ads

Style1

Style2

Style3[OneLeft]

Style3[OneRight]

Style4

Style5

समय और अंतरिक्ष के बारे में

समय और अंतरिक्ष दोनों पदार्थ द्वारा परिभाषित होते हैं क्योंकि इनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। ये दोनों किसी भी चीज से निर्मित नहीं हैं और न ही पदार्थ की अनुपस्थिति में इनका कोई अर्थ निकलता है। इसलिए समय और अंतरिक्ष दोनों को अमूर्त कहा जाता है और ये दोनों पदार्थ की उपस्थिति में परिभाषित होते हैं। इसलिए यह प्रश्न करना सर्वदा अनुचित है कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति से पहले क्या था ? ब्रह्माण्ड के उस तरफ क्या है ? ब्रह्माण्ड कहाँ स्थित है ? क्या विलक्षण बिंदु उत्पत्ति के पहले गतिशील था ? स्पेस कब बना ? इत्यादि....

स्पेस (अंतरिक्ष, आकाश, अंतराल, जगह, अधर, दिक् स्थान, रिक्तता) का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। इसलिए इस प्रश्न का उत्तर देना गलत होगा कि स्पेस किस्से बना है ? और जब स्पेस किसी भी चीज से निर्मित नही है। तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि स्पेस अब बना या तब बना था। बल्कि समय की तरह स्पेस भी पदार्थ की उपस्थिति में परिभाषित होता है। इसलिए हम महानाद के बाद से ही स्पेस के अस्तित्व को परिभाषित करते हैं और उसका संज्ञान ले सकते हैं। हम वास्तव में जिसे स्पेस कहते हैं। वहां भी ऊर्जा अथवा पदार्थ के होने की संभावना जताई जाती है। यहाँ तक कि जिस अंतरिक्ष को हम रिक्त मानते हैं। वहां भी हाइड्रोज़न और अन्य तत्वों के परमाणु उपस्थित होते हैं। परन्तु इसका मतलब यह नही है कि अंतरिक्ष हाइड्रोज़न या अन्य तत्वों से मिलकर बना है। अब प्रश्न यह उठता है कि स्पेस किसे कहते हैं ? पदार्थ की अनुपस्थिति में स्पेस को परिभाषित करना असंभव है। इसलिए कहा जाता है कि स्पेस का प्रादुर्भाव ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय हुआ है। पदार्थ की उपस्थिति में स्पेस तीन तरह से परिभाषित होता है।

1. पदार्थ (पिंडों और कणों के माध्यम से) जितना स्थान घेरता है।
2. पिंडों के मध्य का वह स्थान जिसे पदार्थ के माध्यम से कण घेर सकता है।
3. ब्रह्माण्ड का घन्तव या अंतरिक्ष


आयाम के रूप में समय और निर्देशांकों में अंतर
भले ही दिक् (दिशा/अंतरिक्ष) और काल की उत्पत्ति ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के साथ ही हुई है। दिक् और काल भले ही आपस में गुथे हुए हों। परन्तु दिक् और काल दोनों भिन्न-भिन्न चीजें हैं।
1. क्योंकि समय के साथ दिक् अर्थात दिशा में विस्तार होता है। परन्तु काल में विस्तार नहीं होता है।
2. समय की माप हमेशा 1 (एक) से शुरू होती है जबकि निर्देशांकों की माप 0 (शून्य) से शुरू होती है। क्योंकि शून्य समय का कोई अर्थ नहीं होता है।
3. समय सदैव एक ही दिशा अर्थात लगातार वृद्धि करता है। जबकि निर्देशांकों की माप यह कहती है कि यह घट (कम) भी सकती है।
4. सापेक्षता के आधार पर समय के बारे में यह कहा जाता है कि वह आगे चल रहा है और मैं उसके सापेक्ष पीछे चल रहा हूँ। परन्तु निर्देशांकों के बारे में यह कहा जाता है कि वह मेरे सापेक्ष आगे जा रहा है और मैं उसके सापेक्ष पीछे जा रहा हूँ। अर्थात समय के बारे में दोनों एक ही दिशा (आगे की ओर) में बढ़ रहे हैं जबकि निर्देशांकों के बारे में दोनों एक दूसरे के विपरीत जा रहे हैं।
5. समय के मूर्त रूप का अर्थ किसी काल में घटित घटनाओं के मध्य के भौतिक अंतर से है। जबकि निर्देशांकों का मूर्त रूप दो काल के मध्य को तय करने वाले पिंड के मार्ग और उस पिंड की गति से परिभाषित होता है।

समय पदार्थ की मात्रा अर्थात द्रव्यमान के रूप में
1. जब हम पदार्थ की मात्रा के रूप में परमाणु से लेकर आकाशगंगा तक के निर्माण को समय द्वारा परिभाषित करते हैं। अर्थात टाइमलाइन के माध्यम से हम क्रमशः निम्न द्रव्यमान से लेकर उच्च द्रव्यमान वाले तंत्रों के निर्माण को दर्शाते हैं। इस प्रकार टाइमलाइन के माध्यम से समय का पहला रूप क्षण परिभाषित होता है।
2. जब हम पदार्थ के प्रवाह या जलने की दर का उपयोग घड़ी बनाने में करते हैं। तब हम पदार्थ की मात्रा का उपयोग समय मापन के रूप में करते हैं। इस प्रकार समय के दूसरे रूप गुजरे समय की अवधि परिभाषित होती है। उदाहरण के लिए समय नियतांक के रूप में परिभाषित होता है। जिससे ब्रह्माण्ड की अवस्था का ज्ञान होता है।
3. समय का तीसरा रूप आयु कभी भी प्रत्यक्ष रूप से परिभाषित नहीं होता है। क्योंकि समय यहाँ नियतांक के रूप में कार्य करता हैं। परन्तु इसे स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। ब्रह्माण्ड के अंत के सभी संभावित परिदृश्यों के अंतर्गत ब्रह्माण्ड का अंत आकाशगंगा से परमाणु की ओर होगा। अर्थात ब्रह्माण्ड के निपात या अंत की शुरुआत आकाशगंगा से होगी और अंत परमाणु जैसे कम द्रव्यमान वाले कणों/तंत्र के पतन से होता है।

क्या अंतरिक्ष अनंत है ?
सर्वप्रथम जर्दानो ब्रूनो ने इस विचार को लेकर प्रश्न उठाया कि यदि ब्रह्माण्ड सीमित है तो उस सीमा के उस तरफ क्या है ? और यदि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है तो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के पहले क्या था ? इन प्रश्नों की अपनी कोई सार्थकता नहीं है क्योंकि समय और दिशा/अंतरिक्ष का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। यह पदार्थ की उपस्थिति में परिभाषित होते हैं। या इनका संज्ञान पदार्थ की उपस्थिति में ही लगाया जा सकता है। इसलिए ये दोनों प्रश्न सर्वदा अनुचित हैं। वास्तव में इन प्रश्नों के माध्यम से जर्दानो ब्रूनो अंतहीन ब्रह्माण्ड की संकल्पना देना चाहते थे। जिसके बारे में ग्रहों की गति संबंधी नियम देने वाले खगोल वैज्ञानिक केप्लर का तर्क था कि यदि ब्रह्माण्ड अंतहीन है। तो रात के समय अंतरिक्ष में समरूपता दिखाई देनी चाहिए और अंतरिक्ष में किसी भी ओर अंधकार नहीं होना चाहिए। परन्तु ऐसा दृष्टिगोचर नहीं होता है इसलिए केप्लर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि तारों की संख्या अवश्य ही सीमित होगी। परन्तु यह कैसे संभव है कि अनंत अंतरिक्ष में प्रकाशवान तारे सीमित हैं। तब तो अनंत अंतरिक्ष की उपस्थिति में ब्रह्माण्ड के अनंत होने की अवधारणा संभव नही हो सकती थी ?

इस विसंगति को दूर करने के लिए हब्बल ने अपने अवलोकनों के द्वारा इस निष्कर्ष की पुष्टि करी कि ब्रह्माण्ड स्थिर अवस्था में नहीं है बल्कि वह गतिशील है। अर्थात इस ब्रह्माण्ड में कुछ तारें ऐसे भी हैं जिनका (एक निश्चित सीमा से दूर के तारों का) प्रकाश हम तक कभी नहीं पहुँच पाएगा। क्योंकि प्रकाश की अपनी सीमित गति है और साथ ही साथ ब्रह्माण्ड विस्तार कर रहा है। जिसका ज्ञान हमें पहले नहीं था। इन दोनों तथ्यों के मिलेजुले स्वरुप की गणनाओं के आधार पर यह सीमा 125 करोड़ प्रकाश वर्ष ज्ञात की गई है। अर्थात रात के समय अंतरिक्ष में तारे एकरूपता के साथ अंतरिक्ष के अंधकार को मिटाते हों, तर्क के अनुसार अब यह जरुरी नहीं रह गया था। और इस तरह से स्थिर ब्रह्माण्ड की संकल्पना को ख़ारिज कर दिया गया। इसके बदले में दोलित ब्रह्माण्ड की संकल्पना जो प्राचीन भारतीय अवधारणा है। ब्रह्माण्ड के संभावित स्वरुप की दौड़ में शामिल हो गई। परन्तु यह प्रश्न अभी भी बना था कि क्या ब्रह्माण्ड अनंत है या इसकी अपनी कोई सीमा है ?

साधारण सापेक्षता और गतिशील ब्रह्माण्ड के सिद्धांत की खोज के बाद फ्रीडमैन ने ब्रह्माण्ड के निदर्श के रूप में दिक और काल से बने स्वरुप को प्रस्तुत किया था। जिसे बाद में चलकर और विश्लेषित किया गया ताकि ब्रह्माण्ड की नियति को दिक-काल के द्वारा समझा जा सके। फलस्वरूप ब्रह्माण्ड के संभावित परिदृश्यों में से एक के अनुसार ब्रह्माण्ड का गुरुत्वाकर्षण बल इतना प्रबल होता है कि आकाश भी ब्रह्माण्ड की ओर झुक जाता है। दूसरे शब्दों में आकाश ब्रह्माण्ड को ढक लेता है। इसके लिए गुरुत्वाकर्षण का श्याम ऊर्जा के साथ की खींचतान में गुरुत्वाकर्षण का भारी पड़ना जरुरी है। फलस्वरूप अंतरिक्ष की वक्रता बंद ब्रह्माण्ड का समर्थन करती हुई दिखाई देती है। इस परिदृश्य के अनुसार ब्रह्माण्ड की कोई सीमा नहीं है अर्थात किसी एक दिशा में गतिशील रहने के बाद भी आपको किसी भी तरह की सीमा के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। बल्कि एक समय के बाद आप अपने आप को उसी स्थान पर पाएंगे। जहाँ से आपने शुरुआत की थी। इस तरह से ब्रह्माण्ड की प्रकृति सीमित हो जाती है। परन्तु ब्रह्माण्ड के अनंत होने का अनुभव हमेशा बना रहता है। क्योंकि हम दिक-काल से निर्मित अंतरिक्ष में रहते हैं। ब्रह्माण्ड की प्रकृति सीमित होते हुए भी हमारे सापेक्ष बहुत विशाल और व्यापक है। परन्तु अनंत नहीं है। क्योंकि इसका कोई सार्थक अर्थ नहीं निकलता है।


दिक्-काल के आधार पर ब्रह्माण्ड के स्वरूप को निर्धारित करने वाला पहला परिदृश्य (अ), ब्रह्माण्डिकी की पूर्ववर्ती अवधारणा थी। जिसके अनुसार दिक्-काल को निरपेक्ष मानकर ही गणना की जाती थी। फलस्वरूप हम ब्रह्माण्ड के अनंत होने के पक्षधर थे अन्यथा ब्रह्माण्ड के बाहर क्या है ? प्रश्न करते थे। क्योंकि हम एक ही क्षण में स्वयं को ब्रह्माण्ड की सीमा के बाहर लाकर खड़ा करके प्रश्न करने लगते थे और दिक्-काल के निरपेक्ष अथवा सापेक्ष होने का ख्याल ही नहीं करते थे। सर्वप्रथम सर आइजैक न्यूटन ने स्पष्ट रूप से समय के निरपेक्ष होने की बात स्वीकारी थी। परन्तु वास्तविकता यही है कि समय सापेक्ष है। हम दिक्-काल के निर्देशांक के रूप में सापेक्षीय गणना करते हैं। अर्थात दूसरा परिदृश्य (ब) वास्तविकता है।

शीर्ष