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समान्तर ब्रह्माण्ड को समझना और उस पर अध्ययन करना बहुत ही जटिल कार्य है। क्योंकि समान्तर ब्रह्माण्ड की शुरुआत एक ही बिंदु या स्थिति से होती है और आगे चलकर उन ब्रह्माण्ड की दिशा या अवस्था भिन्न-भिन्न हो जाती है। यह ठीक उसी तरह से होता है जैसे कि किसी विषय की शुरुआत एक मुद्दे से होती है। परन्तु वह मुद्दा व्यक्ति विशेष की सोच के अनुरूप भिन्न-भिन्न दिशा में विचरण करने लगता है। हमें ज्ञात रहे विशेष समय या स्थिति के लिए प्रत्येक समान्तर ब्रह्माण्ड का मान सदैव एक समान रहता है।


वास्तव में समान्तर ब्रह्माण्ड की अवधारणा संभावनाओं पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए वर्तमान स्थिति वही बिंदु है। जहाँ से समान्तर ब्रह्माण्ड की शुरुआत होती है। और आने वाला समय अर्थात भविष्य उसकी संभावनाओं को दर्शाता है। याद रहे प्रकृति प्रायिकता पर कार्य करती है। परिणाम स्वरुप भविष्य की सभी संभावनाएँ एक साथ, एक ही समय पर, किसी न किसी दिशा में अवश्य उपस्थित रहती हैं। यही समान्तर ब्रह्माण्ड का स्वरुप है।

इस विषय के निष्कर्ष और भी मजेदार हैं। इसे एक तरह का जादू ही समझिये।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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