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गणित एक भाषा है। जबकि प्रायिकता एक गणितीय अवधारणा है। क्योंकि प्रायिकता का इस व्यवहारिक दुनिया से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। अर्थात प्रायिकता का पूर्ववर्ती घटनाओं के साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं होता है। इसे आप इस तरह से समझिए, पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है। अर्थात 6 बार में एक बार 2 आना चाहिए। परन्तु व्यव्हार में जरुरी नहीं है कि 6 बार में एक बार भी 2 आए। ऐसा भी हो सकता है कि लगातार पांच बार 2 आ जाए। और ऐसा भी हो सकता है कि पांच बार में 2 नहीं आया है, छटवी बार भी 2 नहीं आए। सीधा सा अर्थ है कि प्रायिकता पूर्ण रूप से एक अनिश्चित अवधारणा है। इस प्रकार गणित भाषा का उपयोग गलत अर्थ भी दे सकता है। वास्तव में पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है, का अर्थ यह नहीं होता है कि 6 बार में एक बार 2 आएगा। पाँसे में 2 आने की प्रायिकता 1/6 होती है, का अर्थ यह होता है कि प्रत्येक बार पाँसे को उछालने पर 2 आने की सम्भावना 1/6 अर्थात 16 % होती है। याद रहे प्रत्येक बार पाँसे को उछालने पर प्रायिकता एक समान होती है। प्रायिकता के 50 प्रतिशत से अधिक होने के बाद भी कोई भी गणितज्ञ प्रायिकता के आधार पर जीतने की निश्चितता को लेकर शर्त नहीं लगाता है। क्योंकि वह जानता है कि प्रायिकता पूर्ण रूप से एक अनिश्चित अवधारणा है। इसका एक उदाहरण आप इस लेख में पढ़ सकते हैं।

ताश में : प्रायिकता से अधिक बड़ी पत्ती को महत्व दिया जाता है
सिक्के को उछालकर शर्त लगाना प्रायिकता पर आधारित खेल है। क्योंकि चित (Heads) या पट (Tails) आने की प्रायिकता बराबर अर्थात 50-50 प्रतिशत होती है। पाँसे को उछालकर सम (2,4,6) या विषम (1,3,5) आने पर शर्त लगाना भी प्रायिकता पर आधारित खेल है। अर्थात वे सभी खेल जिसमें दोनों पक्ष या सभी पक्ष के पास जीतने की संभावना बराबर होती है। प्रायिकता पर आधारित खेल कहलाते हैं। यदि पाँसे को उछालकर एक पक्ष 2 आने की संभावना पर शर्त लगाता है और दूसरा पक्ष 2 नहीं आने की संभावना पर शर्त लगाता है। तो ऐसे खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं कहेंगे। क्योंकि 2 न आने की प्रायिकता (84%) 2 आने की प्रायिकता (16 %) से पांच गुनी होती है। अर्थात दोनों या सभी पक्ष के जीतने की संभावना बराबर नहीं है। इसलिए ऐसे खेल प्रायिकता आधारित खेल नहीं कहलाते हैं।

अनिश्चित अवधारणा के रहते लगातार सातवीं जीत
ताश का खेल भी कई कारणों से प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं है। वो बात अलग है कि हम ताश के खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल मानते हैं। निम्न कारणों से ताश का खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं है।
  1. ताश को बांटने का तरीका
  2. ताश के खेल में सभी पत्ती संख्या के आधार पर एक दूसरे से बड़ी होती हैं। इसलिए खेल में बड़ी पत्ती को अधिक महत्व दिया जाता है। न कि सिर्फ कम प्रायिकता (विशेष संयोग) को महत्व दिया जाता है। उदाहरण के लिए सत्ता (7), छक्का (6) से बड़ी पत्ती होती है।
  3. फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता से कम होती है। जबकि खेल में त्रिल आने को अधिक महत्व दिया जाता है।
  4. इक्का, दुप्पी और बादशाह को रन नहीं गिना जाता है। जबकि इक्का, बेगम और बादशाह को रन (विशेष संयोग) गिना जाता है।
  5. यदि दो खिलाड़ी के पास एक समान संख्या की पत्ती आ जाती हैं तो पत्ती शो कराने वाला खिलाड़ी हारा माना जाता है।
ताश के द्वारा हम अनेक खेल खेलते हैं। उनमें से जिन खेलों में ये पांच में से कोई भी एक कारण होता है तो वह खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं माना जा सकता है। आइये इस पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

1. ताश के जिस खेल में दो या दो से अधिक खिलाड़ी खेल रहे हों तथा ताश की एक-एक पत्ती सभी खिलाड़ियों को या एक-एक खिलाड़ी को बराबर पत्ती बांटी जाती है। तो वह खेल प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं रह जाता है। इसे आप इस तरह से समझिए। हम ताश की पत्ती को दो तरह से बाँट सकते हैं। पहला : सभी खिलाडियों को एक-एक करके पत्ती बाँटना। दूसरा : प्रत्येक खिलाड़ी को एक ही बार में बराबर-बराबर पत्ती बाँटना। परन्तु जब हम किसी भी तरह से दो या दो से अधिक लोगों के बीच में पत्ती को बाटंते हैं तो वह खेल हमारे लिए प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं रह जाता है। क्योंकि तब विशेष संयोग अर्थात फ़्लैश, त्रिल, रन, कलर या डबल आने की प्रायिकता ज्ञात नहीं की जा सकती है। तब हमें यह ज्ञात नहीं हो सकता है कि विशेष संयोग के लिए आवश्यक पत्ती बांटी जा चुकी है या नहीं !! अनिश्चितता के कारण संभावित यथार्थ (प्रायिकता) को जानना नामुमकिन होता है। इसलिए यह प्रायिकता पर आधारित खेल न होने का एक बहुत महत्वपूर्ण कारण है। विस्तार से समझने के लिए इस लेख का उदाहरण न 1 पढ़े। विशेष संयोग बन पाने के लिए आवश्यक पत्ती का ज्ञान अनिश्चितता (पत्ती बांटी जा चुकी है या नहीं) द्वारा नहीं लगाया जा सकता है। इसलिए हम इस खेल को प्रायिकता पर आधारित खेल नहीं कहते हैं। भले ही सभी खिलाड़ियों के साथ एक बराबर की अनिश्चितता बनी रहती है।

1 ले, 2 रे, 6 वे. और 7 वे. दाव की तस्वीर : प्रायिकता का असमान वितरण । 7 वे. दाव में रन (A/Q/K) का दोहराव

2. फ़्लैश, त्रिल, रन, कलर या डबल आने की प्रायिकता क्रमशः एक दूसरे से अधिक होती है। साथ ही ताश की पत्ती बांटने के तरीके के आधार पर प्रायिकता परिवर्तित होती है। परन्तु क्रम यही रहता है। खेल में जितनी कम प्रायिकता उस संयोग के निर्मित होने को उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। अर्थात यदि किसी के पास त्रिल बन गया और किसी के पास डबल तो चूँकि त्रिल बनने की प्रायिकता डबल से कम होती है। इसलिए जिसके पास त्रिल बना है विजयी कहलाएगा। मतलब की प्रायिकता महत्वपूर्ण होती है। फिर चाहे त्रिल इक्का (1) की बने या दहला (10) की। परन्तु खेल में संख्या के आधार पर पत्ती एक दूसरे से बड़ी मानी जाती है। इस आधार के कारण खेल प्रायिकता पर आधारित न होकर संभावना पर आधारित हो जाता है।

3. एक-एक करके ताश की पत्ती बांटने पर फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता से अधिक होती है। जबकि प्रत्येक खिलाड़ी को एक ही बार में बराबर-बराबर पत्ती बाँटने पर फ़्लैश आने की प्रायिकता त्रिल आने की प्रायिकता के बराबर होती है। सीधा सा अर्थ है खेल में फ़्लैश को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए था। परन्तु खेल में त्रिल आने को अधिक महत्व दिया जाता है। इसलिए यह शर्त भी उस खेल के प्रायिकता पर आधारित होने का खंडन करती है।

4. संख्या के आधार क्रमशः तीन पत्ती के संयोग को रन कहा जाता है। परन्तु खेल में इक्का, दुप्पी और बादशाह को रन के अंतर्गत नहीं रखा जाता है। जिससे कि रन के एक विशेष संयोग बनने की संभावना कम हो जाती है। अर्थात खेल में प्रायिकता को अधिक महत्व न देकर बड़ी पत्ती को अधिक महत्व दिया जाता है। जिसके अंतर्गत इक्का (1) को सबसे बड़ी पत्ती माना जाता है।

5. इसके अलावा यदि किन्ही दो खिलाडियों के पास एक समान पत्ती है। तब तो खेल में हार-जीत का फैसला असंभव होना चाहिए था। अर्थात स्पष्ट निर्णय के आभाव में खेल को पुनः खेला जाना चाहिए था। परन्तु खेल में हार-जीत का फैसला पत्ती को शो करने वाले पर निर्भर करता है। अर्थात जो पत्ती शो करता है। वह व्यक्ति हारा हुआ मान लिया जाता है। क्योंकि ऐसा मान लिया जाता है कि उसे अपनी जीत पर विश्वास ही नहीं था।

प्रायिकता के आधार पर किसी को नहीं जीतना चाहिए था।
प्रायिकता भले ही एक अनिश्चित अवधारणा है। इसके बाद भी वह विज्ञान में सहायक है। क्योंकि प्रायिकता में घटनाओं की संभावनाओं की सीमा की निश्चितता होती है। अर्थात प्रायिकता ज्ञात करने में यादृच्छिक (Random) घटनाओं के परिणामों का एक समष्टि समुच्चय बनाया जाता है। इसमें विज्ञान की दो विशेषताएं/गुण शामिल होते हैं। पहला : यादृच्छिक आंकड़े इकट्ठे किये जाते हैं। और दूसरा : घटनाओं का समष्टि अध्ययन किया जाता है। इन विशेषताओं/गुणों के रहते प्रायिकता विज्ञान में उपयोगी है। वर्तमान में प्रायिकता का उपयोग क्वांटम जगत के रहस्यों को सुलझाने में किया जा रहा है। सर अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपने पहले शोध ऊर्जाणुवाद के रूप में कण और तरंग सिद्धांत का एकीकरण करके क्वांटम भौतिकी की नींव रखी थी। परन्तु सर अल्बर्ट आइंस्टीन क्वांटम भौतिकी को विज्ञान नहीं मानते थे। भले उन्होंने ही क्वांटम भौतिकी की नींव रखी थी। वे अपने अंतिम दिनों तक क्वांटम भौतिकी को विज्ञान मानने से इंकार करते रहे। क्योंकि प्रायिकता पर आधारित क्वांटम सिद्धांत तब तक अपेक्षाकृत अधूरा ही था।

आधारभूत ब्रह्माण्ड के बारे में

आधारभूत ब्रह्माण्ड, एक ढांचा / तंत्र है। जिसमें आयामिक द्रव्य की रचनाएँ हुईं। इन द्रव्य की इकाइयों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ। आधारभूत ब्रह्माण्ड के जितने हिस्से में भौतिकता के गुण देखने को मिलते हैं। उसे ब्रह्माण्ड कह दिया जाता है। बांकी हिस्से के कारण ही ब्रह्माण्ड में भौतिकता के गुण पाए जाते हैं। वास्तव में आधारभूत ब्रह्माण्ड, ब्रह्माण्ड का गणितीय भौतिक स्वरुप है।
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