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प्रकृति न ही पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मनुष्यों को कहा जाता हैं। और न ही इन तीनों के सम्मलित रूप को प्रकृति कहा जाता है। तो फिर प्रकृति किसे कहा जाता है ? ब्रह्माण्ड में अवस्था परिवर्तन से निर्मित व्यवस्था को प्रकृति कहा जाता है। अर्थात प्रकृति एक व्यापक व्यवस्था का नाम है। जो किसी एक समय में ब्रह्माण्ड को व्यवस्थित बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होती है। फलस्वरूप हम प्रकृति को प्रकार्य (Function) के रूप में या भौतिकता में प्रदर्शन (Performance) होते हुए भी देखते हैं। प्रकृति न सिर्फ पृथ्वी तक सीमित है और न ही सौरमंडल तक सीमित है। बल्कि प्रकृति सारे ब्रह्माण्ड में एक व्यवस्था के रूप में व्याप्त है। मनुष्य ब्रह्माण्ड में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर प्रकृति की पहचान करता है। वह उसे परिवर्तन के रूप में देखता है। प्रकृति की व्यापकता और ब्रह्माण्ड में होने वाला परिवर्तन प्रकृति को उसकी व्यापकता और धरातलीय स्तर के आधार पर कई छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर देता है। ऐसा होने से ब्रह्माण्ड को संचालित करने में प्रकृति को आसानी होती है। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड में अनेक इकाइयों के रूप में परमाणु, पेड़-पौधे, जीव-जंतु, मनुष्य, ग्रह-उपग्रह, सौरमंडल और श्याम विवर जैसे तंत्र (Systems) एक व्यवस्था के रूप में संचालित होते है। इन व्यवस्थाओं को संचालित करने वाले नियम उस तंत्र के आकार और अवयवी तंत्रों के आपसी व्यव्हार पर निर्भर होते हैं। इसलिए प्रकृति अपनी बनाई हुई प्रत्येक कृति का ध्यान संचालन के माध्यम से रखती है। फिर चाहे प्रकृति की वह कृति सूक्ष्म ही क्यों न हो ? वह स्वतः निर्मित नियमों के माध्यम से उस सूक्ष्म कृति का संचालन करती है। इसलिए प्रकृति किसी भी तरह से भेदभाव नहीं करती है। और जहाँ आप भेदभाव होते हुए देंखे, तो समझ जाइयेगा कि वहां प्रकृति या स्वभाव कार्यरत नहीं है। वहां अवश्य ही व्यव्हार कार्यरत है। स्वभाव प्रकृति का ही एक रूप है जो सिर्फ जीवित तंत्रों में देखने को मिलता है। क्योंकि ये सभी तंत्र अपनी जरूरतों के लिए व्यवहार में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। और ये अपनी आवश्यकताओं को कम कर या बढ़ा सकते हैं। इसलिए पेड़-पौधे, जीव-जंतु और मनुष्यों का अपना एक स्वभाव होता है। जो उनके अवयवों पर निर्भर करता है।

जैसा कि प्रकृति भेदभाव नहीं करती है। इसलिए मानव प्रकृति की पहचान उसके द्वारा निर्धारित नियमों के माध्यम से करता है। फलस्वरूप मानव एक निश्चित क्रम, उस क्रम की पुनरावृत्ति और भौतिकीय राशियों के मापन के ज्ञान की अपेक्षा करता है। ताकि सिद्धांतों के माध्यम से प्रकृति को समझते हुए, उसे निर्धारित कर सके। इसलिए मानव क्वांटम क्षेत्र अर्थात सूक्ष्म स्तर की भौतिकी से लेकर ब्रह्माण्ड की भौतिकी (ब्रह्माण्डिकी) तक को जानना चाहता है। ताकि संयुक्त रूप से एक सिद्धांत में सारी प्रकृति को पिरो (प्रत्येक कड़ी को बाँधना) सके। वर्तमान में M-सिद्धांत द्वारा ऐसे एक सिद्धांत होने की संभावना वैज्ञानिकों द्वारा जताई गई है। जिसका पालन स्वयं ब्रह्माण्ड करता है। यह वही सिद्धांत है, जो स्वयं में परिवर्तन किये बिना इस ब्रह्माण्ड को चलायमान अर्थात परिवर्तनशील बनाए हुए है। जो प्रकृति के कार्य की भूमिका निर्धारित किये हुए है। परन्तु यह सिद्धांत अभी तक मानव जाति को ज्ञात नहीं है। स्ट्रिंग सिद्धांत सहित अनेक सिद्धांतों ने इस एक सिद्धांत के लिए अपना दावा पेश किया है। परन्तु एक भी सिद्धांत सूक्ष्म स्तर से लेकर गुरुत्वीय धरातल तक को पिरोने में सक्षम नहीं है। स्ट्रिंग सिद्धांत सिर्फ गणितीय सिद्धांत बनकर रह गया है। प्रकृति की यथार्थ व्याख्या के लिए मानव जाति को चाहिए है कि वह एक गणितीय भौतिक सिद्धांत का प्रतिपादन करे। ताकि गणित के माध्यम से उस प्रकृति की कार्यशैली को सही भाषा में समझा जा सके। और उसके भौतिक गुण के कारण उसकी यथार्थता सिद्ध हो सके।


"यह एक ऐसा सिद्धांत होगा, जिसके माध्यम से हम ब्रह्माण्ड की बनावट से लेकर उसके ससीम या असीम होने तक का ज्ञान प्राप्त कर पाएंगे।"


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