ads

Style1

Style2

Style3[OneLeft]

Style3[OneRight]

Style4

Style5

दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाइये

एक बार मुझे एक बहुत-बड़े संत महात्मा जी के प्रवचन सुनने का मौका मिला था। उन्होंने गुरु-शिष्य के सम्बन्ध से अपने प्रवचन की शुरुआत की। प्रवचन को विस्तार देते-देते वे गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में बताने लगे। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण शब्द का संधि विच्छेद "गुरु+तत्व+आकर्षण" के रूप में किया। इस तरह से उन्होंने गुरुत्वाकर्षण बल के अर्थ का अनर्थ कर दिया। प्रवचन के दौरान उन्होंने इशारा करते हुए बताया कि यह जानकारी उन्हें उनके शिष्य जो एक माध्यमिक शाला में विज्ञान विषय के शिक्षक हैं, ने बताई है। (मैं उन संत महात्मा जी का परिचय आपको नहीं दे सकता हूँ क्योंकि वे जिस पदवी को धारण किये हुए हैं वह पदवी सबसे बड़ी पदवी मानी जाती है।)

अर्थ का अनर्थ हमेशा दो तरह के इंसान करते हैं।
1. अधूरा ज्ञान रखने वाला इंसान
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण न रखने वाला इंसान
अज्ञानी व्यक्ति कभी भी समाज का अहित नहीं कर सकता है और न ही वह अर्थ का अनर्थ करता है। इसलिए एक अज्ञानी पुरुष सदैव विद्वान व्यक्ति के समान स्पष्ट सोच रखता है। इसलिए उनकी जिंदगी औरों की तरह ख़ुशी से गुजरती है।

इसलिए कहा भी जाता है, यदि आपको किसी विषय का अधूरा ज्ञान है तो आप उस विषय के बारे में और अधिक जानकारी जुटाइए। तब तक अधूरा ज्ञान रखने वाले इंसान को उस अधूरे ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए मनाही रहती है। ऐसा करना समाज के लिए हितकारी होता है। (महत्वपूर्ण बिंदु : पूरा ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है, इसलिए अधूरा ज्ञान को स्पष्ट करना हमारी जिम्मेदारी बनती है। अधूरे ज्ञान का अर्थ है किसी विषय, वस्तु या घटना के बारे में अधूरी जानकारी रखना, जिसके अभाव में कभी भी उस विषय, वस्तु या घटना के बारे में स्पष्ट होना असंभव होता है।)

ऐसा क्यों है कि विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया जाता है ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का क्षेत्र विज्ञान से कहीं अधिक व्यापक होता है। विज्ञान के किसी क्षेत्र में कार्य करने की अपनी कुछ शर्तें होती हैं। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण संगतता के आधार पर फलता-फूलता है। यह हम मनुष्यों के दैनिक जीवन में प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण उस प्रकाश के समान है जिसकी अनुपस्थिति में अंधकार रुपी अन्धविश्वास हम मनुष्यों को जकड़ लेता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रत्येक विषय, वस्तु और घटना के बारे में हमारी समझ विकसित करता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही है जिसके माध्यम से हम न केवल चीजों को परिभाषित करते हैं बल्कि उसके सहयोग से उन चीजों (विषय, वस्तु और घटना) की पहचान करना भी सीखते हैं।

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विशेष : विज्ञान उद्देशिका

हम भारतीय प्रत्येक वर्ष "रमन प्रभाव" की खोज की याद में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाते हैं। "रमन प्रभाव" की खोज भारत रत्न सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (7 नवंबर 1888 – 21 नवंबर 1970) द्वारा 28 फ़रवरी 1928 को पूर्ण हुई थी। आप विज्ञान क्षेत्र के पहले एशियाई और भारतीय भौतिकविद थे, जिनको सन 1930 में नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। आप नोबेल पुरुस्कार प्राप्त करने वाले (ब्रिटिश भारत के) दूसरे भारतीय तथा भारत रत्न से सम्मानित प्रारंभिक तीन रत्नों (महान विभूतियों) में एक रत्न थे। जिनका शोधकार्य मुख्य रूप से "परमाणु भौतिकी" और "विद्युतचुंबकत्व" विषय पर आधारित था। आप प्रो. विक्रम अम्बालाल साराभाई जी जैसे महान वैज्ञानिकों के मार्ग प्रदर्शक रहे हैं। आपके कार्यों ने देश को विज्ञान के क्षेत्र में सदैव एक नई दिशा, लक्ष्य और प्रोत्साहन देने का कार्य किया है। इसी कड़ी में इस वर्ष (2016) के राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की चर्चा का विषय "देश के विकास के लिए वैज्ञानिक मुद्दों को सार्वजनिक प्रोत्साहन देने का उद्देश्य" रखा गया है।



हम, मानव जाति के सदस्य, विज्ञान को एक (खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक)
विषय के रूप में विकसित करने के लिए, विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग करते हैं।
विज्ञान का उपयोग : समस्त मानव जाति के हित में हो यह सुनिश्चित करने, वैकल्पिक युक्तियों और साधनों
की खोज और उनके नि:संकोच उपयोग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा की व्यवस्था तथा
आपसी समझ विकसित करने और समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों समानता-असमानता
और सामान्य-असामान्य (परिस्थिति वाले कारणों, घटनाओं और उनके प्रभावों) को परिभाषित करने,
वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से प्राप्त होने वाले ज्ञान को तब स्वीकार करते हैं, जब वह ज्ञान
स्वतंत्र रूप से एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा प्रमाणित होता है।
हम समस्त मानव जाति के विकास के लिए ज्ञान के यथार्थ को जानने, उसे आपस में साझा करने तथा
प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा, विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने का दृढ़ संकल्प करते हैं।

विज्ञान उद्देशिका पर विस्तृत लेख                                                                       - अज़ीज़ राय            

भय : अंधविश्वास और प्रयोग दोनों का स्रोत है !

डर स्वाभाविक है, लेकिन डर के रहते हुए भी कार्य को नहीं रोकना साहस है। जिसने यह साहस दिखाया है उसने हम मानवों का मार्गदर्शन किया है और हम मानवों ने उस साहसी व्यक्ति को अपना नेता बनाया है।
यह सम्पूर्ण स्थूल जगत प्रकृति है और मानव की सूक्ष्म चेतना पुरुष है। सृष्टि की सार्थकता प्रकृति और पुरुष के एकीकरण में हैं। लेकिन प्रकृति का स्वाभाव आत्मसमर्पण नहीं है प्रकृति का स्वाभाव तो विजय पाना है। दूसरे शब्दों में प्रकृति कभी भी पुरुष के नियंत्रण को स्वीकार नहीं करती है, जब तक पुरुष अपने पौरुष से उसे जीत नहीं लेता। इस अभियान में मनुष्य ने समय-समय पर अनेकों गलतियाँ की हैं। जिसका खामियाजा उसने अपनी पूर्वावस्था को पुनः पाकर (पिछड़ कर) चुकाया है।
जो डरा नहीं, मैं उसके बारे में निसंकोच कह सकता हूँ कि उसने कुछ नया किया ही नही।

डर तो लगेगा, डर लगना स्वाभाविक है क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि आप कुछ नया करने जा रहे हैं, नया कहने जा रहे हैं।

वाबजूद, आप उस काम को करते हैं तो यह आपका पौरुष (पुरुष तत्व) है। जो समाज के लिए कल्याणकारी सिद्ध होता है। फिर चाहे आप उस काम को करने में सफल रहते हों या असफल हो जाते हों। निष्कर्ष सदैव फलदायी होता है। इसलिए नए काम को करने से मत डरिये बल्कि उन्हें करिये। एेसे कार्यों का सर्जन कीजिए, जिनकी शुरूआत करने में डर लगता है। 

डरवश किसी कार्य को नही करना, अंधविश्वास कहलाता है। जबकि डर का सामना करते हुए उस काम को करना, पुरुषार्थ या प्रयोग कहलाता है। किसी कार्य को करने में भय या आशंका की दो वजह होती हैं।
1. उस कार्य की शुरुआत को लेकर
2. उस कार्य के परिणाम को लेकर


प्रत्येक कार्य की शुरुआत में डर लगना स्वाभाविक है। कार्य की शुरुआत को लेकर लगने वाला डर शुरुआत हो जाने के बाद स्वतः मिट जाता है। इस प्रकार का डर मनुष्य के सामाजिक प्राणी होने की वजह से निर्मित होता है। यह इस बात का डर होता है कि "लोग क्या कहेंगे ?" परन्तु इन कार्यों के परिणाम को लेकर जो आशंका हमारे मन में निर्मित होती है। वह कार्य के अंत तक बनी रहती है। यह आशंका ही तो प्रयोग का मूल है। जो इस बात का संकेत है कि प्रयोग करने वाला व्यक्ति पूर्वाग्रह से ग्रस्ति नहीं है। वह प्रयोग के दौरान निष्पक्ष जाँच/अवलोकन कर रहा है। भले ही वह अनजाने परिणाम से भयभीत है। न जाने फलां-फलां काम को करने से क्या होता है ? परन्तु ऐसा करना मानव जाति के हित में होता है। फिर चाहे परिणाम कुछ भी हो। निष्कर्ष सदैव फलदायी होता है। क्योंकि ऐसे प्रयोग मानव जाति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

आज हम यह जो विकास देख रहे हैं। वह इन्ही कार्यों (प्रयोग) की देन है। आग की खोज से लेकर मंगल ग्रह में यान भेजने तक यह जो विकास दिख रहा है। वह आशंका (परिणाम को लेकर लगने वाला डर) के बने रहते हुए भी फलित हुआ है। इस डर के रहते हुए, हम मनुष्यों में सोचने और समझने की क्षमता विकसित हुई है। जिसका उपयोग आज हम प्रेक्षण और प्रयोग के दौरान करते हैं कि हमसे कोई भूल/चूक न हो जाए। जरुरी नहीं है कि प्रयोग एक बार में ही सफल हो जाए। परन्तु असफलता की आशंका के रहते हुए हम प्रयोग ही न करें। यह अंधविश्वास है। ऐसे कदम समाज के लिए अहितकारी होते है। यह सर्वथा गलत है।

पृथ्वी गोल है ! तथ्य का ज्ञान कैसे हुआ ?

पृथ्वी गोल है ! कहना, आज जितना सरल और सही लगता है। आज से लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व पृथ्वी को गोल कहना उतना सरल और सही नहीं लगता था। क्योंकि तब हम पृथ्वी को सपाट मानते थे। ऐसा नहीं है कि पृथ्वी को सपाट मानने के पीछे हमारे पास कोई तर्क नहीं थे। हमारे पास वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं था या पृथ्वी को सपाट मानना महज एक कोरी कल्पना थी। बल्कि पृथ्वी को सपाट मानने के पीछे हम मानवों के पास सबसे बड़ा साक्ष्य था। अर्थात "आप स्वयं देखकर के (अवलोकन करके) बताओ कि पृथ्वी आपको कैसी मालूम पड़ती है ?" आज भी आपका उत्तर पृथ्वी को सपाट ही कहेगा, न कि पृथ्वी को गोल कहेगा। इसे निगमन विधि कहते हैं। परन्तु आज हम जानते हैं कि पृथ्वी की संरचना गोल है। अब प्रश्न यह उठता है कि सर्वप्रथम किसने पृथ्वी के रूप का पता पृथ्वी के सपाट होने और पृथ्वी के गोल होने के रूप में लगाया था ? सच कहूँ तो हम्मे से यह किसी को भी पता नहीं है कि सर्वप्रथम पृथ्वी को सपाट किसने कहा था ?  परंतु ऐसा कैसे हो सकता है !! दरअसल वास्तविकता यह है कि पृथ्वी गोल है इस तथ्य को हमने समय के साथ भुला दिया था और मानव जाति एक बार पुनः पृथ्वी को सपाट मानने लगी थी। अर्थात पृथ्वी के गोल होने का पता सर्वप्रथम पांच सौ वर्ष पूर्व नहीं लगाया गया था। बल्कि न केवल यूनानी, भारतीय लोग भी पृथ्वी के गोल होने को सही मानते थे। वे तर्क और प्रमाण दोनों देते थे। बाबजूद हम सभी एक बार फिर पृथ्वी को सपाट मानने के भ्रम में फंस गए थे।

जब हम पृथ्वी के किसी एक भू-भाग का भ्रमण करते हैं, तो हम अवलोकन द्वारा यह नहीं बता सकते हैं कि पृथ्वी गोल है। क्योंकि पृथ्वी प्रेक्षक के रूप में हम मानवों की तुलना (आकार) में बहुत बड़ी है और दूसरी बात हम मानव पृथ्वी के धरातल में रहते हैं। इसलिए प्रेक्षक के रूप में हम मानव किसी एक भू-भाग के अवलोकन द्वारा पृथ्वी के रूप का सही पता नहीं लगा सकते हैं।
अपोलो अभियान के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों द्वारा ली गई पृथ्वी की तस्वीरों को जब पृथ्वी पर भेजा गया और इन तस्वीरों के आधार पर "फ्लैट अर्थ सोसाइटी" के सचिव को पृथ्वी के गोल होने का सबूत दिया गया। तब उनका हाजिर जबाब था : "देखा ! यह चित्र भी हमारी धारणाओं को प्रमाणित करता है।"
अपोलो मिशन के दौरान चन्द्रमा से ली गई पृथ्वी की फोटो
इसलिए माना जाता है कि पृथ्वी के रूप को जानने का विचार सर्वप्रथम चीन में आया होगा। क्योंकि प्राचीन चीन (प्राचीन नाम : त्यान स्या अर्थात मध्य राज्य) समृद्ध, विशाल और एक राष्ट्र के रूप विकसित था। कहा जाता है कि एक बार सम्राट ने अपने राज्य की सीमाओं के निर्धारण के लिए चारों ओर अधिकारी भेजे। उन सभी को गुप्तयंत्र कुतुबनुमा अर्थात दिशा सूचक यंत्र दिए गए। जिन्हे चीन में "दक्षिण सूचक" कहा जाता था। महीनों चली इस यात्रा के अनुभवों को दरबार में साझा किया गया। परन्तु कुछ प्रश्नों के उत्तर तब भी नहीं मिल रहे थे। और अंततः यह मान लिया गया कि पृथ्वी का रूप सपाट है जिसके चारों ओर खम्बे द्वारा आकाश टिका हुआ है। किसी दिन एक अजदहे ने एक खम्बे को मोड़ दिया होगा इसलिए पृथ्वी का पूर्वी हिस्सा समुद्र की ओर झुक गया और पश्चिमी हिस्सा पहाड़ बनकर आकाश को छूने लगा। इसलिए सभी नदियां पूर्व की ओर बहती हैं। (चीन के बारे में यह जो वर्णन है यह किस दौर का है ? समझना मुश्किल है। क्योंकि दिशा सूचक यंत्र को अरब साम्राज्य की देन मानते हैं। जिसका स्वर्ण काल 800 ई. से 1300 ई. तक चला। इसी के समकालीन चीन में बड़े-बड़े जहाज बनाए गए थे। परन्तु चीन में दिशा सूचक यंत्र के चलन के प्रमाण 900 ई. पुराने तक के हैं। इसके अलावा चीन में सर्वप्रथम सम्राट की पदवी 200 ई. पू. से मानी जाती है।)

ठीक इसी प्रकार हम भारतीयों ने भी पृथ्वी को चपटा माना था। आज भी पुराणों में सात-समुंदर की कथाएँ सुनने को मिलती हैं। जम्बूद्वीप को थल स्थल अर्थात सम्पूर्ण पृथ्वी माना गया था। जिसके केंद्र में मेरु पर्वत को स्थित माना जाता था। इस द्वीप को क्रमशः मधु सागर, इक्षु (गन्ने का रस) सागर, सुरा सागर, सर्पि सागर, क्षीर (दूध) सागर, दधि (दही) सागर, स्वादुद सागर के वलयों से घिरा हुआ बतलाया जाता था। एक अन्य कथा के अनुसार सम्पूर्ण थल स्थल को चार भागों में विभाजित माना गया था। इनके मध्य में मेरु पर्वत है। जिसकी परिक्रमा चन्द्रमा और सूर्य करते हैं। केवल दक्षिणी भाग के स्थल में ही मानव पाए जाते हैं। जिसे जम्बूद्वीप कहा गया। जिसे लवण सागर से घिरा हुआ बतलाया जाता था। एक और भारतीय कल्पना के अनुसार क्षीर सागर में एक कछुआ तैरता है जिसकी पीठ पर चार हाथी अलग-अलग दिशाओं की ओर मुँह करके खड़े हैं जिन्होंने मिलकर पृथ्वी को धारण किया हुआ है। इसके पीछे का यह तर्क दिया जाता था कि कछुए की पीठ के समान मजबूती और हाथी से अधिक बलवान और कौन हो सकता है ?
समझने योग्य बात यह है कि पृथ्वी सपाट अर्थात चपटी है का आशय स्थल का कोई अंत नहीं है या फिर जल का कोई अंत नहीं है ? क्योंकि तब पृथ्वी के सपाट रूप के संगत किसी न किसी को तो अनंत होना पड़ेगा। इसलिए अनेकों कल्पनाएं की गई थी। अधिकतर कल्पनाओं में जल को अनंत बताया गया है।
इसी प्रकार की कल्पनाएँ यूनान, मिस्र, रोम, रूस और इंग्लैंड आदि सभी जगह प्रचलित थी। 6 वी. शताब्दी में कोस्मा नामक व्यापारी ने एक "पुस्तक ईसा मसीह की, चहुँ ओर व्याप्त संसार के वर्णन सहित" नामक पुस्तक लिखी थी। उसने अपनी पुस्तक में देश-विदेश का वर्णन किया है। जो कभी भारत भी आया था। उसने बाइबिल का अनुसरण करते हुए, पुस्तक में पृथ्वी को सपाट बताया है। वह अपनी पुस्तक में पृथ्वी को चौकोर और ऊँची दीवारों से घिरा हुआ बतलाता है। पारदर्शी आकाश इसी दीवार के सहारे टिका हुआ है अर्थात आकाश को ठोस बतलाया गया है। जिसके ऊपर आकाश का पानी है जो समय-समय पर बरसता है। उत्तर की ओर पर्वत है जिसके पीछे रात को जाकर सूरज छिप जाता है। इस पुस्तक का कईयों भाषाओँ में अनुवाद हुआ है। जबकि लेखक ने इस पुस्तक को "स्वयं सुनी-सुनाई कहानियों की पुस्तक" कहा है। यूनान की कल्पना के अनुसार पृथ्वी निराधार नहीं हो सकती है। इसलिए उन्होंने एक खम्बे की कल्पना की, जिसके सहारे पृथ्वी को टिका हुआ बताया जाता था। यह खम्बा पृथ्वी को भेदते हुए केंद्र से आकाश की ओर जाता है। जिसके सहारे गोल (छत्ते के समान आधा-वृत्त) आकाश खम्बे से टिका रहता है। खम्बे के साथ-साथ आकाश भी घूमता है। जिससे की तारे, नक्षत्र और अन्य सभी ग्रह घूमते नज़र आते हैं। परन्तु किसी ने भी पृथ्वी के घूमने (घूर्णन गति) के बारे में नहीं सोचा था ! स्वर्ग में बैठे देवता गण इन गतियों को नियंत्रित करते हैं। इसी प्रकार रूस में पृथ्वी को व्हेल मछली के ऊपर स्थित बतलाया जाता था। और इसके पीछे का कारण भूकम्प का आना बतलाया जाता था। ठीक यही कारण हमे भी बचपन में शेषनाग के ऊपर पृथ्वी का होना बताया गया था।

माना जाता है कि पृथ्वी को गोल कहने वाली बात सर्वप्रथम पाइथागोरस ने कही थी। परन्तु सिर्फ इस तर्क के साथ कि "गोल, सबसे सुन्दर ज्यामितीय आकृति होती है और यदि पृथ्वी ब्रह्माण्ड (उस समय सौरमंडल को ही ब्रह्माण्ड मान लिया गया था।) का केंद्र है। तो उसे गोल होना चाहिए।" परन्तु यह किस तरह का गोल है ? चन्द्रमा-सूरज वाला गोल, रोटी-कचौड़ी वाला गोल या साइकिल के चक्के वाला गोल ? मुझे तो बचपन की "चंदा गोल, सूरज गोल" कविता याद आ रही है। वास्तव में गोल एक 3 आयाम की संरचना है और चूँकि पृथ्वी हम से आकार में बहुत बड़ी है। इसलिए पृथ्वी को गोल+आकार (गोलाकार) कहते हैं। पृथ्वी के सपाट होने और गोल होने का जो संवाद है। वह संरचना आधारित है। इसलिए सपाट और गोल होने की शर्तों को समझना बहुत आवश्यक है। साइकिल के चक्के वाला गोल तो जम्बूद्वीप भी था। परन्तु क्या वह पृथ्वी का सही रूप है ? नही न। पृथ्वी का रूप गोल या सपाट होने में अंततः यह विरोध है कि गोल होने का अर्थ है पृथ्वी सीमित है और सपाट होने का अर्थ था पृथ्वी असीमित (जल या थल) है। फिर चाहे दोनों स्थितियों में हम मानवों की तुलना में पृथ्वी कितनी भी बड़ी क्यों न हो !! दोनों ही स्थितियों में थल भाग के सीमित होने की संभावना बनती है। परन्तु पृथ्वी के सपाट होने का अर्थ था जल भाग का असीम होना। परन्तु पृथ्वी के गोलाकार होने का अर्थ है अंतरिक्ष का असीमित होना।
एक अशिक्षित व्यक्ति से पृथ्वी के रूप का सही पता पूछने पर वह उसे सपाट बतलाता है। छोटा बच्चा उसे लड्डू जैसा गोल बतलाता है। पंद्रह साल का बच्चा उसे संतरे के समान ध्रुवों पर चपटा बतलाता है। विज्ञान की समझ रखने वाला व्यक्ति उसे नाशपाती के समान उत्तरी ध्रुव से उभरा और दक्षिणी ध्रुव से चपटा बतलाता है तथा एक वैज्ञानिक इसी पृथ्वी के रूप को भू-आभ (Geoid) या पृथ्वीयकार बताता है अर्थात पृथ्वी, पृथ्वी जैसी है।
यूनानी पृथ्वी के स्थल भाग को एक द्वीप मानते थे। जिसके बीच में एक समुद्र है तथा द्वीप चारों ओर से ओशियन नामक नदी से घिरा हुआ है। ओशियन नदी का कोई अंत नहीं है और स्थलाकृतियों से निर्मित भू-भाग को ओइकोमीन (Oikoumene) कहते थे। जिसका अर्थ निवास योग्य विश्व होता है। याद रहे उस समय तक केवल एशिया, यूरोप और अफ्रीका (प्राचीन नाम इथियोपिया और लीबिया, बाद में अफ़्रीगी नाम की जनजाति के नाम पर अफ्रीका नाम पड़ा) महाद्वीप के बारे में ज्ञान था। आज का भूमध्यसागर और काला सागर मिलकर प्राचीन काल का वही सागर कहलाते थे, जिसे सम्पूर्ण स्थल भाग के बीच में इंगित किया जाता था। इस प्रकार यूनानियों का मानचित्र भी पृथ्वी के अधूरे ज्ञान को व्यक्त करता है। इसके बाबजूद अरस्तु (Aristotle, 384-322 ई. पू. यूनानी दार्शनिक और ज्योतिर्विद) पृथ्वी को गोल मानते थे। क्योंकि वे ग्रहण को ग्रहों का एक मात्र संयोग कहते थे। याद रहे अरस्तु यूनानी थे। पृथ्वी की स्थलाकृतियों का सम्पूर्ण ज्ञान न रखते हुए (अन्य महाद्वीपों के ज्ञान के आभाव में) भी, वे पृथ्वी की संरचना को गोल कहते थे। क्योंकि वे ग्रहण होने का कारण जानते थे। अरस्तु पृथ्वी, चन्द्रमा और सूर्य सहित सभी ग्रहों को गोल मानते थे। क्योंकि जब उन्होंने अवलोकन के दौरान देखा कि ग्रहण के समय सूर्य के प्रकाश से बनने वाली छाया सदैव वक्राकार होती है। तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह तभी संभव है जब पृथ्वी (चन्द्र ग्रहण से) और चन्द्रमा (सूर्य ग्रहण से) दोनों की संरचना गोल हो ! सूर्य हमें सदैव गोल मालूम पड़ता है। ग्रहों के इस सिद्धांत के सरलीकरण (आगमन विधि) का यह प्रभाव हुआ कि अन्य सभी पाँचों ग्रहों को गोल मान लिया गया। तथा इन ग्रहों के मार्ग को भी खगोल (खः+गोल=आकाशीय, उड़ने योग्य गोल) बोला गया। अर्थात वृत्तीय मार्ग जिस पर अन्य गोल संरचना के ग्रह लुढ़कते हैं। (याद रहे अरस्तु ने पृथ्वी के गोल होने का सही प्रमाण दिया था। इसके बाद भी वे ब्रह्माण्ड के सही स्वरुप को नहीं पहचान पाए थे। क्योंकि वे पृथ्वी को ब्रह्माण्ड का केंद्र मानते थे।)

अरस्तू के अनुयायियों में से बहुत से दार्शनिक और ज्योतिर्विद ऐसे भी थे। जिन्होंने अलग-अलग तर्क देकर पृथ्वी की संरचना को गोल बतलाया था। उन्ही में से एक अनुयायी अरिस्टार्कस (Aristarchus, 310 – 230 ई. पु.) ने पृथ्वी को गोल मानते हुए, ग्रहण होने के समय को पूर्व निर्धारित करने की गणना की थी। उन्होंने ही सर्वप्रथम यह बतलाया था कि क्रमशः चन्द्रमा, पृथ्वी और सूर्य एक दूसरे से बड़े हैं। एक अनुयायी ऐरातोस्थेनस (Eratosthenes, 276 - 195 ई. पु.) ने पृथ्वी की परिधि की गणना की थी। ऐरातोस्थेनस अलेक्जेंड्रिया के कला और विज्ञान पुस्तकालय के लिए लिखी जाने वाली पुस्तकों का एक लेखक था। उसे जब यह जानकारी मिली कि सियेना नगर के केंद्र में एक बहुत गहरा कुआँ है। जिसके अंदर से पानी के चमकने जैसी रोशनी आती है। परन्तु यहाँ अलेक्जेंड्रिया में कुओं के पानी में तो ऐसा नहीं होता है !! इस आधार पर उसने सोचा जरूर से पृथ्वी गोल है। सूर्य का प्रकाश सियेना नगर में दोपहर को सीधा पड़ता होगा और यहाँ अलेक्जेंड्रिया में सूर्य का प्रकाश थोड़े झुकाव के साथ आपतित होता है। सियेना नगर से आए सौदागरों से सियेना नगर से यहाँ तक की दूरी जानने के बाद ऐरातोस्थेनस ने पृथ्वी की परिधि को ज्ञात किया था। ज्ञात वर्तमान परिधि की लम्बाई ऐरातोस्थेनस द्वारा की गई गणना से मात्र 1200 कि. मी. छोटी थी। जो सियेना नगर से आए सौदागरों द्वारा (18 कि. मी. दूर ) बतलाई गई अनुमानित दूरी पर आधारित थी।

इसी क्रम में यूनानियों ने यह भी अनुभव किया था कि रात के वक्त ध्रुव तारे (उत्तर दिशा) की ओर आगे चलने पर ध्रुव तारा ऊपर उठता हुआ दिखाई पड़ता है और जबकि भूमध्य सागर की ओर चलने पर ध्रुव तारा क्षितिज पर झुकते हुए दिखाई पड़ता है। तब स्पष्ट निष्कर्ष निकाला गया कि पृथ्वी गोल है। क्योंकि ध्रुव तारा उत्तर ध्रुव के ठीक ऊपर स्थिर दिखाई देता है। माना जाता है कि मिस्र और यूनान से देखने पर ध्रुव तारे की स्थिति में जो अंतर दिखाई देता है। उस आधार पर अरस्तु ने पृथ्वी की परिधि को मापा था। पृथ्वी की संरचना गोल है। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए यूनानी जिस तर्क को देते थे। वह तर्क सातवी शताब्दी ई. पूर्व का है। आज के लेबनान राज्य के लोग उस समय निडर हुआ करते थे। उन्हें समुद्रों की लहरों से डर नहीं लगता था। क्योंकि वे साहसी थे। इसलिए मिस्र के फ़राऊन नेहो द्वितीय ने इन लोगों को आदेश दिया कि "तुम लोग द्वीप (आज का अफ्रीका) के किनारे-किनारे तब तक आगें जाते जाओ, जब तक कोई बड़ी बाधा सामने न आ जाए।" इस तरह से यह यात्रा तीन वर्ष तक चली। यात्रा का अंत यात्रियों के समुद्र में विपरीत दिशा से वापस आने के साथ हुआ। इसी यात्रा के दौरान यात्रियों ने पाया कि "भूमि की ओर चलते हुए देखने पर सर्वप्रथम पहाड़ों की चोटियां, उसके बाद नगर की बड़ी-बड़ी इमारतें तत्पश्चात छोटे भवन और मनुष्य दिखाई देते हैं।" यह दृश्य समुद्र में रहकर डॉल्फ़िन के झांकने के समान दिखाई पड़ता था। इसलिए जहाज की पाल पर चढ़कर देखने से दूर तक दिखाई देता है। और तब अंततः यह निष्कर्ष निकाला गया कि पृथ्वी अर्ध गोल के समान उभारदार है। क्योंकि पृथ्वी यदि सपाट होती तो समस्त स्थलाकृतियां एक साथ दिखाई पड़ती। गोल संरचना का तो सवाल ही नहीं उठता था। क्योंकि यदि पृथ्वी गोल होती तो हम गिर नहीं जाते !!
जिस प्रकार पाइथागोरस के शिष्य फिलोलस की खोज पृथ्वी परिक्रमण गति करती है को प्लूटो और अरस्तु के मतों के सामने समय के साथ भुला दिया गया था। ठीक उसी प्रकार अरस्तु और उसके अनुयायियों की खोज पृथ्वी का रूप गोल है को एक्विनास के एकीकरण के सामने भुला दिया गया था। एक्विनास ने चर्च के लिए बाइबिल और अरस्तु-टॉलमी के निदर्श का एकीकरण किया था। वास्तविकता यही है कि इसे एकीकरण कहना गलत होगा। क्योंकि एक्विनास ने अरस्तु-टॉलमी के निदर्श और खोजों का उपयोग प्रमाण के रूप में किया था। अर्थात जो खोजे बाइबिल का समर्थन नहीं करती थी या खंडन करती थी। उन्हें गलत बोला गया। इस प्रकार एक बहुत बड़े समूह ने पुनः पृथ्वी को सपाट कहना शुरू कर दिया।
ठीक यही गलती हम भारतीयों ने भी दोहराई है। सर्वप्रथम आर्यभट्ट (Aryabhata, 476-550 ई.) ने पृथ्वी के गोल होने, उसकी घूर्णन और परिक्रमण गति तथा सूर्य सिद्धांत की बात कही थी। इस आधार पर उन्होंने कर्क और मकर रेखा का निर्धारण किया था तथा उस दिन के निर्धारण के लिए लिए गणना की थी। जिस दिवस दिन और रात एक बराबर होते हैं। प्रत्येक दिवस के दिन और रात के अंतर को मापा था। यह निर्धारण आज से पहले विश्व के किसी भी गणितज्ञ या ज्योतिर्विद ने नहीं किया था। उनके बाद आचार्य लल्ल (720-790 ई.) ने "लल्ल सिद्धांत" के माध्यम से और भास्कराचार्य जी (Bhāskaracharya II, 1114-1185 ई.) ने "सिद्धांत-शिरोमणि" के माध्यम से पृथ्वी की संरचना को गोल बताया था। आचार्य लल्ल का तर्क था कि "यदि पृथ्वी सपाट है तो ताड़ के समान ऊँचे पेड़ दूर से नज़र क्यों नहीं आते हैं ?"

समता यदि विद्यते भुवस्तखस्ताल निभा बहुच्छृयाः।
कथमेव न दृष्टिगोचर नुरहु यान्ति सुदूर संस्थिताः।।                                                               (लल्ल सिद्धांत से)

सर्वतः पर्वतानाम ग्राम चैत्य चयैश्चितः। 
कदंबकुसुमग्रथिः केसर प्रसरैरिव।।                                                                                 (सिद्धांत-शिरोमणि से)

इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए, पृथ्वी गोल है !! परन्तु हम सब इससे बंधे हुए हैं ? के कारण गुरुत्वाकर्षण की खोज सर्वप्रथम भारतीय ज्योतिर्विद भास्कराचार्य जी ने बारह्वी शताब्दी में की थी। भास्कराचार्य जी और आचार्य ब्रह्मगुप्त जी की रचनाओं का सन 1817 ई. में टी. कोलब्रुक द्वारा तथा सूर्य सिद्धांत का सन 1860 ई. में ई. बर्जेस द्वारा अनुवाद किया गया था। फ्लोरेंटाइन के वैज्ञानिक तथा गणितज्ञ पावतो तोस्कानेली (1397-1482 ई.) ने भी अपनी पुस्तक में पृथ्वी की संरचना गोल है के बारे में लिखा है। इन सबके बावजूद संचार के माध्यमों की कमी के चलते और समाज में फैले अन्धविश्वास के कारण हम पृथ्वी के रूप को सपाट मानते रहे। सभी धर्मों ने अपने-अपने ग्रंथों की आड़ में हमसे झूट बोला। लोगों से धन इकठ्ठा किया और सच कभी भी सामने आने नहीं दिया गया। "दैवीय सिद्धांत" के नाम पर हम मनुष्यों की परिक्रमा/आरती स्वयं चन्द्रमा और सूरज करते हैं कहा जाता था। पृथ्वी सपाट है कहकर हम को समुद्रों और लम्बी यात्राओं से दूर रखा गया। ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ भारत में हुआ है। मैं तो कहता हूँ कि आपको यह पूछना चाहिए "ऐसा कहाँ नहीं हुआ है ?" मेरा उत्तर होगा "ऐसा सभी जगह हुआ है।" यह हमारी सजगता का सो जाना है जिसके न रहते हुए हम सच को देरी से जान पाए हैं।

पृथ्वी का रूप नाशपाती के समान है !!
विषय संबंधी प्रमुख जानकारियाँ :
1. 20 सितम्बर 1519 से लेकर 6 सितम्बर 1522 तक की समुद्री यात्रा करके विक्टोरिया नामक जहाज ने अटलांटिक महासागर में स्थित सेविले बंदरगाह पर पहुंचकर पृथ्वी की एक पूरी परिक्रमा की। जिससे यह प्रमाणित हो गया कि "पृथ्वी का रूप गोल है।"
2. चिकित्सक विलियम गिल्बर्ट (William Gilbert, 1544-1603 ई.) ने अपने 17 वर्ष चले लंबे अनुसंधान में पाया कि पृथ्वी चुम्बक की तरह व्यवहार करती है। जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक "दी मैग्नेट" (De Magnete) में किया है।
3. पृथ्वी गोल नहीं अपितु संतरे के समान ध्रुवो पर चपटी है। सर्वप्रथम न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज करने के बाद गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव को समझाते हुए बतलाया था। और इस प्रकार फ़्रांस और इंग्लैंड के वैज्ञानिकों/लोगों में पृथ्वी के रूप को लेकर मतभेद हो गए थे। क्योंकि फ़्रांसिसी लोग पृथ्वी को ध्रुवों की ओर उभरा तथा ब्रिटेन के लोग पृथ्वी को भूमध्य रेखा की ओर से उभरा बतलाते थे।
4. पृथ्वी संतरे के समान नहीं अपितु नाशपाती के समान उत्तरी ध्रुव से उभरी तथा दक्षिणी ध्रुव से चपटी है सर्वप्रथम सर जेम्स जीन ने बतलाया था। और इस तरह से फ्रांस और इंग्लैंड के लोगों में मतभेद समाप्त हो गया था।

शीर्ष