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ब्रह्माण्ड का उत्पन्न, निर्मित या पैदा होना एक बात है। तो ब्रह्माण्ड का सुचारू रूप से संचालित होना दूसरी बात है। इन दोनों के पीछे भिन्न-भिन्न क्रियाएँ कार्यरत होती है। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति स्वाभाविक (Natural) क्रियाओं की देन है। जबकि ब्रह्माण्ड का सुचारू रूप से संचालित होना स्वतः (Automatic) क्रियाओं की देन है। अर्थात ब्रह्माण्ड की स्वतः उत्पत्ति असंभव है। परन्तु ब्रह्माण्ड स्वयं अपना संचालन सुचारू रूप से कर सकता है। यहाँ तक कि ब्रह्माण्ड का स्वतः विकास भी संभव है। कहने का अर्थ है, सर्वप्रथम स्वाभाविक क्रियाओं के कारण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। तत्पश्चात ब्रह्माण्ड स्वतः क्रियाओं के कारण सुचारू रूप से संचालित और विकसित होता आया है। यहाँ तक कि सैद्धांतिक रूप से ही सही परन्तु एक भी ऐसी युक्ति अब तक मानव को ज्ञात नहीं हुई है। जिसके कारण या जिसके सहयोग से ब्रह्माण्ड स्वयं की उत्पत्ति को संभव बना सकता था। यदि हम ब्रह्माण्ड के अनादि-अनंत (स्थिर अवस्था का ब्रह्माण्ड) होने की अवधारणा को दरकिनार कर दें। तब भी ब्रह्माण्ड की संरचना से जुड़ा हुआ कोई भी तथ्य, कोई भी नियम या सिद्धांत इस बात पुष्टि नहीं करता है कि ब्रह्माण्ड की स्वतः उत्पत्ति संभव है। क्योंकि ब्रह्माण्ड के अनादि-अनंत होने की अवधारणा ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का खंडन करती है।

स्वाभाविक क्रियाएँ : बाह्य बल से उत्पन्न वे क्रियाएँ जिनकी जानकारी हमें प्रतिक्रिया के रूप में प्राप्त होती है। स्वाभाविक क्रियाएँ कहलाती हैं। फलस्वरूप स्वाभाविक क्रियाएँ उस तंत्र में परिवर्तन दर्शाती हैं। जिनमें पहले से स्वतः क्रियाएँ क्रियान्वित रहती हैं। वास्तव में स्वाभाविक क्रियाएँ परिवर्तन द्वारा उस तंत्र के विकास के लिए जिम्मेदार होती है। जिसमें बाह्य बल आरोपित होता है।

स्वतः क्रियाएँ : ये वे क्रियाएँ हैं जो किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं। अर्थात इन क्रियाओं के द्वारा उस व्यवस्था या तंत्र को बंद निकाय के रूप में परिभाषित किया जाता है। जिस पर ये क्रियाएँ सतत क्रियान्वित होती हैं। ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति स्वतः क्रियाओं की ही देन है। इसके समर्थन में मनुष्य के पास एक भी तथ्य, नियम या सिद्धांत नही हैं।

स्वाभाविक और स्वतः क्रियाओं में सबसे बड़ा अंतर यह है कि स्वतः क्रियाओं में एक रूपता पाई जाती है। क्योंकि स्वतः क्रियाएँ तंत्र के अस्तित्व को दर्शाती है। जबकि स्वाभाविक क्रियाएँ बाह्य बल को आरोपित करने वाले पिंड या तंत्र पर निर्भर करती हैं। फलस्वरूप स्वाभाविक क्रियाओं में एक रूपता नहीं पाई जाती।

स्वतः क्रियाओं के कारण ही विज्ञान में न सिर्फ प्रयोगों द्वारा बल्कि अवलोकनों के द्वारा भी प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। बशर्त है कि वे अवलोकन भौतिकता के प्रति हमारी समझ को विकसित कर सकें। अर्थात स्वतः क्रियाओं के कारण ही हम अवलोकनों के द्वारा प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि हम भौतिकता के जिस किसी रूप का अवलोकन करते हैं। उसमें हस्तक्षेप किये बिना भी उस भौतिकता की जानकारी एकत्रित कर सकते हैं। जबकि स्वाभाविक क्रियाओं के कारण हम सिर्फ प्रयोगों द्वारा ही प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं। क्योंकि ऐसा करने के लिए हमें भौतिकता के उस रूप में "हस्तक्षेप" करना होता है। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रयोगों में हमारी उपस्थिति अनिवार्य होती है। न सिर्फ परिणाम प्राप्त करने के लिए बल्कि परिणामों के द्वारा निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए भी विश्लेषण की आवश्यकता होती है। फलस्वरूप स्वाभाविक क्रियाओं में एक रूपता न होने के बाद भी प्रयोगों को सबसे अधिक विश्वसनीय माना जाता है। क्योंकि स्वाभाविक क्रियाओं के कारण ही विज्ञान में व्यवहारिकता देखने को मिलती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण यह है कि "आग चीजों को जलाती है, यह उसका (आग) स्वभाव (Nature) है। परन्तु पानी के संपर्क में आने से वह (आग) बुझ जाती है, यह उसका व्यव्हार (Behavior) है।" यह एक प्रायोगिक उदाहरण है। न कि अवलोकन पर आधारित उदाहरण है। जबकि अवलोकन में एक रूपता होने के बाद भी अवलोकन से प्राप्त प्रमाणों को अपेक्षाकृत कम विश्वसनीय माना जाता है। क्योंकि अवलोकन के दौरान भ्रमित होने की संभावना सबसे अधिक होती है। फलस्वरूप विज्ञान में भौतिकता के रूपों को जानने का क्रम यहीं नहीं रुक जाता है। बल्कि अवलोकन के बाद भी विज्ञान में और भी प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाता है। उन प्रक्रियाओं को आप हमारे इस लेख में पढ़ सकते हैं।


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