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विज्ञान के विकास में प्रयोग विधि का बहुत बड़ा योगदान है। जब प्रेक्षण (अवलोकन) विधि की अपनी सीमाओं के रहते विज्ञान का विकास थमने सा लगा था। और उत्पन्न होने वाले भ्रम से वास्तविकता को कैसे पृथक किया जाए ? तब जिस विधि की आवश्यकता जान पड़ी थी। वह प्रयोग विधि थी। विज्ञान में प्रकृति और उसके नियमों को जानने/खोजने के लिए प्रयोग विधि को उपयोग में लाने का सुझाव मेरी याद में सर्वप्रथम रॉजर बेकन (दार्शनिक) ने 1275 ई. के आसपास दिया था। परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि इससे पहले प्रयोग विधि का उपयोग नहीं किया जाता था या उससे पहले उसका ज्ञान मानव समाज को नहीं था। बल्कि तकनीकी विकास में प्रयोग विधि का उपयोग प्रारम्भ से होता आया है। जिसे विज्ञान के विकास के लिए उपयोग में लेने का सुझाव सर्वप्रथम रॉजर बेकन ने दिया था। रोजर बेकन ये वही दार्शनिक हैं जिन्होंने कीमियागिरी में प्रयोग करने के लिए नए-नए उपकरण बनाए थे। वो बात अलग है कि वे असफल रहे। आपको (रोजर बेकन) भी आपकी पुस्तक के लिए चर्च ने मठ में कारावास दिया था।

प्रयोग विधि के महत्वपूर्ण बिंदु :
  1. मनुष्य प्रयोगकर्ता के रूप में कार्यविधि में शामिल होता है। यह इस विधि की प्रमुख आवश्यकता है। अर्थात प्रयोग की शुरुआत कब करनी है ? यह प्रयोगकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है।
  2. इस विधि का उपयोग एक सीमा तक किसी भी समय (सुबह, दोपहर, शाम या रात), किसी भी स्थान और किसी भी व्यक्ति (आयुवर्ग या स्त्री-पुरुष) द्वारा किया जा सकता है।
  3. प्रयोग विधि को उसके दोहराव के लिए जाना जाता है। 
  4. इस विधि का उपयोग विज्ञान में प्रकृति का अध्ययन अर्थात खोज करने तथा प्रौद्योगिकी में उन खोजों के ज्ञान को उपयोग में लाने के लिए किया जाता है।
  5. यह विधि प्रचलित ज्ञान और खोजे गए ज्ञान को प्रमाणित करने में सहायक सिद्ध होती है।
  6. मनुष्य की इंद्रियों से निर्मित भ्रम में से वास्तविकता को जानना इस विधि के द्वारा आसान होता है।

प्रयोग विधि के चार प्रकार :
  1. जिन प्रयोगों का उपयोग खोज करने के लिए किया जाता है। इन प्रयोगों के दोहराव करने से भौतिक राशियों के रूप में हमें कुछ आंकड़े (मान) प्राप्त होते हैं। जिन आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके हम किसी निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। यह पहले प्रकार के प्रयोग कहलाते हैं। जिनके माध्यम से हम विज्ञान में ऐसे निष्कर्षों की खोज कर पाते हैं। जिनकी जानकारी हमें इन प्रयोगों के पहले तक नहीं होती है। मूल रूप से वैज्ञानिक समुदाय खोज करने के लिए इन प्रयोगों का उपयोग करता है।
  2. अब तक के ज्ञात सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और जानकारियों को प्रमाणित करने में इन प्रयोगों का उपयोग किया जाता है। तथा इन प्रयोगों के द्वारा पूर्व में घटित घटनाओं के प्रति समझ विकसित की जाती है। इन प्रयोगों के द्वारा खोज (पहले वाले प्रयोग) के दौरान आंकड़े एकत्रित करने में होने वाली त्रुटि और कार्यविधि के सिद्धांत की गलती की पहचान की जाती है। ताकि दोबारा प्रयोगों में सुधार के बाद नए/परिवर्तित आंकड़े प्राप्त किये जा सकें। इन प्रयोगों को करने से पहले ही हमारे पास प्रयोग की आवश्यक सामग्री, प्रायोगिक सिद्धांत, उसकी कार्यविधि, सावधानियां और संभावित आंकड़े और निष्कर्ष की जानकारी पहले से उपलब्ध होती है। मूल रूप से विद्यार्थी वर्ग प्रमाण जुटाने में इन प्रयोगों का उपयोग करता है।
  3. मूल रूप से मानव समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सुधार के लिए इन प्रयोगों का उपयोग अपने-अपने स्तर पर करता है। और अपनी सोच को समय-समय पर बदलता रहता है। इस प्रकार के प्रयोग का अर्थ "कर-करके सीखने" से होता है। इसलिए विश्व में देश-काल पर आधारित अनेकों व्यवस्थाओं का जन्म होता है। ये व्यवस्थाएं सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक आधार पर अलग-अलग होती हैं। चूंकि ये व्यवस्थाएं किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं करती है। इन व्यवस्थाओं के निर्माण के पीछे पीछे सभी मनुष्यों का अपना-अपना स्वभाव/अनुभव काम करता है। इसलिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्थाएं विज्ञान के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आती हैं।
  4. मूल रूप से आविष्कार करने के लिए इन प्रयोगों का उपयोग किया करता है। इसे परीक्षण (Testing) विधि भी कहते हैं। इन प्रयोगों के द्वारा तकनीक विकसित होती है। और समय-समय पर नई आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से तकनीक और भी उन्नत की जाती है। तीसरे और चौथे प्रकार की प्रयोग विधि प्राचीन है। ये दोनों ही प्रकार प्रौद्योगिकी के विकास में सहायक होते हैं। जबकि पहले और दूसरे प्रकार के प्रयोग विज्ञान के विकास (खोज) में सहायक होते हैं।
दार्शनिक रॉजर बेकन के जन्म के पहले से प्रयोग विधि उपयोग में आती रही है। इसी विधि के उपयोग से अलेक्जेंड्रिया के अल-हेजन (Al-Hazen 965-1038 ई.) ने प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन के नियमों की खोज की थी। इसके अलावा भी कृषिकार्य, ऊर्जा के स्रोत (पनचक्की, पवनचक्की आदि के निर्माण में), युद्ध के उपकरण और संचार के साधनों (जहाज निर्माण आदि) में प्रयोग विधि के तीसरे और चौथे प्रकार का उपयोग होता था। वो बात अलग है विज्ञान में प्रयोग विधि का चलन लगभग 400 वर्ष पहले से प्रारम्भ हुआ है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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1 Comment

  1. बहुत ही गहराई से वर्णन किया हुआ, धन्यवाद।।

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