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प्रायिकता का खेल

गणित एक भाषा है। जबकि प्रायिकता एक गणितीय अवधारणा है। क्योंकि प्रायिकता का इस व्यवहारिक दुनिया से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। अर्थात प्रायिकता का पूर्ववर्ती घटनाओं के साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता है। इसे आप इस तरह से समझिए, पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है। अर्थात 6 बार में एक बार 2 आना चाहिए। परन्तु व्यव्हार में जरुरी नहीं है कि 6 बार में एक बार भी 2 आए। ऐसा भी हो सकता है कि लगातार पांच बार 2 आ जाए। और ऐसा भी हो सकता है कि पांच बार में 2 नहीं आया है, छटवी बार भी 2 नहीं आए। सीधा सा अर्थ है कि प्रायिकता पूर्ण रूप से एक अनिश्चित अवधारणा है। इस प्रकार गणित भाषा का उपयोग गलत अर्थ भी दे सकता है। वास्तव में पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है, का अर्थ यह नहीं होता है कि 6 बार में एक बार 2 आएगा। पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है, का अर्थ यह होता है कि प्रत्येक बार पाँसे को उछालने पर 2 आने की सम्भावना 1/6 अर्थात 16 % होती है। याद रहे प्रत्येक बार पाँसे को उछालने पर प्रायिकता एक समान होती है। प्रायिकता के 50 प्रतिशत से अधिक होने के बाद भी कोई भी गणितज्ञ प्रायिकता के आधार पर जीतने की निश्चितता को लेकर शर्त नहीं लगाता है। क्योंकि वह जानता है कि प्रायिकता पूर्ण रूप से एक अनिश्चित अवधारणा है। इसका एक उदाहरण आप इस लेख में पढ़ सकते हैं।

ताश में : प्रायिकता से अधिक बड़ी पत्ती को महत्व दिया जाता है
सिक्के को उछालकर शर्त लगाना प्रायिकता पर आधारित खेल है। क्योंकि चित (Heads) या पट (Tails) आने की प्रायिकता बराबर अर्थात 50-50 प्रतिशत होती है। पाँसे को उछालकर सम (2,4,6) या विषम (1,3,5) आने पर शर्त लगाना भी प्रायिकता पर आधारित खेल है। अर्थात वे सभी खेल जिसमें दोनों पक्ष या सभी पक्ष के पास जीतने की संभावना बराबर होती है। प्रायिकता पर आधारित खेल कहलाते हैं। यदि पाँसे को उछालकर एक पक्ष 2 आने की संभावना पर शर्त लगाता है और दूसरा पक्ष 2 नहीं आने की संभावना पर शर्त लगाता है। तो ऐसे खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं कहेंगे। क्योंकि 2 न आने की प्रायिकता (84%) 2 आने की प्रायिकता (16 %) से पांच गुनी होती है। अर्थात दोनों या सभी पक्ष के जीतने की संभावना बराबर नहीं है। इसलिए ऐसे खेल प्रायिकता आधारित खेल नहीं कहलाते हैं।

अनिश्चित अवधारणा के रहते लगातार सातवीं जीत
ताश का खेल भी कई कारणों से प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं है। वो बात अलग है कि हम ताश के खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल मानते हैं। निम्न कारणों से ताश का खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं है।
  1. ताश को बांटने का तरीका
  2. ताश के खेल में सभी पत्ती संख्या के आधार पर एक दूसरे से बड़ी होती हैं। इसलिए खेल में बड़ी पत्ती को अधिक महत्व दिया जाता है। न कि सिर्फ कम प्रायिकता (विशेष संयोग) को महत्व दिया जाता है। उदाहरण के लिए सत्ता (7), छक्का (6) से बड़ी पत्ती होती है।
  3. फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता से कम होती है। जबकि खेल में त्रिल आने को अधिक महत्व दिया जाता है।
  4. इक्का, दुप्पी और बादशाह को रन नहीं गिना जाता है। जबकि इक्का, बेगम और बादशाह को रन (विशेष संयोग) गिना जाता है।
  5. यदि दो खिलाड़ी के पास एक समान संख्या की पत्ती आ जाती हैं तो पत्ती शो कराने वाला खिलाड़ी हारा माना जाता है।
ताश के द्वारा हम अनेक खेल खेलते हैं। उनमें से जिन खेलों में ये पांच में से कोई भी एक कारण होता है तो वह खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं माना जा सकता है। आइये इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

1. ताश के जिस खेल में दो या दो से अधिक खिलाड़ी खेल रहे हों तथा ताश की एक-एक पत्ती सभी खिलाड़ियों को या एक-एक खिलाड़ी को बराबर पत्ती बांटी जाती है। तो वह खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं रह जाता है। इसे आप इस तरह से समझिए। हम ताश की पत्ती को दो तरह से बाँट सकते हैं। पहला : सभी खिलाडियों को एक-एक करके पत्ती बाँटना। दूसरा : प्रत्येक खिलाड़ी को एक ही बार में बराबर-बराबर पत्ती बाँटना। परन्तु जब हम किसी भी तरह से दो या दो से अधिक लोगों के बीच में पत्ती को बाटंते हैं तो वह खेल हमारे लिए प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं रह जाता है। क्योंकि तब विशेष संयोग अर्थात फ़्लैश, त्रिल, रन, कलर या डबल आने की प्रायिकता ज्ञात नहीं की जा सकती है। तब हमें यह ज्ञात नहीं हो सकता है कि विशेष संयोग के लिए आवश्यक पत्ती बांटी जा चुकी है या नहीं !! अनिश्चितता के कारण संभावित यथार्थ (प्रायिकता) को जानना नामुमकिन होता है। इसलिए यह प्रायिकता पर आधारित खेल न होने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। विस्तार से समझने के लिए इस लेख का उदाहरण न 1 पढ़े। विशेष संयोग बन पाने के लिए आवश्यक पत्ती का ज्ञान अनिश्चितता (पत्ती बांटी जा चुकी है या नहीं) द्वारा नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए हम इस खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं कहते हैं। भले ही सभी खिलाड़ियों के साथ एक बराबर की अनिश्चितता बनी रहती है।

1 ले, 2 रे, 6 वे. और 7 वे. दाव की तस्वीर : प्रायिकता का असमान वितरण । 7 वे. दाव में रन (A/Q/K) का दोहराव

2. फ़्लैश, त्रिल, रन, कलर या डबल आने की प्रायिकता क्रमशः एक दूसरे से अधिक होती है। साथ ही ताश की पत्ती बांटने के तरीके के आधार पर प्रायिकता परिवर्तित होती है। परन्तु क्रम यही रहता है। खेल में जितनी कम प्रायिकता उस संयोग के निर्मित होने को उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। अर्थात यदि किसी के पास त्रिल बन गया और किसी के पास डबल तो चूँकि त्रिल बनने की प्रायिकता डबल से कम होती है। इसलिए जिसके पास त्रिल बना है विजयी कहलाएगा। मतलब की प्रायिकता महत्वपूर्ण होती है। फिर चाहे त्रिल इक्का (1) की बने या दहला (10) की। परन्तु खेल में संख्या के आधार पर पत्ती एक दूसरे से बड़ी मानी जाती है। इस आधार के कारण खेल प्रायिकता पर आधारित न होकर संभावना पर आधारित हो जाता है।

3. एक-एक करके ताश की पत्ती बांटने पर फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता से अधिक होती है। जबकि प्रत्येक खिलाड़ी को एक ही बार में बराबर-बराबर पत्ती बाँटने पर फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता के बराबर होती है। सीधा सा अर्थ है खेल में फ़्लैश को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए था। परन्तु खेल में त्रिल आने को अधिक महत्व दिया जाता है। इसलिए यह शर्त भी उस खेल के प्रायिकता पर आधारित होने का खंडन करती है।

4. संख्या के आधार क्रमशः तीन पत्ती के संयोग को रन कहा जाता है। परन्तु खेल में इक्का, दुप्पी और बादशाह को रन के अंतर्गत नहीं रखा जाता है। जिससे कि रन के एक विशेष संयोग बनने की संभावना कम हो जाती है। अर्थात खेल में प्रायिकता को अधिक महत्व न देकर बड़ी पत्ती को अधिक महत्व दिया जाता है। जिसके अंतर्गत इक्का (1) को सबसे बड़ी पत्ती माना जाता है।

5. इसके अलावा यदि किन्ही दो खिलाडियों के पास एक समान पत्ती है। तब तो खेल में हार-जीत का फैसला असंभव होना चाहिए था। अर्थात स्पष्ट निर्णय के आभाव में खेल को पुनः खेला जाना चाहिए था। परन्तु खेल में हार-जीत का फैसला पत्ती को शो करने वाले पर निर्भर करता है। अर्थात जो पत्ती शो करता है। वह व्यक्ति हारा हुआ मान लिया जाता है। क्योंकि ऐसा मान लिया जाता है कि उसे अपनी जीत पर विश्वास ही नहीं था।

प्रायिकता के आधार पर किसी को नहीं जीतना चाहिए था।
प्रायिकता भले ही एक अनिश्चित अवधारणा है। इसके बाद भी वह विज्ञान में सहायक है। क्योंकि प्रायिकता में घटनाओं की संभावनाओं की सीमा की निश्चितता होती है। अर्थात प्रायिकता ज्ञात करने में यादृच्छिक (Random) घटनाओं के परिणामों का एक समष्टि समुच्चय बनाया जाता है। इसमें विज्ञान की दो विशेषताएं/गुण शामिल होते हैं। पहला : यादृच्छिक आंकड़े इकट्ठे किये जाते हैं। और दूसरा : घटनाओं का समष्टि अध्ययन किया जाता है। इन विशेषताओं/गुणों के रहते प्रायिकता विज्ञान में उपयोगी है। वर्तमान में प्रायिकता का उपयोग क्वांटम जगत के रहस्यों को सुलझाने में किया जा रहा है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने पहले शोध ऊर्जाणुवाद के रूप में कण और तरंग सिद्धांत का एकीकरण करके क्वांटम भौतिकी की नींव रखी थी। परन्तु सर अल्बर्ट आइंस्टीन क्वांटम भौतिकी को विज्ञान नहीं मानते थे। भले उन्होंने ही क्वांटम भौतिकी की नींव रखी थी। वे अपने अंतिम दिनों तक क्वांटम भौतिकी को विज्ञान मानने से इंकार करते रहे। क्योंकि प्रायिकता पर आधारित क्वांटम सिद्धांत तब तक अपेक्षाकृत अधूरा ही था।

गणित का भाषायी निरूपण

भाषा कभी भी खोज का माध्यम नही होती है। परन्तु खोज की अभिव्यक्ति का माध्यम अवश्य होती है। खोज के प्रचार-प्रसार का माध्यम होती है। इसलिए विज्ञान के प्रचार-प्रसार के लिए आवश्यक है "हम ऐसे शब्दों का उपयोग कदापि न करें। जो अस्पष्ट और अपरिभाषित होते हैं।" साथ ही ऐसे शब्दों का उपयोग करना चाहिए, जो हमारे या वैज्ञानिकों के कहने या उनके कार्यों (खोज) के अर्थ को स्पष्ट करते हैं।

गणित न केवल प्रकृति/भौतिकी की भाषा है बल्कि वह विज्ञान की भी भाषा है। जिसके उपयोग से तकनीक विकसित की जाती है। क्योंकि यह भाषा मानव और प्रकृति के बीच संवाद का माध्यम बनती है। प्रकृति के रहस्यों को जानने और उस ज्ञान के उपयोग से तकनीक विकसित करने में हमारी मदद करती है। इसलिए गणित, विज्ञान का एक सहायक विषय भी है। परन्तु भाषा के रूप में गणित हिंदी, अंग्रेजी, स्पेनिस, जर्मन, बंगाली आदि अन्य भाषाओँ से बिलकुल अलग है। क्योंकि इस भाषा का उपयोग सूत्र और समीकरण के रूप में किया जाता है। अर्थात गणित के माध्यम से किसके बारे में चर्चा की जा रही है ? इस बारे में जानना असंभव होता है। दो और दो मिलकर चार हो गए। परन्तु वे पुरुष थे या स्त्री ? जानवर थे या पक्षी ? सजीव थे या निर्जीव ? गणित भाषा में क्या कहा गया है ? यह जानना तब तक असंभव है जब तक सुनने, पढ़ने या देखने वाले को चर्चा का विषय ज्ञात नहीं हो जाता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि गणित भाषा में कही गई बातें संदिग्ध होती हैं। उनका स्पष्ट अर्थ नहीं निकलता है। बल्कि गणित भाषा में कही गई बातें स्पष्ट और यथार्थ (कुछ परिस्थितियों में नजदीक अर्थ वाली) होती हैं। फलस्वरूप यह भाषा आम लोगों की बोलचाल में नहीं बोली जाती है।
भाषाविदों के द्वारा कहा भी जाता है कि "जो भाषा जितनी अधिक सरल और आम लोगों के द्वारा बोली या लिखी जाती है। उस भाषा में कही गई बातों के उतने ही अधिक अर्थ निकलते हैं।" जिसके कारण उस भाषा में कही गई बातों की संदिग्धता की संभावना बढ़ जाती है। गणित के साथ भी यही हुआ है। इसलिए गणित आम बोलचाल की भाषा नहीं है।

गणित, विज्ञान नहीं है ! क्योंकि यह न ही खोज का माध्यम है और यह न ही खोज की एक विधि है। परन्तु भाषा के रूप में गणित खोज का कारण अवश्य हो सकती है। अर्थात भाषा के रूप में गणित का उपयोग दूसरों की खोज पर प्रश्न चिन्ह लगा सकता है। शंका उत्पन्न कर सकता है। उनकी खोज की गलती या कमी को उजागर कर सकता है। उदाहरण के लिए सर स्टीफेन हाकिंग ने विलक्षण स्थिति के गणितीय मॉडल की कमी द्वारा श्याम विवर (Black Hole) की खोज की थी। परन्तु गणित खोज का माध्यम नहीं हो सकता है। जो लोग गणित को विज्ञान कहते हैं। उसे खोज का साधन मानते हैं। उन्हें इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए कि "क्या गणित हमारे प्रश्नों के उत्तर दे सकता है ?" इस प्रश्न का उत्तर है नहीं। यदि गणित हमारे प्रश्नों के उत्तर देने में सक्षम होता। तो गणित अवश्य ही विज्ञान कहलाता। क्योंकि तब गणित खोज का माध्यम/साधन कहलाता। परन्तु गणित कभी भी हमारे प्रश्नों का उत्तर नहीं देता है। वह हमारी समस्याओं को सरल/हल (Solve) करता है। मूर्त को अमूर्त और अमूर्त को मूर्त रूप देने में सहायक होता है। इस प्रकार से गणित भाषा के रूप में हमारी खोज को अभिव्यक्त करता है। वो बात अलग है कि गणित विषय को विज्ञान संकाय के अंतर्गत रखा जाता है। परन्तु गणित न ही विज्ञान है और न ही कला है।
यह सच्चाई है कि कोई भी गणितज्ञ, जब तक वह थोडा-बहुत कवि न हो, एक परिपूर्ण गणितज्ञ कदापि नहीं हो सकता।
- कार्ल वायरस्ट्रास (1815-97 ई.)
गणित सहायक विषय के रूप में :
1. गणित का किसी न किसी रूप में निश्चितता और यथार्थता के साथ संबंध होता है। यह यथार्थता हमेशा वैज्ञानिक पद्धति को लेकर होती है।
2. गणित के द्वारा चीजों को परिभाषित किया जाता है। ताकि आंकिक मान और चित्रात्मक रूपों की पहचान समानता और असमानता के आधार पर की जा सके।
3. गणित के द्वारा मूर्त को अमूर्त तथा अमूर्त को मूर्त रूप दिया जा सकता है। इस विशेषता के रहते ज्ञान का तकनीकी उपयोग करना संभव होता है। और इस तरह से सैद्धांतिक प्रकरण का व्यवहारिक प्रकरण के साथ संबंध स्थापित होता है।

गणित के प्रश्नों के हल का वर्गीकरण तीन प्रकार का होता है।
1. जो हल यथार्थ मान के रूप में ज्ञात होता है।
2. जो हल संभावित मान के रूप में ज्ञात होते हैं। इसलिए इन प्रश्नों के हल दो या दो से अधिक मान को लिए हुए होते हैं। जिनमें से कोई एक मान यथार्थ होता है।
3. इन प्रश्नों के हल सदैव यथार्थ मान के नजदीक होते हैं। इसलिए इन प्रश्नों के अनेक हल ज्ञात किये जा सकते हैं। परन्तु इन प्रश्नों की यथार्थता कभी भी ज्ञात नहीं की जा सकती है।
संख्याएँ कभी भी किसी वास्तविक स्थूल वस्तु को नहीं दर्शाती हैं। वे तो बस चिन्ह के रूप में होती हैं, जो चेतना से रहित शून्य में किसी जटिल पहेली के अलग-अलग हो गए टुकड़ों की भाँति तैरती रहती हैं। उनमें से किन-किन (चिन्हों) को एक साथ रखना ज़रूरी है ? यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी समस्याओं की शर्तें क्या मांग कर रही हैं ? उन मांगों की पूर्ति करके समस्याओं की पहेली को एक नया अर्थ दे दिया जाता है। जिससे समस्या का समाधान तो नहीं होता है परन्तु समस्या सरल हो जाती है। समस्या को नए अर्थ के साथ समझना आसान हो जाता है। तत्पश्चात हम प्रतिरूप या प्रतिमान द्वारा परिभाषित कारणों, घटकों या उनके प्रभावों की खोज कर पाते हैं। इस प्रकार गणित विज्ञान को सहायता प्रदान करता है।
ज्ञान के यथार्थ को खोजने को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान में कल्पनाओं का कोई स्थान नहीं होता है। परन्तु गणित में कल्पनाओं की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इन कल्पनाओं के द्वारा वास्तविक दुनिया के रहस्य को उजागर किया जा सकता है। क्योंकि गणित की शुरुआत कहीं से भी "माना" या काल्पनिक तथ्यों के द्वारा भी की जा सकती है। गणित में शुरुआत को लेकर कोई भी बाध्यता नहीं होती है। परन्तु विज्ञान एक पद्धति है इस कारण विज्ञान में ज्ञात ज्ञान (सिद्धांत, नियम, तथ्य या जानकारी) के द्वारा अज्ञात को खोजने का प्रयास किया जाता है। विज्ञान की अपनी कुछ सीमाएं हैं। जिस प्रकार भाषा के द्वारा काल्पनिक और वास्तविक दोनों प्रकार की दुनिया को अभिव्यक्त किया जा सकता है। उसी प्रकार गणित के द्वारा काल्पनिक और वास्तविक दोनों प्रकार की दुनिया की रचना की जा सकती है। परन्तु इन दोनों दुनिया में कहीं भी असंगतता का अस्तित्व देखने को नहीं मिलता है। इसलिए गणित में विज्ञान और कला दोनों के गुण पाए जाते हैं। गणित को सिर्फ विज्ञान या कला कह देना अनुचित है। गणित एक उच्च्स्तरीय भाषा है जिसका उपयोग सही अर्थ के साथ तब हो सकता है। जब चर्चा का विषय कहने और सुनने वाले दोनों को पता होता है।

गणित, विज्ञान नहीं है क्यों ?
1. शुरुआत को लेकर किसी भी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं होती है। अर्थात गणित वास्तविक दुनिया से अलग काल्पनिक दुनिया के बारे में भी हो सकता है। जबकि विज्ञान में विधि या प्रक्रिया को लेकर भले ही बाध्यता नहीं होती है। परन्तु शुरुआत को लेकर विज्ञान में दो प्रकार की बाध्यता होती है।
2. दिशा को लेकर भी किसी भी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं होती है। जबकि विज्ञान में भले ही विधि या प्रक्रिया के चुनाव को लेकर बाध्यता नहीं होती है। परन्तु चुनाव के बाद विज्ञान में दिशा की बाध्यता निर्मित हो जाती है।
3. मूर्त को अमूर्त रूप देने के बाद गणित में आकार को लेकर भी बाध्यता नहीं होती है। इसे सूत्रीकरण कहा जाता है। जबकि विज्ञान में आकार को लेकर हमेशा बाध्यता होती है। उदाहरण : जब हम घटना या भौतिकता का गणितीय निरूपण करते हैं तो उसे समीकरण कहते हैं। इसमें आकार (विशेष मान) को लेकर बाध्यता होती है। यदि विज्ञान में यह बाध्यता नहीं होती तो हमें नई-नई तकनीक विकसित करने की आवश्यकता नहीं होती।

स्ट्रिंग सिद्धांत एक गणितीय अवधारणा है। जो ब्रह्माण्ड के संभावित निदर्श के बारे में दी गई अवधारणा है। जिसकी वास्तविकता अभी खोजा जाना बांकी है। इसे हम कल्पना कह सकते हैं। विज्ञान के पिछले 100 वर्ष के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं। जब गणितीय समीकरणों को सिद्धांतों के निष्कर्ष के अनुसार बाद में परिवर्तित किया गया था। क्योंकि गणित का उपयोग भाषा के रूप में वैज्ञानिकों की खोजों को अभिव्यक्त करने में किया जाता रहा है।

प्रकृति का गणितीय निरूपण

गणित का निम्न रूप से प्रकृति और मनुष्यों द्वारा भाषा के रूप में उपयोग किया जाता है।

  1. गणित अंकों के निश्चित क्रमों के द्वारा प्रकृति की सुंदरता को गणितीय प्रतिमानों के रूप में अभिव्यक्त करता है। अर्थात भौतिकता के रूपों की सुंदरता को गणित के माध्यम से समझा जाता है। तभी तो कहा गया है कि प्रकृति (Nature) का गणित ही गणित का स्वाभाव (Nature) है। यह गणित का गणना करने का गुण है।
  2. गतिशील पदार्थों (सामान्य उदाहरण : तूफ़ान) के प्रारब्ध से लेकर के उसकी नियति तथा उसके प्रभाव को निर्धारित करने में गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का भौतिकीय परिवर्तनों को समझने का गुण है।
  3. छोटे से छोटे अंतर और परिवर्तन की पहचान करने में गणित का उपयोग किया जाता है। ताकि भविष्य में होने वाले बड़े से बड़े प्रभावों को समझा जा सके। यह गणित का भविष्यवाणी करने का गुण है।
  4. दूसरे आयामों में भौतिकता के छुपे हुए रूपों की संभावना को व्यक्त करने में गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का दार्शनिक गुण है। उदाहरण : डूबे ग्लैशियर की यथार्थता को जानने में
  5. जिन स्थानों में भौतिकता के (किसी एक) रूपों के शक्तिशाली प्रभावों के चलते जाना असंभव होता है। उन स्थानों की वास्तविकता को समझने के लिए गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का रहस्यवादी गुण है। उदाहरण के लिए सूर्य और श्याम विवर जैसे खगोलीय पिंडों के वातावरण के रहस्य को सुलझाने में गणित का उपयोग किया जाता है।
  6. उपकरणों की संयोजकता के लिए जाल-तंत्र (Network) की रचना में गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का सम्बन्ध संयोजक गुण है।
  7. भौतिकता के एक समान रूपों और घटनाओं की पहचान करने में गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का विषमता की पहचान करने का गुण है। जो प्रायिकता के द्वारा संभव हो पाता है।
  8. गणित उपकरणों और मशीनों की पूरी क्रिया प्रणाली को न्यूनतम छति को ध्यान में रखकर के रूप रेखा तैयार करता है। तथा तकनीकी ज्ञान को मूर्त रूप देने में सहयोगी होता है। जिससे कि मशीनें सुचारू रूप से चलायमान हो सकें। यह गणित के यांत्रिकीय गुण के कारण संभव हो पाता है।
  9. डी.एन.ए. की संरचना को समझने से लेकर के दवाइयों के निर्माण तक गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का जीवनदायिनी गुण है। गणित भाषा के रूप में न केवल मनुष्यों द्वारा बल्कि प्रकृति के द्वारा भी बोली जाती है। जिसके फलस्वरूप मेरे और आपके शरीर का निर्माण (गुणसूत्रों द्वारा) संभव हो पाया है।
  10. सुरक्षा की दृष्टी से कूटशब्दों के निर्माण और उसके कूटवाचन में गणित का उपयोग किया जाता है। यह गणित का मशीनी गुण है। जिसके कारण एक संगणक (Computer) सुचारू रूप से कार्य कर पाता है।
  11. ऊर्जा के संसाधनों का उपयोग तरंगों के माध्यम से ऊर्जा निर्मित करने में और तत्पश्चात उसी ऊर्जा को नियंत्रित करके उसका उपयोग तरंगों के रूप में संचार करने में किया जाता है। यह गणित का व्यवहारिक गुण है।
  12. यह गणित का सबसे व्यापक और सदाबहार बने रहने का गुण है कि वह सभी जगह किसी न किसी रूप में उपयोगी सिद्ध होता है। कला से लेकर के विज्ञान तक में हमेशा उपयोगी होने वाली यह भाषा प्रत्येक समस्या के समाधान को ढूंढने में मददगार सिद्ध होती है।
विशेष बिंदु : विज्ञान में दो प्रकार की बाध्यता होती है।
  1. विज्ञान काल्पनिक दुनिया के बारे में नहीं है। पूरा लेख यहाँ से पढ़ें।
  2. विज्ञान की शुरुआत बिना आधार (ज्ञात ज्ञान) के असंभव है अर्थात आगे चलकर हम उसी ज्ञात ज्ञान की संगतता को खोजते हैं। इस संगतता में संशोधन और विस्तार करना संभव होता है।
अगला लेख "प्रायिकता का खेल" जिसमें आप पढेंगें कि कैसे गणित भाषा का उपयोग गलत अर्थ भी दे सकता है।

विज्ञान का उद्भव कब हुआ ?

विज्ञान का उद्भव कब और कहाँ हुआ ? इस बारे में सही-सही बता पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन काम है। क्योंकि प्रारम्भिक घुमक्कड़ मनुष्यों के द्वारा आग की खोज और पहिये का आविष्कार कब और कहाँ हुआ था, सही-सही बता पाना मुश्किल काम है ? परन्तु विज्ञान का उदय और उसके विकास के बारे में काफी हद तक सही-सही जानकारी इतिहास के माध्यम से जुटाई गई है। जिससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि विज्ञान का किन-किन परिस्थितियों के रहते उदय और विकास हुआ था ? उन मनुष्यों की सोच क्या रही होगी, जिनके रहते सभ्यताएं बनीं, सभ्यताएं विकसित हुईं और जिसने विज्ञान को आज इतना समृद्ध बनाया ? बेशक विज्ञान को विकसित और समृद्ध बनाना, उन मनुष्यों का उद्देश्य नहीं था। क्योंकि उस समय उनकी समझ इतनी विकसित नहीं थी। परन्तु उनकी सोच ने उनकी समझ को विकसित किया। उनकी गलतियों ने सुधार की आवश्यकता को पहचाना। जिससे कि अप्रत्यक्ष रूप से ही सही विज्ञान का विकास होता गया। आज यह कह पाना मुश्किल है कि "हमने विज्ञान को विकसित किया है या फिर विज्ञान ने हमारी मानव सभ्यताओं का विकास किया है ?"

प्राचीन समय की वे परिस्थितियां और उनसे उपजी मनुष्य की सोच, जिनसे हमें विज्ञान के उद्भव के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। निम्न हैं :
1. पहली सोच (दर्शन से) घटना के कारण को जानने की रही होगी ? तब प्रश्न रहा होगा : "ऐसा क्यों ?" अवश्य ही यह प्रश्न डर से उत्पन्न हुआ होगा।
2. दूसरी सोच उन घटनाओं पर नियंत्रण पाने की रही होगी। यह उन मनुष्यों की आवश्यकता थी।
3. तीसरी सोच उन घटकों और घटनाओं के उपयोग को लेकर रही होगी। जिससे कि तकनीक का विकास हुआ। यह आज की जरुरत है।
4. चौथी सोच प्रकृति और भौतिकी के प्रकार्य (Function) को जानने के लिए रही होगी। यह सोच विज्ञान का प्रारंभिक प्रश्न है। क्योंकि यह प्रश्न "कैसे" के बारे में जानने के लिए किया जाता है। इन प्रश्नों के उत्तर में विषय संबंधी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विधियां, संभावित परिणाम और समस्याओं का समाधान छुपा होता है।

वर्तमान मनुष्य की किस सोच के रहते विज्ञान अपना कार्य प्रारम्भ करता है ? वे सोच निम्न हैं :
1. मूल प्रश्न "ऐसा ही क्यों ?" निर्भरता को कम करने और विकल्प जानने के लिए किया जाता है।
2. बार-बार ऐसा क्यों होता है ? इस प्रश्न के द्वारा समय और निश्चितता का ज्ञान होता है।
3. हर बार ऐसा क्यों होता है ? कारण और परिणाम को जानने के लिए ताकि ज्ञान को उपयोग में लाया जा सके।
4. यदि ऐसा-ऐसा है तो ऐसा होना चाहिए ! संगतता के आधार पर पुरानी धारणाओं पर प्रश्न उठाए जाते हैं और प्रमाणित/ज्ञात ज्ञान के द्वारा अज्ञात को जानने का प्रयास किया जाता है।
5. यदि इसका अस्तित्व है तो ऐसा-ऐसा करना संभव है ! संगतता के आधार अनुसंधान और आविष्कार किये जाते हैं।
6. इस सुंदरता का क्या राज है ? प्रकृति के रहस्य को सुलझाया जाता है। छुपे ज्ञान को खोजा जाता है।
7. वह ऐसा कर सकता है तो क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूँ ? भौतिकी के प्रकार्य (Function) को समझा जाता है।

चर्चा के विषयों में वर्तमान मनुष्य की ये सोच विज्ञान के होने की संभावना को व्यक्त करती हैं। विज्ञान के कार्यक्षेत्र को निर्धारित करने वाली गिनी-चुनी शर्तों के बारे में हम दूसरे लेख में चर्चा करेंगे। याद रहे ये सोच वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत भी आती हैं। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है।

ज्ञान की यथार्थ और सतत खोज, विज्ञान है।
अनेक पुस्तकों और लेखों के माध्यम से जानकारी मिलती है कि लगभग चार सौ वर्ष पहले तक विशेषज्ञता नाम की कोई चीज नहीं होती थी। विद्वान एक से अधिक विषयों के ज्ञाता होते थे। वे सभी बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति होते थे जो जिस विषय में हाथ आजमाते थे। वे उसी विषय में परंपरागत हो जाते थे। हालाँकि विशेषज्ञता का अपना अलग महत्व होता है क्योंकि इससे उत्पादन कईयों गुना बढ़ जाता है। उत्पादित वस्तु की गुणवत्ता में सुधार और वृद्धि होती है। तथा विषय की समझ होने से रोजगार में बढ़ोत्तरी होती है। इन कारणों से विज्ञान प्राचीन काल से ही अन्य दूसरे सामाजिक विषयों (धर्म, आध्यात्म और दर्शन इत्यादि) का सहायक बना रहा। सोलहवीं शताब्दी के आसपास विज्ञान, ज्ञान की अन्य धाराओं से अलग हुआ और एक नए विषय के रूप में सामने आया। जिसके कारण विज्ञान और मानव जाति ने कम समय में बहुत अधिक विकास किया।
धर्म, हमें यह बताता है कि हमें क्या-क्या करना चाहिए ? जबकि विज्ञान हमें यह सिखाता है, हमें उसे कैसे करना चाहिए ?
प्रश्नों के इन प्रकारों को देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह से विज्ञान सहायक विषय के रूप में उपयोगी था। और आखिर विज्ञान का इतने वर्षों में विकास क्यों नहीं हो पाया था ? जबकि बाद के इन चार सौ वर्षों में विज्ञान ने पहले की तुलना में हज़ारों गुना विकास करके दिखाया है। याद रहे, विज्ञान कभी भी मनुष्यों को निर्देशित नहीं करता है और न ही कभी कर सकता है। क्योंकि निर्देशित करना, विज्ञान की प्रकृति नहीं है। विज्ञान सदैव मार्ग प्रशस्त करता है। हमारे लिए विकल्प खोजता है। यह उसकी प्रकृति भी है और उसकी उपयोगिता भी है। इसलिए विकल्प खोजने की वजह से विज्ञान में कट्टरता नहीं होती।

प्रमाण देना या प्रमाण मांगना विज्ञान नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जिसे आज हम विज्ञान की प्रमुख शर्त कहते हैं। ताकि समाज खोजे गए ज्ञान और आविष्कार को निःसंकोच स्वीकार सके। विज्ञान का अर्थ सिर्फ खोजने तक सीमित होता है उस खोजे गए ज्ञान को प्रमाणित करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहलाता है। वैज्ञानिकों के इस दृष्टिकोण के रहते विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समुदाय का गठन हो रहा है। एक देश के वैज्ञानिक दूसरे देशों के वैज्ञानिकों से जुड़ रहे हैं। न केवल ज्ञान और तकनीक का आदान-प्रदान कर रहे हैं। बल्कि वैज्ञानिक एक साथ मिलकर प्रयोग कर रहे हैं, आकंड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं। और वैज्ञानिक विधियों को एक दूसरे से साझा कर रहे हैं। ताकि निष्कर्षों में कोई त्रुटि न रह जाए।
अल्बर्ट आइंस्टीन अपनी होने वाली पत्नी मिलेवा के साथ चर्चा कर रहे थे। उन्होंने यह कहते हुए सर आइजक न्यूटन के नियमों पर संदेह किया "संभव है कि न्यूटन के नियम गलत हों क्योंकि वे अपने नियमों के प्रमाण नहीं देते हैं।"
इसे कहते हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण !! संदेह करना, आशंका जताना, समस्या को पहचानना, कारण जानना, परिभाषित करना और प्रतिरूपों की पहचान करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया का ज्ञान विज्ञान कहलाता है। संभव है कि चार सौ वर्ष पहले तक विज्ञान में प्रमाण की आवश्यकता को महसूस नहीं किया गया था। इसके निम्न दो कारण हो सकते हैं।
  1. समाज द्वारा विज्ञान का विषय के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व न स्वीकारना।
  2. उस समय तक ज्ञान की प्रमाणिकता परीक्षण विधि द्वारा सिद्ध होती थी।
कुछ लोगों को भ्रम है कि भौतिकी/भौतिक विज्ञान ही सम्पूर्ण विज्ञान है। जबकि भौतिकी, विज्ञान की एक शाखा है। जिसका विकास "प्रकृति और दर्शन" के अध्ययन से हुआ है। इसलिए 19 वीं शताब्दी के अंत तक भौतिकी को 'प्राकृतिक दर्शन' (Natural Philosophy) कहा जाता था। इसके अलवा 20 वी. शताब्दी के दूसरे दशक तक गणित को दर्शन विभाग/संकाय के अंतर्गत रखा जाता था। आज भी विज्ञान में नई-नई शाखाओं का उदय हो रहा है। जिनका ज्ञान हमें पहले भी था। परन्तु विज्ञान की ये शाखाएं अन्य शाखाओं/विषयों के अंतर्गत रखी जाती थीं। अन्य शाखाओं की सहयोगी मानी जाती थीं। क्योंकि उस क्षेत्र में अध्ययन कार्य और शोध कार्य कम होते थे। इन शाखाओं के अलग हो जाने से विज्ञान के उस क्षेत्र में चरघातांकी विकास देखने को मिलता है। इसलिए सम्पूर्ण विज्ञान को भौतिकी (भौतिक विज्ञान) या उसकी एक शाखा का नाम देना गलत है। शरीर के एक अंग को सम्पूर्ण शरीर कहना गलत है।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान प्राचीन ज्ञान नहीं है। बल्कि उसका उद्भव चार सौ वर्ष पहले पश्चिमी देशों में हुआ था। संभव है कि ये लोग औद्योगिक विकास (तकनीकी ज्ञान) को ही विज्ञान समझते हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों, कंप्यूटर, आधुनिक हथियारों, खगोलीय यात्राओं जैसी बड़ी-बड़ी उपलब्धियां मानव जाति को इन चार सौ वर्षों में प्राप्त हुई हैं। विज्ञान को प्राचीन ज्ञान न मानने के पीछे तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं। जिनकी सही समझ न होने की वजह से विज्ञान के उद्भव के बारे में लोगों की गलत धारणा बन गई है। इनमें से पहला कारण विज्ञान की प्रकृति को लेकर है। जिसके चलते आज हम वर्तमान को वैज्ञानिक युग कहते हैं। दूसरा कारण विज्ञान की एक अभिधारणा है जिसके अनुसार विज्ञान में संशोधन और विस्तार करना संभव होता है। और तीसरा प्रमुख कारण वैश्विक राजनीति है जिसके चलते पूरे विश्व में लगभग 500-600 वर्ष तक कोई नई खोज नहीं हुई थी। बल्कि दबी आवाज में वैज्ञानिक युग की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। वे कारण निम्न हैं :

1. विज्ञान की प्रकृति : ज्ञान की संचायशीलता विज्ञान की प्रकृति है। इसके बारे में सर आइजक न्यूटन ने सन 1676 में रोबर्ट हूक को एक पत्र लिखा था : "यदि मैं दूसरों से कुछ अधिक दूर तक देख पाया हूँ तो इसलिए कि मुझे अपने पूर्वज विद्वानों के कन्धों पर खड़े होकर देखने का अवसर मिला है।"
2. विज्ञान की अभिधारणा : यह अभिधारणा विज्ञान की प्रकृति का ही विस्तार है। जिससे हमें विज्ञान के कार्य करने के तरीके के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। "सभी पुराने सिद्धांत विषय संबंधी नए सिद्धांत के उपसिद्धान्त कहलाते हैं।" फलस्वरूप सिद्धांतों पर आधारित सभी (नए और पुराने) तथ्य नए सिद्धांत के सहायक तथ्य कहलाते हैं। और ये सभी तथ्य नए सिद्धांत द्वारा एक-दूसरे के संगत होते हैं। इसलिए विज्ञान एक पद्धति है।
3. सूचना के साधनों में विकास होने से सूचना की क्रांति आई। विचारों का आदान-प्रदान बड़ी तीव्रता के साथ बढ़ने लगा। जिससे लोगों में शंकाए बढ़ने लगीं। धार्मिक दर्शन (विषय) वैज्ञानिक दर्शन में परिवर्तित होने लगा। और तब जाकर "प्रयोग" आधारित विज्ञान की एक नई कार्यविधि का उदय हुआ। जिसमें कहा गया "हर ज्ञान की सार्थकता को प्रयोगों द्वारा परखा जाना चाहिए। यही विज्ञान की असली कसौटी है।" मजेदार बात यह है कि यह कथन किसी वैज्ञानिक ने नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले दार्शनिक रॉजर बेकन (Roger Bacon : 1214-92 ई.) ने कहे थे। उन्होंने प्राकृतिक नियमों को प्रयोगों द्वारा खोजे जाने का सुझाव दिया था।

जिस औद्योगिक विकास को देखकर हम वर्तमान को वैज्ञानिक युग कहते हैं। यह बहुत कम समय में संभव हुआ है। क्योंकि इसमें विशेषज्ञता का बहुत बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि मशीनी उपकरण इससे पहले उपयोग में नहीं लाए जाते थे और उनका निर्माण नहीं हुआ था ! विज्ञान के लगभग हर क्षेत्र में तकनीकी विकास पहले भी हुआ है। मनुष्य के पास तकनीकी ज्ञान पहले भी था। शस्त्रों (बारूद का उपयोग भी), बड़े-बड़े जहाजों, पनचक्कियों (ज्वर-भाटे की ऊर्जा का उपयोग भी), पवनचक्कियों, पीसने और काटने की मशीनों, कागज बनाने के लिए कारखाने, छपाईखाना, दिशासूचक यंत्र और प्रोजेक्टर आदि का निर्माण पहले ही हो चुका था। भवन निर्माण की तकनीक के हज़ारों उदाहरण पूरे विश्व में आज भी देखने को मिलते हैं। याद रहे यहाँ "विज्ञान" (प्राचीन) के बारे में नहीं अपितु "तकनीकी उपलब्धियों" की चर्चा हो रही है। प्राचीन विज्ञान के एक नहीं हज़ारों/लाखों उदाहरण हैं। जिनमें से बहुत से आज भी प्रमाणित हैं।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान का उद्भव धर्म/रूढ़िवादी धारणाओं के विरोध के रूप में हुआ है। क्योंकि धार्मिक/रूढ़िवादी लोगों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों को मारना शुरू कर दिया था। उन पर दबाब दिए जाते थे। उनको धर्म के विरोध में खोज करने के लिए मनाही थी। उनकी पुस्तकों को जला दिया जाता था। उनको पढ़ने और प्रचारित करने की मनाही थी। उदाहरण के लिए जियोर्दानो ब्रूनो (Giordano Bruno : 1548 – 1600) को जिंदा जला दिया गया था। कोपरनिकस, केप्लर और गैलिलियो पर अनेक बार उनकी खोजों को लेकर दबाब बनाया गया था। तभी से विज्ञान का उद्भव हुआ है, ऐसा लोग कहते हैं। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के दबाब और बुरे कृत्य इससे पहले कभी नहीं हुए थे। बेशक ये दबाब धार्मिक रूप से दिए गए थे। परन्तु अब हम जो उदाहरण दे रहें हैं उनके पीछे हमें नहीं लगता कोई भी धार्मिक कारण रहे होंगे। पहला उदाहरण अनेक्सागोरस (Anaxagoras 510 ई.पू. - 428 ई.पू.) को इस घोषणा के लिए मौत के घाट उतार दिया गया था क्योंकि उन्होंने कहा था "चन्द्रमा उन्ही तत्वों से बना है जिनसे यह पृथ्वी बनी है।" दूसरा उदाहरण सन 415 ईस्वी में अलेक्जेंड्रिया की महिला और अंतिम वैज्ञानिक/गणितज्ञ हाईपटिया (Hypatia : 351 - 415 ई.) की हत्या कट्टरपंथियों ने कर दी गई थी।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान सिर्फ प्रयोग आधारित ज्ञान है। परन्तु यदि ऐसा होता तो आज हम शायद ही यह विकास देख पाते। वास्तव में वैज्ञानिक ज्ञान को प्रमाणित करने और सिद्धांतों में आवश्यक संशोधन करने के लिए ही प्रयोग किये जाते हैं। हाँ, यह सही है कि ज्ञान की बहुत ही शाखाओं का उदय प्रयोग द्वारा संभव हुआ है। क्योंकि प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणाम हमारे सिद्धांतों से मेल नही खाते थे। फलस्वरूप नए निष्कर्षों के संगत सिद्धांतों में परिवर्तन करना पड़ता था। कई बार तो सिद्धांत प्रयोगों में खरे नहीं उतरते थे। तो उन्हें गलत मान लिया गया। स्पष्ट है कि विज्ञान सिर्फ प्रयोग आधारित ज्ञान नही है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन का कोई भी सिद्धांत प्रयोग आधारित नहीं था। तो क्या अब आप उसे भी विज्ञान में शामिल नहीं करेंगे। विज्ञान में अल्बर्ट आइंस्टीन का कार्य निगमन विधि के अंतर्गत रखा जाता है। न कि आगमन विधि, जो प्रयोग आधारित होती है। सही पूछा जाए तो इसके अलावा 1865 के बाद से ही विज्ञान में खोजों का कार्य निगमन विधि के अंतर्गत सिद्धांतों के माध्यम से हुआ है। आधुनिक विज्ञान की पूरी नीव इन्ही सिद्धांतों पर टिकी है। महत्वपूर्ण यह है कि वे सिद्धांत भविष्यवाणी कर सकें। यदि वे भविष्यवाणियां सत्य होती हैं तो सिद्धांतों को सही मान लिया जाता है। यही पद्धति तो प्राचीन काल में भी अपनाई जाती थी। जो सिद्धांत समय के साथ घटनाओं की व्याख्या करने में समर्थ नहीं पाए जाते थे। तो उनमें या तो संशोधन कर दिया जाता था या उन्हें हटा दिया जाता था। प्राचीन खगोल विज्ञान के कई सिद्धांत और तथ्य आज भी सही हैं। और बहुत से गलत भी सिद्ध हुए हैं।

सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते ।
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमोऽवति हन्त्यासत् ।। ऋग्वेद - 7.104.12, अथर्ववेद - 8.4.12

विज्ञान यदि लगभग चार सौ वर्ष पूर्व का ज्ञान होता तो शायद विज्ञान शब्द का उल्लेख चार सौ वर्ष पहले के साहित्य में नहीं मिलना चाहिए था। परन्तु विज्ञान शब्द का उल्लेख तो इस ऋचा में भी पढ़ने को मिलता है। अनेक ग्रन्थ और पुराणों में भी एक नहीं हज़ारों बार पढ़ने को मिलता है। परन्तु इसका यह मतलब भी नहीं है कि वेदों, ग्रंथों, पुराणों और उपनिषदों में पूरा ज्ञान-विज्ञान है। ऐसा सोचना भी गलत है। यहाँ तक की हम जो विज्ञान की परिभाषा कहते हैं। वह संस्कृत/भारतीय वाग्ङमय से ली गई परिभाषा है। जिसके अनुसार प्रकृति के क्रमबद्ध या विशिष्ट/विशेष ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान की परिभाषा विज्ञान शब्द को संधि-विच्छेद करने से समझ में आ जाती है। जिसके बारे में प्रसिद्द दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes : 1588-1679) ने कहा है "एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर आधारित और परिणामी ज्ञान विज्ञान कहलाता है।"

यदि हम आज की उन्नति को देखकर 400 सौ वर्ष पहले के काल को विज्ञान के उद्भव का काल मान भी लेते हैं। तो रॉजर बेकन (Roger Bacon : 1214-92 ई.) की उस भविष्यवाणी क्या ? जिसमें कहा गया है कि स्वचालित वाहन और उड़न यान बनाना संभव है। उन्होंने कांच के माध्यम से लेंस बनाकर चश्मे बनाने का सुझाव दिया था। बारूद बनाने का सूत्र खोजा था। गणित, भौतिकी, दर्शन इत्यादि विषयों पर तीन ग्रन्थ लिखे थे। जो आगे चलकर कोपरनिकस, गैलेलिओ, फ्रांसिस बेकन तथा न्यूटन के अनुसंधानों का आधार बने थे। ठीक इसी प्रकार फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon : 1561 -1626 ई.) ने भी भविष्य में होने वाली औद्योगिक क्रांति का आधार छापाखाना, बारूद और दिशासूचक को बताया था। इस तरह विज्ञान के उद्भव का काल धीरे-धीरे पीछे होता हुआ प्रतीत होता है। जो प्राचीन काल तक पहुँच जाता है। और यदि सच में विज्ञान का उद्भव चार सौ वर्ष पूर्व हुआ होता। तो रिवरसाइड चर्च में प्राचीन वैज्ञानिकों की मूर्तियां न लगाई जातीं। क्योंकि प्राचीन वैज्ञानिकों के नाम को सूची में शामिल करने का सुझाव तो वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों ने ही दिया था।

सर अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रसिद्धि

सर अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम पूरे विश्व में प्रसिद्द है। विज्ञान संकाय के विद्यार्थी से लेकर दर्शन, कला, राजनीति और अर्थशास्त्र तक के विद्यार्थी सर अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम और उनकी खोज के बारे में जानते हैं। आप अपने विचार रखिये और बस यह कह दीजिये कि यह विचार/कथन सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहे हैं। तो शायद ही कोई उस विचार/कथन से असहमति जताता है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन आज हमारे बीच में न रहते हुए भी चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। क्योंकि विज्ञान में खोज और घटनाओं को लेकर उनकी भविष्यवाणियां आज भी सच साबित हो रही हैं। इसलिए उनका नाम सिर्फ विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समाज से सरोकार रखने वाला व्यक्ति भी उनके नाम से परिचित है।

पश्चिमी द्वार | स्रोत
पश्चिमी द्वार का दक्षिणी भाग | स्रोत

एक उदाहरण है जो सर अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रसिद्धि को जगजाहिर करता है। डॉ हैरी एमर्सन फॉस्डिक सन 1925 में रिवरसाइड चर्च के मंत्री के पद के लिए चुने गए थे। वे आधुनिकवाद और रूढ़िवाद के बीच की बहस में हमेशा फंसे रहते थे। उन्होंने अनेक बातों की परवाह किये बिना सन 1929 में चर्च की एक नई और बड़ी ईमारत बनाने की योजना बनाई। तो जॉन डी रॉकफेलर जूनियर ने उस ईमारत के लिए वित्तीय सहायता की व्यवस्था की। यह प्रोटेस्टेंट चर्च हडसन नदी पर नदी के किनारे न्यूयॉर्क शहर में बनाया जाना था। जिसके पश्चिमी द्वार में उस समय तक के विश्व प्रसिद्द 600 महान व्यक्तियों की मूर्तियां लगाई जानी थी। डॉ हैरी एमर्सन फॉस्डिक ने लगभग-लगभग सभी बड़े विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों को खत भेजकर महान वैज्ञानिकों के नामों की सूची देने के लिए निवेदन किया। योजना के अनुसार सिर्फ 14 महान वैज्ञानिकों की मूर्तियां द्वार में लगाई जानी थीं।

सर अल्बर्ट आइंस्टीन (दाहिने हाथ से दूसरे) | स्रोत

लम्बी बहस के बाद अंततः सर अल्बर्ट आइंस्टीन न केवल वैज्ञानिकों बल्कि उन सभी 600 महान व्यक्तियों (महात्माओं, दार्शनिकों, राजाओं, वैज्ञानिकों आदि) में से एक मात्र ऐसे महान व्यक्ति थे, जिनके जीते जी उनकी मूर्ति को चर्च के द्वार पर लगाया गया था। उससे भी मजेदार बात यह थी कि सर अल्बर्ट आइंस्टीन एक मात्र ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका नाम सभी विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों की सूची में शामिल था। जबकि आर्किमिडीज, यूक्लिड, गैलेलियो और न्यूटन का नाम अधिकतर सूचियों में ही शामिल था। ईमारत के तैयार हो जाने के बाद सन 1930 में न्यूयॉर्क दौरे पर सर अल्बर्ट आइंस्टीन और उनकी पत्नी रिवरसाइड चर्च गए थे। जहाँ पर उन्होंने स्वयं की मूर्ति के अलावा हिप्पोक्रेट्स, यूक्लिड, पाइथागोरस, आर्किमिडीज, गैलीलियो, केपलर, न्यूटन, फैराडे, डार्विन और पाश्चर जैसे महान वैज्ञानिकों की मूर्तियां देखी थीं। जिन्हें देखते हुए उन्होंने शरारती मुस्कान के साथ कहा था कि "इन मूर्तियों का केवल एक ही जीवित प्रतिनिधि है और वह मैं स्वयं हूँ।"

विज्ञान में कारण, घटना और उनके प्रभाव

कारण को जानना मूल रूप से दर्शन है। विज्ञान में कारण को जानने का कार्य प्रयोग विधि द्वारा किया जाता है। ताकि लक्षणों की पहचान की जा सके, समस्याओं का समाधान ढूंढा जा सके, वस्तुओं और तत्वों की उपयोगिता परखी जा सके तथा सिद्धांतों और नियमों द्वारा प्रकृति की यथार्थता को सिद्ध किया जा सके। सरल शब्दों में कारण को जानने का कार्य प्रमाण उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है। इस प्रकार दर्शन विज्ञान के लिए उपयोगी होता है। आज के इस लेख में हम केवल विज्ञान से संबंधित कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों के विषय में चर्चा करेंगे।

कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच कैसा संबंध होता है ? इसको जानने के लिए हम एक उदाहरण देते हैं। मैंने एक विद्यार्थी से पूछा : आप पढ़ाई क्यों करते हो ? उसने जबाब दिया : ताकि मैं अच्छे अंकों से पास हो सकूँ। प्रश्न यह उठता है कि क्या पढाई करने का "कारण" अच्छे अंक प्राप्त करना है ? क्या घटना कभी कारण के पहले घटित हो सकती है ? या फिर प्रत्येक घटना "उसके कारण" के बाद ही घटित होती है ? क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि किसी कारणवश (उद्देश्य प्राप्ति हेतु) कोई घटना घटित हो !

यदि घटना सदैव कारण के बाद घटित होती है तो समझने के लिए एक उदाहरण और लेते हैं। क्या ग्रहण, ध्रुवीय ज्योति, तारों का अंत, सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा, परमाणु और हम सभी के अस्तित्व का कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति है ? अर्थात यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ही नहीं होती तो न ही सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा और परमाणु होते और न ही ये घटनाएं घटित होती, क्या यह कथन सही है ? क्या हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को सभी वस्तु, पिंड और घटना के अस्तित्व का कारण मान सकते हैं ? आइये अब हम कारण, घटना और उनके प्रभाव के अंतर्संबंधों के विषय में चर्चा करते हैं। सर्वप्रथम हमको यह क्रम जानना जरूरी है।

कारण >> घटना >> उनके प्रभाव


याद रहे घटना सदैव कारण के बाद ही घटित होती है। कारण महज एक संयोग होता है। जो घटना की शुरुआत को परिभाषित करता है। यह क्षणिक होता है। कारण और घटना के संबंध में विकल्प का पूर्णतः अभाव होता है। अर्थात किसी भी घटना के घटित होने का कारण सदैव वह होता है जब किसी दूसरी घटना का कोई विकल्प मौजूद नहीं होता है। यदि विकल्प मौजूद है तब तो न ही कोई कारण और न ही कोई घटना घटित होगी। (क्रिया, कार्य और घटना में भेद फिर कभी) अर्थात ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को सभी वस्तु, पिंड और घटना के अस्तित्व का कारण नहीं माना जा सकता है। उद्देश्य प्राप्ति के लिए हम जो भी कार्य करते हैं। वह उद्देश्य कभी भी कारण नहीं कहलाता है। वह कार्य का परिणाम अर्थात प्रभाव कहलाता है। जिसे हमने अंतर्संबंधों के क्रम में दर्शाया हुआ है।
कारणाभावात् कार्याभावः ।
न तु कार्याभावात् कारणाभावः । वैशेषिकसूत्रम् -१,२
अर्थात कारण के बिना प्रभाव उत्पन्न नहीं होता है। प्रभाव की अनुपस्थिति में जरुरी नहीं है कि कारण की अनुपस्थिति हो। (क्योंकि)
कारण, दिक्काल में होने वाला एक संयोग है। जो एक निश्चित सीमा में घटना के लिए जिम्मेदार होता है। इसे ही घटना का क्षेत्र कहते हैं। जिसके प्रभाव स्वरुप उस क्षेत्र की भौतिकता में परिवर्तन, उत्पत्ति या अंत होता है। यह एक विशेष स्थिति के रूप में भी परिभाषित होता है। जो किसी पिंड या निकाय की उत्पत्ति या उसके अंत को दर्शाता है। अर्थात जिस किसी उद्देश्य के लिए हम कार्य करते हैं। उस कार्य का परिणाम सदैव भौतिकता (परिवर्तन, उत्पत्ति या अंत) के रूप में प्राप्त होता है और ये जो सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह-उपग्रह, आकाशगंगा और परमाणु का अस्तित्व है वह ब्रह्माण्ड की प्रमुख घटनाओं का प्रभाव है। जो भौतिकता के रूपों में हमें दिखाई देता है।

ऊपर लिखे वैशेषिक दर्शन के श्लोक की पहली पंक्ति से विज्ञान की पहली अभिधारणा सामने आती है कि "बिना अस्तित्व के कुछ भी नहीं पनप सकता है।" अर्थात ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति भी बिना कारण (अस्तित्व और संयोग) के असंभव है। फिर भले ही वह (ब्रह्माण्ड) किसी भी रूप में क्यों न अस्तित्व रखता हो ! एक संयोग जो महाविस्फोट घटना का कारण बना। तत्पश्चात स्वतः भौतिकी के नियमों द्वारा ब्रह्माण्ड का विकास हुआ। ब्रह्माण्ड का वर्तमान स्वरुप जो अनेक तारों, आकाशगंगाओं, निकायों, ग्रह-उपग्रह से निर्मित है। वह उसी महाविस्फोट घटनाक्रम का प्रभाव है। जो भौतिकी के नियमों द्वारा व्यवस्थित रूप से संचालित होता है।

विज्ञान की अन्य दूसरी अभिधारणा भी पहली अभिधारणा का विस्तृत रूप है। जिसके अनुसार संयोग होने पर नियत परिणाम प्राप्त होने की बात कही जाती है। अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" इन्ही दो अभिधारणाओं के चलते दर्शन विज्ञान के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। जिसके अनुसार प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग करना संगत है। इन प्रयोगों का दोहराव करना विज्ञान में युक्तिसंगत होता है। क्योंकि एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं। इसी अभिधारणा के रहते हम सिद्धांतों और नियमों द्वारा प्रकृति की यथार्थता को सिद्ध करते हैं। इसे कोई भी व्यक्ति कभी भी प्रमाणित कर सकता है। क्योंकि प्रकृति भेदभाव नहीं करती है।

विशेष बिंदु : "होना" कारण हो सकता है। "न होना" कभी भी कारण नहीं होता है। यह कारण होने की प्रमुख शर्त है। साथ ही विज्ञान के एक सिद्धांत का सम्बन्ध विशेष रूप से इसी शर्त से होता है। जिसके अनुसार "किसी भी नियम या सिद्धांत को सहमति और अवलोकन के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। परन्तु अवलोकन के आधार पर बनी असहमति के द्वारा अमान्य घोषित जरुर किया जा सकता है।"

वैज्ञानिक दृष्टिकोण की अनुपस्थिति : अंधविश्वास की उपस्थिति है !

संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 11 के द्वारा (3-1-1977 से) मूल कर्तव्यों को संविधान में अंत:स्थापित किया गया है। संविधान निर्माताओं को इन कर्तव्यों को संविधान में शामिल करने की आवश्यकता मालूम नहीं पड़ती थी। इसलिए मूल कर्तव्यों को संविधान निर्माण के समय शामिल नही किया गया था। परन्तु जब समता के अधिकार और पंथनिरपेक्ष जैसे लक्ष्यों को साधना मुश्किल होने लगा। तब हम भारतीयों द्वारा इन लक्ष्यों को साधने के लिए मूल कर्तव्यों की आवश्यकता पड़ी। ये मूल कर्तव्य संविधान में वर्णित हमारी आकाँक्षाओं और लक्ष्यों को पूरा करने में हमारी सहायता करते हैं। जिन्हे भारत का नागरिक होने के नाते और मूल अधिकार प्राप्त करने के बदले में हम भारतीयों को ये कार्य अवश्य करने चाहिए।
भारतीय संविधान के भाग - "4 क" के अनुच्छेद - "51 क" में वर्णित मूल कर्तव्यों में से एक (51 क का ज) "वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें" आज के लेख का मुख्य विषय है।
भारतीय संविधान ने हम भारतीयों को "रीति-रिवाज, परम्परा और अपने-अपने धर्म को बनाए रखने की स्वतंत्रता दे रखी है।" परन्तु रीति-रिवाज, परम्परा और धर्म के नाम पर अंधविश्वास को बढ़ावा देना समाज और देश के लिए हानिकारक होता है। इसलिए हम भारतीयों का भारत का नागरिक होने के नाते अंधविश्वास को समाज से निकाल फैंकना हमारा मूल कर्तव्य है। परन्तु यह अंधविश्वास क्या होता है ? यह समाज में अपनी जगह कैसे बना लेता है ?

कहा भी जाता है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।"
जहाँ देखकर सीखने का मतलब अपनी समझ विकसित करने के लिए अवलोकन करना है। वहीं देखा-सीखी करने का मतलब आकर्षित होकर, बिना आवश्यकता के या लालच में आकर आवश्यक परिणाम प्राप्त करने के लिए बिना सोचे समझे दूसरों के कार्यों का दोहराव करना है। फलस्वरूप देखकर सीखना एक सर्वोत्तम वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि देखा-सीखी करना अंधविश्वास की पहचान है। क्योंकि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो यह जरुरी नहीं है। इसलिए लोगों को देखकर सीखने की आवश्यकता है न कि देखा-सीखी करने की आवश्यकता है।
एक उदाहरण के तौर पर अधिक भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। खाली पेट में भी दर्द होता है। ख़राब भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। और कमर कसी होने पर भोजन लेने से भी पेट में दर्द होता है। अब आप स्वयं सोचें, किसी और की पेट दर्द की दवा यदि आप खाएंगे, तो क्या आपका पेट दर्द मिट जाएगा ? संभव है, यदि दोनों के पेट दर्द का कारण एक ही हो। अन्यथा स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है।
अंधविश्वास उस अंधकार के समान है जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रूपी प्रकाश की उपस्थिति में अपना अस्तित्व खो देता है। अंधविश्वास और अंधकार का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता है। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधविश्वास और अंधकार दोनों व्यक्ति, समाज और देश में अपना नकारात्मक प्रभाव दर्शाते हैं।
अंधविश्वास न सिर्फ विकास के कार्य करने में बाधा उत्पन्न करता है बल्कि वह मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर बनाता है। हमारी सोचने-समझने की क्षमता को नष्ट करता है और सहजता के प्रति हमें कट्टर बनाता है। अंधविश्वास उस नशे के समान है जिसके बुरे प्रभाव को सभी जानते हैं। परन्तु उसकी लत लग जाने के बाद उसके बारे में बात करना या उबरने का प्रयास करना भी लोगों को चिड़चिड़ा बना देता है। फलस्वरूप लोग अपने कार्यों के प्रति कट्टर होने लगते हैं।
अधिकतर देखने को मिलता है कि "पढ़े-लिखे और तकनीकी ज्ञान रखने वाले लोग भी अंधविश्वासी होते हैं ?" लोगों का प्रश्न होता है कि ऐसा कैसे संभव है ? वास्तव में विज्ञान का मतलब वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं होता है और न ही तकनीकी ज्ञान का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई संबंध होता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है। इसलिए विज्ञान और तकनीकी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी अंधविश्वासी होता है। उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी होती है। फिर भले ही वह कितनी भी पुस्तकें क्यों न पढ़ ले। मोबाइल, कंप्यूटर और वाई-फाई जैसी सुविधाओं का क्यों न उपयोग करता हो। परन्तु ऐसे लोग समाज और देश की उन्नति में बाधा उत्पन्न करते हैं। अंधविश्वासी होते हैं। इसलिए विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की बात की जाती है।

चित्रकार : Rob Gonsalves
अंधविश्वास का सीधा सा अर्थ है बिना जांचे-परखे स्वीकारना और उस पर विश्वास करना। यदि आप रीति-रिवाज, परम्परा, संस्कृति और धर्म के नाम पर ऐसे कार्य करते हैं जिनको करने का कारण आपको नहीं पता है तो ऐसे कार्य अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं। कारण जानते हुए भी यदि वे कार्य आवश्यक परिणाम नहीं देते हैं फिर भी उन कार्यों को करते रहना, अंधविश्वास है।

इस आधार पर अंधविश्वास दो प्रकार के होते हैं। पहला वह अंधविश्वास जो विकास के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। और दूसरा वह अंधविश्वास जो दूसरों के कार्यों में बाधा उत्पन्न करने की चेष्टा करता है। अर्थात् यदि आप दूसरों के रीति-रिवाज, परंपराओं, संस्कृति और धार्मिक कार्यों को अंधविश्वास कहकर बाधा पहुँचाने की चेष्टा करते हैं और उन कार्यों को करने या उनको अंधविश्वास कहने का कारण आपको नहीं पता है ? तो आप स्वयं अंधविश्वासी है। क्योंकि बिना सोचे समझे दूसरों का समर्थन करना भी अंधविश्वास कहलाता है। भले ही आप अच्छाई के पक्ष में क्यों न हों ! परन्तु आने वाला समय आपके इस अंधविश्वास के कारण समाज के लिए घातक होता है। इसी कारण के चलते बहुत सी परम्पराएँ अंधविश्वास की श्रेणी में आने लगी हैं। पहला वाला अंधविश्वास वर्तमान की बुराई कहलाता है। जबकि दूसरा वाला अंधविश्वास भविष्य की बुराई के लिए साधन बनता है।

अभी कुछ दिन पूर्व "राष्ट्रीय विज्ञान दिवस" के दिन मित्रों और पाठकों के साथ अंधविश्वास को लेकर बहुत लंबी चर्चा हुई। जिनमें से कुछ मित्रों का मानना था कि कभी-कभी परिवार में अंधविश्वास को लेकर मनमुटाव हो जाता है। हमने पूछा कि "आप तो उसी परिवार के सदस्य हो फिर आपको यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ कि आपके परिवार के लोग अंधविश्वासी है ? और आप अंधविश्वासी नहीं हो ?" इस प्रश्न का उनके पास कोई उत्तर नहीं था। हालाँकि उन्होंने शिक्षा को कारण बताया था। परन्तु फिर अपनी ही बात से पलट गए कि "शिक्षित लोग भी तो अंधविश्वासी होते हैं।" चर्चा के दौरान एक और कारण सामने आया था "हमें तुलना करने पर समझ में आने लगता है कि हम जो परिणाम चाह रहे हैं वो हमें हासिल नहीं हो रहा है।" अर्थात हम गलत रास्ते पर हैं। इसी कारण से हमें लगता है कि परिवार वाले अंधविश्वासी हैं।
हमारा दूसरा प्रश्न था कि क्या उनकी सोच में परिवर्तन संभव है ? क्या आपने इस दिशा में प्रयास किया है ? उनका उत्तर था कि हाँ, हमने प्रयास किया है। परन्तु हमें नहीं लगता है कि उनकी सोच में परिवर्तन करना संभव है।
आज हम नौजवान यदि अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज भी उठाते हैं तो जरुरी है कि हम बड़े-बुजुर्गों के सामने ससम्मान तर्क रखें। जो अकाट्य होने चाहिए। जो स्पष्ट होने चाहिए। जिनके द्वारा अंधविश्वास दूर होना चाहिए। विषय के विस्तार के लिए हमारे पास उदाहरण होने चाहिए। सम्बंधित घटना के बारे में स्वयं का कुछ अनुभव होना चाहिए। यदि हम सामने वाले के अंधविश्वास को दूर करने में समर्थ नहीं हैं, तो हम स्वयं अंधविश्वासी हैं। आप अपनी बात सामने वाले को नहीं समझा पा रहे हो तो आप समझदार नहीं हो, नसमझ हो। यदि आप सामने वाले को भ्रमित कहते हो तो उसके भ्रम को दूर करना हमारा कर्तव्य है। उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रेरित सीख देने की आवश्यकता है। ठीक उसी प्रकार से समझाने की आवश्यकता है। जिस कारण के रहते आपको यह आभास हुआ था कि आपके परिवार के लोग भ्रमित है या अंधविश्वासी है। यदि आप उसी तरह से समझाएंगे तो निश्चित ही वे समझेंगे। परन्तु यदि आप उनको नहीं समझा पा रहे हैं, तो सम्भव है कि आप ही अंधविश्वासी हैं।

अंधविश्वास का एक कारण भय माना जाता है। परन्तु यह भय अंधविश्वास और प्रयोग दोनों की निशानी है। यदि भय या किसी आशंका के रहते आपको कार्य करने में बाधा होती है। तो यह अंधविश्वास है। परन्तु यदि भय या आशंका के रहते आप कार्य करते हैं। तो आपका कार्य प्रयोग कहलाता है। इन्ही कार्यों के चलते हम मनुष्यों ने वर्तमान विकास को प्राप्त किया है। अपनी समझ को विकसित किया है। एक खोजी और विवेकपूर्ण (सजग) व्यक्ति को दो तरह के भय से जीतना होता है। पहला प्रयोग के परिणाम क्या होंगे, उसकी आशंका को लेकर और दूसरा समाज पर ऊँगली उठाने के कारण समाज की प्रतिक्रिया को लेकर भय रहता है। परन्तु हमें इस भय का सामना करना ही पड़ता है।

इस भय का एक उदाहरण यह भी है कि जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की अच्छाई बताता है। तब हम उसकी बात पर भरोसा नहीं करते हैं। दूसरे की अच्छाई को हमेशा संदेह की नज़रों से देखते हैं और वहीं जब हमारा दोस्त किसी दूसरे की बुराई बताता है। तब तो हम उसकी बात पर फ़ौरन यकीन कर लेते हैं। क्योंकि हम बुराई को परखना भी नहीं चाहते हैं। कहीं उस बुराई ने हमें घेर लिया तो ! परखते समय हमारा कोई नुकसान हो गया तो ! जबकि अच्छाई से हमें कोई डर नहीं लगता है, हम अपना काम निकालने की सीमा को जानने के लिए उस अच्छे व्यक्ति को परखना चाहते हैं। इस तरह का भेदभाव भी अंधविश्वास कहलाता है। यह भेदभाव करना हमें किसी ने नहीं सिखाया है। बल्कि हम इसी तरह से सीखते आए हैं। अपनी सोच-समझ विकसित करते आए हैं। फिर भी यह एक अंधविश्वास है।

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विज्ञान उद्देशिका पर विस्तृत लेख

उद्देशिका के बारे में : विज्ञान उद्देशिका, भारतीय संविधान की उद्देशिका से प्रभावित होकर लिखी गई उद्देशिका है। यह न केवल हमें विज्ञान और तकनीक के सहयोग से प्राप्त होने वाले सामाजिक स्तर के बारे में जानकारी देती है। बल्कि वह हमारे लिए उस सामाजिक स्तर को प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त भी करती है। साधारण शब्दों में विज्ञान उद्देशिका वैज्ञानिकों के कार्य करने के तरीके से लेकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विधियों तथा विज्ञान और तकनीक को परिभाषित करने के बारे में जानकारी देती है।

विज्ञान उद्देशिका और संविधान की उद्देशिका में मुख्य रूप से यह अंतर है कि विज्ञान उद्देशिका हमें उन अंतर्निहित उद्देश्यों के बारे में जानकारी देती है, जिन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाला एक व्यक्ति, वैज्ञानिक और आविष्कारक अपने कार्यों द्वारा सामाजिक उत्थान के लिए हासिल करना चाहता है। इसलिए विज्ञान उद्देशिका को आत्मसात करने वालों की न ही कोई एक स्पष्ट सीमा है और न ही आत्मसात करने की कोई एक निश्चित दिनांक है। जबकि संविधान और उसकी उद्देशिका हम भारतीयों के लिए हम भारतीयों (संविधान सभा) द्वारा 26 नवम्बर 1949 ई. को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित की गई थी।

विज्ञान उद्देशिका को लिखने का मुख्य उद्देश्य समस्त मानव जाति के हित और विकास के लिए, लोगों के मन में एक ऐसे विश्वस्तरीय आदर्श समाज का स्पष्ट चित्रण कराना है। जो न केवल हम मनुष्यों के लक्ष्य, अपेक्षाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करता है। बल्कि हम मनुष्यों के द्वारा जिसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से व्यवहार में हासिल भी किया जा सकता है।


उद्देशिका में सम्मिलित पारिभाषिक शब्दावली
1. विज्ञान : खोज करने की पद्धति को विज्ञान कहते हैं।
2. तकनीक : विज्ञान को उपयोग में लाने की प्रक्रिया को तकनीक कहते हैं।

उद्देशिका द्वारा आदर्श समाज का चित्रण :
1. समस्त मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
2. वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज सदैव करते रहना चाहिए।
3. नए और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
4. शिक्षा और दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।
5. हम मनुष्यों को आपसी समझ विकसित करने के लिए हरदम प्रयास करते रहना चाहिए।

वैज्ञानिक कार्यशैली का वर्णन :
1. समस्या का समाधान ढूँढना समस्या को परिभाषित करते ही सरल हो जाता है।
2. समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है।
3. वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रमाणित ज्ञान को ही स्वीकार करने की बात कहता है।
4. प्रमाणित ज्ञान, जब एक से अधिक विधियों या एक से अधिक बार के प्रयोगों (आंकड़ों) पर आधारित होता है, तब वह ज्ञान समाज में स्वीकारने योग्य होता है।
5. जब सभी प्रयोग और प्रमाण के लिए उपयोग में लाई गईं सभी विधियाँ एक दूसरे से स्वतंत्र होती हैं, तब उस प्रमाणित ज्ञान की विश्वसनीयता समाज में और अधिक बढ़ जाती है।

विज्ञान के विकास के लिए वर्णित अपेक्षाएं : 
1. ज्ञान के यथार्थ को जानने का प्रयास होते रहना चाहिए।
2. खोजे हुए ज्ञान को आपस में साझा करना चाहिए।
3. प्रायोगिक निष्कर्ष में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं करना चाहिए।

विज्ञान उद्देशिका का विस्तार

"हम, मानव जाति के सदस्य" अर्थात विज्ञान हम मनुष्यों के लिए है। न ही वनस्पति जगत और न ही शेष जंतु जगत विज्ञान का उपयोग करता है।

"विज्ञान को एक विषय के रूप में" अर्थात विज्ञान के बारे में चर्चा की जाती है। असमंजस की स्थिति में उसकी विधियों और खोजों के विषय में प्रश्न उठाए जा सकते हैं। विज्ञान में प्रश्न उठाने को लेकर समय, वर्ग और उम्र की कोई प्रतिबद्धता (सीमा) नहीं है।

"विज्ञान का पद्धति तथा तकनीकी ज्ञान के रूप में उपयोग" अर्थात विज्ञान एक (खोज) पद्धति है। भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती हैं।

"विज्ञान एक (खोजपूर्ण, ज्ञानवर्धक, निर्णायक और भविष्य निर्माणक) विषय के रूप में विकसित" अर्थात विज्ञान खोजने, ज्ञान में वृद्धि करने, निर्णय लेने तथा भविष्य को प्रभावित और निर्मित करने में मानव जाति के लिए उपयोगी और सहयोगी सिद्ध होता है। विज्ञान के प्रभावी होने के लिए जरुरी है कि विज्ञान में निर्णायक एकरूपता की उपस्थिति होनी चाहिए। इसीलिए विज्ञान की प्रकृति ज्ञान को सतत हासिल करने तथा उसमें आवश्यकतानुसार संशोधन करने के बाद उसे संचित करने की होती है।



"विज्ञान का उपयोग समस्त मानव जाति के हित में हो" अर्थात चूँकि विज्ञान के अनुप्रयोग से विज्ञान की उपयोगिता निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान और मानव में तकनीकी ज्ञान और प्रौद्योगिकी के रूप में चरघातांकी विकास संभव हो पाता है। परन्तु विज्ञान की यह उपयोगिता मानव जाति के लिए अभिशाप न बन जाए, इसके लिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा दी जानी चाहिए। ताकि तकनीकी ज्ञान के प्रति मानव जाति की समझ विकसित हो सके। क्योंकि बिना विज्ञान की समझ के तकनीकी ज्ञान का उपयोग और प्रौद्योगिकी पर पूर्ण निर्भरता मानव जाति के लिए अभिशाप है। मानव जाति के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए "व्यापक दृष्टि और दूरदृष्टि" दोनों की सतत आवश्यकता है।

"वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज और उनका नि:संकोच उपयोग" अर्थात भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक ही विधि या प्रक्रिया के उपयोग से एक समान परिणाम प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसके अलावा निष्कर्ष को लेकर एक मत होना भी मुश्किल होता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा वैकल्पिक युक्तियों और वैकल्पिक साधनों की खोज की वकालत करती है। उनके नि:संकोच उपयोग को बढ़ावा देने की बात कहती है। ताकि परीक्षण विधि द्वारा व्यक्ति अपने-अपने मतों (निष्कर्ष) को प्रमाणित कर सके।

"वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा" अर्थात ऐसी शिक्षा जो मानव जाति के हित को ध्यान में रखकर के समाधान को पहचानने और उनको परखने वाले मापदंडों का उपयोग करना सिखाती है। उन मापदंडों की रचना करना सिखाती है। प्रमाण प्रस्तुत करने के तरीकों से हमारा परिचय कराती है। ऐसी शिक्षा न केवल हम मनुष्यों के लिए क्या अच्छा-बुरा और सही-गलत है, का ज्ञान कराती है। बल्कि हम मनुष्यों में आपसी समझ विकसित करती है और समाज में सामंजस्य स्थापित करती है।

"समस्याओं के समाधान के लिए तुलनात्मक मापदंडों को परिभाषित करने" अर्थात "एक समान परिस्थितियों में एक समान कारण के प्रभाव सदैव एक समान होते हैं।" विज्ञान की इस अभिधारणा को ध्यान में रखकर के समानता-असमानता के आधार पर प्रतिरूप और प्रतिमानों की तथा सामान्य-असामान्य के आधार पर कारण, घटना और उनके प्रभावों की आपसी तुलना की जाती है। ताकि समस्याओं का समाधान समस्या को परिभाषित करके, मापदंडों की पहचान द्वारा सरलता से ढूंढा जाता है।

"कारण, घटना और उनके प्रभाव" अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उत्प्रेरित शिक्षा समस्याओं के समाधान के बारे में यह सीख देती है कि "देखकर सीखें, न कि देखा-सीखी करें।" क्योंकि यह जरुरी नहीं है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक समान प्रभाव के पीछे एक ही कारण हो। इसलिए कारण, घटना और उनके प्रभावों के बीच अंतर्संबंध स्थापित करना, विज्ञान की प्रमुख उपलब्धि होती है।

"वैज्ञानिक पद्धतियों और मापन की प्रक्रियाओं से" अर्थात विज्ञान में अस्पष्ट और अपरिभाषित ज्ञान का कोई स्थान नहीं होता है। जिस ज्ञान को हम भौतिक राशियों के रूप में व्यक्त कर सकते हों, जिसे मापा जा सकता हो, जिसको प्रमाणित करने के लिए उस ज्ञान के आधार पर भविष्यवाणियां की जा सकती हों और जिसकी जाँच-पड़ताल करना संभव हो, ऐसा ज्ञान ही विज्ञान में स्वीकारने योग्य होता है।

"एक से अधिक विधियों में निहित और प्रयोगात्मक कार्यों द्वारा" अर्थात जिस ज्ञान को एक से अधिक विधियों द्वारा या स्वतंत्र रूप से कार्य करते हुए, संबंधित प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जाता है। ऐसा ज्ञान विज्ञान में अधिक विश्वसनीय माना जाता है। इसलिए समय के साथ इस ज्ञान में सिर्फ संशोधन और विस्तार करने की आवश्यकता होती है।

"समस्त मानव जाति के विकास के लिए" अर्थात विज्ञान का विकास सम्पूर्ण मानव जाति के विकास को निर्धारित करता है। कहने के लिए एक खोज एक वैज्ञानिक या वैज्ञानिकों का समूह करता है। परन्तु उस खोज के उपयोग और उसके प्रभाव से सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की दशा और दिशा निर्धारित होती है। फलस्वरूप विज्ञान मानव जाति के लिए वरदान साबित हो, इसके लिए हमें विज्ञान के विकास से जुड़ी अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।

"ज्ञान के यथार्थ को जानने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए पहली अपेक्षा के अनुसार खोजे गए ज्ञान की यथार्थता और उसकी उपयोगिता को जानने का सतत प्रयास किया जाना चाहिए। क्योंकि विज्ञान में परम ज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती है। वैज्ञानिकों के मत के अनुसार "विज्ञान के द्वारा हम केवल सत्य अर्थात ज्ञान के नजदीक जा सकते हैं। परन्तु यथार्थ ज्ञान अर्थात अंतिम सत्य कभी भी नहीं जान सकते हैं।" निरंतर ज्ञान की यथार्थता जानने के प्रयास में हम न केवल स्वयं को सत्य के और नजदीक पाते हैं बल्कि हम उस ज्ञान का उपयोग भी कर पाते हैं।

"आपस में साझा करने" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए दूसरी अपेक्षा के अनुसार विज्ञान के उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें ज्ञान और उस ज्ञान की उपयोगिता को आपस में साझा करना चाहिए। ताकि मानव जाति के ज्ञान में वृद्धि हो सके। विज्ञान का मुख्य उद्देश्य : प्रणाली अथवा तंत्र को एकरूप में जानने अथवा समझने के लिए उस प्रणाली अथवा तंत्र के ज्ञान को क्रमबद्ध संचित करना।

"प्रतिकूल प्रभाव रहित प्रायोगिक कार्यों द्वारा" अर्थात विज्ञान के विकास के लिए तीसरी अपेक्षा के अनुसार प्रयोग के दौरान ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, जो प्रयोगों को प्रभावित कर सकता है तथा प्रयोगों के निष्कर्ष निकालते समय "पूर्वधारणाओं और व्यक्तिगत भावनाओं" को जबरन निष्कर्ष में शामिल नहीं करना चाहिए।

"विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समाज बनाने" अर्थात स्वयं अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर, विज्ञान और तकनीक के सहयोग से ऐसे समाज का उदाहरण प्रस्तुत करना है। जिसे आदर्श समाज के रूप में व्यव्हार में हासिल किया जा सकता है।

- अज़ीज़ राय

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