पद्धति है। भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती हैं।

"विज्ञान एक (खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक) विषय के रूप में विकसित" अर्थात विज्ञान खोजने, ज्ञान में वृद्धि करने, निर्णय लेने तथा भविष्य को प्रभावित और निर्मित करने में मानव जाति के लिए उपयोगी और सहयोगी सिद्ध होता है। विज्ञान के प्रभावी होने के लिए जरुरी है कि विज्ञान में निर्णायक एकरूपता की उपस्थिति होनी चाहिए। इसीलिए विज्ञान की प्रकृति ज्ञान को सतत हासिल करने तथा उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करने के बाद उसे संचित करने की होती है।



"विज्ञान का उपयोग समस्त मानव जाति के हित में हो" अर्थात चूँकि विज्ञान के अनुप्रयोग से विज्ञान की उपयोगिता निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान और मानव में तकनीकी ज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में चरघातांकी विकास संभव हो पाता है। परन्तु विज्ञान की यह उपयोगिता मानव जाति के लिए अभिशाप न बन जाए, इसके लिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा दी जानी चाहिए। ताकि तकनीकी ज्ञान के प्रति मानव जाति की समझ विकसित हो सके। क्योंकि बिना विज्ञान की समझ के तकनीकी ज्ञान का उपयोग और प्रौद्योगिकी पर पूर्ण निर्भरता मानव जाति के लिए अभिशाप है। मानव जाति के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए "व्यापक दृष्टि और दूरदृष्टि" दोनों की सतत आवश्यकता है।

"वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज और उनका नि:संकोच उपयोग" अर्थात भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक ही विधि या प्रक्रिया के उपयोग से एक समान परिणाम प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसके अलावा निष्कर्ष को लेकर एक मत होना भी मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा वैकल्पिक युक्तियों और वैकल्पिक साधनों की खोज की वकालत करती है। उनके नि:संकोच उपयोग को बढ़ावा देने की बात कहती है। ताकि परीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति अपने-अपने मतों (निष्कर्ष) को प्रमाणित कर सके।

"वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा" अर्थात ऐसी शिक्षा जो मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर के समाधान को पहचानने और उनको परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। ऐसी शिक्षा न केवल हम मनुष्यों के लिए क्या अच्छा-बुरा और सही-गलत है, का ज्ञान कराती है। बल्कि हम मनुष्यों में आपसी समझ विकसित करती है और समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।

"समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों को परिभाषित करने" अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" विज्ञान की इस अभिधारणा को ध्यान में रखकर के समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है। ताकि समस्याओं का समाधान समस्या को परिभाषित करके, मापदंडों की पहचान द्वारा सरलता से ढूंढा जाता है।

"कारण, घटना और उनके प्रभाव" अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा समस्याओं के समाधान के बारे में यह सीख देती है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।" क्योंकि यह जरुरी नहीं है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो। इसलिए कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच अंतर्संबंध स्थापित करना, विज्ञान की प्रमुख उपलब्धि होती है।

"वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से" अर्थात विज्ञान में अस्पष्ट और अपरिभाषित ज्ञान का कोई स्थान नहीं होता है। जिस ज्ञान को हम भौतिक राशियों के रूप में व्यक्त कर सकते हों, जिसे मापा जा सकता हो, जिसको प्रमाणित करने के लिए उस ज्ञान के आधार पर भविष्यवाणियां की जा सकती हों और जिसकी जाँच-पड़ताल करना संभव हो, ऐसा ज्ञान ही विज्ञान में स्वीकारने योग्य होता है।

"एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा" अर्थात जिस ज्ञान को एक से अधिक विधियों द्वारा या स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए, संबंधित प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जाता है। ऐसा ज्ञान विज्ञान में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए समय के साथ इस ज्ञान में सिर्फ संशोधन और विस्तार करने की आवश्यकता होती है।

"समस्त मानव जाति के विकास के लिए" अर्थात विज्ञान का विकास सम्पूर्ण मानव जाति के विकास को निर्धारित करता है। कहने के लिए एक खोज एक वैज्ञानिक या वैज्ञानिकों का समूह करता है। परन्तु उस खोज के उपयोग और उसके प्रभाव से सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की दशा और दिशा निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान मानव जाति के लिए वरदान साबित हो, इसके लिए हमें विज्ञान के विकास से जुड़ी अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।

"ज्ञान के यथार्थ को जानने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए पहली अपेक्षा के अनुसार खोजे गए ज्ञान की यथार्थता और उसकी उपयोगिता को जानने का सतत प्रयास किया जाना चाहिए। क्योंकि विज्ञान में परम ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है। वैज्ञानिकों के मत के अनुसार "विज्ञान के द्वारा हम केवल सत्य अर्थात ज्ञान के नजदीक जा सकते हैं। परन्तु यथार्थ ज्ञान अर्थात अंतिम सत्य कभी भी नहीं जान सकते हैं।" निरंतर ज्ञान की यथार्थता जानने के प्रयास में हम न केवल स्वयं को सत्य के और नजदीक पाते हैं बल्कि हम उस ज्ञान का उपयोग भी कर पाते हैं।

"आपस में साझा करने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए दूसरी अपेक्षा के अनुसार विज्ञान के उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें ज्ञान और उस ज्ञान की उपयोगिता को आपस में साझा करना चाहिए। ताकि मानव जाति के ज्ञान में वृद्धि हो सके। विज्ञान का मुख्य उद्देश्य : प्रणाली अथवा तंत्र को एकरूप में जानने अथवा समझने के लिए उस प्रणाली अथवा तंत्र के ज्ञान को क्रमबद्ध संचित करना।

"प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए तीसरी अपेक्षा के अनुसार प्रयोग के दौरान ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, जो प्रयोगों को प्रभावित कर सकता है तथा प्रयोगों के निष्कर्ष निकालते समय "पूर्वधारणाओं और व्यक्तिगत भावनाओं" को जबरन निष्कर्ष में शामिल नहीं करना चाहिए।

"विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने" अर्थात स्वयं अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से ऐसे समाज का उदाहरण प्रस्तुत करना है। जिसे आदर्श समाज के रूप में व्यव्हार में हासिल किया जा सकता है।

- अज़ीज़ राय

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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