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विज्ञान का उद्भव कब हुआ ?

विज्ञान का उद्भव कब और कहाँ हुआ ? इस बारे में सही-सही बता पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन काम है। क्योंकि प्रारम्भिक घुमक्कड़ मनुष्यों के द्वारा आग की खोज और पहिये का आविष्कार कब और कहाँ हुआ था, सही-सही बता पाना मुश्किल काम है ? परन्तु विज्ञान का उदय और उसके विकास के बारे में काफी हद तक सही-सही जानकारी इतिहास के माध्यम से जुटाई गई है। जिससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि विज्ञान का किन-किन परिस्थितियों के रहते उदय और विकास हुआ था ? उन मनुष्यों की सोच क्या रही होगी, जिनके रहते सभ्यताएं बनीं, सभ्यताएं विकसित हुईं और जिसने विज्ञान को आज इतना समृद्ध बनाया ? बेशक विज्ञान को विकसित और समृद्ध बनाना, उन मनुष्यों का उद्देश्य नहीं था। क्योंकि उस समय उनकी समझ इतनी विकसित नहीं थी। परन्तु उनकी सोच ने उनकी समझ को विकसित किया। उनकी गलतियों ने सुधार की आवश्यकता को पहचाना। जिससे कि अप्रत्यक्ष रूप से ही सही विज्ञान का विकास होता गया। आज यह कह पाना मुश्किल है कि "हमने विज्ञान को विकसित किया है या फिर विज्ञान ने हमारी मानव सभ्यताओं का विकास किया है ?"

प्राचीन समय की वे परिस्थितियां और उनसे उपजी मनुष्य की सोच, जिनसे हमें विज्ञान के उद्भव के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। निम्न हैं :
1. पहली सोच (दर्शन से) घटना के कारण को जानने की रही होगी ? तब प्रश्न रहा होगा : "ऐसा क्यों ?" अवश्य ही यह प्रश्न डर से उत्पन्न हुआ होगा।
2. दूसरी सोच उन घटनाओं पर नियंत्रण पाने की रही होगी। यह उन मनुष्यों की आवश्यकता थी।
3. तीसरी सोच उन घटकों और घटनाओं के उपयोग को लेकर रही होगी। जिससे कि तकनीक का विकास हुआ। यह आज की जरुरत है।
4. चौथी सोच प्रकृति और भौतिकी के प्रकार्य (Function) को जानने के लिए रही होगी। यह सोच विज्ञान का प्रारंभिक प्रश्न है। क्योंकि यह प्रश्न "कैसे" के बारे में जानने के लिए किया जाता है। इन प्रश्नों के उत्तर में विषय संबंधी वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक विधियां, संभावित परिणाम और समस्याओं का समाधान छुपा होता है।

वर्तमान मनुष्य की किस सोच के रहते विज्ञान अपना कार्य प्रारम्भ करता है ? वे सोच निम्न हैं :
1. मूल प्रश्न "ऐसा ही क्यों ?" निर्भरता को कम करने और विकल्प जानने के लिए किया जाता है।
2. बार-बार ऐसा क्यों होता है ? इस प्रश्न के द्वारा समय और निश्चितता का ज्ञान होता है।
3. हर बार ऐसा क्यों होता है ? कारण और परिणाम को जानने के लिए ताकि ज्ञान को उपयोग में लाया जा सके।
4. यदि ऐसा-ऐसा है तो ऐसा होना चाहिए ! संगतता के आधार पर पुरानी धारणाओं पर प्रश्न उठाए जाते हैं और प्रमाणित/ज्ञात ज्ञान के द्वारा अज्ञात को जानने का प्रयास किया जाता है।
5. यदि इसका अस्तित्व है तो ऐसा-ऐसा करना संभव है ! संगतता के आधार अनुसंधान और आविष्कार किये जाते हैं।
6. इस सुंदरता का क्या राज है ? प्रकृति के रहस्य को सुलझाया जाता है। छुपे ज्ञान को खोजा जाता है।
7. वह ऐसा कर सकता है तो क्या मैं भी ऐसा कर सकता हूँ ? भौतिकी के प्रकार्य (Function) को समझा जाता है।

चर्चा के विषयों में वर्तमान मनुष्य की ये सोच विज्ञान के होने की संभावना को व्यक्त करती हैं। विज्ञान के कार्यक्षेत्र को निर्धारित करने वाली गिनी-चुनी शर्तों के बारे में हम दूसरे लेख में चर्चा करेंगे। याद रहे ये सोच वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत भी आती हैं। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र विज्ञान के कार्यक्षेत्र से बहुत व्यापक होता है।

ज्ञान की यथार्थ और सतत खोज, विज्ञान है।
अनेक पुस्तकों और लेखों के माध्यम से जानकारी मिलती है कि लगभग चार सौ वर्ष पहले तक विशेषज्ञता नाम की कोई चीज नहीं होती थी। विद्वान एक से अधिक विषयों के ज्ञाता होते थे। वे सभी बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्ति होते थे जो जिस विषय में हाथ आजमाते थे। वे उसी विषय में परंपरागत हो जाते थे। हालाँकि विशेषज्ञता का अपना अलग महत्व होता है क्योंकि इससे उत्पादन कईयों गुना बढ़ जाता है। उत्पादित वस्तु की गुणवत्ता में सुधार और वृद्धि होती है। तथा विषय की समझ होने से रोजगार में बढ़ोत्तरी होती है। इन कारणों से विज्ञान प्राचीन काल से ही अन्य दूसरे सामाजिक विषयों (धर्म, आध्यात्म और दर्शन इत्यादि) का सहायक बना रहा। सोलहवीं शताब्दी के आसपास विज्ञान, ज्ञान की अन्य धाराओं से अलग हुआ और एक नए विषय के रूप में सामने आया। जिसके कारण विज्ञान और मानव जाति ने कम समय में बहुत अधिक विकास किया।
धर्म, हमें यह बताता है कि हमें क्या-क्या करना चाहिए ? जबकि विज्ञान हमें यह सिखाता है, हमें उसे कैसे करना चाहिए ?
प्रश्नों के इन प्रकारों को देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि किस तरह से विज्ञान सहायक विषय के रूप में उपयोगी था। और आखिर विज्ञान का इतने वर्षों में विकास क्यों नहीं हो पाया था ? जबकि बाद के इन चार सौ वर्षों में विज्ञान ने पहले की तुलना में हज़ारों गुना विकास करके दिखाया है। याद रहे, विज्ञान कभी भी मनुष्यों को निर्देशित नहीं करता है और न ही कभी कर सकता है। क्योंकि निर्देशित करना, विज्ञान की प्रकृति नहीं है। विज्ञान सदैव मार्ग प्रशस्त करता है। हमारे लिए विकल्प खोजता है। यह उसकी प्रकृति भी है और उसकी उपयोगिता भी है। इसलिए विकल्प खोजने की वजह से विज्ञान में कट्टरता नहीं होती।

प्रमाण देना या प्रमाण मांगना विज्ञान नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जिसे आज हम विज्ञान की प्रमुख शर्त कहते हैं। ताकि समाज खोजे गए ज्ञान और आविष्कार को निःसंकोच स्वीकार सके। विज्ञान का अर्थ सिर्फ खोजने तक सीमित होता है उस खोजे गए ज्ञान को प्रमाणित करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण कहलाता है। वैज्ञानिकों के इस दृष्टिकोण के रहते विश्वस्तरीय वैज्ञानिक समुदाय का गठन हो रहा है। एक देश के वैज्ञानिक दूसरे देशों के वैज्ञानिकों से जुड़ रहे हैं। न केवल ज्ञान और तकनीक का आदान-प्रदान कर रहे हैं। बल्कि वैज्ञानिक एक साथ मिलकर प्रयोग कर रहे हैं, आकंड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं। और वैज्ञानिक विधियों को एक दूसरे से साझा कर रहे हैं। ताकि निष्कर्षों में कोई त्रुटि न रह जाए।
अल्बर्ट आइंस्टीन अपनी होने वाली पत्नी मिलेवा के साथ चर्चा कर रहे थे। उन्होंने यह कहते हुए सर आइजक न्यूटन के नियमों पर संदेह किया "संभव है कि न्यूटन के नियम गलत हों क्योंकि वे अपने नियमों के प्रमाण नहीं देते हैं।"
इसे कहते हैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण !! संदेह करना, आशंका जताना, समस्या को पहचानना, कारण जानना, परिभाषित करना और प्रतिरूपों की पहचान करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जबकि भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया का ज्ञान विज्ञान कहलाता है। संभव है कि चार सौ वर्ष पहले तक विज्ञान में प्रमाण की आवश्यकता को महसूस नहीं किया गया था। इसके निम्न दो कारण हो सकते हैं।
  1. समाज द्वारा विज्ञान का विषय के रूप में स्वतंत्र अस्तित्व न स्वीकारना।
  2. उस समय तक ज्ञान की प्रमाणिकता परीक्षण विधि द्वारा सिद्ध होती थी।
कुछ लोगों को भ्रम है कि भौतिकी/भौतिक विज्ञान ही सम्पूर्ण विज्ञान है। जबकि भौतिकी, विज्ञान की एक शाखा है। जिसका विकास "प्रकृति और दर्शन" के अध्ययन से हुआ है। इसलिए 19 वीं शताब्दी के अंत तक भौतिकी को 'प्राकृतिक दर्शन' (Natural Philosophy) कहा जाता था। इसके अलवा 20 वी. शताब्दी के दूसरे दशक तक गणित को दर्शन विभाग/संकाय के अंतर्गत रखा जाता था। आज भी विज्ञान में नई-नई शाखाओं का उदय हो रहा है। जिनका ज्ञान हमें पहले भी था। परन्तु विज्ञान की ये शाखाएं अन्य शाखाओं/विषयों के अंतर्गत रखी जाती थीं। अन्य शाखाओं की सहयोगी मानी जाती थीं। क्योंकि उस क्षेत्र में अध्ययन कार्य और शोध कार्य कम होते थे। इन शाखाओं के अलग हो जाने से विज्ञान के उस क्षेत्र में चरघातांकी विकास देखने को मिलता है। इसलिए सम्पूर्ण विज्ञान को भौतिकी (भौतिक विज्ञान) या उसकी एक शाखा का नाम देना गलत है। शरीर के एक अंग को सम्पूर्ण शरीर कहना गलत है।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान प्राचीन ज्ञान नहीं है। बल्कि उसका उद्भव चार सौ वर्ष पहले पश्चिमी देशों में हुआ था। संभव है कि ये लोग औद्योगिक विकास (तकनीकी ज्ञान) को ही विज्ञान समझते हैं। क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों, कंप्यूटर, आधुनिक हथियारों, खगोलीय यात्राओं जैसी बड़ी-बड़ी उपलब्धियां मानव जाति को इन चार सौ वर्षों में प्राप्त हुई हैं। विज्ञान को प्राचीन ज्ञान न मानने के पीछे तीन प्रमुख कारण हो सकते हैं। जिनकी सही समझ न होने की वजह से विज्ञान के उद्भव के बारे में लोगों की गलत धारणा बन गई है। इनमें से पहला कारण विज्ञान की प्रकृति को लेकर है। जिसके चलते आज हम वर्तमान को वैज्ञानिक युग कहते हैं। दूसरा कारण विज्ञान की एक अभिधारणा है जिसके अनुसार विज्ञान में संशोधन और विस्तार करना संभव होता है। और तीसरा प्रमुख कारण वैश्विक राजनीति है जिसके चलते पूरे विश्व में लगभग 500-600 वर्ष तक कोई नई खोज नहीं हुई थी। बल्कि दबी आवाज में वैज्ञानिक युग की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी। वे कारण निम्न हैं :

1. विज्ञान की प्रकृति : ज्ञान की संचायशीलता विज्ञान की प्रकृति है। इसके बारे में सर आइजक न्यूटन ने सन 1676 में रोबर्ट हूक को एक पत्र लिखा था : "यदि मैं दूसरों से कुछ अधिक दूर तक देख पाया हूँ तो इसलिए कि मुझे अपने पूर्वज विद्वानों के कन्धों पर खड़े होकर देखने का अवसर मिला है।"
2. विज्ञान की अभिधारणा : यह अभिधारणा विज्ञान की प्रकृति का ही विस्तार है। जिससे हमें विज्ञान के कार्य करने के तरीके के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। "सभी पुराने सिद्धांत विषय संबंधी नए सिद्धांत के उपसिद्धान्त कहलाते हैं।" फलस्वरूप सिद्धांतों पर आधारित सभी (नए और पुराने) तथ्य नए सिद्धांत के सहायक तथ्य कहलाते हैं। और ये सभी तथ्य नए सिद्धांत द्वारा एक-दूसरे के संगत होते हैं। इसलिए विज्ञान एक पद्धति है।
3. सूचना के साधनों में विकास होने से सूचना की क्रांति आई। विचारों का आदान-प्रदान बड़ी तीव्रता के साथ बढ़ने लगा। जिससे लोगों में शंकाए बढ़ने लगीं। धार्मिक दर्शन (विषय) वैज्ञानिक दर्शन में परिवर्तित होने लगा। और तब जाकर "प्रयोग" आधारित विज्ञान की एक नई कार्यविधि का उदय हुआ। जिसमें कहा गया "हर ज्ञान की सार्थकता को प्रयोगों द्वारा परखा जाना चाहिए। यही विज्ञान की असली कसौटी है।" मजेदार बात यह है कि यह कथन किसी वैज्ञानिक ने नहीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले दार्शनिक रॉजर बेकन (Roger Bacon : 1214-92 ई.) ने कहे थे। उन्होंने प्राकृतिक नियमों को प्रयोगों द्वारा खोजे जाने का सुझाव दिया था।

जिस औद्योगिक विकास को देखकर हम वर्तमान को वैज्ञानिक युग कहते हैं। यह बहुत कम समय में संभव हुआ है। क्योंकि इसमें विशेषज्ञता का बहुत बड़ा महत्वपूर्ण योगदान है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि मशीनी उपकरण इससे पहले उपयोग में नहीं लाए जाते थे और उनका निर्माण नहीं हुआ था ! विज्ञान के लगभग हर क्षेत्र में तकनीकी विकास पहले भी हुआ है। मनुष्य के पास तकनीकी ज्ञान पहले भी था। शस्त्रों (बारूद का उपयोग भी), बड़े-बड़े जहाजों, पनचक्कियों (ज्वर-भाटे की ऊर्जा का उपयोग भी), पवनचक्कियों, पीसने और काटने की मशीनों, कागज बनाने के लिए कारखाने, छपाईखाना, दिशासूचक यंत्र और प्रोजेक्टर आदि का निर्माण पहले ही हो चुका था। भवन निर्माण की तकनीक के हज़ारों उदाहरण पूरे विश्व में आज भी देखने को मिलते हैं। याद रहे यहाँ "विज्ञान" (प्राचीन) के बारे में नहीं अपितु "तकनीकी उपलब्धियों" की चर्चा हो रही है। प्राचीन विज्ञान के एक नहीं हज़ारों/लाखों उदाहरण हैं। जिनमें से बहुत से आज भी प्रमाणित हैं।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान का उद्भव धर्म/रूढ़िवादी धारणाओं के विरोध के रूप में हुआ है। क्योंकि धार्मिक/रूढ़िवादी लोगों ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों को मारना शुरू कर दिया था। उन पर दबाब दिए जाते थे। उनको धर्म के विरोध में खोज करने के लिए मनाही थी। उनकी पुस्तकों को जला दिया जाता था। उनको पढ़ने और प्रचारित करने की मनाही थी। उदाहरण के लिए जियोर्दानो ब्रूनो (Giordano Bruno : 1548 – 1600) को जिंदा जला दिया गया था। कोपरनिकस, केप्लर और गैलिलियो पर अनेक बार उनकी खोजों को लेकर दबाब बनाया गया था। तभी से विज्ञान का उद्भव हुआ है, ऐसा लोग कहते हैं। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के दबाब और बुरे कृत्य इससे पहले कभी नहीं हुए थे। बेशक ये दबाब धार्मिक रूप से दिए गए थे। परन्तु अब हम जो उदाहरण दे रहें हैं उनके पीछे हमें नहीं लगता कोई भी धार्मिक कारण रहे होंगे। पहला उदाहरण अनेक्सागोरस (Anaxagoras 510 ई.पू. - 428 ई.पू.) को इस घोषणा के लिए मौत के घाट उतार दिया गया था क्योंकि उन्होंने कहा था "चन्द्रमा उन्ही तत्वों से बना है जिनसे यह पृथ्वी बनी है।" दूसरा उदाहरण सन 415 ईस्वी में अलेक्जेंड्रिया की महिला और अंतिम वैज्ञानिक/गणितज्ञ हाईपटिया (Hypatia : 351 - 415 ई.) की हत्या कट्टरपंथियों ने कर दी गई थी।

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि विज्ञान सिर्फ प्रयोग आधारित ज्ञान है। परन्तु यदि ऐसा होता तो आज हम शायद ही यह विकास देख पाते। वास्तव में वैज्ञानिक ज्ञान को प्रमाणित करने और सिद्धांतों में आवश्यक संशोधन करने के लिए ही प्रयोग किये जाते हैं। हाँ, यह सही है कि ज्ञान की बहुत ही शाखाओं का उदय प्रयोग द्वारा संभव हुआ है। क्योंकि प्रयोग द्वारा प्राप्त परिणाम हमारे सिद्धांतों से मेल नही खाते थे। फलस्वरूप नए निष्कर्षों के संगत सिद्धांतों में परिवर्तन करना पड़ता था। कई बार तो सिद्धांत प्रयोगों में खरे नहीं उतरते थे। तो उन्हें गलत मान लिया गया। स्पष्ट है कि विज्ञान सिर्फ प्रयोग आधारित ज्ञान नही है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन का कोई भी सिद्धांत प्रयोग आधारित नहीं था। तो क्या अब आप उसे भी विज्ञान में शामिल नहीं करेंगे। विज्ञान में अल्बर्ट आइंस्टीन का कार्य निगमन विधि के अंतर्गत रखा जाता है। न कि आगमन विधि, जो प्रयोग आधारित होती है। सही पूछा जाए तो इसके अलावा 1865 के बाद से ही विज्ञान में खोजों का कार्य निगमन विधि के अंतर्गत सिद्धांतों के माध्यम से हुआ है। आधुनिक विज्ञान की पूरी नीव इन्ही सिद्धांतों पर टिकी है। महत्वपूर्ण यह है कि वे सिद्धांत भविष्यवाणी कर सकें। यदि वे भविष्यवाणियां सत्य होती हैं तो सिद्धांतों को सही मान लिया जाता है। यही पद्धति तो प्राचीन काल में भी अपनाई जाती थी। जो सिद्धांत समय के साथ घटनाओं की व्याख्या करने में समर्थ नहीं पाए जाते थे। तो उनमें या तो संशोधन कर दिया जाता था या उन्हें हटा दिया जाता था। प्राचीन खगोल विज्ञान के कई सिद्धांत और तथ्य आज भी सही हैं। और बहुत से गलत भी सिद्ध हुए हैं।

सुविज्ञानं चिकितुषे जनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते ।
तयोर्यत् सत्यं यतरदृजीयस्तदित् सोमोऽवति हन्त्यासत् ।। ऋग्वेद - 7.104.12, अथर्ववेद - 8.4.12

विज्ञान यदि लगभग चार सौ वर्ष पूर्व का ज्ञान होता तो शायद विज्ञान शब्द का उल्लेख चार सौ वर्ष पहले के साहित्य में नहीं मिलना चाहिए था। परन्तु विज्ञान शब्द का उल्लेख तो इस ऋचा में भी पढ़ने को मिलता है। अनेक ग्रन्थ और पुराणों में भी एक नहीं हज़ारों बार पढ़ने को मिलता है। परन्तु इसका यह मतलब भी नहीं है कि वेदों, ग्रंथों, पुराणों और उपनिषदों में पूरा ज्ञान-विज्ञान है। ऐसा सोचना भी गलत है। यहाँ तक की हम जो विज्ञान की परिभाषा कहते हैं। वह संस्कृत/भारतीय वाग्ङमय से ली गई परिभाषा है। जिसके अनुसार प्रकृति के क्रमबद्ध या विशिष्ट/विशेष ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान की परिभाषा विज्ञान शब्द को संधि-विच्छेद करने से समझ में आ जाती है। जिसके बारे में प्रसिद्द दार्शनिक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes : 1588-1679) ने कहा है "एक तथ्य से दूसरे तथ्य पर आधारित और परिणामी ज्ञान विज्ञान कहलाता है।"

यदि हम आज की उन्नति को देखकर 400 सौ वर्ष पहले के काल को विज्ञान के उद्भव का काल मान भी लेते हैं। तो रॉजर बेकन (Roger Bacon : 1214-92 ई.) की उस भविष्यवाणी क्या ? जिसमें कहा गया है कि स्वचालित वाहन और उड़न यान बनाना संभव है। उन्होंने कांच के माध्यम से लेंस बनाकर चश्मे बनाने का सुझाव दिया था। बारूद बनाने का सूत्र खोजा था। गणित, भौतिकी, दर्शन इत्यादि विषयों पर तीन ग्रन्थ लिखे थे। जो आगे चलकर कोपरनिकस, गैलेलिओ, फ्रांसिस बेकन तथा न्यूटन के अनुसंधानों का आधार बने थे। ठीक इसी प्रकार फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon : 1561 -1626 ई.) ने भी भविष्य में होने वाली औद्योगिक क्रांति का आधार छापाखाना, बारूद और दिशासूचक को बताया था। इस तरह विज्ञान के उद्भव का काल धीरे-धीरे पीछे होता हुआ प्रतीत होता है। जो प्राचीन काल तक पहुँच जाता है। और यदि सच में विज्ञान का उद्भव चार सौ वर्ष पूर्व हुआ होता। तो रिवरसाइड चर्च में प्राचीन वैज्ञानिकों की मूर्तियां न लगाई जातीं। क्योंकि प्राचीन वैज्ञानिकों के नाम को सूची में शामिल करने का सुझाव तो वैज्ञानिकों और विश्वविद्यालयों ने ही दिया था।

सर अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रसिद्धि

सर अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम पूरे विश्व में प्रसिद्द है। विज्ञान संकाय के विद्यार्थी से लेकर दर्शन, कला, राजनीति और अर्थशास्त्र तक के विद्यार्थी सर अल्बर्ट आइंस्टीन का नाम और उनकी खोज के बारे में जानते हैं। आप अपने विचार रखिये और बस यह कह दीजिये कि यह विचार/कथन सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहे हैं। तो शायद ही कोई उस विचार/कथन से असहमति जताता है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन आज हमारे बीच में न रहते हुए भी चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। क्योंकि विज्ञान में खोज और घटनाओं को लेकर उनकी भविष्यवाणियां आज भी सच साबित हो रही हैं। इसलिए उनका नाम सिर्फ विज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समाज से सरोकार रखने वाला व्यक्ति भी उनके नाम से परिचित है।

पश्चिमी द्वार | स्रोत
पश्चिमी द्वार का दक्षिणी भाग | स्रोत

एक उदाहरण है जो सर अल्बर्ट आइंस्टीन की प्रसिद्धि को जगजाहिर करता है। डॉ हैरी एमर्सन फॉस्डिक सन 1925 में रिवरसाइड चर्च के मंत्री के पद के लिए चुने गए थे। वे आधुनिकवाद और रूढ़िवाद के बीच की बहस में हमेशा फंसे रहते थे। उन्होंने अनेक बातों की परवाह किये बिना सन 1929 में चर्च की एक नई और बड़ी ईमारत बनाने की योजना बनाई। तो जॉन डी रॉकफेलर जूनियर ने उस ईमारत के लिए वित्तीय सहायता की व्यवस्था की। यह प्रोटेस्टेंट चर्च हडसन नदी पर नदी के किनारे न्यूयॉर्क शहर में बनाया जाना था। जिसके पश्चिमी द्वार में उस समय तक के विश्व प्रसिद्द 600 महान व्यक्तियों की मूर्तियां लगाई जानी थी। डॉ हैरी एमर्सन फॉस्डिक ने लगभग-लगभग सभी बड़े विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों को खत भेजकर महान वैज्ञानिकों के नामों की सूची देने के लिए निवेदन किया। योजना के अनुसार सिर्फ 14 महान वैज्ञानिकों की मूर्तियां द्वार में लगाई जानी थीं।

सर अल्बर्ट आइंस्टीन (दाहिने हाथ से दूसरे) | स्रोत

लम्बी बहस के बाद अंततः सर अल्बर्ट आइंस्टीन न केवल वैज्ञानिकों बल्कि उन सभी 600 महान व्यक्तियों (महात्माओं, दार्शनिकों, राजाओं, वैज्ञानिकों आदि) में से एक मात्र ऐसे महान व्यक्ति थे, जिनके जीते जी उनकी मूर्ति को चर्च के द्वार पर लगाया गया था। उससे भी मजेदार बात यह थी कि सर अल्बर्ट आइंस्टीन एक मात्र ऐसे वैज्ञानिक थे जिनका नाम सभी विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों की सूची में शामिल था। जबकि आर्किमिडीज, यूक्लिड, गैलेलियो और न्यूटन का नाम अधिकतर सूचियों में ही शामिल था। ईमारत के तैयार हो जाने के बाद सन 1930 में न्यूयॉर्क दौरे पर सर अल्बर्ट आइंस्टीन और उनकी पत्नी रिवरसाइड चर्च गए थे। जहाँ पर उन्होंने स्वयं की मूर्ति के अलावा हिप्पोक्रेट्स, यूक्लिड, पाइथागोरस, आर्किमिडीज, गैलीलियो, केपलर, न्यूटन, फैराडे, डार्विन और पाश्चर जैसे महान वैज्ञानिकों की मूर्तियां देखी थीं। जिन्हें देखते हुए उन्होंने शरारती मुस्कान के साथ कहा था कि "इन मूर्तियों का केवल एक ही जीवित प्रतिनिधि है और वह मैं स्वयं हूँ।"

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