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जब दो रेलगाड़ियाँ एक ही दिशा में भिन्न-भिन्न वेग से गतिशील हों। तब आप देखेंगे कि कम वेग से गतिशील रेलगाड़ी अधिक वेग से गतिशील रेलगाड़ी के सापेक्ष पीछे-पीछे गतिशील न होकर, पीछे की ओर गतिशील होती हुई प्रतीत होती है। यह साधारण सापेक्षता का उदाहरण है।


विज्ञान में प्रतीत होने का दो तरह से अध्ययन किया जाता है। एक तो भ्रम की स्थिति को निर्धारित करने में.. और दूसरा तब जब सैद्धांतिक रूप से हमें यह ज्ञात हो जाता है कि प्रयोगों द्वारा इसे प्रमाणित नहीं की जा सकता। यही वह स्थिति होती है जब हम प्रकृति के समकक्ष होते हैं। उदाहरण स्वरुप प्रकाश की गति के समकक्ष वेग से गतिशील वस्तु की लम्बाई में कमी को मापने के लिए जरुरी है कि प्रेक्षक भी उसी वेग से गतिशील हो। अर्थात प्रेक्षक की लम्बाई में भी कमी आएगी। फलस्वरूप हम प्रकाश की गति से गतिशील वस्तु की लम्बाई की कमी को नहीं माप सकेंगे। क्योंकि मापन की क्रिया अनुपातिक क्रिया होती है। वस्तु तथा प्रेक्षक में समान अनुपात में कमी आएगी। क्योंकि वस्तु तथा प्रेक्षक की गति समान है। भ्रम की स्थिति साधारण सापेक्षता और प्रायोगिक कमी के रूप में आंकी जाने वाली स्थिति विशेष सापेक्षता के अंतर्गत आती है।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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