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विज्ञान जगत में : हमारे अधिकार

विज्ञान जगत : मनुष्यों द्वारा निर्मित एक ऐसा समाज जहाँ प्रत्येक मनुष्य खोज और उस खोज के उपयोग को लेकर पूर्णतः स्वतंत्र होता है। विज्ञान जगत कहलाता है। "विज्ञान क्या है ?" के उत्तर से एक बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि आखिर क्यों मनुष्य को विज्ञान जगत में समानता और स्वतंत्रता का अधिकार है। जहाँ एक तरफ "समानता का अधिकार" हमें प्रकृति ने दे रखा है। जिसका अध्ययन हम वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से करते हैं। वहीं दूसरी तरफ "स्वतंत्रता का अधिकार" हमें विज्ञान की प्रकृति (संचयशीलता) से प्राप्त है। विज्ञान जो एक पद्धति है। जिसमें विकल्प के लक्षण होते हैं। जहाँ किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं होती है। संचयशीलता जिसकी प्रकृति होती है। उसी विज्ञान ने हमें उसके उपयोग और उसकी नयी-नयी शाखाओं की खोज की स्वतंत्रता दे रखी है।

विज्ञान के सम्पूर्ण इतिहास और वैज्ञानिक विधियों के विकास पर गौर करने से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहली : विज्ञान की भिन्न-भिन्न शाखाओं का प्रादुर्भाव अलग-अलग समय में हुआ है। और दूसरी : भले ही वैज्ञानिक विधियों का विकास प्रकृति के अध्ययन से शुरू होकर आज उसके उपयोग तक जा पहुंचा है। परन्तु हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते हैं कि वैज्ञानिक विधियों के विकास के साथ ही साथ समाज में उसका चलन भी रहा है ! यदि ऐसा हुआ होता तो आज समाज में सिर्फ परीक्षण विधि का ही उपयोग होता। प्रेक्षण और प्रयोग विधि इस समाज से अपना अस्तित्व खो चुकी होतीं। परन्तु ऐसा नहीं है। हम आज भी अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से इन वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करते हैं। तत्पश्चात खोज की प्रमाणिकता अन्य दूसरी वैज्ञानिक विधि से भी सिद्ध करते हैं।
यह आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक विधियों और विचारधाराओं की शक्ति के प्रति सजग हमारे समाज ने स्वयं अपने जीवन को सुव्यवस्थित करने में इन विधियों का उपयोग नहीं किया है। विज्ञान ने स्वयं हमें अपने ऊपर पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है और स्वयं अपनी तथा अपनी सामाजिक सत्ता की सफलताओं को सुनिश्चित किया है। परन्तु हमने स्पष्ट और सरल वैज्ञानिक संकल्पनाओं की तुलना में अठारहवीं शताब्दी की दार्शनिक विचारधाराओं की कोरी कल्पनाओं को अधिक पसंद किया है।
- डॉ. अलेक्सिस कैरेल (चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित)
वृद्धि और विकास दोनों भिन्न-भिन्न चीजें हैं। जहाँ एक तरफ वृद्धि का आशय किसी एक विशेष गुण अथवा भौतिक राशि के मान में बढ़ोत्तरी से होता है। वहीँ दूसरी तरफ विकास का आशय आवश्यक गुणों अथवा तत्वों की संख्या और उनके मान में बढ़ोत्तरी से होता है। वृद्धि एक आयाम में बढ़ोत्तरी है जबकि विकास बहुआयम में बढ़ोत्तरी है। भौतिक रूपों और घटनाओं की जानकारी में बढ़ोत्तरी होना ज्ञान में वृद्धि है। जबकि विज्ञान और तकनीक में नयी-नयी शाखाओं की खोज तथा वैज्ञानिक विधियों और प्रक्रियाओं का उपयोग विज्ञान का विकास है। इस प्रकार विज्ञान और तकनीक के विकास में मानव जाति का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यदि किसी कारण से मानव जाति नष्ट हो जाती है। तो विज्ञान अपना अस्तित्व खो देगा। विज्ञान ने मनुष्य को पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है। अर्थात विज्ञान ने मनुष्य को निम्न स्वतंत्रता दे रखी है।

समानता का अधिकार :
"विज्ञान में प्रत्येक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के कार्य को बराबर महत्व दिया जाता है।"
विस्तार : किसी भी उम्र और देश का नागरिक, शिक्षित-अशिक्षित, स्त्री-पुरुष कोई भी व्यक्ति खोज कर सकता है। और अपनी बात समाज के सामने रख सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की खोज को उतना ही महत्व दिया जाता है। जितना कि एक खोजकर्ता और वैज्ञानिक को दिया जाता है। शर्त सिर्फ इतनी सी होती है कि "उसकी खोज मानव जाति की समझ को विकसित कर सके।" अर्थात वह खोज ज्ञात ज्ञान के संगत होनी चाहिए। यह विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा का ही परिणाम है कि आज विज्ञान इतना विकास कर पाया है।

विज्ञान में मुख्य रूप से प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। और चूँकि प्रकृति दो समरूप चीजों में भेदभाव नहीं करती है। इसलिए प्रयोग द्वारा क्रियाविधि का दोहराव किया जाता है। जिस निष्कर्ष पर वैज्ञानिक समुदाय पहुँचता है। ठीक उसी निष्कर्ष पर हम भी पहुँचते हैं। जो आश्चर्यजनक कार्य एक जादूगर कर सकता है। उसी कार्य का दोहराव हम भी कर सकते हैं। अर्थात प्रकृति ने भेदभाव न करके हम सभी मनुष्यों को विज्ञान में बराबरी का अधिकार दिया है।

प्रकृति के समक्ष समानता
स्वतंत्रता का अधिकार :
1. प्रश्न उठाने को लेकर स्वतंत्रता : हम किसी भी समय किसी भी सिद्धांत, नियम, तथ्य अथवा जानकारी की प्रमाणिकता को लेकर प्रश्न उठा सकते हैं। फिर चाहे उस सिद्धांत का प्रतिपादन एक वैज्ञानिक ने ही क्यों न किया हो ! उन नियमों और तथ्यों को एक खोजकर्ता ने ही क्यों न खोजा हो ! जानकरी की आँखों देखी प्रमाणिकता भले ही लाखों लोग स्वयं क्यों न देते हों। इसके बाद भी हम असंगत अथवा अपवाद स्वरूप घटना या भौतिकता के किसी भी रूप की जानकारी देकर पुरानी मान्यताओं पर प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं।

2. खोज या मापन में विधि और प्रक्रिया के उपयोग को लेकर स्वतंत्रता : मनुष्य खोज करने के लिए किसी भी विधि का उपयोग कर सकता है। परन्तु जब उसकी यह खोज एक से अधिक विधियों द्वारा परखी जा चुकी होती है। तब वह खोज प्रमाणित मानी जाती है। ठीक इसी प्रकार मापन की प्रक्रिया को लेकर भी मनुष्य स्वतंत्र होता है। शर्त सिर्फ इतनी सी होती है कि भौतिक राशियों को मापने का उद्देश्य पूरा होना चाहिए। अर्थात परिणाम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। परन्तु निष्कर्ष एक होना चाहिए। इसका सबसे अच्छा उदाहरण समय और गति को सापेक्ष मानकर उसका मापन करना है।

3. प्रमाण जुटाने और उसके उपयोग की स्वतंत्रता : 

4. विज्ञान में नयी शाखाओं की खोज को लेकर स्वतंत्रता : विज्ञान की नयी शाखाओं की खोज भले ही एक संयोग होता है। परन्तु उस शाखा का एक नयी शाखा के रूप में विकास मनुष्यों का सामूहिक निर्णय होता है। उसे चर्चा के रूप में एक विषय बनाना हम मनुष्यों की आवश्यकता और इच्छा पर निर्भर करता है। शाखाओं की खोज का संयोग भी मनुष्यों की आवश्यकता और इच्छा का ही परिणाम होता है। जिसे असंगतता में विज्ञान की शर्तों के क्रियान्वय होने पर खोजा जाता है।

5. विज्ञान की खोज और उसकी उपयोगिता को लेकर स्वतंत्रता : भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती हैं। इन खोजों से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती है। जबकि इन्ही खोजों के अलावा जब हम वैज्ञानिक विधियों, प्रक्रियाओं और विज्ञान की शाखाओं की खोज करते हैं। तो विज्ञान में विकास होता है। हम विज्ञान की विभिन्न शाखाओं से ज्ञान में वृद्धि करने उसके उपयोग से तकनीक विकसित करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं।

हम न ही आने वाली पीढ़ी को और न ही अन्य दूसरे लोगों को खोज की प्रमाणिकता के लिए अन्य दूसरी वैज्ञानिक विधियों को उपयोग में लेने को बाध्य कर सकते हैं। और न ही वैकल्पिक युक्तियों की खोज के लिए बाध्य कर सकते हैं। विज्ञान के उपयोग से तकनीक विकसित करने के लिए हम पूर्णतः स्वतंत्र हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखें और उनका पालन करें। फिर चाहे उस तकनीक/उपकरण/साधन का उपयोग मानव जाति के हित में हो अथवा न हो !

6. विज्ञान के प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता : मनुष्य का विज्ञान पर विश्वास तथा उसका प्रचार-प्रसार वैज्ञानिक पद्धतियों और मनुष्य की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। हमारी अपनी आवश्यकता देश-काल के आधार पर बदलती रहती है। इसके बाबजूद हम विकल्प प्रस्तुत करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। क्योंकि देखा गया है कि हमारी आवश्यकता को एक ही तकनीक पूरा नहीं कर पाती है। फलस्वरूप हमें अन्य दूसरी तकनीक भी विकसित करनी होती है। हम जिस प्रकार विज्ञान के प्रचार-प्रसार द्वारा विकल्प प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होते हैं ठीक उसी प्रकार समाज भी उसके उपयोग को लेकर पूर्णतः स्वतंत्र होता है।

विशेष बिंदु :
विज्ञान, मनुष्य को कभी भी निर्देशित नहीं करता है कि उसे क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। बल्कि मनुष्य जो करना चाहता है। उस कार्य को कैसे करना चाहिए अर्थात उस कार्य को कैसे किया जा सकता है ? के बारे में विज्ञान युक्ति, विधि, प्रक्रिया और उसके साधनों का सुझाव उपलब्ध कराता है। अर्थात हम सुझाव को मानने या न मानने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। वैकल्पिक युक्तियों अथवा साधनों के चुनाव के लिए भी स्वतंत्र होते हैं। यहाँ स्वतंत्रता का आशय "मनुष्य स्वयं तथा विज्ञान के विकास के लिए मनुष्य किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं होता है" से है।

विज्ञान ने स्वयं हमें अपने ऊपर पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है। अर्थात जिस प्रकार संविधान की प्रस्तावना में वर्णित "सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न" शब्द का आशय "इस देश की अच्छाई-बुराई के लिए हमारे अपने निर्णय जिम्मेदार होंगे। हमें किसी भी दूसरे व्यक्ति के कहे पर चलने की आवश्यकता नहीं है। हम निर्णय लेने में स्वयं सक्षम/समर्थ हैं।" से होता है। ठीक उसी प्रकार विज्ञान के उपयोग को लेकर भी हम मनुष्य सक्षम हैं। क्योंकि विज्ञान खोजे गए ज्ञान द्वारा मनुष्य की समझ विकसित करता है। खोजे गए ज्ञान के साथ-साथ जब हम उस विधि या प्रक्रिया को समाज के सामने रखते हैं। जिसके उपयोग से हमने खोज की है। तो विज्ञान हमे उसके उपयोग को लेकर निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। इसलिए हम स्वीकारते हैं कि आने वाला परिणाम हमारे अपने निर्णय की प्रतिक्रिया होती है। हम स्वयं इस परिणाम के लिए जिम्मेदार होते हैं। परिणाम की अच्छाई या बुराई हमारे अपने निर्णय का परिणाम होता है। अर्थात विज्ञान न ही अच्छा है और न ही बुरा है। उसका उपयोग कैसे करना है ? यह हम मनुष्यों पर निर्भर करता है।

"विज्ञान में मनुष्य का प्रभुत्व" अर्थात विज्ञान के विकास की दर और उसकी अच्छाई-बुराई का परिणाम मनुष्य के निर्णय पर निर्भर करता है। जबकि "प्रकृति में मनुष्य का प्रभुत्व" अर्थात उस व्यवस्था रुपी तंत्र पर मनुष्य का नियंत्रण जिसके द्वारा वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है। आवश्यकतानुसार उस व्यवस्था में बदलाव कर सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी अधिक से अधिक समझ विकसित करे। और उसकी सीमाओं का निर्धारण करे। जबकि विज्ञान में मनुष्य का प्रभुत्व सिर्फ उसके उपयोग तक सीमित है। अर्थात विज्ञान के उपयोग को लेकर मनुष्य स्वतंत्र है। खोज करने के लिए स्वतंत्र है। परन्तु परिणाम प्रकृति निर्धारित करती है। विज्ञान में प्रभुत्व अर्थात रास्ते के चुनाव की स्वतंत्रता जबकि प्रकृति में प्रभुत्व अर्थात मंजिल रुपी व्यवस्था में आवश्यकतानुसार बदलाव...

विज्ञान के कार्यक्षेत्र की व्यापकता

जो (भी) है सिर्फ़ वही विज्ञान का कार्यक्षेत्र है। जबकि जो नही है वह भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत अाता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र न केवल विज्ञान के कार्यक्षेत्र से अधिक व्यापक होता है। बल्कि विज्ञान का कार्यक्षेत्र भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आता है।

जो (भी) है, एेसा क्यों है ? ऐसा कैसे है ? अर्थात भौतिकता के रूपों और घटनाओं के कारण तथा प्रकार्य को जानने/खोजने और उसका अध्ययन करने तक विज्ञान कार्य करता है। जबकि "यदि ऐसा नहीं होता" या " यदि ऐसा होता" के परिणामस्वरूप क्या होता को जानने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उपयोग किया जाता है। जो नहीं है और जो हो सकता है, उसके बारे में यथार्थता के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा जानकारी जुटाई जा सकती है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण संगतता पर आधारित होता है। इस आधार पर संभावनाओं को लेकर तर्क-वितर्क किए जा सकते हैं और चर्चा के दौरान सभी एक मत भी हो सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी सी है कि चर्चा के दौरान सभी पक्षों को विषय संबंधी कारक और घटकों की उपस्थिति तथा उनकी मात्रा की जानकारी पहले से ज्ञात होनी चाहिए।

विज्ञान का कार्य सभी स्तरों में प्रकृति के अध्ययन तक सीमित होता है।

दिन-रात क्यों होते हैं ? पाचनतंत्र कैसे कार्य करता है ? प्रश्नों के उत्तर विज्ञान द्वारा खोजे जाते हैं। जबकि यदि सूर्य नहीं होता तो क्या होता ? या मंगल ग्रह में जीवन होता तो कैसा (किस तरह का) होता ? प्रश्नों के उत्तर वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा दिए/खोजे जाते हैं।
विज्ञान, उस धारदार चाकू के समान है जिसका उपयोग करना हमारे हाथों में है। या तो आप उससे सब्जी/फलों को काटकर अपने दैनिक जीवन में उसका उपयोग कर सकते हैं। या फिर उससे किसी की हत्या करके पूरे जीवन जेल में रहकर हत्या का अफ़सोस मना सकते हैं। विज्ञान न ही अच्छा होता है और न ही बुरा। हमारे द्वारा उसको उपयोग में लाने के बाद विज्ञान के प्रभाव अच्छे और बुरे कहलाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में तकनीक विकसित करना असंभव है। अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा ही तकनीक को साकार रूप दिया जाता है। विज्ञान का उपयोग किया जाता है। आविष्कार किये जाते हैं। जो आज से पहले नहीं थे। उन्हें निर्मित किया जाता है। यह तब भी संभव है जब लोगों को तकनीकी ज्ञान होने के बाबजूद उसके पीछे का विज्ञान ज्ञात नही होता है। कंप्यूटर को कैसे उपयोग में लाया जाता है ? किस खराबी को कैसे दूर किया जाता है ? यह सब उन लोगों से बखूबी आता है। परन्तु यह क्यों किया जाता है ? कंप्यूटर कैसे कार्य करता है ? अर्थात उसके पीछे के विज्ञान से वे (लोग) अंजान रहते हैं। यह इस बात का संकेत है कि भले ही उन्हें विज्ञान का ज्ञान न हो। परन्तु उन लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जो समाज के लिए हितकारी है। परन्तु ऐसा होने से विज्ञान की उपयोगिता कम नही होती है। विज्ञान की अपनी यह विशेषता है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की व्यापकता में वृद्धि करता है। हमें जितनी अधिक विज्ञान की जानकारी होगी। हमारी दृष्टी संगतता के आधार पर उतनी ही व्यापक होती चली जाएगी। विज्ञान के माध्यम से हम यह भी जान पाएंगे कि जो (जिनका अस्तित्व) आज से पहले हमें असंगत प्रतीत होते थे। वे सभी संगत हैं। फलस्वरूप हम उनका भी आविष्कार कर पाएंगे। जो हमारी कल्पनाओं में तो पहले से उपस्थित थे। परन्तु उनका आविष्कार करना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता था।

विज्ञान का कार्यक्षेत्र भौतिकता के रूपों और घटनाओं के कारण तथा प्रकार्य को खोजने और उसे परिभाषित करने तक सीमित होता है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत विज्ञान का उपयोग समस्याओं को सुलझाने, परिभाषित ज्ञान के आधार पर तुलना करने और तकनीक विकसित करने में किया जाता है। विज्ञान का संबंध खोज तक सीमित होता है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध विज्ञान को खोजने के साथ-साथ उसकी उपयोगिता को निर्धारित करने में किया जाता है।

विज्ञान के विकास में : हमारे कर्तव्य

विज्ञान का उद्भव तब हुआ, जब मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए खोजना प्रारंभ किया। खोजे हुए ज्ञान को उपयोग में लाना सीखा। प्रकृति की सुंदरता के रहस्य को जानना शुरू किया। परन्तु विषय के रूप में विज्ञान का विकास समाज के अस्तित्व में आ जाने के बाद ही संभव हो सका है। लोगों ने आपस में समस्याओं को सुलझाने में अपने-अपने अनुभव साझा किये हैं। तब जाकर वैकल्पिक युक्तियों/तरीकों की खोज ने विज्ञान को परिभाषित किया है। और इसलिए ऐसा कहा जाता है कि विज्ञान एक पद्धति है। जो कार्य एक व्यक्ति से संभव नहीं हो सकता था। उस कार्य को लोगों ने मिलकर करना सीखा है। जिससे कि लोगों में आपसी समझ विकसित हुई है। और इस तरह से समय के साथ-साथ विज्ञान में भिन्न-भिन्न वैज्ञानिक विधियों का उदय हुआ है। विज्ञान का यह विकास कला, दर्शन, गणित और भाषा की अनुपस्थिति में असंभव था। विज्ञान ने कभी विश्व के किसी हिस्से में सभ्यता का विकास किया है। तो कभी विश्व के किसी दूसरे हिस्से में सभ्यता विकास किया है। एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में विज्ञान और तकनीक के प्रचार-प्रसार का कार्य व्यापारी लोगों द्वारा होता आया है। ऐसा नहीं है कि व्यापारी लोग विज्ञान के प्रचार-प्रसार करने के लिए बाध्य होते थे। या वे विज्ञान के प्रचार-प्रसार की इच्छा रखते थे। बल्कि यह प्रचार-प्रसार व्यापार के लिए की जाने वाली लम्बी-लम्बी यात्राओं के माध्यम से स्वतः होता गया है।

विज्ञान में प्रयोग विधि द्वारा चरघातांकी विकास हुआ है। जिसको विज्ञान में अधिक से अधिक उपयोग में लाने का सुझाव लगभग 800 वर्ष पहले दे दिया गया था। परन्तु यह विधि लगभग 400 वर्ष पहले से चलन में आई है। सभ्यताओं के विकास और उसके पतन दोनों में विज्ञान की भूमिका होती है। विज्ञान को किस तरह से उपयोग में लाना चाहिए ? इस विषय में लम्बी चर्चा की जा सकती है। परन्तु सामाजिक प्राणी होने के नाते विज्ञान के विकास में हम मनुष्यों के क्या-क्या कर्तव्य होने चाहिए ? आज का यह लेख इसी विषय पर लिखा गया है। जो कर्तव्य निम्न हैं।

  • हमें निम्न संभावनाओं के रहते हुए भी खोज या अविष्कार को समाज के सामने लाना चाहिए।
1. भविष्य में स्वयं की खोज या तथ्य के गलत होने या अविष्कार के मूलस्वरूप में परिवर्तन की संभावना रहने पर
2. पुरानी सामाजिक धारणाओं के खंडित होने या किसी महान वैज्ञानिक/नेता की खोज/सिद्धांत के गलत होने की संभावना रहने पर
3. खोज या अविष्कार के दुरुपयोग होने की संभावना रहने पर भी
स्पष्टीकरण : विज्ञान की अभिधारणा के अनुसार "सभी पुराने सिद्धांत विषय संबंधी नए सिद्धांत के उपसिद्धांत कहलाते हैं।" अर्थात सिद्धांतों में संशोधन और विस्तार किया जा सकता है। इसलिए सिद्धांतों पर आधारित पुराने तथ्य और माप नए सिद्धांत के अनुसार गलत हो सकते हैं। चूँकि यही विज्ञान की प्रकृति है और विज्ञान इसी तरह से कार्य करता है इसलिए हमें गलत होने की संभावना रहने पर भी खोज और आविष्कार को समाज के सामने लाना चाहिए। फिर चाहे समाज की परम्पराएं (देश-काल के अनुसार) और धारणाएं बनी रहें या खंडित हो जाएँ।

विज्ञान न ही अच्छा होता है और न ही बुरा होता है। हमारी आवश्यकताएँ उसकी उपयोगिता को अच्छी या बुरी बनाती हैं। इसलिए विज्ञान के दुरुपयोग होने की संभावना रहने पर भी हमें खोज और आविष्कार को समाज के सामने लाना चाहिए।

      • यदि किसी ज्ञात सिद्धांत के असंगत/अपवाद स्वरूप हमें घटना या भौतिकता के किसी रूप की जानकारी मिलती है तो हमें उसकी चर्चा समाज में करनी चाहिए।
      स्पष्टीकरण : सामाजिक प्राणी होने के नाते यह हमारा कर्तव्य है कि जब कभी हमें किसी ज्ञात सिद्धांत के अपवाद में कोई घटना या भौतिकता के किसी रूप (अवयवी कण, खगोलीय पिंड, निकाय या निर्देशित तंत्र) की जानकारी मिलती है तो हमें उसकी चर्चा समाज में करनी चाहिए। क्योंकि अपवाद वे उदाहरण हैं जो हमें सिद्धांत या नियम में संशोधन या विस्तार करने के लिए बाध्य करते हैं। ताकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा सटीकता के साथ भविष्यवाणी की जा सके।

      विज्ञान एक पद्धति है। फलस्वरूप किसी भी सिद्धांत या नियम को तब तक गलत नहीं कहना चाहिए। जब तक हमें उस सिद्धांत या नियम में सुधार के बाद सिद्धांत या नियम का संशोधित या विस्तृत रूप ज्ञात नहीं हो जाता है। या फिर हमें दूसरे नियम ज्ञात नहीं हो जाते हैं। क्योंकि विज्ञान के कार्यक्षेत्र की शर्तों के आधार पर नियम किसी न किसी रूप में अवश्य लागू रहते हैं।

      • किसी भी दावा का खंडन उसी तरह से किया जाना चाहिए। जिस तरह से दावा किया जाता है। अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा कारण और उसके प्रभाव के विषय में चर्चा (तर्क-वितर्क द्वारा) की जानी चाहिए।
      स्पष्टीकरण : प्रत्येक दावा के पीछे विषय संबंधी आंकड़े या फिर दावा करने वाले का अपना-अपना अनुभव होता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर कारण, घटना और उसके प्रभाव को चर्चा में शामिल करके दावे का खंडन करना चाहिए। "मुझे यह सही नहीं लगता है" सिर्फ इतना कहने से दावा का खंडन नहीं होता है। विषय के अपवाद को उदाहरण रूप में लाना जरुरी होता है। ताकि सकारात्मक चर्चा द्वारा संभव है कि "एकीकरण" की आवश्यकता पड़ जाए। और एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन हो जाए।
      किसी भी चीज पर इसलिए विश्वास मत करें क्योंकि ऐसा तुम्हें बताया गया है, या आपने स्वयं यही सोचा था !! तुम्हे तुम्हारे गुरु ने कहा है इसलिए भी किसी बात पर विश्वास मत करें। गुरु के प्रति सम्मान की भावना के कारण भी नहीं करें। लेकिन पूरे परीक्षण तथा विश्लेषण के बाद जो तुम्हें कल्याणकारी लगे, सभी के लिए लाभकारी और हितकारी प्रतीत हो। उसी सिद्धांत पर विश्वास करो और उससे संलग्न रहकर उसे अपना मार्गदर्शक बनाओ।   भगवान बुद्ध का उपदेश (सतत प्रश्न उठाने को लेकर - कालामसुत्त से)
      कर्तव्य पालन के बिना अधिकार की मांग अनुचित है।
      "विज्ञान के विकास में : हमारे अधिकार" अगले लेखों में
      • जब तक हम घटना की वास्तविकता को नहीं जान लेते हैं। तब तक हमें किसी भी घटना को भ्रम नहीं कहना चाहिए।
      स्पष्टीकरण : जिस प्रकार प्रकाश की अनुपस्थिति में अंधकार का, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में अंधविश्वास का तथा पदार्थ की अनुपस्थिति में रिक्तता का बोध होता है। ठीक उसी प्रकार वास्तविकता के अभाव में लोग भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए यह हमारा कर्तव्य बनता है कि हम लोगों को भर्मित कहे बिना उनको वास्तविकता से अवगत कराएं। ताकि आगे चलकर ये लोग भी वैज्ञानिक समाज के विकास में सहयोग दे सकें।

      • वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज सदैव करते रहना चाहिए।
      स्पष्टीकरण : विज्ञान एक पद्धति है। जिसका आशय विकल्प से होता है। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों (देश-काल) के रहते, एक ही विधि या प्रक्रिया के उपयोग से एक समान परिणाम प्राप्त करना मुश्किल होता है। इसके अलावा निष्कर्ष को लेकर एक मत होना भी मुश्किल होता है। इसलिए विज्ञान में वैकल्पिक युक्तियों और साधनों की खोज की जाती है। तथा विधि और प्रक्रिया के चुनाव को लेकर विज्ञान में बाध्यता नहीं होती है।

      • नए और वैकल्पिक साधनों का उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
      स्पष्टीकरण : समाज के विकास के लिए जरूरी है कि हम अधिक से अधिक प्रयोग करें। प्रयोग के तौर पर नए-नए आविष्कारों को उपयोग में लाएं। ताकि उन आविष्कारों की उपयोगिता तथा उनके प्रभाव की माप को निर्धारित किया जा सके। और विज्ञान और तकनीक का भविष्य में सदुपयोग किया जा सके। और उसके नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।

      स्पष्टीकरण : वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उपयोग न केवल विज्ञान में बल्कि तकनीक विकसित करने में भी किया जाता है। अर्थात जो (भी) है, उसको खोजने और जो नहीं है, उसको साकार रूप देने या उसके होने की संभावना के प्रभाव का अध्ययन करने में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उपयोग किया जाता है। इसीलिए समाज में विज्ञान से अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का महत्व होता है। जो समाज में सामंजस्य स्थापित  करने में सहयोगी सिद्ध होता है। और जो एक आदर्श समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है।

      स्पष्टीकरण : विज्ञान के इतिहास में ध्यान देने पर ज्ञात होता है कि किसी भी खोज की यथार्थता उस ज्ञान की उपयोगिता को निर्धारित करती है। इसलिए यथार्थता को खोजना जरुरी होता है। संभावित, लगभग मान (आंकड़े) या नजदीकी ज्ञान को उपयोग में लाना मुश्किल होता है। इसलिए ज्ञान की यथार्थ को खोजना और उसको प्रमाणित करना समाज के हित में होता है।

      • प्रायोगिक निष्कर्ष में पूर्वाग्रह को शामिल नहीं करना चाहिए।
      स्पष्टीकरण : बेशक कोई भी प्रयोग बिना किसी उद्देश्य के नहीं किया जाता है। परन्तु प्रायोगिक निष्कर्षों में अपनी इच्छा से मनमाफिक निष्कर्ष अलग से नहीं जोड़ना चाहिए और न ही उन्हें परिवर्तित करना चाहिए। इसे ही पूर्वाग्रह से ग्रसित होना कहते हैं। इसके अलावा विधि से अलग या प्रयोग को प्रभावित करने वाले अनावश्यक कार्यों को प्रयोग से दूर रखना चाहिए। ताकि प्रयोग के दौरान उनमें प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। और समाज सही अर्थों में यथार्थ को जान सके।

      • वैज्ञानिक निष्कर्षों के साथ-साथ अध्ययन के कार्यक्षेत्र की सीमा, उपयोग में लाई गई वैज्ञानिक विधि और कार्यविधि के सिद्धांत के बारे में भी समाज को अवगत कराना चाहिए।
      स्पष्टीकरण : जब हम सिर्फ वैज्ञानिक निष्कर्षों को समाज के सामने रखते हैं तो उनकी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में होती है। परन्तु जब हम अध्ययन के कार्यक्षेत्र की सीमा, उपयोग में लाई गई वैज्ञानिक विधि और कार्यविधि के सिद्धांत के साथ-साथ खोज का दावा और निष्कर्ष को समाज के सामने रखते हैं। तो इन निष्कर्षों की विश्वसनीयता प्रमाणित मानी जाती है। क्योंकि तब हमें उपयोग में लाई गई वैज्ञानिक विधि के बारे में जानकारी होती है। जिसके दोहराव से हम उन निष्कर्षों की जाँच बार-बार कर सकते हैं। आंकड़े में होने वाले परिवर्तन को पहले से निर्धारित कर सकते हैं। और सबसे बड़ी बात उस खोज की यथार्थता को उपयोगिता द्वारा सिद्ध कर सकते हैं।

      स्पष्टीकरण : विज्ञान में प्रयोग और परीक्षण विधि ऐसी हैं जिनका उपयोग मानव जाति को सीधे प्रभावित करता है। न सिर्फ खोज करने के दौरान बल्कि उस ज्ञान की उपयोगिता को परखने के दौरान भी ये दोनों विधियां मानव जाति को प्रभावित करती हैं। इसलिए इन विधियों का उपयोग छोटे-छोटे स्तर पर करना चाहिए। ताकि तकनीक की सीमाओं को निर्धारित किया जा सके। हालाँकि भारत में लगभग सभी योजनाएं प्रयोग के तौर पर छोटे स्तर पर प्रारम्भ की जाती हैं। यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है।

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