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जिस प्रकार सामने वाले की गलती या कमी पर हमारी प्रतिक्रिया से हमारी मंशा जगजाहिर होती है। उसी प्रकार अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग पर समाज की प्रतिक्रिया से हम उस समाज के व्यक्तियों की मंशा जान सकते हैं। जब हम सामने वाले की गलती या कमी को उसी के सामने (मुंह पर) कहते हैं। तो समझ में आता है कि हम वास्तव में सामने वाले में सुधार स्वरूप बदलाव देखना चाहते हैं। परन्तु जब हम पीठ पीछे गलती या कमी गिनाते हैं। तो समझ में आता है कि हम जिसकी बुराई कर रहे हैं। वास्तव में हम उसमें सुधार देखना नहीं चाहते हैं। संभव है कि पीठ पीछे किसी की गलती या कमी गिनाना, (सब) झूठ हो। वास्तव में हम पीठ पीछे जिसके सामने गलती या कमी गिनाते हैं हम उसके मन में वाहवाही लूटना चाहते हैं। स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं। यही सब अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग पर भी लागू होता है।

याद रहे हमने पहले भी लिखा है कि अंधविश्वास का जन्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आभाव में होता है। और भ्रम का जन्म वास्तविकता को परखने की क्षमता के आभाव में होता है। वास्तव में अंधविश्वास और भ्रम का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। जिस प्रकार प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधकार का बोध होता है ठीक उसी प्रकार क्रमशः वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वास्तविकता को परखने की क्षमता के आभाव में अंधविश्वास और भ्रम मनुष्य को जकड़ लेता है।

मनुष्य न ही जन्मजात अंधविश्वासी होता है और न ही वह जन्म से भ्रमित रहता है। मनुष्य में जब-जब वास्तविकता को परखने की क्षमता का आभाव होता है मनुष्य तब-तब संबंधित घटनाओं को लेकर भ्रमित हो जाता है। अर्थात यदि कोई व्यक्ति किसी घटना की वास्तविकता जानता है। तो जरुरी नहीं है कि वह व्यक्ति अब कभी भी भ्रमित नहीं होगा !! आप जितना अधिक और अच्छे से घटनाओं का विश्लेषण करते जाएंगे। आपके भ्रमित होने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी। परन्तु आप भ्रमित होने से हमेशा के लिए नहीं बच सकते हैं। अंधविश्वास ऐसी खाई है जिसमें एक बार मनुष्य फंस जाता है। वह उसमें फंसता चला जाता है। उसे इस बात की खबर तक नहीं होती है। क्योंकि आगे चलकर मनुष्य उसमें सहजता ढूंढ लेता है। वह विचार करने से भी कतराने लगता है। क्योंकि अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग जितना नुक्सान समाज का करता है। उतना ही नुकसान व्यक्तिगत रूप से मनुष्य का भी होता है। इसलिए मनुष्य न सिर्फ स्वयं को अंधविश्वासी कहलवाने से झिझकता है। बल्कि वह अब तक हुए नुक्सान का आंकलन करने से भी कतराता है। आखिर अंधविश्वास का जन्म लालच और देखा-सीखी करने से ही तो होता है।

स्रोत
मनोरोग आभाव में भी होता है और अधिकता में भी होता है। फिर चाहे वह धन की अधिकता या कमी को लेकर हो या फिर आत्म-विश्वास को लेकर हो। साफ़-सफाई की अधिकता या कमी को लेकर हो या पौषक तत्वों को आहार में शामिल करने को लेकर हो आदि। किसी भी एक की अधिकता या कमी मनोरोग का कारण हो सकती है। परन्तु इसका मतलब यह भी नहीं है कि आपमें यदि इनकी कमी या अधिकता है तो आप मनोरोगी हो। यह सिर्फ कारण हैं। जिन्हे मैंने लिखा है। जो मनोरोग का कारण बन सकते हैं। आपको डरने की आवश्यकता नहीं है। अधिक जानने के लिए हमें मनो-चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। न कि फ्री में ज्ञान बांटने वाले अनाड़ियों से इसका प्रशस्ति पत्र स्वीकार करना चाहिए। फलस्वरूप एक समझदार व्यक्ति भी मनोरोग का शिकार हो जाता है। बड़े-बड़े महान व्यक्तित्व और प्रसिद्धि प्राप्त व्यक्ति भी इसके घेरे में आ जाते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण होता है अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग पर समाज की प्रतिक्रिया कैसी है ? यदि वास्तव में कोई व्यक्ति अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग से ग्रसित है तो समाज को चाहिए कि वह ऐसे व्यक्तियों के साथ संवेदना के साथ पेश आए। ग्रसित लोगों से हमें हमदर्दी रखना चाहिए। उनको आवश्यक उपचार उपलब्ध कराना चाहिए। न कि उनका विरोध करना चाहिए। और न ही उनको ताने मारना चाहिए। परन्तु जो व्यक्ति अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग से ग्रसित व्यक्तियों का विरोध करते हैं। समस्या गिनाने के बाद भी उनका उपचार नहीं जानते हैं। हमें ऐसे लोगों से सचेत रहने की आवश्यकता है। क्योंकि तब ऐसे लोगों की मंशा पर संदेह होता है।

अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग पर समाज की प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए ? इस विषय पर प्रयासरत सफल-असफल लोगों से मैंने चर्चाएं कीं। और मेरा व्यक्तिगत 8 वर्ष का अनुभव भी यही कहता है कि हमें अंधविश्वास और भ्रम का समाधान/निदान आभाव की पूर्ति द्वारा करना चाहिए। अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आभाव की पूर्ति से अंधविश्वास को और वास्तविकता को परखने की क्षमता के आभाव की पूर्ति से भ्रम को दूर करना चाहिए। तथा मनोरोगियों के साथ अच्छा व्यव्हार करना चाहिए। और जरुरत पढ़ने पर मनोचिकित्सकों द्वारा इलाज की आवश्यकता की पूर्ति करवानी चाहिए। मनोरोगियों के निम्न लक्षण होने के चलते हमें उनसे हमदर्दी और संवेदना के साथ पेश आना चाहिए। हमें उनके साथ आम रोगियों की तरह ही पेश आना चाहिए।

1. मनोरोगी अपना अनुभव तो साझा करता है परंतु उस अनुभव के विश्लेषण को सुनना पसंद नहीं करता है।
2. वह घटना और उसके परिणाम को एक रूप में देखता है। वह घटना को घटक और कारण के रूप में छिन्न-भिन्न होते नहीं देख सकता है।
3. संकुचित सोच भी मनोरोगी का एक लक्षण है। परन्तु याद रहे संकुचित सोच का मतलब सीमित सोच नहीं होता है। क्योंकि उम्र के साथ-साथ लगभग प्रत्येक व्यक्ति की सोच सीमित हो जाती है। सीमित सोच का कारण सिर्फ शारीरिक कमजोरी या कमी नहीं है। बल्कि एक उम्र के बाद किसी भी व्यवसाय या नौकरी का चुनाव और उसी दिशा में आगे बढ़ने की इच्छा तथा दूसरे क्षेत्र में नाम कमाने में लगने वाला समय भी इन्ही कारणों में आता है।

रोग के पुराने होने तथा उपचार के लिए असफल प्रयत्नों की संख्या और उनका तरीका भी लक्षणों में बदलाव ला सकता है। ये उभयनिष्ठ लक्षण हैं बाँकी तरह-तरह की बीमारी की पहचान के लिए अलग-अलग लक्षण होते हैं।

हमने अनुभव किया है कि खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जब लोग बीमारी से गुजरते हैं। उसी दौरान सगे-संबंधी या परिचित व्यक्ति मरीजों को ताने मारते हैं। शायद उनके लिए यह एक अच्छा मौका होता है। फलस्वरूप दवाइयों द्वारा बीमारी में सुधार की दर बहुत कम हो जाती है। तब मरीज मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमजोर होने लगता है। मैंने इसी केस में एक मौत होते तक देखा है। ताने मुख्य रूप से धार्मिक, सामाजिक, पुराने पारिवारिक क्रियाकलापों/विवादों आदि से संबंधित होते हैं। जिनका मरीज की बीमारी सी कतई कोई संबंध नहीं होता है। यह ताने मारने वालों की ठीस या उनका आपसी कोई पुराना आर्थिक मामला होता है।

परन्तु मनोरोगी के स्थान पर जब आप अंधविश्वास और भ्रम से ग्रसित लोगों को (सिर्फ) ताने मारते हो। उनसे हमदर्दी से पेश नहीं आते हो। तो एक समय के बाद ग्रसित लोगों को अंधविश्वासी या भ्रमित कहने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। फिर वे इस छाप को सहज रूप से स्वीकार लेते हैं। फिर उनमें सुधार की संभावना पहले की अपेक्षा बहुत कम हो जाती है। इसलिए सामाजिक प्राणी होने के नाते ग्रसित लोगों से अच्छा व्यव्हार करना चाहिए।

इसलिए आप भी सजग रहें। समाज को जागरूक बनाएं। भ्रमित और मनोरोगी व्यक्तियों के साथ हमदर्दी रखें। और उनको भूल से भी नीचा नहीं दिखाएँ। लोगों को अंधविश्वास, भ्रम और मनोरोग से उबरने के लिए उन्हें समय दें। कृपया जल्दी-जल्दी मत करें। इन सब के निदान/उपचार में समय लगता है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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