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विज्ञान के कार्यान्वित होने की शर्तें

विज्ञान प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति पर केंद्रित होता है। समस्याओं के निदान की खोज हो या फिर प्रतिरूप/प्रतिमानों की खोज हो ! आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नई प्रणालियों के निर्माण की संभावना की खोज हो या फिर कारण का घटना, प्रभाव और लक्षण के साथ संबंध की खोज हो ! वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज हो या फिर सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज हो ! विज्ञान की प्रत्येक खोज प्रकृति पर आधारित होती है। और चूँकि प्रकृति कोई वस्तु या पिंड तो है नहीं कि हम विज्ञान के कार्यान्वित होने की शर्तों को आसानी से समझ सकें। इसलिए हम प्रकृति को समझने के लिए प्रकृति का तीन अलग-अलग रूपों में अध्ययन करते हैं। साथ ही प्रकृति का इन तीन रूपों में वर्गीकरण करने से ऊपर लिखी सभी खोजों के लिए वैज्ञानिक विधियों और प्रक्रियाओं का निर्धारण करने में आसानी होती है।

इसके पहले के लेख में हमने देखा था कि प्रकृति को एक व्यवस्था के रूप में जाना जाता है। जो सूक्ष्म धरातल के स्तर से लेकर खगोलीय धरातल के स्तर तक व्यवस्था बनाए रखती है। इसके बाबजूद हम मनुष्य, जीव-जंतु और पेड़-पौधे विकास करने के लिए स्वतंत्र होते हैं ! क्या यह "पूर्ण स्वतंत्रता" है ? यदि इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" में है तब तो ठीक है। परन्तु यदि इस प्रश्न का उत्तर "नहीं" में है, तब तो एक प्रश्न और उठता है कि इस स्वतंत्रता की सीमा क्या (कहाँ तक) है ? प्रकृति इस विशाल ब्रह्माण्ड को कैसे संचालित करती है ? विज्ञान के कार्यान्वित होने की निम्न लिखित शर्तें हैं।

1. नियम, नियतांक और सामंजस्य : जब मनुष्य को नियमितता का आभास होने लगा। तब मनुष्य ने अपने प्रेक्षणों में पाया कि कुछ तो है जिसकी पुनरावृत्ति होती है। कुछ तो है जिसका क्रम निश्चित होता है ! अर्थात नियमित है। तब जाकर मनुष्य ने प्रकृति में नियमित और नियतांक होने का महत्व समझा। क्योंकि इस आधार पर निश्चित समय के बाद होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी करना संभव होता है। नियम और नियतांक द्वारा असंबंधित प्रतीत होने वाले भौतिकता के रूपों में आपसी संबंध की खोज की जाती है। क्योंकि ये नियम और नियतांक ही हैं, जो भौतिकता के विभिन्न रूपों में सामंजस्य स्थापित करते हैं। फलस्वरूप हमें सामंजस्य से निर्मित तंत्रों का ज्ञान/बोध होता है। मुख्य रूप से इस शर्त की उपस्थिति में प्रेक्षण विधि का उपयोग किया जाता है। इस विधि में लम्बे समय तक आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं। और विश्लेषण द्वारा असंबंधित प्रतीत होने वाले भौतिकता के रूपों में आपसी संबंध खोजा जाता है। परन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि इस शर्त की उपस्थिति में सिर्फ प्रेक्षण विधि का ही उपयोग किया जाता है। अन्य वैज्ञानिक विधियों और प्रक्रियाओं का उपयोग करना भी संभव होता है। परन्तु जब एक से अधिक विधियों और प्रक्रियाओं द्वारा एक समान निष्कर्ष प्राप्त होते हैं। तो निष्कर्ष अधिक मान्य कहलाते हैं।

तंत्र में नियम और नियतांक होने की शर्त पूरी होने पर आगमन विधि के द्वारा सिद्धांतों का सरलीकरण किया जाता है। ताकि नियम और नियतांकों के आधार पर सूक्ष्म धरातल में और सुदूर स्थित प्रतिरूप और प्रतिमानों की खोज की जा सके। केप्लर के नियम इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। जिसे प्रारम्भ में सिर्फ मंगल ग्रह के लिए प्रतिपादित किया गया था। जिसका बाद में चलकर सरलीकरण किया गया है। क्योंकि ये नियम और तंत्रों के नियतांक सभी खगोलीय तंत्रों में लागू पाए जाते हैं। सौर परिवार के सभी ग्रहों का आपसी और सूर्य के साथ सामंजस्य तथा इलेक्ट्रॉन्स का आपसी और नाभिक के साथ सामंजस्य से जिन भिन्न-भिन्न तंत्रों का बोध होता है। ये तंत्र नियमों और नियतांकों की ही देन होते हैं।

2. कानून और व्यवस्था : जिस प्रकार सामंजस्य के लिए नियम और नियतांक तथा प्रणाली के लिए क्रियाविधि जिम्मेदार होती है। ठीक उसी प्रकार व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून जिम्मेदार होता है। वातावरण प्रत्येक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक होता है। और यही महत्वपूर्ण घटक स्वतंत्रता और बाध्यता दोनों की सीमा को निर्धारित करता है। कानून, सामाजिक व्यवस्था का भी घटक है और प्रकृति जिसे हम एक व्यवस्था के रूप में जानते हैं उसका भी घटक है। परन्तु सामाजिक व्यवस्था और प्रकृति दोनों के कानून में काफी भिन्नताएं हैं।

1. जहाँ सामाजिक व्यवस्था का कानून सुनवाई करता है। वहीँ प्रकृति का कानून सुनवाई नहीं करता है।
2. सामाजिक व्यवस्था का कानून कई कारणों से भेदभाव करता है और विशेष परिस्थिति में छूट भी देता है। परन्तु प्रकृति का कानून न ही भेदभाव करता है और न हीं कोई छूट देता है।
3. इसलिए सामाजिक व्यवस्था का कानून सबूत मांगता है। जबकि प्रकृति के कानून को सबूत की आवश्यकता नहीं होती है।
4. यह जरुरी नहीं है कि सामाजिक व्यवस्था के कानून की सजा तुरंत लागू हो। परन्तु प्रकृति के कानून की सजा तुरंत मिलती है। अर्थात प्रकृति पहले से आगाह नहीं करती है कि मनुष्य कोई गलती कर रहा है। हमें अपनी गलती को स्वयं खोजना होता है। या यूँ कहें कि हमें वातावरण के परिप्रेक्ष्य अपनी स्वतंत्रता स्वयं निर्धारित करनी होती है। जो प्रकृति वातावरण के अनुसार बदलती रहती है।

इसलिए मनुष्य वातावरण के परिप्रेक्ष्य अपनी स्वतंत्रता को निर्धारित करने के लिए प्रयोग विधि का उपयोग करता है। प्रयोग विधि के अंतर्गत मनुष्य हस्तक्षेप करके प्रकृति के व्यवहार (प्रतिक्रिया) को समझने की चेष्टा करता है। व्यापक प्रभाव को समझने के लिए छोटे-छोटे प्रयोगों के परिणाम का गुणन किया जाता है। अप्राकृतिक घटनाओं के आंकड़े अर्थात अव्यवस्था को मापने से उस मानक व्यवस्था में मनुष्य की स्वतंत्रता से होने वाले परिवर्तन का आकलन होता है। चूँकि सामाजिक व्यवस्था किसी एक व्यक्ति की इच्छा पर तो संचालित नहीं होती है। व्यवस्था बनाए रखना एक सामूहिक निर्णय होता है। इसलिए सामाजिक व्यवस्था का कानून और प्रकृति के कानून में भिन्नता होने के बाद भी "सामाजिक व्यवस्था" विज्ञान के कार्यक्षेत्र की सीमा के अंतर्गत आती है। और अंग्रेजी में मनुष्य के स्वाभाव को नेचर (Nature) ही कहते हैं। मानव जाति और विज्ञान का अब तक का सम्पूर्ण विकास इसी शर्त की उपस्थिति में प्रयोग विधि द्वारा संभव हुआ है।


मूल रूप से इस शर्त की उपस्थिति में प्रयोग विधि का उपयोग किया जाता है। परन्तु याद रहे प्रयोग विधि के भी चार अलग-अलग रूप होते हैं। जिनका उद्देश्य उसको उपयोग में लाने वाले व्यक्ति अपने व्यवसाय (खोजी, विद्यार्थी, आम नागरिक, आविष्कारक) द्वारा निर्धारित करते हैं। कानून और व्यवस्था की उपस्थिति में वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज तथा कारण का घटना, प्रभाव और लक्षण के साथ संबंध खोजा जाता है। जल और वायु (ऑक्सीजन, नाइट्रोजन या कार्बन डाई ऑक्साइड) चक्र का अध्ययन भी इसी शर्त की उपस्थिति में किया जाता है। सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत आने वाली अर्थव्यवस्था और शासन/प्रशासन व्यवस्था में भी विज्ञान कार्य करता है। क्योंकि इस क्षेत्र में भी हम आंकड़ों के आधार पर (विकास आदि के विषय में) भविष्यवाणियां कर सकते हैं।
विज्ञान = भौतिकी, रासायनिकी, जैविकी, खगोलिकी, यांत्रिकी आदि
कला = चित्र, मूर्ति, संगीत, नृत्य, नाटक आदि
विज्ञान + कला = समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, तकनीक, चिकित्सा आदि
3. क्रियाविधि और प्रणाली : मूलरूप में इस शर्त की उपस्थिति में परीक्षण विधि का उपयोग किया जाता है। आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु नई प्रणालियों के निर्माण, उनमें परिवर्तन और क्रियाविधि का निर्धारण किया जाता है। समस्याओं के निदान खोजने में इस शर्त की उपस्थिति अनिवार्य होती है। प्रणाली कैसे काम करेगी/करती है ? प्रणाली का प्रकार ? उस प्रणाली की उपयोगिता को निर्धारित करता है। अर्थात तकनीकी विकास में सैद्धांतिक क्रियाविधि की भूमिका निर्धारित की जाती है। जो प्रणाली के प्रकार को परिभाषित करती है। मुख्य रूप से यांत्रिकी, श्वसन और पाचन तंत्र तथा आवश्यकताओं की पूर्ति हेतू विकसित किया गया तंत्र का अध्ययन इसी श्रेणी में आता है। इस शर्त की उपस्थिति में हम कंप्यूटर, सभी इलेक्ट्रॉनिक्स तथा मशीनी उपकरण में काम करने वाले विज्ञान का अध्ययन करते हैं। और साथ ही क्रियाविधि के आधार संगत प्रणाली के निर्माण की संभावना को भी निर्धारित करते हैं।

इस तरह से हम पाते हैं कि विज्ञान किसी न किसी रूप में हर जगह कार्य करता है। क्योंकि वहां प्रकृति कार्य करती है। और यह प्रकृति विशाल ब्रह्माण्ड को संचालित करने के लिए स्वयं छोटे-छोटे हिस्सों में तंत्रों/व्यवस्था/प्रणालियों में विभक्त हो जाती है। इसके बाबजूद वह "भेद न करने" का अपना गुणधर्म कभी और कहीं भी नहीं छोड़ती है। और इस प्रकार विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण शर्त होती है : "होना"। अर्थात जो है ही नहीं, उसके बारे में विज्ञान संभावना भी नहीं जताता है। फिर चाहे "जो भी हो" वह कृत्रिम हो या प्राकृतिक। वह किसी न किसी रूप में प्रकृति का ही अंग है। और वह किसी न किसी रूप में विज्ञान के कार्यान्वित होने की शर्त को (अवश्य) पूरा करता है।

प्रकृति की सुंदरता

साहित्य लेखन में भले ही प्रकृति की सुंदरता को पेड़-पौधे और जीव-जन्तुओं के रंग-रूप (संरचना) के द्वारा दर्शाया जाता है। सूर्योदय की लालिमा, आसमान का नीलापन, बादलों की सफेदी और रात के समय आकाश में टिमटिमाते तारें सुंदरता का बोध कराते हों। परन्तु विज्ञान में प्रकृति की सुंदरता का आशय "प्रकृति का एक रूप में पाया जाना या एक समान बने रहना" से होता है।

दरअसल सुंदरता का अपना कोई मापदंड नहीं है। और चूँकि व्यक्ति के विचार और उसका लेखन हमें आकर्षित करता है। इसलिए हम विचारों और लेखन को भी प्रतिक्रिया के रूप में सुंदर कह देते हैं। क्योंकि देखा गया है कि तब लेखक और पाठक के विचारों में एक रूपता पाई जाती है। एक लेखक के विचार पाठक को अपने लगने लगते हैं।

प्रकृति की सुंदरता के प्रमुख बिंदु :
1. प्रकृति कोई कर्ता नहीं है। जो भेदभाव करे।
2. प्रकृति को एक व्यवस्था के रूप में जाना जाता है।
3. प्रकृति सूक्ष्म स्तर से लेकर खगोलीय स्तर तक व्यवस्था बनाए रखती है।
4. प्रकृति व्यवहार में समानता का भाव रखती है।
5. प्रकृति निर्णायक भूमिका भी निभाती है। अर्थात बिना आगाह किये दण्ड देना।
6. हम सिद्धांत देने और उसके आधार पर कार्य करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं। परन्तु (प्रतिक्रिया के रूप में) प्रत्येक सिद्धांत (Theory) की सत्यता का निर्णय प्रकृति के द्वारा किया जाता है।
7. पेड़-पौधे और जीव-जन्तु प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्राकृतिक चीजें हैं। अर्थात वे सभी प्रकृति के ही परिणाम हैं। जिससे एक व्यवस्था/प्रणाली का बोध होता है। समय पर सूर्योदय-सूर्यास्त का होना, आग से सभी चीजों का जलना, पानी से आग का बुझना आदि ये प्रकृति है।
ईश्वर ने एक बहुत अच्छा अवसर अपने हाथ से जाने दिया। - सर अल्बर्ट आइंस्टीन (प्रश्न : यदि आपका यह सिद्धांत गलत साबित होता है तो ? के जबाब में) यह भेदभाव के बारे में स्पष्ट समझ विकसित करने वाला एक वक्तव्य है, जो यह दर्शाता है कि आइंस्टीन को प्रकृति पर कितना विश्वास था।
प्रकृति का सौंदर्य : उसकी एक रूपता है।
प्रकृति कभी भी भेदभाव नहीं करती है। यदि प्रकृति भेदभाव करती तो विज्ञान का अस्तित्व ही नहीं होता। हमारे आपसी निष्कर्ष कभी भी मेल नहीं खाते। प्रयोग और परीक्षण विधि को उपयोग में लाना असंभव होता। उसकी सत्यता हमेशा संदेह के घेरे में होती। चिकित्सा पद्धति में रोगों के कारण को पहचानना असंभव होता। तकनीक विकसित करना मनुष्य के वश में नहीं होता। और सबसे बड़ी परमाणु से लेकर खगोलीय पिंडों तक का अस्तित्व ही नहीं होता।
ये जो हम अपने चारों और देखते हैं पेड़-पौधे, जीव-जंतु, तारे, ग्रह, उपग्रह इत्यादि। ये प्रकृति नहीं है !! बल्कि इन सभी के बीच के संतुलन और सामंजस्य को प्रकृति कहते हैं। इस संतुलन और सामंजस्य में सौन्दर्य भी है, सामर्थ्य भी है। यहाँ सौन्दर्य का आशय "जिसे हम खोज के दौरान ज्ञात करते हैं और उसके द्वारा भविष्यवाणियां कर सकते हैं" से होता है। जबकि सामर्थ्य का आशय "उस क्षमता या परिस्थिति से है, जिसके द्वारा प्रकृति द्वारा प्रदत्त अर्थात प्राकृतिक चीजों की रचना होती हैं।" हमारा जन्म भी संतुलन का ही परिणाम है कि हम दिखने में वैसे ही हैं जैसे : हमारे अभिभावक
संयोग किसी भी घटना के लिए बहुत महत्व रखता है। प्रकृति भेदभाव करती है कहकर जो उदाहरण दिया जाता है। वह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय का है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय पदार्थ और प्रतिपदार्थ समान मात्रा में थे। प्रकृति ने उसे नष्ट करके भेदभाव किया है ! चूँकि प्रतिपदार्थ अभी तक नहीं खोजा गया है। इसलिए प्रकृति के ऊपर भेदभाव का आरोप लगाना गलत है। और दूसरी ओर संभव है कि प्रति-ब्रह्माण्ड भी अस्तित्व रखता हो ! जब इन दोनों का संयोग होगा तब सम्पूर्ण पदार्थ नष्ट होकर ऊर्जा में परिवर्तित हो जाएगा।

वैज्ञानिक विधियों का विकास

ज्यों-ज्यों मानव जाति का विकास होता गया। उसकी समझ और अधिक विकसित होती गई। अब वह सिर्फ इस पृथ्वी की सुंदरता से आकर्षित नहीं हो रहा था और न ही सिर्फ घटित घटनाओं को आश्चर्य से देख रहा था। बल्कि अब उसके मन में अज्ञात को जानने के लिए प्रश्न उठने लगे थे ! वह देखी हुई घटनाओं के पीछे के कारण को जानना चाहता था ? क्योंकि "पुनरावृत्ति देखकर मनुष्य सोचने के लिए मजबूर होता है।" जहाँ एक तरफ मनुष्य समाज बनाने की ओर विकास कर रहा था। वहीँ दूसरी ओर वह अज्ञात तथ्यों और नियमों को जानने के लिए भी प्रयास कर रहा था। तब जिन वैज्ञानिक विधियों के सहयोग से तब के मानव ने आज तक के मानव का जो सफर तय किया है। उन वैज्ञानिक विधियों में भी विकास हुआ है। वैज्ञानिक विधियों का यह विकास उन विधियों के चलन और उनके प्रति मानव जाति की समझ पर आधारित था। फलस्वरूप अलग-अलग समय में विज्ञान की अलग-अलग शाखाओं का उदय हुआ है।

खगोलिकी, विज्ञान की सबसे प्राचीन शाखा है। जिसका संबंध ऋतु विज्ञान से भी होता है। इसलिए कहा जा सकता है कि वर्षों तक ग्रह, उपग्रह और तारों का निरन्तर अध्ययन करने से जिस विधि का प्रादुर्भाव हुआ वह प्रेक्षण विधि ही थी। विज्ञान की इस विधि में प्रेक्षक के रूप में मनुष्य कार्यविधि में शामिल नहीं होता है। और न ही वह किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करता है। वह केवल घटना का अध्ययन करने के उद्देश्य से घटना का अवलोकन करता है। घटना की शुरुआत, घटकों की मौजूदगी और घटना के दोहराव का अध्ययन करना इस विधि की पहचान होती है। जब घटना का दोहराव होता है। तब प्रेक्षण के दौरान हमें घटना से संबंधित जानकारी मिलती है। घटकों की बारम्बार उसी मौजूदगी से वह जानकारी, तथ्य में परिवर्तित हो जाती है। तथा घटना का एक निश्चित समयांतराल के बाद दोहराव होते रहना। किसी व्यवस्था की ओर संकेत होता है। जो नियमित (नियमों में बंधी) और व्यवस्थित प्रणाली के अस्तित्व के बारे में जानकारी देता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रेक्षण विधि के द्वारा घटना की जानकारी, तथ्यों और नियमों को जाना जा सकता है। परन्तु सिर्फ इस विधि के द्वारा संबंधित तंत्र या प्रणाली के सिद्धांतों की व्याख्या करना असंभव होता है। फलस्वरूप वैज्ञानिक विधियों में विकास की आवश्यकता को महसूस किया जाने लगा।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सिर्फ व्यवस्थित तंत्र/प्रणाली में ही विज्ञान कार्य करता है ? अर्थात जो घटनाएं एक निश्चित समयांतराल के बाद नहीं घटती हैं या वे कभी-कभी घटती हैं तो वहां कौन सी वैज्ञानिक विधि कार्य करती है ? क्या वहां प्रेक्षण विधि कार्य करती है ?
एक निश्चित समयांतराल के बाद घटना का दोहराव नही होना या कभी-कभी घटना का घटित होना। ऐसे कार्यक्षेत्र में भी विज्ञान कार्य करता है। परन्तु ऐसे कार्यक्षेत्रों में एक शर्त और जुड़ जाती है कि "यदि एक समान घटकों का (घटना के बाद) परिणाम एक समान होता है तो।" यह विज्ञान की एक अभिधारणा है। इस अभिधारणा का क्रियान्वयन विज्ञान के कार्यक्षेत्र होने की मुख्य शर्तों में से एक है। परन्तु इसके लिए जरुरी है कि ऐसी घटनाएं प्रमाणित भी (अर्थात घटकों, उसकी मात्रा तथा प्रभाव की सही-सही जानकारी) होनी चाहिए ! जिसके लिए हमें प्रयोग विधि की आवश्यकता होती है। इस विधि के द्वारा प्रयोगकर्ता घटनाओं का दोहराव कर सकता है।


प्रयोगकर्ता के रूप में मनुष्य प्रयोग विधि में शामिल होता है। वह आवश्यकतानुसार प्रयोग के दौरान घटना को घटक की मात्रा या भिन्न घटक के द्वारा प्रभावित भी कर सकता है। इस विधि के द्वारा प्रकृति के सिद्धांतों को भी समझा जा सकता है। प्रकृति कैसे कार्य करती है ? घटना क्यों घटित हुई ? आदि प्रश्नों के उत्तर इस विधि के द्वारा जाने/समझे जा सकते हैं। जबकि प्रेक्षण विधि में यह सब संभव नहीं होता है। प्रेक्षण विधि के द्वारा सिर्फ घटना का अध्ययन किया जा सकता है। और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की भविष्यवाणी की जा सकती है। जबकि प्रयोग विधि के द्वारा घटना में परिवर्तन करना भी संभव होता है।

सिर्फ देखने, सुनने और छूने से प्राप्त होने वाली जानकरी सही नहीं होती है। मनुष्य भ्रमित भी हो सकता है। आज हमारे पास मानव जाति के इतिहास के बहुत से उदाहरण हैं। जिसकी वास्तविकता हमें प्रयोग विधि के द्वारा बाद में ज्ञात हुई है। इसलिए प्रेक्षण विधि से ज्ञात होने वाली जानकारी गलत भी हो सकती है। और तब इन जानकारियों के वैज्ञानिक विश्लेषण से ज्ञात होने वाले तथ्य और नियम भी गलत होंगे। इसलिए यह कहना सही है कि प्रयोग विधि, प्रेक्षण विधि से उन्नत होती है। क्योंकि प्रयोग विधि न सिर्फ प्रमाण उपलब्ध कराती है बल्कि भ्रम (देखे, छुए और सुने) से वास्तविकता को पृथक करना इस विधि की विशेषता होती है।

प्रयोग विधि का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इस विधि से ज्ञात तथ्यों और नियमों के द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है। क्योंकि यह विधि कारण और क्रियाविधि को प्रमाणित करती है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा इस विधि से ज्ञात तथ्यों, नियमों और सिद्धांतों का उपयोग तकनीक विकसित करने में किया जा सकता है। संगतता के आधार पर तकनीक विकसित की संभावना खोजी जा सकती है। और काफी हद तक तकनीक का सैद्धांतिक पहलू भी निर्धारित किया जा सकता है। परन्तु यदि प्रयोग के परिणाम के आधार पर हम गलत निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं तो तकनीक का सैद्धांतिक पक्ष भी गलत हो जाता है। जिससे तकनीक विकसित करना संभव नहीं होता है। तब हम निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि प्रयोग विधि से ज्ञात होने वाले तथ्य, नियम और सिद्धांत भी गलत हो (सक) ते हैं। तब जिस विधि का विकास हुआ उसे परीक्षण विधि कहते हैं। यह विधि प्रयोग विधि से अधिक उन्नत होती है। क्योंकि इस विधि से खोजे गए ज्ञान की उपयोगिता और प्रमाणित दोनों सिद्ध होती है।

वैज्ञानिक विधियों का विकास प्रेक्षण विधि (अध्ययन करने) से परीक्षण विधि (खोज को उपयोग में लाने) की ओर हुआ है। ध्यान रहे "प्रयोग विधि में अवलोकन भी किया जाता है। तथा परीक्षण विधि में तकनीक को बारम्बार परखा जाता है।" अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से ही सही प्रेक्षण विधि का प्रयोग विधि से और प्रयोग विधि का परीक्षण विधि से गहरा संबंध होता है। और ये एक-दूसरे से अधिक उन्नत होती हैं।

लेख को पढ़ते वक्त ध्यान में रखने योग्य बिंदु :
1. प्रयोग विधि का परिणाम क्रियाविधि पर निर्भर करता है। जबकि उनका निष्कर्ष मानव की समझ (वैज्ञानिक दृष्टिकोण) पर निर्भर करता है। अर्थात एक ही परिणाम से भिन्न-भिन्न निष्कर्ष भी निकाले जा सकते हैं। यह प्रयोग विधि की एक कमी है।
2. प्रयोग विधि का परिणाम सदैव परिभाषित भौतिक राशि का आंकिक मान होता है। यह इस विधि की सबसे बड़ी विशेषता है।
3. चूंकि किसी भी विधि की विशेषता उसकी प्रमाणिकता होती है। जिसे मनुष्य निर्धारित नहीं करता है। प्रकृति इसके लिए निर्णायक भूमिका निभाती है। अर्थात हम मनुष्य वैज्ञानिक विधियों के उपयोग से भविष्यवाणी या भविष्य का निर्माण करते हैं। प्रकृति स्वयं बिना भेदभाव करे या खोजे ज्ञान की उपयोगिता द्वारा इन विधियों की प्रमाणिकता सिद्ध करती है।

प्रयोग के प्रकार

विज्ञान के विकास में प्रयोग विधि का बहुत बड़ा योगदान है। जब प्रेक्षण (अवलोकन) विधि की अपनी सीमाओं के रहते विज्ञान का विकास थमने सा लगा था। और उत्पन्न होने वाले भ्रम से वास्तविकता को कैसे पृथक किया जाए ? तब जिस विधि की आवश्यकता जान पड़ी थी। वह प्रयोग विधि थी। विज्ञान में प्रकृति और उसके नियमों को जानने/खोजने के लिए प्रयोग विधि को उपयोग में लाने का सुझाव मेरी याद में सर्वप्रथम रॉजर बेकन (दार्शनिक) ने 1275 ई. के आसपास दिया था। परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि इससे पहले प्रयोग विधि का उपयोग नहीं किया जाता था या उससे पहले उसका ज्ञान मानव समाज को नहीं था। बल्कि तकनीकी विकास में प्रयोग विधि का उपयोग प्रारम्भ से होता आया है। जिसे विज्ञान के विकास के लिए उपयोग में लेने का सुझाव सर्वप्रथम रॉजर बेकन ने दिया था। रोजर बेकन ये वही दार्शनिक हैं जिन्होंने कीमियागिरी में प्रयोग करने के लिए नए-नए उपकरण बनाए थे। वो बात अलग है कि वे असफल रहे। आपको (रोजर बेकन) भी आपकी पुस्तक के लिए चर्च ने मठ में कारावास दिया था।

प्रयोग विधि के महत्वपूर्ण बिंदु :
  1. मनुष्य प्रयोगकर्ता के रूप में कार्यविधि में शामिल होता है। यह इस विधि की प्रमुख आवश्यकता है। अर्थात प्रयोग की शुरुआत कब करनी है ? यह प्रयोगकर्ता की इच्छा पर निर्भर करता है।
  2. इस विधि का उपयोग एक सीमा तक किसी भी समय (सुबह, दोपहर, शाम या रात), किसी भी स्थान और किसी भी व्यक्ति (आयुवर्ग या स्त्री-पुरुष) द्वारा किया जा सकता है।
  3. प्रयोग विधि को उसके दोहराव के लिए जाना जाता है। 
  4. इस विधि का उपयोग विज्ञान में प्रकृति का अध्ययन अर्थात खोज करने तथा प्रौद्योगिकी में उन खोजों के ज्ञान को उपयोग में लाने के लिए किया जाता है।
  5. यह विधि प्रचलित ज्ञान और खोजे गए ज्ञान को प्रमाणित करने में सहायक सिद्ध होती है।
  6. मनुष्य की इंद्रियों से निर्मित भ्रम में से वास्तविकता को जानना इस विधि के द्वारा आसान होता है।

प्रयोग विधि के चार प्रकार :
  1. जिन प्रयोगों का उपयोग खोज करने के लिए किया जाता है। इन प्रयोगों के दोहराव करने से भौतिक राशियों के रूप में हमें कुछ आंकड़े (मान) प्राप्त होते हैं। जिन आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके हम किसी निष्कर्ष तक पहुँचते हैं। यह पहले प्रकार के प्रयोग कहलाते हैं। जिनके माध्यम से हम विज्ञान में ऐसे निष्कर्षों की खोज कर पाते हैं। जिनकी जानकारी हमें इन प्रयोगों के पहले तक नहीं होती है। मूल रूप से वैज्ञानिक समुदाय खोज करने के लिए इन प्रयोगों का उपयोग करता है।
  2. अब तक के ज्ञात सिद्धांतों, नियमों, तथ्यों और जानकारियों को प्रमाणित करने में इन प्रयोगों का उपयोग किया जाता है। तथा इन प्रयोगों के द्वारा पूर्व में घटित घटनाओं के प्रति समझ विकसित की जाती है। इन प्रयोगों के द्वारा खोज (पहले वाले प्रयोग) के दौरान आंकड़े एकत्रित करने में होने वाली त्रुटि और कार्यविधि के सिद्धांत की गलती की पहचान की जाती है। ताकि दोबारा प्रयोगों में सुधार के बाद नए/परिवर्तित आंकड़े प्राप्त किये जा सकें। इन प्रयोगों को करने से पहले ही हमारे पास प्रयोग की आवश्यक सामग्री, प्रायोगिक सिद्धांत, उसकी कार्यविधि, सावधानियां और संभावित आंकड़े और निष्कर्ष की जानकारी पहले से उपलब्ध होती है। मूल रूप से विद्यार्थी वर्ग प्रमाण जुटाने में इन प्रयोगों का उपयोग करता है।
  3. मूल रूप से मानव समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में सुधार के लिए इन प्रयोगों का उपयोग अपने-अपने स्तर पर करता है। और अपनी सोच को समय-समय पर बदलता रहता है। इस प्रकार के प्रयोग का अर्थ "कर-करके सीखने" से होता है। इसलिए विश्व में देश-काल पर आधारित अनेकों व्यवस्थाओं का जन्म होता है। ये व्यवस्थाएं सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक आधार पर अलग-अलग होती हैं। चूंकि ये व्यवस्थाएं किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं करती है। इन व्यवस्थाओं के निर्माण के पीछे पीछे सभी मनुष्यों का अपना-अपना स्वभाव/अनुभव काम करता है। इसलिए सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्थाएं विज्ञान के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आती हैं।
  4. मूल रूप से आविष्कार करने के लिए इन प्रयोगों का उपयोग किया करता है। इसे परीक्षण (Testing) विधि भी कहते हैं। इन प्रयोगों के द्वारा तकनीक विकसित होती है। और समय-समय पर नई आवश्यकताओं की पूर्ति के उद्देश्य से तकनीक और भी उन्नत की जाती है। तीसरे और चौथे प्रकार की प्रयोग विधि प्राचीन है। ये दोनों ही प्रकार प्रौद्योगिकी के विकास में सहायक होते हैं। जबकि पहले और दूसरे प्रकार के प्रयोग विज्ञान के विकास (खोज) में सहायक होते हैं।
दार्शनिक रॉजर बेकन के जन्म के पहले से प्रयोग विधि उपयोग में आती रही है। इसी विधि के उपयोग से अलेक्जेंड्रिया के अल-हेजन (Al-Hazen 965-1038 ई.) ने प्रकाश के परावर्तन और अपवर्तन के नियमों की खोज की थी। इसके अलावा भी कृषिकार्य, ऊर्जा के स्रोत (पनचक्की, पवनचक्की आदि के निर्माण में), युद्ध के उपकरण और संचार के साधनों (जहाज निर्माण आदि) में प्रयोग विधि के तीसरे और चौथे प्रकार का उपयोग होता था। वो बात अलग है विज्ञान में प्रयोग विधि का चलन लगभग 400 वर्ष पहले से प्रारम्भ हुआ है।

विज्ञान जगत में : हमारे अधिकार

विज्ञान जगत : मनुष्यों द्वारा निर्मित एक ऐसा समाज जहाँ प्रत्येक मनुष्य खोज और उस खोज के उपयोग को लेकर पूर्णतः स्वतंत्र होता है। विज्ञान जगत कहलाता है। "विज्ञान क्या है ?" के उत्तर से एक बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि आखिर क्यों मनुष्य को विज्ञान जगत में समानता और स्वतंत्रता का अधिकार है। जहाँ एक तरफ "समानता का अधिकार" हमें प्रकृति ने दे रखा है। जिसका अध्ययन हम वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से करते हैं। वहीं दूसरी तरफ "स्वतंत्रता का अधिकार" हमें विज्ञान की प्रकृति (संचयशीलता) से प्राप्त है। विज्ञान जो एक पद्धति है। जिसमें विकल्प के लक्षण होते हैं। जहाँ किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं होती है। संचयशीलता जिसकी प्रकृति होती है। उसी विज्ञान ने हमें उसके उपयोग और उसकी नयी-नयी शाखाओं की खोज की स्वतंत्रता दे रखी है।

विज्ञान के सम्पूर्ण इतिहास और वैज्ञानिक विधियों के विकास पर गौर करने से दो बातें स्पष्ट हो जाती हैं। पहली : विज्ञान की भिन्न-भिन्न शाखाओं का प्रादुर्भाव अलग-अलग समय में हुआ है। और दूसरी : भले ही वैज्ञानिक विधियों का विकास प्रकृति के अध्ययन से शुरू होकर आज उसके उपयोग तक जा पहुंचा है। परन्तु हम निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते हैं कि वैज्ञानिक विधियों के विकास के साथ ही साथ समाज में उसका चलन भी रहा है ! यदि ऐसा हुआ होता तो आज समाज में सिर्फ परीक्षण विधि का ही उपयोग होता। प्रेक्षण और प्रयोग विधि इस समाज से अपना अस्तित्व खो चुकी होतीं। परन्तु ऐसा नहीं है। हम आज भी अपनी आवश्यकताओं के हिसाब से इन वैज्ञानिक विधियों का उपयोग करते हैं। तत्पश्चात खोज की प्रमाणिकता अन्य दूसरी वैज्ञानिक विधि से भी सिद्ध करते हैं।
यह आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक विधियों और विचारधाराओं की शक्ति के प्रति सजग हमारे समाज ने स्वयं अपने जीवन को सुव्यवस्थित करने में इन विधियों का उपयोग नहीं किया है। विज्ञान ने स्वयं हमें अपने ऊपर पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है और स्वयं अपनी तथा अपनी सामाजिक सत्ता की सफलताओं को सुनिश्चित किया है। परन्तु हमने स्पष्ट और सरल वैज्ञानिक संकल्पनाओं की तुलना में अठारहवीं शताब्दी की दार्शनिक विचारधाराओं की कोरी कल्पनाओं को अधिक पसंद किया है।
- डॉ. अलेक्सिस कैरेल (चिकित्सा क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित)
वृद्धि और विकास दोनों भिन्न-भिन्न चीजें हैं। जहाँ एक तरफ वृद्धि का आशय किसी एक विशेष गुण अथवा भौतिक राशि के मान में बढ़ोत्तरी से होता है। वहीँ दूसरी तरफ विकास का आशय आवश्यक गुणों अथवा तत्वों की संख्या और उनके मान में बढ़ोत्तरी से होता है। वृद्धि एक आयाम में बढ़ोत्तरी है जबकि विकास बहुआयम में बढ़ोत्तरी है। भौतिक रूपों और घटनाओं की जानकारी में बढ़ोत्तरी होना ज्ञान में वृद्धि है। जबकि विज्ञान और तकनीक में नयी-नयी शाखाओं की खोज तथा वैज्ञानिक विधियों और प्रक्रियाओं का उपयोग विज्ञान का विकास है। इस प्रकार विज्ञान और तकनीक के विकास में मानव जाति का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यदि किसी कारण से मानव जाति नष्ट हो जाती है। तो विज्ञान अपना अस्तित्व खो देगा। विज्ञान ने मनुष्य को पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है। अर्थात विज्ञान ने मनुष्य को निम्न स्वतंत्रता दे रखी है।

समानता का अधिकार :
"विज्ञान में प्रत्येक वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के कार्य को बराबर महत्व दिया जाता है।"
विस्तार : किसी भी उम्र और देश का नागरिक, शिक्षित-अशिक्षित, स्त्री-पुरुष कोई भी व्यक्ति खोज कर सकता है। और अपनी बात समाज के सामने रख सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की खोज को उतना ही महत्व दिया जाता है। जितना कि एक खोजकर्ता और वैज्ञानिक को दिया जाता है। शर्त सिर्फ इतनी सी होती है कि "उसकी खोज मानव जाति की समझ को विकसित कर सके।" अर्थात वह खोज ज्ञात ज्ञान के संगत होनी चाहिए। यह विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा का ही परिणाम है कि आज विज्ञान इतना विकास कर पाया है।

विज्ञान में मुख्य रूप से प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। और चूँकि प्रकृति दो समरूप चीजों में भेदभाव नहीं करती है। इसलिए प्रयोग द्वारा क्रियाविधि का दोहराव किया जाता है। जिस निष्कर्ष पर वैज्ञानिक समुदाय पहुँचता है। ठीक उसी निष्कर्ष पर हम भी पहुँचते हैं। जो आश्चर्यजनक कार्य एक जादूगर कर सकता है। उसी कार्य का दोहराव हम भी कर सकते हैं। अर्थात प्रकृति ने भेदभाव न करके हम सभी मनुष्यों को विज्ञान में बराबरी का अधिकार दिया है।

प्रकृति के समक्ष समानता
स्वतंत्रता का अधिकार :
1. प्रश्न उठाने को लेकर स्वतंत्रता : हम किसी भी समय किसी भी सिद्धांत, नियम, तथ्य अथवा जानकारी की प्रमाणिकता को लेकर प्रश्न उठा सकते हैं। फिर चाहे उस सिद्धांत का प्रतिपादन एक वैज्ञानिक ने ही क्यों न किया हो ! उन नियमों और तथ्यों को एक खोजकर्ता ने ही क्यों न खोजा हो ! जानकरी की आँखों देखी प्रमाणिकता भले ही लाखों लोग स्वयं क्यों न देते हों। इसके बाद भी हम असंगत अथवा अपवाद स्वरूप घटना या भौतिकता के किसी भी रूप की जानकारी देकर पुरानी मान्यताओं पर प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं।

2. खोज या मापन में विधि और प्रक्रिया के उपयोग को लेकर स्वतंत्रता : मनुष्य खोज करने के लिए किसी भी विधि का उपयोग कर सकता है। परन्तु जब उसकी यह खोज एक से अधिक विधियों द्वारा परखी जा चुकी होती है। तब वह खोज प्रमाणित मानी जाती है। ठीक इसी प्रकार मापन की प्रक्रिया को लेकर भी मनुष्य स्वतंत्र होता है। शर्त सिर्फ इतनी सी होती है कि भौतिक राशियों को मापने का उद्देश्य पूरा होना चाहिए। अर्थात परिणाम भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। परन्तु निष्कर्ष एक होना चाहिए। इसका सबसे अच्छा उदाहरण समय और गति को सापेक्ष मानकर उसका मापन करना है।

3. प्रमाण जुटाने और उसके उपयोग की स्वतंत्रता : 

4. विज्ञान में नयी शाखाओं की खोज को लेकर स्वतंत्रता : विज्ञान की नयी शाखाओं की खोज भले ही एक संयोग होता है। परन्तु उस शाखा का एक नयी शाखा के रूप में विकास मनुष्यों का सामूहिक निर्णय होता है। उसे चर्चा के रूप में एक विषय बनाना हम मनुष्यों की आवश्यकता और इच्छा पर निर्भर करता है। शाखाओं की खोज का संयोग भी मनुष्यों की आवश्यकता और इच्छा का ही परिणाम होता है। जिसे असंगतता में विज्ञान की शर्तों के क्रियान्वय होने पर खोजा जाता है।

5. विज्ञान की खोज और उसकी उपयोगिता को लेकर स्वतंत्रता : भौतिकता के रूपों (रासायनिक तत्वों, अवयवी कणों, पिंडों आदि) की खोज, समस्याओं के समाधान की खोज, वैकल्पिक साधनों और युक्तियों की खोज, सिद्धांतों, नियमों और तथ्यों की खोज, कारण, घटना और उनके प्रभावों के अंतर्संबंधों की खोज तथा इन खोजों के व्यवहारिक उपयोग की प्रक्रिया विज्ञान के अंतर्गत आती हैं। इन खोजों से मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होती है। जबकि इन्ही खोजों के अलावा जब हम वैज्ञानिक विधियों, प्रक्रियाओं और विज्ञान की शाखाओं की खोज करते हैं। तो विज्ञान में विकास होता है। हम विज्ञान की विभिन्न शाखाओं से ज्ञान में वृद्धि करने उसके उपयोग से तकनीक विकसित करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं।

हम न ही आने वाली पीढ़ी को और न ही अन्य दूसरे लोगों को खोज की प्रमाणिकता के लिए अन्य दूसरी वैज्ञानिक विधियों को उपयोग में लेने को बाध्य कर सकते हैं। और न ही वैकल्पिक युक्तियों की खोज के लिए बाध्य कर सकते हैं। विज्ञान के उपयोग से तकनीक विकसित करने के लिए हम पूर्णतः स्वतंत्र हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखें और उनका पालन करें। फिर चाहे उस तकनीक/उपकरण/साधन का उपयोग मानव जाति के हित में हो अथवा न हो !

6. विज्ञान के प्रचार-प्रसार की स्वतंत्रता : मनुष्य का विज्ञान पर विश्वास तथा उसका प्रचार-प्रसार वैज्ञानिक पद्धतियों और मनुष्य की आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। हमारी अपनी आवश्यकता देश-काल के आधार पर बदलती रहती है। इसके बाबजूद हम विकल्प प्रस्तुत करने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। क्योंकि देखा गया है कि हमारी आवश्यकता को एक ही तकनीक पूरा नहीं कर पाती है। फलस्वरूप हमें अन्य दूसरी तकनीक भी विकसित करनी होती है। हम जिस प्रकार विज्ञान के प्रचार-प्रसार द्वारा विकल्प प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र होते हैं ठीक उसी प्रकार समाज भी उसके उपयोग को लेकर पूर्णतः स्वतंत्र होता है।

विशेष बिंदु :
विज्ञान, मनुष्य को कभी भी निर्देशित नहीं करता है कि उसे क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। बल्कि मनुष्य जो करना चाहता है। उस कार्य को कैसे करना चाहिए अर्थात उस कार्य को कैसे किया जा सकता है ? के बारे में विज्ञान युक्ति, विधि, प्रक्रिया और उसके साधनों का सुझाव उपलब्ध कराता है। अर्थात हम सुझाव को मानने या न मानने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। वैकल्पिक युक्तियों अथवा साधनों के चुनाव के लिए भी स्वतंत्र होते हैं। यहाँ स्वतंत्रता का आशय "मनुष्य स्वयं तथा विज्ञान के विकास के लिए मनुष्य किसी भी प्रकार से बाध्य नहीं होता है" से है।

विज्ञान ने स्वयं हमें अपने ऊपर पूरा प्रभुत्व प्रदान किया है। अर्थात जिस प्रकार संविधान की प्रस्तावना में वर्णित "सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न" शब्द का आशय "इस देश की अच्छाई-बुराई के लिए हमारे अपने निर्णय जिम्मेदार होंगे। हमें किसी भी दूसरे व्यक्ति के कहे पर चलने की आवश्यकता नहीं है। हम निर्णय लेने में स्वयं सक्षम/समर्थ हैं।" से होता है। ठीक उसी प्रकार विज्ञान के उपयोग को लेकर भी हम मनुष्य सक्षम हैं। क्योंकि विज्ञान खोजे गए ज्ञान द्वारा मनुष्य की समझ विकसित करता है। खोजे गए ज्ञान के साथ-साथ जब हम उस विधि या प्रक्रिया को समाज के सामने रखते हैं। जिसके उपयोग से हमने खोज की है। तो विज्ञान हमे उसके उपयोग को लेकर निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। इसलिए हम स्वीकारते हैं कि आने वाला परिणाम हमारे अपने निर्णय की प्रतिक्रिया होती है। हम स्वयं इस परिणाम के लिए जिम्मेदार होते हैं। परिणाम की अच्छाई या बुराई हमारे अपने निर्णय का परिणाम होता है। अर्थात विज्ञान न ही अच्छा है और न ही बुरा है। उसका उपयोग कैसे करना है ? यह हम मनुष्यों पर निर्भर करता है।

"विज्ञान में मनुष्य का प्रभुत्व" अर्थात विज्ञान के विकास की दर और उसकी अच्छाई-बुराई का परिणाम मनुष्य के निर्णय पर निर्भर करता है। जबकि "प्रकृति में मनुष्य का प्रभुत्व" अर्थात उस व्यवस्था रुपी तंत्र पर मनुष्य का नियंत्रण जिसके द्वारा वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है। आवश्यकतानुसार उस व्यवस्था में बदलाव कर सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य प्रकृति के प्रति अपनी अधिक से अधिक समझ विकसित करे। और उसकी सीमाओं का निर्धारण करे। जबकि विज्ञान में मनुष्य का प्रभुत्व सिर्फ उसके उपयोग तक सीमित है। अर्थात विज्ञान के उपयोग को लेकर मनुष्य स्वतंत्र है। खोज करने के लिए स्वतंत्र है। परन्तु परिणाम प्रकृति निर्धारित करती है। विज्ञान में प्रभुत्व अर्थात रास्ते के चुनाव की स्वतंत्रता जबकि प्रकृति में प्रभुत्व अर्थात मंजिल रुपी व्यवस्था में आवश्यकतानुसार बदलाव...

विज्ञान के कार्यक्षेत्र की व्यापकता

जो (भी) है सिर्फ़ वही विज्ञान का कार्यक्षेत्र है। जबकि जो नही है वह भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत अाता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का कार्यक्षेत्र न केवल विज्ञान के कार्यक्षेत्र से अधिक व्यापक होता है। बल्कि विज्ञान का कार्यक्षेत्र भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आता है।

जो (भी) है, एेसा क्यों है ? ऐसा कैसे है ? अर्थात भौतिकता के रूपों और घटनाओं के कारण तथा प्रकार्य को जानने/खोजने और उसका अध्ययन करने तक विज्ञान कार्य करता है। जबकि "यदि ऐसा नहीं होता" या " यदि ऐसा होता" के परिणामस्वरूप क्या होता को जानने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उपयोग किया जाता है। जो नहीं है और जो हो सकता है, उसके बारे में यथार्थता के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा जानकारी जुटाई जा सकती है। क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण संगतता पर आधारित होता है। इस आधार पर संभावनाओं को लेकर तर्क-वितर्क किए जा सकते हैं और चर्चा के दौरान सभी एक मत भी हो सकते हैं। शर्त सिर्फ इतनी सी है कि चर्चा के दौरान सभी पक्षों को विषय संबंधी कारक और घटकों की उपस्थिति तथा उनकी मात्रा की जानकारी पहले से ज्ञात होनी चाहिए।

विज्ञान का कार्य सभी स्तरों में प्रकृति के अध्ययन तक सीमित होता है।

दिन-रात क्यों होते हैं ? पाचनतंत्र कैसे कार्य करता है ? प्रश्नों के उत्तर विज्ञान द्वारा खोजे जाते हैं। जबकि यदि सूर्य नहीं होता तो क्या होता ? या मंगल ग्रह में जीवन होता तो कैसा (किस तरह का) होता ? प्रश्नों के उत्तर वैज्ञानिक दृष्टिकोण द्वारा दिए/खोजे जाते हैं।
विज्ञान, उस धारदार चाकू के समान है जिसका उपयोग करना हमारे हाथों में है। या तो आप उससे सब्जी/फलों को काटकर अपने दैनिक जीवन में उसका उपयोग कर सकते हैं। या फिर उससे किसी की हत्या करके पूरे जीवन जेल में रहकर हत्या का अफ़सोस मना सकते हैं। विज्ञान न ही अच्छा होता है और न ही बुरा। हमारे द्वारा उसको उपयोग में लाने के बाद विज्ञान के प्रभाव अच्छे और बुरे कहलाते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में तकनीक विकसित करना असंभव है। अर्थात वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा ही तकनीक को साकार रूप दिया जाता है। विज्ञान का उपयोग किया जाता है। आविष्कार किये जाते हैं। जो आज से पहले नहीं थे। उन्हें निर्मित किया जाता है। यह तब भी संभव है जब लोगों को तकनीकी ज्ञान होने के बाबजूद उसके पीछे का विज्ञान ज्ञात नही होता है। कंप्यूटर को कैसे उपयोग में लाया जाता है ? किस खराबी को कैसे दूर किया जाता है ? यह सब उन लोगों से बखूबी आता है। परन्तु यह क्यों किया जाता है ? कंप्यूटर कैसे कार्य करता है ? अर्थात उसके पीछे के विज्ञान से वे (लोग) अंजान रहते हैं। यह इस बात का संकेत है कि भले ही उन्हें विज्ञान का ज्ञान न हो। परन्तु उन लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जो समाज के लिए हितकारी है। परन्तु ऐसा होने से विज्ञान की उपयोगिता कम नही होती है। विज्ञान की अपनी यह विशेषता है कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण की व्यापकता में वृद्धि करता है। हमें जितनी अधिक विज्ञान की जानकारी होगी। हमारी दृष्टी संगतता के आधार पर उतनी ही व्यापक होती चली जाएगी। विज्ञान के माध्यम से हम यह भी जान पाएंगे कि जो (जिनका अस्तित्व) आज से पहले हमें असंगत प्रतीत होते थे। वे सभी संगत हैं। फलस्वरूप हम उनका भी आविष्कार कर पाएंगे। जो हमारी कल्पनाओं में तो पहले से उपस्थित थे। परन्तु उनका आविष्कार करना युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता था।

विज्ञान का कार्यक्षेत्र भौतिकता के रूपों और घटनाओं के कारण तथा प्रकार्य को खोजने और उसे परिभाषित करने तक सीमित होता है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत विज्ञान का उपयोग समस्याओं को सुलझाने, परिभाषित ज्ञान के आधार पर तुलना करने और तकनीक विकसित करने में किया जाता है। विज्ञान का संबंध खोज तक सीमित होता है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संबंध विज्ञान को खोजने के साथ-साथ उसकी उपयोगिता को निर्धारित करने में किया जाता है।

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