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वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अनुपस्थिति : अंधविश्वास की उपस्थिति है !

संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 11 के द्वारा (3-1-1977 से) मूल कर्तव्यों को संविधान में अंत:स्थापित किया गया है। संविधान निर्माताओं को इन कर्तव्यों को संविधान में शामिल करने की आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती थी। इसलिए मूल कर्तव्यों को संविधान निर्माण के समय शामिल नही किया गया था। परन्तु जब समता के अधिकार और पंथनिरपेक्ष जैसे लक्ष्यों को साधना मुश्किल होने लगा। तब हम भारतीयों द्वारा इन लक्ष्यों को साधने के लिए मूल कर्तव्यों की आवश्यकता पड़ी। ये मूल कर्तव्य संविधान में वर्णित हमारी आकाँक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करने में हमारी सहायता करते हैं। जिन्हे भारत का नागरिक होने के नाते और मूल अधिकार प्राप्त करने के बदले में हम भारतीयों को ये कार्य अवश्य करने चाहिए।
भारतीय संविधान के भाग - "4 क" के अनुच्छेद - "51 क" में वर्णित मूल कर्तव्यों में से एक (51 क का ज) "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें" आज के लेख का मुख्य विषय है।
भारतीय संविधान ने हम भारतीयों को "रीति-रिवाज, परम्परा और अपने-अपने धर्म को बनाए रखने की स्वतंत्रता दे रखी है।" परन्तु रीति-रिवाज, परम्परा और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा देना समाज और देश के लिए हानिकारक होता है। इसलिए हम भारतीयों का भारत का नागरिक होने के नाते अंधविश्वास को समाज से निकाल फैंकना हमारा मूल कर्तव्य है। परन्तु यह अंधविश्वास क्या होता है ? यह समाज में अपनी जगह कैसे बना लेता है ?

कहा भी जाता है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।"
जहाँ देखकर सीखने का मतलब अपनी समझ विकसित करने के लिए अवलोकन करना है। वहीं देखा-सीखी करने का मतलब आकर्षित होकर, बिना आवश्यकता के या लालच में आकर आवश्यक परिणाम प्राप्त करने के लिए बिना सोचे समझे दूसरों के कार्यों का दोहराव करना है। फलस्वरूप देखकर सीखना एक सर्वोत्तम वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि देखा-सीखी करना अंधविश्वास की पहचान है। क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो यह जरुरी नहीं है। इसलिए लोगों को देखकर सीखने की आवश्यकता है न कि देखा-सीखी करने की आवश्यकता है।
एक उदाहरण के तौर पर अधिक भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। खाली पेट में भी दर्द होता है। ख़राब भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। और कमर कसी होने पर भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। अब आप स्वयं सोचें, किसी और की पेट दर्द की दवा यदि आप खाएंगे, तो क्या आपका पेट दर्द मिट जाएगा ? संभव है, यदि दोनों के पेट दर्द का कारण एक ही हो। अन्यथा स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
अंधविश्वास उस अंधकार के समान है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रूपी प्रकाश की उपस्थिति में अपना अस्तित्व खो देता है। अंधविश्वास और अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधविश्वास और अंधकार दोनों व्यक्ति, समाज और देश में अपना नकारात्मक प्रभाव दर्शाते हैं।
अंधविश्वास न सिर्फ विकास के कार्य करने में बाधा उत्पन्न करता है बल्कि वह मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बनाता है। हमारी सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट करता है और सहजता के प्रति हमें कट्टर बनाता है। अंधविश्वास उस नशे के समान है जिसके बुरे प्रभाव को सभी जानते हैं। परन्तु उसकी लत लग जाने के बाद उसके बारे में बात करना या उबरने का प्रयास करना भी लोगों को चिड़चिड़ा बना देता है। फलस्वरूप लोग अपने कार्यों के प्रति कट्टर होने लगते हैं।
अधिकतर देखने को मिलता है कि "पढ़े-लिखे और तकनीकी ज्ञान रखने वाले लोग भी अंधविश्वासी होते हैं ?" लोगों का प्रश्न होता है कि ऐसा कैसे संभव है ? वास्तव में विज्ञान का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता है और न ही तकनीकी ज्ञान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई संबंध होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है। इसलिए विज्ञान और तकनीकी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंधविश्वासी होता है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी होती है। फिर भले ही वह कितनी भी पुस्तकें क्यों न पढ़ ले। मोबाइल, कंप्यूटर और वाई-फाई जैसी सुविधाओं का क्यों न उपयोग करता हो। परन्तु ऐसे लोग समाज और देश की उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। अंधविश्वासी होते हैं। इसलिए विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है।

चित्रकार : Rob Gonsalves
अंधविश्वास का सीधा सा अर्थ है बिना जांचे-परखे स्वीकारना और उस पर विश्वास करना। यदि आप रीति-रिवाज, परम्परा, संस्कृति और धर्म के नाम पर ऐसे कार्य करते हैं जिनको करने का कारण आपको नहीं पता है तो ऐसे कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं। कारण जानते हुए भी यदि वे कार्य आवश्यक परिणाम नहीं देते हैं फिर भी उन कार्यों को करते रहना, अंधविश्वास है।

इस आधार पर अंधविश्वास दो प्रकार के होते हैं। पहला वह अंधविश्वास जो विकास के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। और दूसरा वह अंधविश्वास जो दूसरों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने की चेष्टा करता है। अर्थात् यदि आप दूसरों के रीति-रिवाज, परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक कार्यों को अंधविश्वास कहकर बाधा पहुँचाने की चेष्टा करते हैं और उन कार्यों को करने या उनको अंधविश्वास कहने का कारण आपको नहीं पता है ? तो आप स्वयं अंधविश्वासी है। क्योंकि बिना सोचे समझे दूसरों का समर्थन करना भी अंधविश्वास कहलाता है। भले ही आप अच्छाई के पक्ष में क्यों न हों ! परन्तु आने वाला समय आपके इस अंधविश्वास के कारण समाज के लिए घातक होता है। इसी कारण के चलते बहुत सी परम्पराएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आने लगी हैं। पहला वाला अंधविश्वास वर्तमान की बुराई कहलाता है। जबकि दूसरा वाला अंधविश्वास भविष्य की बुराई के लिए साधन बनता है।

अभी कुछ दिन पूर्व "राष्ट्रीय विज्ञान दिवस" के दिन मित्रों और पाठकों के साथ अंधविश्वास को लेकर बहुत लंबी चर्चा हुई। जिनमें से कुछ मित्रों का मानना था कि कभी-कभी परिवार में अंधविश्वास को लेकर मनमुटाव हो जाता है। हमने पूछा कि "आप तो उसी परिवार के सदस्य हो फिर आपको यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ कि आपके परिवार के लोग अंधविश्वासी है ? और आप अंधविश्वासी नहीं हो ?" इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं था। हालाँकि उन्होंने शिक्षा को कारण बताया था। परन्तु फिर अपनी ही बात से पलट गए कि "शिक्षित लोग भी तो अंधविश्वासी होते हैं।" चर्चा के दौरान एक और कारण सामने आया था "हमें तुलना करने पर समझ में आने लगता है कि हम जो परिणाम चाह रहे हैं वो हमें हासिल नहीं हो रहा है।" अर्थात हम गलत रास्ते पर हैं। इसी कारण से हमें लगता है कि परिवार वाले अंधविश्वासी हैं।
हमारा दूसरा प्रश्न था कि क्या उनकी सोच में परिवर्तन संभव है ? क्या आपने इस दिशा में प्रयास किया है ? उनका उत्तर था कि हाँ, हमने प्रयास किया है। परन्तु हमें नहीं लगता है कि उनकी सोच में परिवर्तन करना संभव है।
आज हम नौजवान यदि अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज भी उठाते हैं तो जरुरी है कि हम बड़े-बुजुर्गों के सामने ससम्मान तर्क रखें। जो अकाट्य होने चाहिए। जो स्पष्ट होने चाहिए। जिनके द्वारा अंधविश्वास दूर होना चाहिए। विषय के विस्तार के लिए हमारे पास उदाहरण होने चाहिए। सम्बंधित घटना के बारे में स्वयं का कुछ अनुभव होना चाहिए। यदि हम सामने वाले के अंधविश्वास को दूर करने में समर्थ नहीं हैं, तो हम स्वयं अंधविश्वासी हैं। आप अपनी बात सामने वाले को नहीं समझा पा रहे हो तो आप समझदार नहीं हो, नसमझ हो। यदि आप सामने वाले को भ्रमित कहते हो तो उसके भ्रम को दूर करना हमारा कर्तव्य है। उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रेरित सीख देने की आवश्यकता है। ठीक उसी प्रकार से समझाने की आवश्यकता है। जिस कारण के रहते आपको यह आभास हुआ था कि आपके परिवार के लोग भ्रमित है या अंधविश्वासी है। यदि आप उसी तरह से समझाएंगे तो निश्चित ही वे समझेंगे। परन्तु यदि आप उनको नहीं समझा पा रहे हैं, तो सम्भव है कि आप ही अंधविश्वासी हैं।

अंधविश्वास का एक कारण भय माना जाता है। परन्तु यह भय अंधविश्वास और प्रयोग दोनों की निशानी है। यदि भय या किसी आशंका के रहते आपको कार्य करने में बाधा होती है। तो यह अंधविश्वास है। परन्तु यदि भय या आशंका के रहते आप कार्य करते हैं। तो आपका कार्य प्रयोग कहलाता है। इन्ही कार्यों के चलते हम मनुष्यों ने वर्तमान विकास को प्राप्त किया है। अपनी समझ को विकसित किया है। एक खोजी और विवेकपूर्ण (सजग) व्यक्ति को दो तरह के भय से जीतना होता है। पहला प्रयोग के परिणाम क्या होंगे, उसकी आशंका को लेकर और दूसरा समाज पर ऊँगली उठाने के कारण समाज की प्रतिक्रिया को लेकर भय रहता है। परन्तु हमें इस भय का सामना करना ही पड़ता है।

इस भय का एक उदाहरण यह भी है कि जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की अच्छाई बताता है। तब हम उसकी बात पर भरोसा नहीं करते हैं। दूसरे की अच्छाई को हमेशा संदेह की नज़रों से देखते हैं और वहीं जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की बुराई बताता है। तब तो हम उसकी बात पर फ़ौरन यकीन कर लेते हैं। क्योंकि हम बुराई को परखना भी नहीं चाहते हैं। कहीं उस बुराई ने हमें घेर लिया तो ! परखते समय हमारा कोई नुकसान हो गया तो ! जबकि अच्छाई से हमें कोई डर नहीं लगता है, हम अपना काम निकालने की सीमा को जानने के लिए उस अच्छे व्यक्ति को परखना चाहते हैं। इस तरह का भेदभाव भी अंधविश्वास कहलाता है। यह भेदभाव करना हमें किसी ने नहीं सिखाया है। बल्कि हम इसी तरह से सीखते आए हैं। अपनी सोच-समझ विकसित करते आए हैं। फिर भी यह एक अंधविश्वास है।

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विज्ञान उद्देशिका पर विस्तृत लेख

उद्देशिका के बारे में : विज्ञान उद्देशिका, भारतीय संविधान की उद्देशिका से प्रभावित होकर लिखी गई उद्देशिका है। यह न केवल हमें विज्ञान और तकनीक के सहयोग से प्राप्त होने वाले सामाजिक स्तर के बारे में जानकारी देती है। बल्कि वह हमारे लिए उस सामाजिक स्तर को प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त भी करती है। साधारण शब्दों में विज्ञान उद्देशिका वैज्ञानिकों के कार्य करने के तरीके से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विधियों तथा विज्ञान और तकनीक को परिभाषित करने के बारे में जानकारी देती है।

विज्ञान उद्देशिका और संविधान की उद्देशिका में मुख्य रूप से यह अंतर है कि विज्ञान उद्देशिका हमें उन अंतर्निहित उद्देश्यों के बारे में जानकारी देती है, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला एक व्यक्ति, वैज्ञानिक और आविष्कारक अपने कार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान के लिए हासिल करना चाहता है। इसलिए विज्ञान उद्देशिका को आत्मसात करने वालों की न ही कोई एक स्पष्ट सीमा है और न ही आत्मसात करने की कोई एक निश्चित दिनांक है। जबकि संविधान और उसकी उद्देशिका हम भारतीयों के लिए हम भारतीयों (संविधान सभा) द्वारा 26 नवम्बर 1949 ई. को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित की गई थी।

विज्ञान उद्देशिका को लिखने का मुख्य उद्देश्य समस्त मानव जाति के हित और विकास के लिए, लोगों के मन में एक ऐसे विश्वस्तरीय आदर्श समाज का स्पष्ट चित्रण कराना है। जो न केवल हम मनुष्यों के लक्ष्य, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करता है। बल्कि हम मनुष्यों के द्वारा जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से व्यवहार में हासिल भी किया जा सकता है।


उद्देशिका में सम्मिलित पारिभाषिक शब्दावली
1. विज्ञान : खोज करने की पद्धति को विज्ञान कहते हैं।
2. तकनीक : विज्ञान को उपयोग में लाने की प्रक्रिया को तकनीक कहते हैं।

उद्देशिका द्वारा आदर्श समाज का चित्रण :
1. समस्त मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
2. वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज सदैव करते रहना चाहिए।
3. नए और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
4. शिक्षा और दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।
5. हम मनुष्यों को आपसी समझ विकसित करने के लिए हरदम प्रयास करते रहना चाहिए।

वैज्ञानिक कार्यशैली का वर्णन :
1. समस्या का समाधान ढूँढना समस्या को परिभाषित करते ही सरल हो जाता है।
2. समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है।
3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रमाणित ज्ञान को ही स्वीकार करने की बात कहता है।
4. प्रमाणित ज्ञान, जब एक से अधिक विधियों या एक से अधिक बार के प्रयोगों (आंकड़ों) पर आधारित होता है, तब वह ज्ञान समाज में स्वीकारने योग्य होता है।
5. जब सभी प्रयोग और प्रमाण के लिए उपयोग में लाई गईं सभी विधियाँ एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं, तब उस प्रमाणित ज्ञान की विश्वसनीयता समाज में और अधिक बढ़ जाती है।

विज्ञान के विकास के लिए वर्णित अपेक्षाएं : 
1. ज्ञान के यथार्थ को जानने का प्रयास होते रहना चाहिए।
2. खोजे हुए ज्ञान को आपस में साझा करना चाहिए।
3. प्रायोगिक निष्कर्ष में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं करना चाहिए।

विज्ञान उद्देशिका का विस्तार

"हम, मानव जाति के सदस्य" अर्थात विज्ञान हम मनुष्यों के लिए है। न ही वनस्पति जगत और न ही शेष जंतु जगत विज्ञान का उपयोग करता है।

"विज्ञान को एक विषय के रूप में" अर्थात विज्ञान के बारे में चर्चा की जाती है। असमंजस की स्थिति में उसकी विधियों और खोजों के विषय में प्रश्न उठाए जा सकते हैं। विज्ञान में प्रश्न उठाने को लेकर समय, वर्ग और उम्र की कोई प्रतिबद्धता (सीमा) नहीं है।

"विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग" अर्थात विज्ञान एक (खोज) पद्धति है। भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती हैं।

"विज्ञान एक (खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक) विषय के रूप में विकसित" अर्थात विज्ञान खोजने, ज्ञान में वृद्धि करने, निर्णय लेने तथा भविष्य को प्रभावित और निर्मित करने में मानव जाति के लिए उपयोगी और सहयोगी सिद्ध होता है। विज्ञान के प्रभावी होने के लिए जरुरी है कि विज्ञान में निर्णायक एकरूपता की उपस्थिति होनी चाहिए। इसीलिए विज्ञान की प्रकृति ज्ञान को सतत हासिल करने तथा उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करने के बाद उसे संचित करने की होती है।



"विज्ञान का उपयोग समस्त मानव जाति के हित में हो" अर्थात चूँकि विज्ञान के अनुप्रयोग से विज्ञान की उपयोगिता निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान और मानव में तकनीकी ज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में चरघातांकी विकास संभव हो पाता है। परन्तु विज्ञान की यह उपयोगिता मानव जाति के लिए अभिशाप न बन जाए, इसके लिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा दी जानी चाहिए। ताकि तकनीकी ज्ञान के प्रति मानव जाति की समझ विकसित हो सके। क्योंकि बिना विज्ञान की समझ के तकनीकी ज्ञान का उपयोग और प्रौद्योगिकी पर पूर्ण निर्भरता मानव जाति के लिए अभिशाप है। मानव जाति के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए "व्यापक दृष्टि और दूरदृष्टि" दोनों की सतत आवश्यकता है।

"वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज और उनका नि:संकोच उपयोग" अर्थात भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक ही विधि या प्रक्रिया के उपयोग से एक समान परिणाम प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसके अलावा निष्कर्ष को लेकर एक मत होना भी मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा वैकल्पिक युक्तियों और वैकल्पिक साधनों की खोज की वकालत करती है। उनके नि:संकोच उपयोग को बढ़ावा देने की बात कहती है। ताकि परीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति अपने-अपने मतों (निष्कर्ष) को प्रमाणित कर सके।

"वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा" अर्थात ऐसी शिक्षा जो मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर के समाधान को पहचानने और उनको परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। ऐसी शिक्षा न केवल हम मनुष्यों के लिए क्या अच्छा-बुरा और सही-गलत है, का ज्ञान कराती है। बल्कि हम मनुष्यों में आपसी समझ विकसित करती है और समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।

"समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों को परिभाषित करने" अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" विज्ञान की इस अभिधारणा को ध्यान में रखकर के समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है। ताकि समस्याओं का समाधान समस्या को परिभाषित करके, मापदंडों की पहचान द्वारा सरलता से ढूंढा जाता है।

"कारण, घटना और उनके प्रभाव" अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा समस्याओं के समाधान के बारे में यह सीख देती है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।" क्योंकि यह जरुरी नहीं है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो। इसलिए कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच अंतर्संबंध स्थापित करना, विज्ञान की प्रमुख उपलब्धि होती है।

"वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से" अर्थात विज्ञान में अस्पष्ट और अपरिभाषित ज्ञान का कोई स्थान नहीं होता है। जिस ज्ञान को हम भौतिक राशियों के रूप में व्यक्त कर सकते हों, जिसे मापा जा सकता हो, जिसको प्रमाणित करने के लिए उस ज्ञान के आधार पर भविष्यवाणियां की जा सकती हों और जिसकी जाँच-पड़ताल करना संभव हो, ऐसा ज्ञान ही विज्ञान में स्वीकारने योग्य होता है।

"एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा" अर्थात जिस ज्ञान को एक से अधिक विधियों द्वारा या स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए, संबंधित प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जाता है। ऐसा ज्ञान विज्ञान में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए समय के साथ इस ज्ञान में सिर्फ संशोधन और विस्तार करने की आवश्यकता होती है।

"समस्त मानव जाति के विकास के लिए" अर्थात विज्ञान का विकास सम्पूर्ण मानव जाति के विकास को निर्धारित करता है। कहने के लिए एक खोज एक वैज्ञानिक या वैज्ञानिकों का समूह करता है। परन्तु उस खोज के उपयोग और उसके प्रभाव से सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की दशा और दिशा निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान मानव जाति के लिए वरदान साबित हो, इसके लिए हमें विज्ञान के विकास से जुड़ी अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।

"ज्ञान के यथार्थ को जानने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए पहली अपेक्षा के अनुसार खोजे गए ज्ञान की यथार्थता और उसकी उपयोगिता को जानने का सतत प्रयास किया जाना चाहिए। क्योंकि विज्ञान में परम ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है। वैज्ञानिकों के मत के अनुसार "विज्ञान के द्वारा हम केवल सत्य अर्थात ज्ञान के नजदीक जा सकते हैं। परन्तु यथार्थ ज्ञान अर्थात अंतिम सत्य कभी भी नहीं जान सकते हैं।" निरंतर ज्ञान की यथार्थता जानने के प्रयास में हम न केवल स्वयं को सत्य के और नजदीक पाते हैं बल्कि हम उस ज्ञान का उपयोग भी कर पाते हैं।

"आपस में साझा करने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए दूसरी अपेक्षा के अनुसार विज्ञान के उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें ज्ञान और उस ज्ञान की उपयोगिता को आपस में साझा करना चाहिए। ताकि मानव जाति के ज्ञान में वृद्धि हो सके। विज्ञान का मुख्य उद्देश्य : प्रणाली अथवा तंत्र को एकरूप में जानने अथवा समझने के लिए उस प्रणाली अथवा तंत्र के ज्ञान को क्रमबद्ध संचित करना।

"प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए तीसरी अपेक्षा के अनुसार प्रयोग के दौरान ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, जो प्रयोगों को प्रभावित कर सकता है तथा प्रयोगों के निष्कर्ष निकालते समय "पूर्वधारणाओं और व्यक्तिगत भावनाओं" को जबरन निष्कर्ष में शामिल नहीं करना चाहिए।

"विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने" अर्थात स्वयं अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से ऐसे समाज का उदाहरण प्रस्तुत करना है। जिसे आदर्श समाज के रूप में व्यव्हार में हासिल किया जा सकता है।

- अज़ीज़ राय

दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाइये

एक बार मुझे एक बहुत-बड़े संत महात्मा जी के प्रवचन सुनने का मौका मिला था। उन्होंने गुरु-शिष्य के सम्बन्ध से अपने प्रवचन की शुरुआत की। प्रवचन को विस्तार देते-देते वे गुरुत्वाकर्षण बल के बारे में बताने लगे। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण शब्द का संधि विच्छेद "गुरु+तत्व+आकर्षण" के रूप में किया। इस तरह से उन्होंने गुरुत्वाकर्षण बल के अर्थ का अनर्थ कर दिया। प्रवचन के दौरान उन्होंने इशारा करते हुए बताया कि यह जानकारी उन्हें उनके शिष्य जो एक माध्यमिक शाला में विज्ञान विषय के शिक्षक हैं, ने बताई है। (मैं उन संत महात्मा जी का परिचय आपको नहीं दे सकता हूँ क्योंकि वे जिस पदवी को धारण किये हुए हैं वह पदवी सबसे बड़ी पदवी मानी जाती है।)

अर्थ का अनर्थ हमेशा दो तरह के इंसान करते हैं।
1. अधूरा ज्ञान रखने वाला इंसान
2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण न रखने वाला इंसान
अज्ञानी व्यक्ति कभी भी समाज का अहित नहीं कर सकता है और न ही वह अर्थ का अनर्थ करता है। इसलिए एक अज्ञानी पुरुष सदैव विद्वान व्यक्ति के समान स्पष्ट सोच रखता है। इसलिए उनकी जिंदगी औरों की तरह ख़ुशी से गुजरती है।

इसलिए कहा भी जाता है, यदि आपको किसी विषय का अधूरा ज्ञान है तो आप उस विषय के बारे में और अधिक जानकारी जुटाइए। तब तक अधूरा ज्ञान रखने वाले इंसान को उस अधूरे ज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए मनाही रहती है। ऐसा करना समाज के लिए हितकारी होता है। (महत्वपूर्ण बिंदु : पूरा ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है, इसलिए अधूरा ज्ञान को स्पष्ट करना हमारी जिम्मेदारी बनती है। अधूरे ज्ञान का अर्थ है किसी विषय, वस्तु या घटना के बारे में अधूरी जानकारी रखना, जिसके अभाव में कभी भी उस विषय, वस्तु या घटना के बारे में स्पष्ट होना असंभव होता है।)

ऐसा क्यों है कि विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अधिक महत्व दिया जाता है ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का क्षेत्र विज्ञान से कहीं अधिक व्यापक होता है। विज्ञान के किसी क्षेत्र में कार्य करने की अपनी कुछ शर्तें होती हैं। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण संगतता के आधार पर फलता-फूलता है। यह हम मनुष्यों के दैनिक जीवन में प्रभाव डालता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण उस प्रकाश के समान है जिसकी अनुपस्थिति में अंधकार रुपी अन्धविश्वास हम मनुष्यों को जकड़ लेता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रत्येक विषय, वस्तु और घटना के बारे में हमारी समझ विकसित करता है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही है जिसके माध्यम से हम न केवल चीजों को परिभाषित करते हैं बल्कि उसके सहयोग से उन चीजों (विषय, वस्तु और घटना) की पहचान करना भी सीखते हैं।

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